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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ६५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ६५
तारकद्वादशी के प्रसंग में राजा कुशध्वज की कथा तथा व्रत-विधान

महाराज युधिष्ठिर ने कहा — भगवन् ! मैं बहुत बड़ा पातकी हूँ । भीष्म, द्रोण आदि महात्माओं का मैंने वध किया । आप कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मैं इस वधरूपी पापसमूह से छुटकारा पा सकूँ ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! प्राचीन काल में विदर्भ देश में एक बड़ा प्रतापी कुशध्वज नाम का राजा रहता था । किसी दिन वह मृगया के लिये वन में गया । om, ॐवहाँ उसने मृग के धोखे में एक तपस्वी ब्राह्मण को बाण से मार दिया । मरने के बाद उस पाप से उसे भयंकर रोरव नरक की प्राप्ति हुई । फिर वह बहुत दिनों तक नरक यातना को भोगकर भयंकर सर्प-योनि में गया । सर्प-योनि में भी उसने पाप किया । इस कारण उसे सिंह-योनि प्राप्त हुई । इस प्रकार उसने कई निन्द्य योनियों में जन्म लिया और उस-उस योनि में पाप-कर्म करता रहा । इस कर्मविपाक से उसे कष्ट भोगना पड़ता था । चूंकि उसने पूर्वजन्म में तारकद्वादशी का व्रत किया था, अतः उस व्रत के प्रभाव से इन पाप-योनियों से वह जल्दी-जल्दी मुक्त होता गया । अन्त में पुनः वह विदर्भ देश का धर्मात्मा राजा हुआ । वह भक्तिपूर्वक तारक-द्वादशी को व्रत किया करता था । उसके प्रभाव से बहुत समय तक निष्कण्टक राज्य कर, मरने पर उसने विष्णुलोक को प्राप्त किया ।

राजा युधिष्ठिर ने पूछा — कृष्णचन्द्र ! इस व्रत को किस प्रकार करना चाहिये ?

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — राजन् ! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तारकद्वादशी व्रत करना चाहिये । प्रातःकाल नदी आदि में स्नानकर तर्पण, पूजन आदि सम्पन्न कर सूर्यास्त तक हवन करता रहे । सूर्यास्त होने पर पवित्र भूमि के ऊपर गोमय से ताराऑ सहित एक सूर्य-मण्डल का निर्माण करे । उस आकाश में चन्दन से ध्रुव को भी अङ्कित करे । अनन्तर ताम्र के अर्ध्यपात्र में पुष्प, फल, अक्षत, गन्ध, सुवर्ण तथा जल रखकर मस्तक तक उस अर्ध्यपात्र को उठाकर दोनों जानु को भूमि पर टेककर पूर्वाभिमुख होकर ‘सहस्रशीर्षा० ‘ इस मन्त्र से उस मण्डल को अर्घ्य प्रदान करे । अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये । मार्गशीर्ष आदि बारह महीनों में क्रमशः खण्ड-खाद्य, सोहालक, तिल-तण्डुल, गुड के अपूप, मोदक, खण्ड़वेष्टक, सत्तू, गुडयुक्त पूरी, मधुशीर्ष, पायस, घृतपर्ण (करंज) और कसार का भोजन ब्राह्मण को कराये । तदनन्तर क्षमा-प्रार्थना कर मौन-धारणपूर्वक स्वयं भी भोजन करे । उद्यापन में चाँदी का तारकमण्डल बनाकर उसकी पूजा करे । मोदक के साथ बारह घड़े तथा दक्षिणा के साथ वह मण्डल ब्राह्मण को निवेदित कर दें । इस विधि से जो पुरुष और स्त्री इस तारकद्वादशी व्रत को करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान विमानों में बैठकर नक्षत्र-लोक को जाते हैं । वहीं अयुत वर्षों तक निवास कर विष्णुलोक को प्राप्त करते हैं । इस व्रत को सती, पार्वती, सीता, राज्ञी, दमयन्ती, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि श्रेष्ठ नारियों ने किया था । इस व्रत को करने से अनेक जन्मों में किये गये पातक नष्ट हो जाते हैं ।
(अध्याय ६५)

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