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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – २७
सत्यनारायण-व्रत के प्रसंग में लकड़हारों की कथा

सूतजी बोले — ऋषियों ! अब इस सम्बन्ध में सत्यनारायण-व्रत के आचरण से कृतकृत्य हुआ भिल्लों की कथा सुनें । एक समय की बात है, कुछ निषादगण वन से लकडियाँ काटकर नगर में लाकर बेचा करते थे । उनमें से कुछ निषाद काशीपुरी में लकड़ी बेचने आये । उन्हीं में से एक बहुत प्यासा लकड़हारा विष्णुदास (शतानन्द)— के आश्रम में गया । वहाँ उसने जल पिया और देखा कि ब्राह्मण लोग भगवान् की पूजा कर रहे हैं ।om, ॐ भिक्षुक शतानन्द का वैभव देखकर वह चकित हो गया और सोचने लगा — ‘इतने दरिद्र ब्राह्मण के पास यह अपार वैभव कहाँ से आ गया ? इसे तो आज तक मैंने अकिंचन ही देखा था । आज यह इतना महान् धनी कैसे हो गया ? इस पर उसने पूछा — ‘ महाराज ! आपको यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ और आपको निर्धनता से मुक्ति कैसे मिली ? यह बताने का कष्ट करें, मैं सुनना चाहता हूँ ।’
शतानन्द ने कहा – भाई ! यह सब सत्यनारायण की आराधना का फल है, उनकी आराधना से क्या नहीं होता । भगवान् सत्यनारायण की अनुकम्पा के बिना किंचित् भी सुख प्राप्त नहीं होता ।

निषाद ने उनसे पूछा — महाराज ! सत्यनारायण भगवान् का क्या माहात्म्य है ? इस व्रत की विधि क्या है ? आप उनकी पूजा के सभी उपचारों का वर्णन करें, क्योंकि उपकार-परायण संत-महात्मा अपने हृदय में सबके लिये समान भाव रखते हैं, किसी से कोई कल्याणकारी बात नहीं छिपाते ।
‘साधुनां समधितानामुपकारव्रतां सताम् ।
न गोप्यं विद्यते किंचिदार्तानामार्तिनाशनम् ॥ (प्रतिसर्गवर्ग २ । २७ । ८)
 शतानन्द बोले — एक समय की बात है, केदारक्षेत्र के मणिपूरक नगर में रहनेवाले राजा चन्द्रचूड मेरे आश्रम में आये और उन्होंने मुझसे भगवान् सत्यनारायण-व्रत-कथा के विधान को पूछा । हे निषादपुत्र ! इसपर मैंने जो उन्हें बताया था, उसे तुम सुनो —
सकाम भाव से अथवा निष्कामभाव से किसी भी प्रकार भगवान् की पूजा का मन में संकल्पकर उनकी पूजा करनी चाहिये । सवा सेर गोधूम के चूर्ण को मधु तथा सुगन्धित घृत से संस्कृतकर नैवेद्य के रूप में भगवान् को अर्पण करना चाहिये । भगवान् सत्यनारायण (शालग्राम) को पञ्चामृत से स्नान कराकर चन्दन आदि उपचारों से उनकी पूजा करनी चाहिये । पायस, अपूप, संयाव, दधि, दुग्ध, ऋतुफल, पुष्प, धुप, दीप तथा नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा करनी चाहिये । यदि वैभव रहे तो और अधिक उत्साह एवं समारोह से पूजा करनी चाहिये । भगवान् भक्ति से जितना प्रसन्न होते है, उतना विपुल द्रव्यों से प्रसन्न नहीं होते । भगवान् सम्पूर्ण विश्व के स्वामी एवं आप्तकाम है, उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, केवल भक्तों के द्वारा श्रद्धा से अर्पित की हुई वस्तु को वे ग्रहण करते है । इसलिए दुर्योधन से द्वारा की जानेवाली राजपूजा को छोडकर भगवान् विदुरजी के आश्रम में आकर शाक-भाजी और पूजा को ग्रहण किया । सुदामा के तण्डुल-कण को स्वीकार कर भगवान् ने उन्हें मनुष्य के लिये सर्वथा दुर्लभ सम्पत्तियाँ प्रदान कर दीं । भगवान् केवल प्रीतिपूर्वक भक्ति की ही अपेक्षा करते है । गोप, गृध्र, वणिक्, व्याध, हनुमान्, विभीषण के अतिरिक्त अन्य वृत्रासुर आदि दैत्य भी नारायण के सांनिध्य को प्राप्त कर उनके अनुग्रह से आज भी आनन्दपूर्वक रह रहे हैं ।
न तुष्येद्द्रव्यसम्भारैर्भक्त्या केवलया यथा ।
भगवान् परितः पूर्णो न मानं वृणुयात् क्वचित् ॥
दुर्योधनकृतां त्यक्त्वा राजपूजां जनार्दनः ।
विदुरस्वाश्रमे वासमातिथ्यं जगृहे विभुः ॥
सुदाम्न्स्तण्डुलकणा जग्ध्वा मानुष्यदुर्लभाः ।
सम्पदोऽदाद्धरिः प्रीत्पा भक्तिमात्रमपेक्ष्यते ॥
गोपो गृधो वणिग्व्याधो हनुमान् सविभीषणः ।
येऽन्ये पापात्मका दैत्या वृत्रकायाधवादयः ॥
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदतेऽद्यापि यद्वशाः । (प्रतिसर्गपर्व २ । २७ । १५-१९)

निषादपुत्र ! मेरी बात सुनकर उस राजा चन्द्रचुड ने पूजा-सामग्रियों को एकत्रितकर आदरपूर्वक भगवान् की पूजा की; फलस्वरूप वे अपना नष्ट हुआ द्रव्य प्राप्तकर आज भी आनन्दित हो रहे हैं । इसलिये तुम भी भक्ति से सत्यनारायण की उपासना करो । इससे तुम इस लोक में सुख को प्राप्त कर अन्त में भगवान् विष्णु का सांनिध्य प्राप्त करोगे ।
यह सुनकर वह निषाद कृतकृत्य हो गया । विप्रश्रेष्ठ शतानन्द को प्रणाम कर अपने घर जाकर उसने अपने साथियों को भी हरि-सेवा का माहात्म्य बताया । उन सबने भी प्रसन्नचित्त हो श्रद्धापूर्वक यह प्रतिज्ञा की कि आज काष्ठ को बेचकर हम लोगों को जितना धन प्राप्त होगा उससे अपने सभी बन्धु-बान्धवों के साथ श्रद्धा एवं विधिपूर्वक हम सत्यनारायण की पूजा करेंगे । उस दिन उन्हें काष्ठ बेचने से पहले की अपेक्षा चौगुना धन मिला । घर आकर उन सबने सारी बात स्त्रियों को बतायी और फिर सबने मिलकर आदरपूर्वक भगवान् सत्यनारायण की पूजा की और कथा का श्रवण किया तथा भक्तिपूर्वक भगवान् का प्रसाद सबको वितरित कर स्वयं भी ग्रहण किया । पूजा के प्रभाव से पुत्र, पत्नी आदि से समन्वित निषादगणों ने पृथ्वीपर द्रव्य और श्रेष्ठ ज्ञान-दृष्टि को प्राप्त किया । द्विजश्रेष्ठ ! उन सबने यथेष्ट भोगों का उपभोग किया और अन्त में वे सभी योगीजनों के लिये भी दुर्लभ वैष्णवधाम को प्राप्त हुए ।
(‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का चतुर्थ अध्याय)
(अध्याय २७)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
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10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
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16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
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21. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १६
22. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १७
23. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १८
24. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १९
25. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २०
26. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २१
27. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २२
28. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २३
29. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २४
30. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २५
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