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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १७९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १७९
कल्पलता-दान का वर्णन

युधिष्ठिर बोले — भगवन् ! आप समस्त प्राणियों के स्वामी हैं समस्त लोक आपको नमस्कार करता है अतः लोक हितार्थ कोई अन्य बात बताने की कृपा करें । देवेश ! जिस दान, व्रत या अन्य उपाय द्वारा प्राणी पापरहित और आयु, यश एवं श्री सम्पन्न होता है, उसे बताने की कृपा करें ।
om, ॐ
श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! जिस उपाय द्वारा मनुष्य इस भूतल में भाग्यवान् होता है, वह लोकहितार्थ तुम्हें बता रहा हूँ, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा, महातीर्थादिमरण, यज्ञ और वेदपाठ द्वारा मेरा लोक प्राप्त नहीं होता है, वह देवों के लिए भी दुर्लभ है । महाभाग ! पार्थ ! किन्तु तुम्हारे स्नेहवश मैं तुम्हें बता रहा रहा हूँ । वह कल्पलता दान अत्यन्त सुशोभन है अतः उसे सविधि सुसम्पन्न करना चाहिए । कल्पवृक्ष-दान की विधि से ही इसका भी सब विधान कहा गया है । सविधान दिक्पालों के लिए बलि प्रदान, आज्य भाग आधार की आहुति अर्पित करने के अनन्तर व्याहृतियों द्वारा ग्रहों को आहुति अर्पित करें । इस यज्ञ में दस सहस्र संख्या की आहुति प्रदान करना बताया गया है । तदुपरान्त स्नान, शुक्लवस्त्र धारण, एवं पवित्रता पूर्ण पुष्प, धूप, अक्षत, वस्त्र, फल द्वारा अर्चा करके प्रदक्षिणा करते समय इन मंत्रों का उच्चारण करे –

नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो
ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालनीभ्यः
आशाशताधिक्यफलप्रदाभ्यो
दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥
या यस्य शक्तिः परमा प्रदिष्टा
वेद पुराणे सुरसत्तमस्य ।
तां पूजयामीह परेण साम्ना
सा मे शुभं यच्छतु तां नतोऽस्मि ॥
(उत्तरपर्व १७९ । १०-११)
”पापोंका विनाश करनेवालीसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और लोकेश्वरों का पालन करनेवाली एवं आशा से अधिक सैकड़ों फल प्रदान करनेवाली दिग्वधूरूपी कल्पलता देवियों ! आपको बार-बार नमस्कार है । वेदों तथा पुराणों में आप देवताओं की परम शक्ति कही गयी हैं, अतः शक्तिस्वरूपा कल्पलते ! मैंने सामध्वनिसे आपका पूजन किया है, आप मेरा कल्याण करें, आपको नमस्कार है ।’

इस प्रकार उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक वह दस दिशारुपी मानसिक संकल्प द्वारा दसकल्पलताएं ब्राह्मणों को अर्पित कर दक्षिणा समेत नमस्कारपूर्वक क्षमा प्रार्थना करे । राजन् ! इस विधान द्वारा इसके दान करने पर जिस पुण्य फल की प्राप्ति होती है, उसे मैं बता रहा हूँ । इस लोक में यह आजीवन विजयी, धनवान् और पुत्रवान रहता है । अन्त में निधन होने पर प्रत्येक मन्वन्तरों के समय में वह इन्द्र लोक का निवासी होता है । राजन् ! वह अपनी महान् शक्ति द्वारा रसातल एवं भूतल के समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त करने के नाते चक्रवर्ती राजा होता है । महाराज इस दान को सुसम्पन्न करने वाली स्त्री शक्तिशाली एवं चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न करती है । दान देते समय इसका दर्शन, अनुमोदन या (इसके पारायण को) सुनने वाला भी अपने समस्त पापों से मुक्त होता है । अतः यदि तुम्हें त्रिलोक विजयी होने की इच्छा हो तो इस देश कल्पलता का जो इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋत के हाथ का पाश, वायु, चन्द्र, शिव, केशव, शंभु की शक्ति रूप है, सविधान पूजन कर ब्राह्मणों को अर्पित करो ।
(अध्याय १७९) मत्स्यपुराण अ० २८६ में कनककल्पलता-दान की स्पष्ट विधि निर्दिष्ट है । वहाँ स्वर्णनिर्मित इन्द्राणी, आग्नेयी, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, कौबेरी आदि दस दिशा-देवियों तथा कल्पलताओं के निर्माण की विधि भी दी गयी है ।

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