July 24, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 369 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय आत्यन्तिक प्रलय एवं गर्भ की उत्पत्ति का वर्णन आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्तिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी ! अब मैं ‘आत्यन्तिक प्रलय’ का वर्णन करूँगा । जब जगत् के आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक संतापों को जानकर मनुष्य को अपने से भी वैराग्य हो जाता है, उस समय उसे ज्ञान होता है और ज्ञान से इस सृष्टि का आत्यन्तिक प्रलय होता है ( यही जीवात्मा का मोक्ष है ) । आध्यात्मिक संताप ‘शारीरिक’ और ‘मानसिक’ भेद से दो प्रकार का होता है। ब्रह्मन् ! शारीरिक ताप के भी अनेकों भेद हैं, उन्हें श्रवण कीजिये । जीव भोगदेह का परित्याग करके अपने कर्मों के अनुसार पुनः गर्भ में आता है । वसिष्ठजी ! एक ‘आतिवाहिक ‘ संज्ञक शरीर होता है, वह केवल मनुष्यों को मृत्युकाल उपस्थित होने पर प्राप्त होता है । विप्रवर ! यमराज के दूत मनुष्य के उस आतिवाहिक शरीर को यमलोक के मार्ग से ले जाते हैं । मुने! दूसरे प्राणियों को न तो आतिवाहिक शरीर मिलता है और न वे यमलोक के मार्ग से ही ले जाये जाते हैं । तदनन्तर यमलोक में गया हुआ जीव कभी स्वर्ग में और कभी नरक में जाता है । जैसे रहट नामक यन्त्र में लगे हुए घड़े कभी पानी में डूबते हैं और कभी ऊपर आते हैं, उसी तरह जीव को कभी स्वर्ग और कभी नरक में चक्कर लगाना पड़ता है। ‘ब्रह्मन्! यह लोक कर्मभूमि है और परलोक फलभूमि । यमराज जीव को उसके कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों तथा नरकों में डाला करते हैं । यमराज ही जीवों द्वारा नरकों को परिपूर्ण बनाये रखते हैं । यमराज को ही इनका नियामक समझना चाहिये । जीव वायुरूप होकर गर्भ में प्रवेश करते हैं । यमदूत जब मनुष्य को यमराज के पास ले जाते हैं, तब वे उसकी ओर देखते हैं । ( उसके कर्मों पर विचार करते हैं — ) यदि कोई धर्मात्मा होता है तो उसकी पूजा करते हैं और यदि पापी होता है तो अपने घर पर उसे दण्ड देते हैं। चित्रगुप्त उसके शुभ और अशुभ कर्मों का विवेचन करते हैं । धर्म के ज्ञाता वसिष्ठजी ! जबतक बन्धु-बान्धवों का अशौच निवृत्त नहीं होता, तबतक जीव आतिवाहिक शरीर में ही रहकर दिये हुए पिण्डों को भोजन के रूप में अपने साथ ले जाता है । तत्पश्चात् प्रेतलोक में पहुँचकर प्रेतदेह (आतिवाहिक शरीर ) — का त्याग करता है और दूसरा शरीर ( भोगदेह) पाकर वहाँ भूख-प्यास से युक्त हो निवास करता है। उस समय उसे वही भोजन के लिये मिलता है, जो श्राद्ध के रूप में उसके निमित्त कच्चा अन्न दिया गया होता है । प्रेत के निमित्त पिण्डदान किये बिना उसको आतिवाहिक शरीर से छुटकारा नहीं मिलता, वह उसी शरीर में रहकर केवल पिण्डों का भोजन करता है । सपिण्डीकरण श्राद्ध करने पर एक वर्ष के पश्चात् वह प्रेतदेह को छोड़कर भोगदेह को प्राप्त होता है । ‘ भोगदेह’ दो प्रकार के बताये गये हैं — शुभ और अशुभ । भोगदेह के द्वारा कर्मजनित बन्धनों को भोगने के पश्चात् जीव मर्त्यलोक में गिरा दिया जाता है । उस समय उसके त्यागे हुए भोगदेह को निशाचर खा जाते है । ब्रह्मन् ! यदि जीव भोगदेह के द्वारा पहले पुण्य के फलस्वरूप स्वर्ग का सुख भोग लेता है और पाप भोगना शेष रह जाता है तो वह पापियों के अनुरूप दूसरा भोगशरीर धारण करता है। परंतु जो पहले पाप का फल भोगकर पीछे स्वर्ग का सुख भोगता है, वह भोग समाप्त होने पर स्वर्ग से भ्रष्ट होकर पवित्र आचार-विचार वाले धनवानों के घर में जन्म लेता है। वसिष्ठजी ! यदि जीव पुण्य के रहते हुए पहले पाप भोगता है तो उसका भोग समाप्त होने पर वह पुण्यभोग के लिये उत्तम ( देवोचित) शरीर धारण करता है । जब कर्म का भोग थोड़ा-सा ही शेष रह जाता है तो जीव को नरक से भी छुटकारा मिल जाता है। नरक से निकला हुआ जीव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनि में ही जन्म लेता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ॥ १-१८ ॥ (मानवयोनि के) गर्भ में प्रविष्ट हुआ जीव पहले महीने में कलल (रज-वीर्य के मिश्रित बिन्दु) — के रूप में रहता है, दूसरे महीने में वह घनीभूत होता है ( कठोर मांसपिण्ड का रूप धारण करता है और) तीसरे महीने शरीर के अवयव प्रकट हो जाते हैं। चौथे महीने में हड्डी, मांस और त्वचा का प्राकट्य होता है । पाँचवें में रोएँ निकल आते हैं। छठे महीने में उसके भीतर चेतना आती है और सातवें से वह दुःख का अनुभव करने लगता है । उसका सारा शरीर झिल्लियों में लिपटा होता है और मस्तक के पास उसके जुड़े हुए हाथ बँधे रहते हैं । यदि गर्भ का बालक नपुंसक हो तो वह उदर के मध्यभाग में रहता है, कन्या हो तो वामभाग में और पुत्र हो तो दायें भाग में रहा करता है । पेट के विभिन्न भागों में रहकर वह पीठ की ओर मुँह किये रहता है । जिस योनि में वह रहता है, उसका उसे अच्छी तरह ज्ञान होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । इतना ही नहीं, वह मनुष्य जन्म से लेकर वर्तमान जन्म तक के अपने सभी वृत्तान्तों का स्मरण करता है। गर्भ के उस अन्धकार में जीव को बड़े कष्ट का अनुभव होता है। सातवें महीने में वह माता के खाये-पीये हुए पदार्थों का रस पीने लगता है। आठवें और नवें महीने में उसको गर्भ के भीतर बड़ा उद्वेग होता है। मैथुन होने पर तो उसे और भी वेदना होती है। माता के अधिक परिश्रम करने पर भी गर्भ के बालक को कष्ट होता है । यदि माँ रोगिणी हो जाय तो बालक को भी रोग का कष्ट भोगना पड़ता है। उसके लिये एक मुहूर्त ( दो घड़ी) भी सौ वर्षों के समान हो जाता है ॥ १९-२५ ॥ जीव अपने कर्मों के अनुसार गर्भ में संतप्त होता है । फिर वह ऐसे मनोरथ करने लगता है, मानो गर्भ से निकलते ही मोक्ष के साधनभूत ज्ञान के प्रयत्न में लग जायगा । प्रसूति-वायु की प्रेरणा से उसका सिर नीचे की ओर हो जाता है और वह योनियन्त्र से पीड़ित होता हुआ गर्भ से बाहर निकल आता है । बाहर आने पर एक महीने तक उसकी ऐसी स्थिति रहती है कि कोई हाथ से छूता है तो भी उसे कष्ट होता है । ‘ख’ शब्दवाच्य आकाश से शरीर के भीतर छोटे-छोटे छेद, कान तथा शून्यता (अवकाश आदि) उत्पन्न होते हैं । श्वासोच्छ्वास, गति और अङ्गों को टेढ़ा- मेढ़ा करके किसी का स्पर्श करना — ये सब वायु के कार्य हैं। रूप, नेत्र, गर्मी, पाचन-क्रिया, पित्त, मेधा, वर्ण, बल, छाया, तेज और शौर्य — ये शरीर में अग्नितत्त्व से प्रकट होते हैं । पसीना, रसना (स्वाद का अनुभव करने वाली जिह्वा ), क्लेद (गलना), वसा ( चर्बी), रसा ( रस- ग्रहण की शक्ति), शुक्र (वीर्य), मूत्र और कफ आदि का जो देह में प्रादुर्भाव होता है, वह जल का कार्य है । घ्राणेन्द्रिय, केश, नख और शिराएँ ( नाड़ियाँ) भूमितत्त्व से प्रकट होती हैं । शरीर में जो कोमल पदार्थ — त्वचा, मांस, हृदय, नाभि, मज्जा, मल, मेदा, क्लेदन और आमाशय आदि हैं, वे माता के रज से उत्पन्न होते हैं । शिरा, स्नायु और शुक्र का प्रादुर्भाव पिता से होता है तथा काम, क्रोध, भय, हर्ष, धर्माधर्म में प्रवृत्ति, आकृति, स्वर, वर्ण और मेहन (मूत्रादिकी क्रिया) आदि जीव के शरीर में स्वतः प्रकट होते हैं (ये दोष और गुण उसके अपने हैं ) । अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, क्षुधा, तृषा, मोह, मात्सर्य, वैगुण्य, शोक, आभास और भय आदि भाव तमोगुण से होते हैं । महामुने ! काम, क्रोध, शौर्य, यज्ञ की अभिलाषा, बहुत बोलने की आदत, अहंकार तथा दूसरों का अनादर करना — ये रजोगुण के कार्य हैं । धर्म की अभिलाषा, मोक्ष की आकाङ्क्षा, भगवान् विष्णु में पराभक्ति का होना, उदारता और उद्योगशीलता – इन्हें सत्त्वगुण से उत्पन्न समझना चाहिये ॥ २६-३६ ॥ चञ्चल, क्रोधी, डरपोक, अधिक बातूनी, कलह में रुचि रखने वाला तथा स्वप्न में आकाश- मार्ग से उड़ने वाला मनुष्य अधिक वात वाला होता है — उसमें वात की प्रधानता होती है। जिसके असमय में ही बाल सफेद हो जायँ, जो क्रोधी, महाबुद्धिमान् और युद्ध को पसंद करने वाला हो, जिसे सपने में प्रकाशमान वस्तुएँ अधिक दिखायी देती हों, उसे पित्तप्रधान प्रकृति का मनुष्य समझना चाहिये। जिसकी मैत्री, उत्साह और अङ्ग सभी स्थिर हों, जो धन आदि से सम्पन्न हो तथा जिसे स्वप्न में जल एवं श्वेत पदार्थों का अधिक दर्शन होता हो, उस मनुष्य में कफ की प्रधानता है । प्राणियों के शरीर में रस जीवन देने वाला होता है, रक्त लेपन का कार्य करता है तथा मांस मेहन एवं स्नेहन क्रिया का प्रयोजक है । हड्डी और मज्जा का काम है शरीर को धारण करना । वीर्य की वृद्धि शरीर को पूर्ण बनाने वाली होती है। ओज शुक्र एवं वीर्य का उत्पादक है; वही जीव की स्थिति और प्राण की रक्षा करने वाला है । ओज शुक्र की अपेक्षा भी अधिक सार वस्तु है । वह हृदय के समीप रहता है और उसका रंग कुछ-कुछ पीला होता है । दोनों जंघे ( ये समस्त पैर के उपलक्षण हैं), दोनों भुजाएँ, उदर और मस्तक – ये छः अङ्ग बताये गये हैं। त्वचा के छः स्तर हैं । एक तो वही है, जो बाहर दिखायी देती है । दूसरी वह है, जो रक्त धारण करती है। तीसरी किलास (धातुविशेष) और चौथी कुण्ड (धातुविशेष ) — को धारण करने वाली है । पाँचवीं त्वचा इन्द्रियों का स्थान है और छठी प्राणों को धारण करने वाली मानी गयी है । कला भी सात प्रकार की है – पहली मांस धारण करने वाली, दूसरी रक्तधारिणी, तीसरी जिगर एवं प्लीहा को आश्रय देने वाली, चौथी मेदा और अस्थि धारण करने वाली, पाँचवीं मज्जा, श्लेष्मा और पुरीष को धारण करने वाली, जो पक्वाशय में स्थित रहती है, छठी पित्त धारण करने वाली और सातवीं शुक्र धारण करने वाली है । वह शुक्राशय में स्थित रहती है ॥ ३७-४५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘आत्यन्तिक प्रलय तथा गर्भ की उत्पत्ति का वर्णन’ नामक तीन सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६९ ॥ Content is available only for registered users. 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