भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १०
सबसे अधिक श्रेष्ठ कौन?
(गुणशेखर राज पत्नी कथा)

सूत जी बोले — महाभाग ! वैताल ने राजा से यह कहा कि — महाराज ! गौड़ देश में वर्धन नामक नगर है, उसमें ख्यातिप्राप्त एवं धार्मिक गुणशेखर नामक राजा राज करता था । जैन धर्मानुयायी निर्भयानन्द नामक उनका मंत्री था । किसी समय राजा ने शिवजी के मन्दिर में जाकर उस सर्वव्यापी एवं ईश्वर शंकर जी की अर्चना की । उसी समय एक बिच्छू ने क्रुद्ध होकर राजा को काट लिया । उस दुःख से दुःखी होकर राजा मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। om, ॐउस समय जैनधर्मी निर्भयानन्द ने उस विष का अपहरण करके राजा से कहा — महाभाग, राजन् ! इन छहों शत्रुओं का, जो मान संस्थित एवं अधम हैं, मैं वर्णन कर रहा हूँ, सुनो ! काम, क्रोध, लोभ, रति, हिंसा और तृष्णा ये छहों दोष रजोगुण से उत्पन्न होते है, इनका भेद पृथक्-पृथक् बताया गया है । मोह, दंभ, मद, ममता, तथा निन्दित आशा की जो जगत् में व्याप्त हैं, तमोगुण से उत्पत्ति हुई है । विष्णु कामी है, शिव क्रोधी, ब्रह्मा लोभी, इन्द्र दम्भी, यम मोही, और कुबेर अभिमानी हैं । इस प्रकार ये सभी देवगण माया के अधीन हैं अतः इनके पूजन करने से क्या लाभ हो सकता है । उपरोक्त छहों शत्रुओं द्वारा जिसकी हार हो गयी है, उसे मुनियों ने अजिन बताया है, और जिसने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया वह अद्वैतवादी रागादि हीन होने के नाते जिन कहा गया है । उसी के ध्यान एवं भाव रखने से मनुष्यों को मोक्ष की प्राप्ति होती है । पृथिवीपति ! उनकी प्रसन्नता के लिए जो धर्म बताया गया है मैं कह रहा हूँ, सुनो ! गो-पूजन से वे देवगण भी सदैव प्रसन्न रहते हैं इसलिए गो-पूजन ही शुद्ध धर्म है क्योंकि हिंसा सर्वत्र वर्जित की गई है । मदपान करने से सर्वात्मा भूत जिन को कष्ट होता है, अतः मांस भोजन और मद्यपान कराना सदैव निषिद्ध कहा गया है । न्यायतः धन का उपार्जन करके भूखे को भोजन करना चाहिए । सूर्य ही जिनकी आत्मा कहे गये हैं अतः जैनियों को उनके प्रकाशित रहने पर ही भोजन करना चाहिए । इस प्रकार (जैन धर्म का वर्णन करके वह मंत्री घर चला गया तथा उसकी बातें स्वीकार करके राजा ने जिन धर्म को ग्रहण किया ।

कुछ समय व्यतीत होने पर उन्होंने वेद-मार्ग का उल्लंघन कर दिया । उस समय उनकी रानी ने अत्यन्त दुःखी होकर भगवान् शिव की शरण प्राप्त की । रुद्र के वरप्रदान द्वारा रानी के महान् उत्तम पुत्र हुआ । उस वेद-व्रत के पारायण करने वाले का धर्मराज नामकरण हुआ । पश्चात् राजा गुणशेखर का निधन हुआ जिससे उन्हें नरक की प्राप्ति हुई । उस समय धर्मराज स्वयं धार्मिक राज्य करने लगा । अनन्तर उसके धर्म के प्रभाव से उसके पिता को स्वर्ग की प्राप्ति हुई । धर्मराज के गुणानुरूप और अत्यन्त उत्तम प्रकृति की तीन स्त्रियाँ हुई । वसंत ऋतु में किसी समय वह राजा अपनी रानियों समेत एक उपवन में जिसमें पुष्पों के ऊपर भौंरे गुंजार कर रहे थे, जाकर रमण करने लगा । शान्त होने पर वह राजा स्त्रियों समेत मदमत्त होकर प्रसन्नता प्रकट करता हुआ किसी सरोवर में स्नान करने लगा । वह एक कमल पुष्प लेकर रानी के हाथ में अर्पित किया, किन्तु उस पुष्प के पतन होने से उसका चरण लँगड़ा हो गया । दुःखी होकर राजा ने उस रानी की चिकित्सा की । पुनः रात्रि के समय चन्द्रप्रकाश होने पर चन्द्र की किरणों से मुग्ध होकर घबड़ाकर गिर गई, किंतु, (पहली स्त्री का) चरण अच्छा हो गया। और उसके गिरने के शब्द सुनकर तीसरी स्त्री को ज्वर हो आया । उस समय दूसरी पत्नी की मूर्च्छा छूट गई । राजा के स्पर्श करने से उसका ज्वर भी दूर हो गया । सुन्दर प्रभात होने पर वह उन स्त्रियों को लेकर अपने घर आया। इतना कहकर नम्रता पूर्वक उस वैताल ने राजा से कहा महाराज ! इन स्त्रियों में कौन सुकुमारी श्रेष्ठ कही जायगी ।

राजा ने कहा — उनमें तीसरी स्त्री परमोत्तम है क्योंकि वायु प्रकृति होने से पहली स्त्री का चरण कमल पुष्प (के स्पर्श) से लंगड़ा हो गया, कफ के अधिक कष्ट होने से चन्द्र किरण के कारण दूसरी स्त्री मूर्छित हो गई और शब्द मात्र सुनकर तीसरी को संताप हो गया अतः यही सर्वोत्तम उसकी स्त्री है । पश्चात् शिवभक्त उस राजा से वैताल ने पुनः कहा — प्रधान जैन धर्म है या वेद धर्म ? उन्होंने कहा सनातन (नित्य) होने के नाते वेदधर्म प्रधान है । उस व्यक्त रूपी ब्रह्म (वेद) के आठ श्रेणियाँ हैं— शुद्र, वैश्य, क्षत्रीय, ब्राह्मण एवं ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये क्रमशः उत्तरोत्तर श्रेष्ठ बताये गये हैं । जो गृहस्थ पुरुष स्त्री का सम्पर्क रखते हुए संन्यासी की भाँति रहता है । वह पापी नरक में महाप्रलय काल तक रखा जाता है । घर में संन्यासियों की भाँति रहना जैनशास्त्र में बताया गया है । इसलिए वह पाखण्डधर्म कहा गया है, बुद्धिमानों को सदैव उसका परित्याग करना चाहिए ।
(अध्याय १०)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९

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