कृत्तिवास रामायण की रामकथा

तुलसीदास जी के आविर्भाव से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व बंगदेश (बंगाल) में कृत्तिवास नामक महाकवि का आविर्भाव माना जाता है । उनका जन्म 1433 ई॰ का माना जाता है । श्रीराम ही उनके उपास्यदेव थे । उन्होंने ‘कृत्तिवास रामायण’ की रचना की थी । इसमें सात काण्ड हैं । उन्होंने श्रीराम को सर्वज्ञ मानते हुए किष्किन्धाकाण्ड में लिखा है –
आपनि से भांग प्रभु आपनिसे गड़ ।
सर्प हइया दंश तुमि ओझा हइया झाड़ ।

अर्थात् “प्रभु ! आप स्वयं ही बिगाड़ते हैं और स्वयं ही बनाते हैं, सर्प होकर आप डसते हैं और ओझा के रुप में विष झाड़ते हैं ।”

रामदर्शन की महिमा
बालकाण्ड में उल्लेख है कि एक बार राजा दशरथ पुत्रों सहित गंगा स्नान के लिए जा रहे थे । मार्ग में देवर्षि नारद ने उनसे कहा, “आप अज्ञानी प्रतीत होते हैं, क्योंकि पतितपावनी भगवती गंगा, जिनके चरण से प्रकट हुई हैं, वे नारायण आपके पुत्र राम ही हैं । उनके दर्शन ही दान-पुण्य और गंगा-स्नान है । पुत्र-भाव से अपने भगवान् का ही दर्शन करें ।”
पतितपावनी गंगा अवनीमण्डले । सेइ गंगा जन्मिलेन यार पदतले । सेइ दान देइ पुण्य सेइ गंगा स्नान । पुत्रभावे देख तुमि प्रभु भगवान् ।

वामदेव को शाप मुक्ति
बारद जी की सलाह पर दशरथ ने जब वापस घर जाने का निश्चय किया, तब श्रीराम ने गंगा की महिमा का बखान कर गंगा-स्नान की सलाह दी । इस पर वे गंगा की ओर आगे बढ़ ही रहे थे कि गुहराज ने तीन करोड़ सैनिकों के साथ उनका मार्ग रोक दिया । दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, गुहराज को बंदी बना लिया गया । जब राम जिज्ञासावश उसे देखने गए, तब वह उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला कि मैं पूर्व जन्म में महर्षि वसिष्ठ का पुत्र वामदेव था । एक बार राजा दशरथ अंधकमुनि के पुत्र की हत्या का प्रायश्चित पूछने आश्रम में आए । उस समय पिता जी कहीं गए हुए थे । मैंने दशरथ को बताया कि राम का तीन बार नाम लो । दशरथ चले गए । जब पिता जी लौटे और मैंने उन्हें यह वृत्तांत सुनाया तो वे बहुत क्रुद्ध हो गए और बोले कि तुम रामनाम की महिमा नहीं जानते । रामनाम तो एक बार लेने मात्र से ब्रह्महत्यादि जैसे महापापों से भी मुक्ति मिल जाती है । तुमने तीन बार राम नाम जपने को क्यों कहा ? तुम नीच योनि में जन्म लोगे और जब प्रभु श्रीराम दशरथ के पुत्र के रुप में अवतार लेंगे, तब उनके दर्शन के पश्चात् ही तुम्हारी मुक्ति होगी । उसे श्रीराम ने मुक्त किया और अग्नि की साक्षी में मित्र बनाया ।
कृत्तिवास ने सीता जी द्वारा भेंट की गई मणियों की माला हनूमान् जी द्वारा तोड़ने और वक्षस्थल चीरकर वहाँ अंकित रामनाम दिखाने की घटना का भी उल्लेख किया है ।

सीताजी द्वारा पिण्डदान
अयोध्याकाण्ड में उल्लिखित है कि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी दशरथ के श्राद्ध के लिए गया-तीर्थ गए । वहाँ दोनों भाई श्राद्ध सामग्री लेने गए । फल्गु नदी के तट पर सीता जी अकेली बैठी उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं, तभी दशरथ जी ने प्रकट होकर कहा कि मैं भूख से पीड़ित हूँ, तुम पिण्डदान कर दो । पूत्रवधू होने के नाते तुमको भी यह अधिकार है । इस पर सीता जी ने बालू का पिण्ड बना तुलसी, फल्गु नदी, वटवृक्ष और ब्राह्मण को साक्षी मान पिण्डदान किया ।

लक्ष्मणजी की शक्ति
एक बार इन्द्रजित् को सबसे बड़ा वीर बता उसे मारने वाले लक्ष्मण की प्रशंसा करने पर अगस्त्य जी से श्रीराम ने पूछा, “लंका में रावण, कुम्भकर्ण इत्यादि कई वीर थे, आप इन्द्रजित् को कैसे सबसे बड़ा वीर बताते हुए उसे मारने वाले लक्ष्मण की शक्ति की प्रशंसा कर रहे हैं ?”
इस पर अगस्त्य जी ने कहा, “लक्ष्मण ने 14 वर्ष वनवास काल में न तो यथोचित आहार लिया, न निद्रा और न ही स्त्री का मुख देखा । इसी शक्तिसंचयन और साधना के बल पर ही वे अजेय इन्द्रजित् का वध कर पाए, अन्यथा आपकी सेना में ऐसा कोई वीर नहीं था, जो मेघनाद को मार पाता ।”
ऐसे ही अनेक रोचक आख्यानों से कृत्तिवास रामायण भरा पड़ा है ।

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