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कालीदास और घटकर्पर
महाराज विक्रमादित्य के नव-रत्नों के नाम इस प्रकार है – धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेताल-भट्ट, घटकर्पर, कालिदास, वाराह-मिहिर तथा रुचि । घटकर्पर को विद्वान् बनाने तथा दरबार में स्थान दिलाने में कालिदास का भी हाथ था । इसके विषय में ‘बंगाल एशियाटिक सोसायटी’ के प्रमुख सदस्य तथा अंग्रेज विद्वान् “हेवरलिन” ने एक बड़ा रोचक कथानक लिखा था, जिसमें बताया गया है –
महा-कवि कालिदास बिहार-बंगाल की सीमा पर अर्थात् ‘आसनसोल’ के पास किसी स्थान पर कुछ दिनों से टिके हुए थे । वहाँ वे ‘देवी’ की आराधना कर रहे थे । आराधना में इतने तल्लीन थे कि एक दिन आराधना के समय का ध्यान नहीं रहा । रात हो गई । ‘देवी की पूजा-आराधना’ समाप्त कर और एक केले के फूल के दोने में देवी का प्रसाद (जो शर्बत के समान था) लेकर, अपने निवास स्थान की ओर कालिदास ने प्रस्थान किया ।
अँधेरी रात होने के कारण तथा अधिक रात बीत जाने के कारण, कालिदास ने बीच में ही ठहर जाना उचित समझा । निकट में एक कुम्हार का निवास-स्थान मिला, जो घटकर्पर का ही मकान था । कालिदास ने उसी स्थान पर, रात में विश्राम निरापद समझा । घर के मालिक घटकर्पर को पुकारा और उनसे अपना साधारण परिचय देकर कहा कि ‘मैं अपने स्थान को चला जाऊँगा । रात भर मुझे यहाँ ठहरने दिया जाए ।’
घटकर्पर ने कहा – मैं जाति का कुम्हार हूँ । मैंने जो बर्तन बनाए थे, वे सब इस समय आवां में पकने के लिए डाल दिए गए हैं, इसलिए चारों तरफ मैदान-ही-मैदान है । जहाँ आपको पसन्द आए, उसी स्थान पर अपना आसन लगाकर ठहर जाइए । मुझे कोई आपत्ति नहीं । बर्तन बिखरे होते, तो मुझे कुछ आपत्ति हो सकती थी, किन्तु इस समय सर्वत्र स्थान-ही-स्थान है । जहाँ-कहीँ भी मेरी चटाई लेकर बिछा लीजिए ।
कालिदास ने घटकर्पर की चटाई लेकर बिछा दी और अपने आसन लगा लिया । जब कालिदास ने अपना सारा सामान अपने समीप रख लिया, तो ‘प्रसाद’ वाले दोने को उन्होंने बहुत सँभाल और सहेज कर रखा । इस पर घटकर्पर ने उनसे पूछा की “यह क्या है ?” कालिदास ने सोचा -‘यदि प्रसाद कह देता हूँ, तो यह इसमें से बिना माँगे नहीं रहेगा और इसमें से नहीं देंगे, तो भी अच्छा नहीं होगा, क्योंकि इसी की शरण में रात काटनी है ।’ इसलिए कालिदास ने बहाना कर दिया -“यह एक दवा है, जो विषैली है । मैं रोगी हूँ, इसलिए इसे साथ लिए चलता हूँ । आज मैंने दवा खा ली है, कल के लिए रख छोड़ी है । इसीलिए इसे सावधानी से रख रहा हूँ कि दूसरा कोई जीव-जन्तु इसे पी न ले, नहीं तो उसके प्राण-पखेरु उड़ जायेंगे । मेरे लिए तो कोई बात नहीं क्योंकि मैं तो रोगी हूँ ।”
घटकर्पर को भी विश्वास हो गया कि ठीक और सच्ची बात कह रहे हैं । अतः इधर-उधर की बातें करके वे भी अपने स्थान पर चले गये ।
घटकर्पर के घर में सुबह से ही पति-पत्नी में झगड़ा चल रहा था । कालिदास के पास से जब वे अपने घर पहुँचे, तो पत्नी से उनका झगड़ा फिर छिड़ गया । इस बार उसने ऐसा विकराल रुप धारण किया कि घटकर्पर ने अपनी पत्नी के साने ही शपथ में कहा कि “मैं विष खाकर प्राण दे दूँगा ।” ऐसा कहकर वे उसी रात में, जहाँ कालिदास सोए हुए थे, उसी स्थान पर वापस आ गए और उन्होंने जिस प्रसाद के दोने को विष भरा हुआ बताया था, उसे उठाकर चुपके से पी गए ।
अब घटकर्पर ने सोचा कि “मैं तुरन्त मरुँगा, इसलिए जीवन की अन्तिम घड़ी में भगवान् की कुछ स्तुति कर लूँ ।” लगे कालिदास के समीप ही बैठकर भगवद्-स्तुति करने । उनकी आवाज सुनकर कालिदास की नींद टूटी । उन्होंने पूछा – “क्या बात है कि आप अभी ही उठकर बैठ गए ?”
घटकर्पर ने सोचा, “जीवन का आखिरी क्षण है, इसमें झूठ बोलना पाप है ।” अतः उन्होंने सच्ची बात कह सुनाई । कालिदास ने जब यह सुना कि दोने का प्रसाद, जिसे मैंने ‘जहर’ बताया था, यह पी गया, तब उन्होंने घटकर्पर को कुछ न कहकर अपने भाग्य को ही कोसना शुरु किया । उन्होंने घटकर्पर से कहा – “बन्धुवर, तुम बड़े भाग्य-शाली हो, तुम मरोगे नहीं । अब तुम विद्वान् बनकर जिओगे । मैंने तुमसे बहाना किया था । यह विष नहीं, देवी का प्रसाद था, जिसके लिए मैंने महीनों से आराधना की थी । देवी ने प्रसन्न होकर अपने हाथों से उठाकर मुझे दिया था । मैंने कल प्रातः उसे ग्रहण करने का निश्चय किया था, किन्तु अब तुम्हारी बुद्धि विमल हो जाएगी । जो कुछ भी पढ़ोगे, तुरन्त बुद्धि उसे ग्रहण करेगी । इसलिए आज से तुम पढ़ना शुरु करो ।”
कालिदास ने घटकर्पर को अक्षरों का ज्ञान करा दिया । उसके बाद से घटकर्पर ने पढ़ना शुरु किया, तो एक प्रसिद्ध कवि बन गए । कालिदास ने उन्हें अपना सहयोगी बनाया क्योंकि उन्हें भी अपनी स्त्री के फटकारने पर ही ज्ञान-प्राप्ति हुई थी । दोनों ‘देवी-भक्त’ भी थे । कालिदास ने ही घटकर्पर को विक्रमादित्य के दरबार में स्थान दिलाया तथा देवी की आराधना और मातृ-भक्ति ने घटकर्पर के मस्तिष्क को तीव्र से तीव्रतर बना दिया ।

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