भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – ३१
महर्षि पाणिनि का इतिवृत्त

ऋषियों ने पूछा — भगवन ! सभी तीर्थों, दानों आदि धर्मसाधनों में उत्तम साधन क्या है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य क्लेश-सागर को पार कर जाय और मुक्ति प्राप्त कर ले ?

सूतजी बोले — प्राचीन काल में साम के एक श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनका नाम पाणिनि था । कणाद के श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ शिष्यों से ये पराजित एवं लज्जित होकर तीर्थाटन के लिये चले गये । प्रायः सभी तीर्थों में स्नान तथा देवता-पितरों का तर्पण करते हुए वे केदार-क्षेत्र का जल पानकर भगवान् शिव के ध्यान में तत्पर हो गये । पत्तों के आहार पर रहते हुए वे सप्ताहान्त में जल ग्रहण करते थे ।om, ॐ फिर उन्होंने दस दिन तक जल ही ग्रहण किया । बाद में वे दस दिनों तक केवल वायु के ही आहार पर रहकर भगवान् शिव का ध्यान करते रहे । इस प्रकार जब अठ्ठाईस दिन व्यतीत हो गये तो भगवान् शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा । भगवान् शिव की इस अमृतमय वाणी को सुनकर उन्होंने गद्गद वाणी से सर्वेश, सर्वलिङ्गेश, गिरिजा-वल्लभ हर की इस प्रकार स्तुति की —

“नमो रुद्राय महते सर्वेशाय हितैषिणे ।
नन्दिसंस्थाय देवाय विद्याभयकराय च ॥
पापान्तकाय भर्गाय नमोऽनन्ताय वेधसे ।
नमो मायाहरेशाय नमस्ते लोकशंकर ॥”

(प्रतिसर्गपर्व- २ । ३१ । ७-८)

‘महान रुद को नमस्कार है । सर्वेश्वर सर्वहितकारी भगवान् शिव को नमस्कार है । अभय एवं विद्या प्रदान करनेवाले, नन्दी वाहन भगवान् को नमस्कार है । पाप का विनाश करनेवाले तथा समस्त लोकों के स्वामी एवं समस्त मायारुपी दुःखों का हरण करनेवाले तेजःस्वरुप अनन्तमूर्ति भगवान शंकर को नमस्कार हैं ।
देवेश ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे मूल विद्या एवं परम शास्त्र-ज्ञान प्रदान करने की कृपा करें, ।’

सूतजी बोले — यह सुनकर महादेवजी ने प्रसन्न होकर ‘अ इ उ ण’ आदि मङ्गलकारी सर्व-वर्ण-मय सूत्रों को उन्हें प्रदान किया । ज्ञानरुपी सरोवर के सत्यरूपी जल से जो राग-द्वेष-रूपी मल का नाश करनेवाला है, उस मानसतीर्थ को प्राप्त करनेपर अर्थात् उस मानस तीर्थ में अवगाहन करनेपर सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है । यह महान-ज्ञान-तीर्थ ब्रह्म के साक्षात्कार कराने में समर्थ है । पाणिने ! मैंने यह सर्वोत्तम तीर्थ तुम्हे प्रदान किया हैं, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे । यह कहकर भगवान रूद्र अन्तर्हित हो गये और पाणिनि अपने घर पर आ गये । पाणिनि ने सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ और लिंगसूत्र-रूप व्याकरण शास्त्र का निर्माण कर परम निर्वाण प्राप्त किया ।
सूत्रपाठं धातुपाठं गणपाठं तथैव च ।
लिङ्गसूत्रं तथा कृत्वा परं निर्वाणमासवान् ॥
(प्रतिसर्गपर्व- २ । ३१ । १३-१४)

अतः भार्गवश्रेष्ठ !  तुम मनोमय ज्ञानतीर्थ का अवलम्बन करो । उन्होंने कल्याणमयी सर्वोत्तम तीर्थमयी गंगा प्रकट हुई है । गंगा से बढकर उत्तम तीर्थ न कोई हुआ है और न आगे होगा ।
(अध्याय ३१)

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