श्री स्वामी अग्रदास जी
(गलता / रैवासा, जिला-सीकर (राजस्थान))

अग्रदासजी राममोपासना में श्रृंगार-रस के आचार्य रूप में विख्यात हैं । इन्हें श्री जानकी जी की प्रिय सखी श्रीचन्द्रकलाजी का अवतार माना जाता है । रामचरितमानस में जानकी जी की एक प्रिय सखी का उल्लेख है, जिसे आगे कर जानकी जी पुष्पवाटिका में रामचन्द्र जी के दर्शन को जाती है- “चली अग्र प्रिय सखी सोई । प्रीति पुरातन लखै न कोई ” उस सखी का नाम श्री चन्द्रकलाजी है । कहते हैं कि वही अग्रगामिनी, प्रिय सखी चन्द्रकलाजी अग्रदासजी (अग्रअली) के रुप में प्रकट हुई । उनके आविर्भाव का उद्देश्य था – रामोपासना को मधुर रस की उपासना का प्रचार करना । रामोपासना में ‘ रसिक-सम्प्रदाय ‘ की स्थापना उन्होंने ही की । उन्होने ही इस सम्प्रदाय के आधारभूत ग्रन्थ ‘ध्यानमन्जरी’ की रचना की इस सम्प्रदाय के उपासक अपने आपको जानकी जी की सखी मानकर उपासना करते है ।
अग्रदासजी का जन्म सं. 1553, फाल्गुन शुक्ला द्वितीया को राजस्थान के रेवासा ग्राम मे ब्राह्मण कुल में हुआ था । छोटी उम्र में ही सं. 1570 में वे घर छोडकर गलता चले गये और गलता गादी के श्रीकृष्णदास पयहारीजी की शरण ली । परमसिद्ध श्रीकृष्णदासजी को उन्हें जानकी जी की प्रिय सखी श्री चन्द्रकलाजी के अवतार के रूप मे पहचानने में देर न लगी उन्हें पाकर उनके आनन्द की सीमा न रही । जिस दिन उन्हें मन्त्रोपदेश दिया उस दिन उनके हृदय मे बड़ा उल्लास था । उनका मन कर रहा था कि उस दिन एक विशाल उत्सव मनाया जाये । भवगत् इच्छा से उसी समय उनके शिष्य आमेर नरेश पृथ्वीराज उनके दर्शन को आये । उन्होंने गुरुदेव से प्रसन्नता का कारण पूछा । तब कृष्णदासजी ने अपने मन कीं बात कही पृथ्वीराज ने उसी समय मंत्रियो को एक विशाल उत्सव की व्यवस्था करने की आज्ञा दी । एक महीने तक उत्सव बड़ी धूमधाम से चलता रहा । दूर-दूर के सन्तों को आमत्रित किया गया । सबने आकर अग्रदास को प्रेमा-भक्ति का अमोघ आशीर्वाद दिया ।
सन्तों का आशीर्वाद शीघ्र फलीभूत हुआ अग्रदास के हृदय में प्रेमा भक्ति का उदय हुआ । वे प्रातःकाल से ही भगवान नाम जप के साथ श्रीरामचन्द्र की मानसी सेवा में संलग्न रहते । भजन बिना एक क्षण भी न जाने देते । उन्होंने मनुष्य-जीवन के मूल्य को जैसा समझा और उसके एक-एक पल का जैसा उपयोग किया, जैसा बहुत कम लोग ही कर पाते हैं । उन्होंने इस सम्बन्ध में साधकों को जो चेतावनी दी है, वह मूल्यवान है । उन्होंने कहा है – यह मत समझो कि मरने के बाद ही तुम्हें अग्नि को समर्पित किया जायेगा । तुम्हारी देहरूपी झोपडी में आग पहले ही लगी हुई है, जो धीरे-धीरे सुलग रही । यदि प्राण-रक्षा चाहते हो तो भजन के सहारे इसमे से जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ । जो श्वास निकल जाता है, वह फिर आता नहीं । जीवन अंजलि में भरे जल के समान है, धीरे-धीरे घटता ही रहता है ।
कृष्णदासजी के परमधाम पधारने के पश्चात् उनके सबसे बडे शिष्य श्री कील्हदेवजी गलता गादी पर बैठे । अग्रदास गलता में रहकर भजन करते और कील्हदेव जी तथा सन्तों की सेवा करते । एक दिन अग्रदासजी ने भूल से कील्हजी की लंगोटी पहन ली । कील्हजी ने अग्रदास से कहा- ”अग्रदास, तुमने मेरी लंगोटी पहन ली ।” अग्रदास ने सोचा जहाँ तेरी-मेरी का भाव हो वहाँ रहना ठीक नहीं । वे उसी दिन कहीं अन्यत्र जाकर रहने का निश्चय कर वहाँ से चल पडे ।
विचरण करते हुए जयपुर से 30 मील दूर रेवासा नामक स्थान पर पहुँचे । वहाँ के लोगों ने कहा- ”महाराज, यहाँ जल का बडा कष्ट है । प्रतिवर्ष न जाने कितने जीवों का प्यास के मारे प्राण (मरण) हो जाता है । ऐसी कृपा करें, जिससे यह कष्ट दूर हो ।” अग्रदास को उन पर दया आयी । उन्होंने एक स्थान पर अपना चिमटा गाड़ दिया । उसी समय वहाँ मीठे जल का स्रोत फूट पड़ा । फिर वहीं एक विशाल कुआँ बनवाया गया, जो आज भी विद्यमान है । अग्रदासजी वहाँ के निवासियो के आग्रह पर आश्रम बनाकर वहीं रहने लगे 1 वहाँ उन्होंने एक आम का बगीचा बनवाया और बगीचे में सुन्दर पुष्पवाटिका लगवाई ।
अग्रदासजी ने बाग-बगीचा कोई अपने लिए थोडे ही बनवाया । बाग लगाया संतों की सेवा के लिए, वाटिका बनवाई राम-जानकी के लिए । वे नित्य भावना में अग्रअली के रूप में प्रियाजी को अपने भवन से लेकर वाटिका मे आते और उनका श्रीराम से मिलन कराते । इसलिए उन्होंने बाग का नाम रखा ”श्रीराम बाग” और वाटिका का ”श्री सियमनरंजनी वाटिका” एक दिन उन्हे वाटिका में जनक-नन्दिनी के साक्षात् दर्शन हुए ।
उसी दिन से युगल सरकार के बिहार के स्थान उस बाग की समस्त सेवा अग्रदास जी अपने हाथ से करने लगे ।
भक्तमाल के रचयिता श्रीनाभाजी इन्हीं अग्रदास के शिष्य थे । इन्होंने ही नाभा जी को रचना करने की आज्ञा दी थी । गुरु शिष्य दोनो सिद्ध थे । एक बार आमेर के राजा मानसिंह दस हजार फौज साथ लिये कहीं लड़ाई पर जा रहे थे । मार्ग में अग्रदासजी का आश्रम पड़ा । बे दर्शन के लिए आभ्रम में आये । अग्रदासजी ने नाभाजी से सब सिपाहियों को प्रसाद देने को कहा । वे दस केले ले आये । अग्रदासजी ने दस-दस केले प्रत्येक सिपाहियों को देने को कहा । नाभाजी ने दस-दस केले सबको दे दिये । फिर भी दस केले बचे रहे ।
एक बार नाभाजी संतों की जमात लेकर विचरने को निकले । एक गाँव में डेरा डाला । वहाँ के एक भक्त वैश्य ने एक माह तक जमात की श्रद्धापूर्वक सेवा की । जिस दिन जमात चलने को हुई उसी दिन वैश्य के इकलौते पुत्र को सर्प ने काटा और वह मर गया । कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग कहने लगे- ”देखा सन्त सेवा का फल । इन निकम्मे शंड-मुशंडों की सेवा का फल और क्या होगा ?” अग्रदासजी ने यह सुना तो बडे दुःखी हुए । सन्त सेवा की महिमा प्रकट करने के लिये उन्होने उसी समय सब संतो का चरणामृत मंगवाकर मृत बालक के मुँह में डाला । चरणामृत मुख में पडते ही वह जी उठा ।
अग्रदासजी निरन्तर बाग की सेवा में लगे रहते । बाग की सेवा के साथ नाम जप और राम-जानकी की मानसी सेवा भी करते रहते । मानसी-सेवा में कभी-कभी इतना डूब जाते कि बाग की सेवा बन्द हो जाती और अपनी सुध-बुध खोकर एक ही स्थान पर घंटों बैठे ही रह जाते । प्रेमाश्रु तो उनके नेत्रोण से सदा बहते ही रहते । एक बार महाराज मानसिंह उनके दर्शन करने आये । साथ आये द्वारपालों को बाहर छोड़ स्वयं वाटिका में चले गये । उस समय अग्रदासजी वाटिका के सूखे पत्ते बीनकर बाहर फेंकने आये । बाहर द्वारपालों को देख उन्हें सम्भवतः जनकपुरी या अयोध्या का ऐसा उद्दीपन हुआ कि वे समाधिस्थ से वहीं बैठे रह गये । बहुत देर हो गयी उन्हें बाहर बैठे-बैठे । और मानसिह को भीतर प्रतीक्षा करते-करते । नाभाजी उस समय वाटिका में थे । वे अग्रदासजी को देखने बाहर आये । उस समय अग्रदासजी निश्चल, निस्पन्द अवस्था में ध्यानमग्न बैठे थे और उनके नेत्रो से अश्रुधारा बह रही थी । उनकी यह दशा देख नाभाजी की भी वही दशा हो गयी । कुछ देर बात मानसिह बाहर आये और गुरु-शिष्य दोनों को भाव समाधि में डूबा देख धन्य हुए ।
अग्रदासजी हिन्दी साहित्य के महान् कवि भी थे । उनका ” अग्रसर ” नाम का ग्रन्थ प्रसिद्ध है, पर वह अब उपलब्ध नहीं है । ”ध्यान मंजरी” और ”अष्टधाम” नाम के उनके दो और ग्रन्थ है, कुछ स्फुट पद भी है । उनके 129 पदो के एक संग्रह का प्रकाशन ” श्री अग्रदेवाचार्य-भजन-वाटिका’ ‘ नाम से जयपुर से हुआ है ।
अग्रदासजी की आलौकिक सिद्धि से प्रभावित हो आमेर नरेश ने इन्हे 1100 बीघा जमीन वर्तमान रैवासा से पूर्व गोचारण के लिये दी थी । वह जमीन अग्रदासजी की गोचर भूमि होने के कारण आज मैरिया नाम से जानी जाती है ।
रेवासा मे अग्रदासजी की प्रमुख गद्दी है और वहाँ जानकी वल्लभजी का विशाल मन्दिर बना हुआ है ।

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