भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १३
जातिस्मर-भद्रव्रतका फल और विधान तथा स्वर्णष्ठीवी की कथा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा — भगवन् ! अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान होना बहुत कठिन है । आप यह बतायें कि ऋषियों के वरदान, देवताओं की आराधना या तीर्थ, स्नान, होम, जप, तप, व्रत आदि के करने से पूर्वजन्मका ज्ञान प्राप्त हो सकता है या नहीं ? यदि ऐसा कोई व्रत हो, जिसके करने से पूर्वजन्म का स्मरण हो सकता है तो आप उसका वर्णन करें ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — राजन् ! एक ही वर्ष में ‘मार्गशीर्ष, फाल्गुन, ज्येष्ठ एवं भाद्रपद’ क्रमशः इन चार मासों में भद्रव्रत का श्रद्धापूर्वक उपवास करने से मनुष्य को अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो जाता है । इस विषय में एक आख्यान है, उसे आप सुनें —om, ॐप्राचीन काल में यमुना के किनारे शुभोदय नाम का एक वैश्य रहता था । वह इस व्रत को करता था । कालक्रम से वह मृत्यु को प्राप्त हुआ और व्रत के प्रभाव से वह दूसरे जन्म में राजा संजय के पुत्र-रूप में उत्पन्न हुआ, उसका नाम था स्वर्णष्टीवी । उसे पूर्वजन्म का स्मरण था । कुछ दिनों बाद चोरों ने उसे मार डाला और नारदजी के प्रभाव से वह जीवित हो गया । इस व्रत के प्रभाव से अपने इस विगत वृत्तान्तों को वह भली-भाँति जानता था ।

राजा ने पूछा — उसका स्वर्णष्टीवी नाम कैसे पड़ा ? और चोरों ने उसे क्यों मार डाला ? तथा किस उपाय से वह जीवित हुआ, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करें ?

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — महाराज ! कुशावती नाम की नगरी में संजय नाम का एक राजा रहता था । एक दिन नारद और पर्वत नाम के दो मुनि राजा के पास आये । वे दोनों राजा के मित्र थे । राजा ने अर्घ्य-पाद्य, आसनादि उपचारों से उनका पूजन तथा सत्कार किया । उसी समय राजा की अत्यन्त सुन्दरी राजकन्या वहाँ आयी । पर्वतमुनि ने उसे देखकर मोहित हो राजा से पूछा — ‘राजन् ! यह युवती कौन है ?’ राजा ने कहा — ‘मुने ! यह मेरी कन्या है । नारदजी ने कहा — ‘राजन् ! आप अपनी इस कन्या को मुझे दे दें और आप जो दुर्लभ वर माँगना चाहते हों, वह मुझसे माँग लें ।’ राजा ने प्रसन्न होकर कहा — “देव ! आप मुझे एक ऐसा पुत्र दें जो जिस स्थान में मूत्र-पुरीष और निष्ठीवन (थूक, खखार)— का त्याग करे, वह सब उत्तम सुवर्ण बन जाय ।’ नारद जी बोले — ‘ऐसा ही होगा ।’
राजा ने अभीष्ट वर प्राप्त कर अपनी कन्या को वस्त्र-आभूषण से अलंकृतकर नारदजी से उसका विवाह कर दिया । नारद की इस लीला को देखकर पर्वतमुनि ओठ क्रोध से फड़कने लगे, आँखें लाल हो गयीं । वे नारदजी से बोले — ‘नारद ! तुमने इसके साथ विवाह कर लिया, अतः तुम मेरे साथ स्वर्ग आदि लोकों में नहीं जा सकोगे और जो तुमने इस राजा को पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया है, वह पुत्र भी चोरॉ द्वारा मारा जायगा ।’ यह सुनकर नारदजी ने कहा — ‘पर्वत ! तुम धर्म को जाने बिना मुझे शाप दे रहे हो । यह कन्या है, इस पर किसी का भी अधिकार नहीं । धर्मपूर्वक माता-पिता जिसे दे दें, वहीं उसका स्वामी होता है । तुमने मूढ़तावश मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी स्वर्ग में नहीं जा सकोगे । राजा संजय के पुत्र को चोरों द्वारा मार डाले जाने पर भी मैं उसे यमलोक से ले आऊँगा ।’

इस प्रकार परस्पर शाप देकर और राजा संजय के द्वारा सत्कृत होकर दोनों मुनि अपने-अपने आश्रम की ओर चले गये । तदनन्तर सातवें महीने में राजा को पुत्र उत्पन्न हुआ । वह कामदेव के समान अतिशय रूपवान् और पूर्वजन्मों का ज्ञाता था । नारदजी के वरदान से जिस स्थान पर वह मूत्र-पुरीष आदि का परित्याग करता, वहीं वह सुवर्ण हो जाता, इसलिये राजा ने उसका नाम स्वर्णष्ठीवी रखा । वह राजपुत्र सभी प्राणियों की बातों को समझता था । राजा संजय ने पुत्र के प्रभाव से बहुत धन प्राप्तकर राजसूय आदि यज्ञों का विधिपूर्वक सम्पादन किया । उसने अनेक कूप, सरोवर, देवालयों आदि का निर्माण कराया । पुत्र की रक्षा के लिये विशाल सेना भी नियुक्त कर दी ।

स्वर्णष्ठीवी के प्रभाव से राजा संजय के यहाँ स्वर्ण की ढेर सारी राशियाँ एकत्र हो गयीं । कुछ समय बाद राजपुत्र की अत्यन्त ख्याति सुनकर लोभवश मदोद्धत चोरों ने स्वर्णष्ठीवी का हरण कर लिया, परंतु जब उसके शरीर में कहीं भी सोना नहीं देखा, तब चोरों ने उसे मारकर जंगल में फेंक दिया । चोरों द्वारा पुत्र के मारे जाने पर राजा बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा । उस समय नारदजी वहाँ पुनः पधारे । नारदजी ने अनेक प्राचीन राजाओं की गाथाएँ सुनाकर राजा के शोक को दूर किया और यमलोक में जाकर वे राजपुत्र को ले आये । पुत्र को प्राप्तकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने नारदजी से पूछा — ‘महाराज ! किस कर्म के प्रभाव से यह मेरा पुत्र स्वर्णष्ठीवी हुआ और किस कर्म के प्रभाव से इसको पूर्वजन्म का स्मरण है ?’ नारदजी ने कहा — ‘राजन् ! इसने ‘भद्र’ नामक व्रत को विधिपूर्वक चार बार किया है । यह उसी का प्रताप है ।’ इतना कहकर नारदजी अपने आश्रम को चले गये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! इस व्रत के करने से व्रती को उत्तम कुल में जन्म होता है और वह रूपवान् तथा पूर्वजन्म का ज्ञाता एवं दीर्घायु होता है । अब आप इस व्रत का विधान सुनें — इस व्रत के चार भद्र चार पाद के रूप में हैं । मार्गशीर्ष में पहला, फाल्गुन में दूसरा, ज्येष्ठ में तीसरा और भाद्रपद में चौथा पाद होता है । मार्गशीर्ष शुक्ल आदि तीन मास ‘विष्णुपद’ नामक भद्र सभी धर्मों का साधक है । फाल्गुन शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिपुष्कर’ नामक भद्ररूप है और यह तप आदि का साधक एवं लक्ष्मीप्रद है । ज्येष्ठ शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिराम’ नामक भद्र है । यह सत्य और शौर्य प्रदान करता है । भाद्र शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिरंग’ नामक भद्र है, यह बहुत विद्या देनेवाला है । सभी स्त्री-पुरुष को इस भद्र-व्रत को करना चाहिये ।

राजा युधिष्ठिर ने पूछा — जगत्पते ! इन भद्रों का विधान आप विस्तारपूर्वक कहें ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! इस अतिशय गुप्त विधान को मैंने किसी से नहीं कहा है, आपको मैं सुनाता हैं, आप सावधान होकर सुनें —

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की प्रारम्भिक चार तिथियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गयी हैं । ये तिथियाँ हैं — द्वितीय, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी । व्रती को प्रतिपदा के दिन जितेन्द्रिय होकर एकभुक्त रहना चाहिये । प्रातःकाल में द्वितीया तिथि को नित्यक्रिया को सम्पन्न कर मध्याह्न में मन्त्रपूर्वक गोमय तथा मिट्टी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये । इन मन्त्रों के अधिकारी चारों वर्ण हैं, किंतु वर्णसंकरों को इनका अधिकार नहीं है । विधवा स्त्री यदि सदाचारसम्पन्न हो तो वह भी इस व्रत की अधिकारिणी है । सधवा स्त्री अपने पति की आज्ञा से यह व्रत ग्रहण करे । शरीर में मिट्टी-लेपन करने का मन्त्र इस प्रकार है —

“त्वं मृत्स्ने वन्दिता देवैः समलैर्दैत्यघातिभिः ॥
मयापि वन्दिता भक्त्या मामतो विमलं कुरु ॥”
(उत्तरपर्व १३ । ६५-६६)

‘मृत्तिके ! दुष्ट दैत्यों का विनाश करनेवाले देवताओं के द्वारा आप वन्दित हैं, मैं भी भक्तिपूर्वक आपकी वन्दना करता हूँ, मुझे भी आप पवित्र बना दें ।’

अनन्तर जल के सम्मुख जाकर सफेद सरसों, कृष्ण तिल, वच और सर्वौषधि का उबटन लगाकर जल में मण्डल अङ्कित कर ये मन्त्र पढ़ने चाहिये —

“त्वमादिः सर्वदेवानां जगतां च जगन्मये ।
भूतानां वीरुधां चैव रसानां पतये नमः ॥
गङ्गासागरजं तोयं पौष्करं नार्मदं तथा ।
यामुनं सांनिहत्यं च संनिधानमिहास्तु मे ॥
(उत्तरपर्व १३ । ६८-६९)

‘जगन्मये ! समस्त संसार और देवों के आदि हो, और समस्त प्राणी, वृक्ष और इस के अधीश्वर हो, अतः तुम्हें नमस्कार कर रहा हूँ । गंगासागर, पुष्कर, नर्मदा और यमुना जी के जल इस जल में मिलकर मेरे सान्निधि में रहने की कृपा करे ।’

ये मन्त्र पढ़कर स्नानकर शुद्ध वस्त्र पहन, संध्या और तर्पण करे । फिर घर आकर नियमपूर्वक रहे और चन्द्रोदय-पर्यन्त किसी से सम्भाषण न करे ।

इसी प्रकार द्वितीया आदि तिथियों में कृष्ण, अच्युत, अनन्त और हृषीकेश— इन नामों से भक्तिपूर्वक भगवान् का पूजन करे । पहले दिन भगवान् के चरणारविन्द का, दूसरे दिन नाभि का, तीसरे दिन वक्षःस्थल का और चौथे दिन नारायण के मस्तक का विधिपूर्वक उत्तम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन करे और रात्रि में जब चन्द्रोदय हो, तब शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु — इन नामों से क्रमशः चन्दन, अगरु, कर्पूर, दधि, दूर्वा, अक्षत तथा अनेक रत्नों, पुष्पों एवं फलों आदि से चन्द्रमा को अर्घ्य दे । प्रत्येक दिन जैसे-जैसे चन्द्रमा की वृद्धि हो वैसे-वैसे अर्घ्य में भी वृद्धि करनी चाहिये । अर्घ्य इस मन्त्र से देना चाहिये —

नवो नवोऽसि मासान्ते जायमानः पुनः पुनः ।
त्रिरग्रिसमवेतान् वै देवानाप्यायसे हविः ॥
गगनाङ्गणसद्दीप दुग्धाब्धिमथनोद्भव ।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते ॥
(उत्तरपर्व १३ । ८६-८७)

‘हे रमानुज ! आप प्रत्येक मास के अन्त में नवीन-नवीन रूप में आविर्भूत होते रहते हैं । तीन अग्नियों से समन्वित देवताओं को आप ही हविष्य के द्वारा आप्यायित करते हैं । आपकी उत्पत्ति क्षीरसागर के मन्थन से हुई है । आपकी आभा से ही दिशा-विदिशाएँ आभासित होती है । गगनरूपी आँगन के आप सत्वरूपी देदीप्यमान दीपक हैं । आपको नमस्कार है ।’

चन्द्रमा को अर्घ्य निवेदित कर वह अर्घ्य ब्राह्मण को दे दे । अनन्तर मौन होकर भूमि पर पद्मपत्र बिछाकर भोजन करे । पलाश या अशोक के पत्रों द्वारा पवित्र भूमि या शिलातल का शोधन कर इस मन्त्र से भूमि की प्रार्थना करनी चाहिये —

त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं देवि सर्वरसोद्भवे ॥
मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्नममृतोपमम् ।
(उत्तरपर्व १३ । ९०-९१)

‘सम्पूर्ण रस को उत्पन्न करनेवाली हे पृथ्वी देवि ! आपके आश्रय में मैं भोजन करना चाहता हूं । मुझ पर अनुग्रह करने के लिये आप इस अन्न को अमृत के समान उत्तम स्वादयुक्त बना दें ।’

अनन्त्तर शाक तथा पक्वान्न का भोजन करे । भोजन के आद आचमन करे और अङ्गों का स्पर्श कर चन्द्रमा का ध्यान करते हुए भूमि पर ही शयन करे । द्वितीया के दिन क्षार एवं लवण रहित हविष्य का भोजन करना चाहिये । तृतीया को नीवार (तिन्नी के चावल) तथा चतुर्थी को गाय के दूध से बने उत्तम पदार्थों को ग्रहण करना चाहिये । पञ्चमी को घृतयुक्त कृशरान्न (खिचड़ी) ग्रहण करना चाहिये । इस भद्रव्रत में सावाँ, चावल, गाय का घृत तथा अन्य गव्य पदार्थ एवं अयाचित प्राप्त वन्य फल प्रशस्त माने गये हैं । अनन्तर प्रातःकाल स्नानकर पितरों का तर्पणकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दान-दक्षिणा आदि देकर विदा करना चाहिये । बाद में भृत्य एवं बन्धुजनों के साथ स्वयं भी भोजन करे ।

इस प्रकार तीन-तीन महीनों तक चार भद्र-व्रत का जो वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक प्रमादरहित होकर आचरण करता है, उसे चन्द्रदेव प्रसन्न होकर श्री, विजय आदि प्रदान करते हैं । जो कन्या इस भद्रव्रत का अनुष्ठान करती है, वह शुभ पति को प्राप्त करती है । दुर्भगा स्त्री सुभगा एवं साध्वी हो जाती हैं तथा नित्य सौभाग्य को प्राप्त करती है । राज्यार्थी राज्य, धनार्थी धन और पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है । इस भद्रव्रत के करने से स्त्री का उत्तम कुल में विवाह होता है तथा वह उत्तम शय्या, अन्न, यान, आसन आदि शुभ पदार्थों को प्राप्त करती है तथा पुरुष धन, पुत्र, स्त्री के साथ ही पूर्वजन्म के ज्ञान को भी प्राप्त कर लेता है ।
(अध्याय १३)

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