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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २८

सूत जी बोले — अपने अट्ठाईसवें वर्ष की अवस्था आरम्भ होने पर उदयसिंह ने कार्तिकमास के चन्द्र दिन जिसमें कृत्तिका नक्षत्र एवं व्यतीपात योग सन्निहित थे, अपनी दश सहस्र सेना लेकर स्वर्णवती (सोना) देवी समेत विवाह-मुकुट के त्यागार्थ गंगा के तट के उस स्थान पर प्रस्थान किया जहाँ कमल का अरण्य सा दिखाई देता था। उसी पवित्र उत्पलारण्य में महर्षि बाल्मीक जी निवास करते थे। om, ॐगंगा के तट पर वह स्थान ब्रह्ममय होने के नाते लोहे की भाँति कीलित कहा जाता है। वहाँ पहुँचकर शुद्धात्मा उदयसिंह ने पुष्पवती के साथ स्नान के उपरांत प्रसन्न होकर सहस्र गोदान व्राह्मणों को प्रदान किया।

उसी बीच शोभा नाम की एक परम सुन्दरी वेश्या आई, जो अत्यन्त सुरम्य और म्लेच्छ कुल में उत्पन्न थी। वह परमसुन्दर एवं पुरुषश्रेष्ठ उदयसिंह को देखते ही उनकी तीसरी आँखों के आघात से व्याकुल होकर उसी समय मूच्छित हो गई। उसे मूच्छित देखकर सर्वमोहन उदयसिंह ने अपने निवासस्थान पर पहुँचकर ब्राह्मणों को बुलवाकर उनसे प्रश्न किया-वेदशास्त्र पारायण करने वाले विद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ ! अष्टादश पुराणों के रचयिता कौन हैं, और उसके श्रवण करने से किम फल की प्राप्ति होती है । इस उत्तम वाणी को सुनकर शास्त्र निपुण विद्वानों ने सगस्त धर्म के ज्ञानी उन उदयसिंह से सुन्दर वाणी द्वारा कहा-पराशर जी ने विष्णुपुराण शिवजी ने स्कन्दपुराण, ब्राह्म ने पद्मपुराण, शुकदेव ने भागवत पुराण, ब्रह्मा ने ब्रह्मपुराण, तथा विष्णु ने गरुडपुराण की रचना की है। यही छहो पुराण सात्विक कहे जाते हैं । मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण, नृसिंहपुराण, वामनपुराण, शिवपुराण और वायु पुराण के रचयिता भी व्यास जी हैं। उस भूतल में ये छहोपुराण राजस् एवं कर्मकाण्डमय कहे गये हैं। मार्कण्डेय और बराहपुराण की रचना मार्कण्डेय ऋषि ने की है ।१-१३। उत्तम अग्नि पुराण के रचयिता अंगिरा हैं । लिंग पुराण और व्रह्माण्ड पुराण की रचना तंडी तथा शुभ भविष्यपुराण की रचना महादेव जी ने की है। शक्तिधर्मपरायण इन छहों पुराणों को तामस् बताया गया है। समस्त पुराणों में भागवत पुराण श्रेष्ठ बताया गया है । पृथ्वी पर घोर कलि के वर्तमान होने पर राजा विक्रमादित्य ने कैलास से पृथ्वी में आगमन करके सभी मुनियो को बुलाया। उस समय नैमिषारण्य निवासी उन महर्षिगणों ने अट्ठारह उपपुराणों की कल्पना की है। धर्मारूढ़ उदयसिंह ने इसे सुनकर भागवतपुराण का पारायण श्रवण करने के उपरांत सातवें दिन व्राह्मणों को गो सुवर्ण के दान प्रदान करके सहस्र वैदिक ब्राह्मणों को भी भोजन कराया। उस समय मदविह्वल शोभा ने भी भिक्षुकी का रूप धारणकर उदयसिंह के पास पहुँचकर माया करना आरम्भ किया—उसने रुद्रकिंकर एवं वीर महामद पिशाच के ध्यानपूर्वक सबको पत्थर कर देने वाली माया की रचना की ! उसे देखकर देवी स्वर्णवती (सोना) ने जो आह्लाद की वामाङ्गी हैं, उसकी माया का विध्वंस करके घर के लिए प्रस्थान किया। उसी समय क्रुद्ध होकर उस वेश्या ने अपनी धूर्तमाया द्वारा स्वर्णवती (सोना) के उत्तम श्रृंगार का, जो स्वर्ण के सुरम्य यंत्र में स्थापित एवं एक लक्ष के मूल्य का था, अपहरण करके वाह्नीक देश को प्रस्थान कर दिया। कल्पक्षेत्र में पहुँचकर नेत्रसिंह की आत्मजा (सोना) ने यह जानकर कि ‘उस वेश्या ने मेरे श्रृंगार का अपहरण कर लिया है, अत्यन्त दुःख प्रकट करती हुई उदयसिंह से कहा-महाबल ! जाओ-जाओ ! मेरे श्रृंगार लेकर मुझे शीघ्र मिलो वीर ! इस मेरे द्वारा रचित गुटिका को मुख में धारण करने से उसकी धूर्त माया विनष्ट हो जायेगी । आपकी मांगलिक कामना के लिए मैंने उसका निर्माण किया है । इसे सुनकर सर्वमोहन उदयसिंह ने उसी भाँति गुटिका धारणकर वाराहक्षेत्र में उस वेश्या को देखा। वह वेश्या भी काम के समान सुन्दर इन्हें देखकर माया की रचना पूर्वक इनके समीप पहुँच गई । किन्तु उसकी माया के निष्फल हो जाने से वह कारुणिक रुदन करने लगी। दयाभूत उदयसिंह ने प्रसन्न होकर रुदन करती हुई उसे देखकर श्रृंगारवस्तु ग्रहण करने के उपरान्त उससे कहा-महाभागे ! क्यों रुदन कर रही है, सत्य कहो, विलम्ब करने की आवश्यकता नहीं है। उसने कहा-सहर नामक मेरे भाई का जो मेरे प्राण के समान प्रिय था, पाँच सहस्र नाद्यों के साथ निधन हो गया है। महाभाग ! इसीलिए आपकी शरण में आकर रुदन कर रही हूँ। इतना कहकर उस धूर्ता ने माया द्वारा अन्त्यजो (नीनों) के शवों का उन्हें प्रदर्शन कराया। और पश्चात् अपने कार्य को सफल करने वाली उस वेश्या ने उनके सम्मुख रुदन करती हुई अपने प्राण विसर्जन की तैयारी कर दी। दयालु उदयसिंह ने उसकी अवस्था देखकर उससे करुण वचनों द्वारा कहा-शोभने ! तुम्हारे वे भ्रातृगण किस प्रकार जीवित हो सकेंगे’ मुझसे शीघ्र कहो। उसने कहा-वीर ! तुम्हारे मुख में स्थित गुटिका द्वारा ही वे सब जीवनदान प्राप्त कर सकेंगे। अतः उसे मुझे देने की कृपा कीजिये। उसके इस प्रकार कहने पर उन्होंने वह गुटिका उसे दे दी। पश्चात् उस धूर्ता ने जो कामपीड़ित हो रही थी प्रसन्न होकर उन्हें शुक (तोता) बनाकर पिंजरे में रखकर अपने वाहीक देश के नगर को प्रस्थान किया। वहाँ अपने घर पहुँचने पर आधीरात के समय मनुष्य रूप में उनके दिव्य शरीर को पूर्ववत् बनाकर उस वेश्या ने काम-पीडित होकर उन धर्म धुरन्धर उदयसिंह का आलिंगन किया, किन्तु उसकी वैसी अवस्था देखकर धीरवीर उदयसिंह ने नम्रता पूर्वक रात्रि सूक्त द्वारा देवी जगदम्बिका की मानसिक आराधना की। उस समय वह स्वेडिनी का रूप धारणकर इमली के वृक्षपर बैठ गई और उन्हें शुक (तोते) के रूप में परिणत कर दिया। उसी बीच विष्णु माया द्वारा स्वर्णवती (सोना) को इस रहस्य का पता लगने पर उसने बाज पक्षी का रूप धारणकर वहाँ पहुँचकर योगी उदयसिंह को शुक के रूप में देखा।

उस समय उस वेश्या ने उनके मनुष्य रूप को पुनः उन्हें प्रदानकर उनसे नम्रता पूर्वक कहा। अये प्राणप्रिय स्वामिन् ! मैं मदन से अत्यन्त व्यथित हो रही हैं, अतः शीघ्र मेरा आलिंगन कीजिये । आप निपुण धर्मज्ञाता हैं, इसलिए रतिदान द्वारा मेरी रक्षा कीजिये । इस प्रकार कहने पर उन्होंने उससे कहा-शोभने ! मेरी बात सुनो ! मैं आर्य धर्म में स्थित होकर वेदमार्ग का यात्री हूँ । जो पुरुष अपनी विवाहिता स्त्री के ऋतुकाल में उसे ऋतुदान नहीं प्रदान करता है, वह पापी नरकयातना के अनुभव करने के उपरांत तिर्यक् (पक्षी) योनि में जाता है। अतः परस्त्री का उपभोग नितान्त नरकप्रद है, इसमें संदेह नहीं है। इसे सुनकर उसने कहा-महाप्राज्ञ ! ज्ञानी विश्वामित्र और शृङ्गी ऋषि ने पहले समय में वेश्या-प्रसङ्ग किया था, किन्तु किसी को नरक नहीं जाना पड़ा। अतः मुझ कामातुर का आलिंङ्गन करना स्वीकार कोजिये । इसे सुनकर उदयसिंह ने पुनः प्रत्युत्तर दिया-वे दोनों महर्षि प्रवर महान् तपस्वी थे, अपने तपोबल द्वारा उन्होंने वैसा किया था। परन्तु इस समय मैं ऐसा करने में अमसर्थ हूँ । पुरुष का अद्धग उसकी स्त्री है, विशेषकर मैथुनकर्म के लिए। इसलिए मैं आर्यपुरुष हूँ और तुम अनेकों के उपभोग करने वाली वेश्या हो, दोनों का साथ होना सर्वथा असम्भव है। क्योंकि पूर्व मुख से सर्वप्रथम ऋषि शब्द का अविर्भाव हुआ, जिससे सनातन की ख्याति हुई, उसी प्रकार दक्षिण मुख से योग यजु शब्द और पश्चिम मुख से तद्धितान्त सामज शब्द आविर्भूत हुए, इसलिए छंद भूत (वैदिक) जितने शब्द हैं, वे ब्राह्मणों को अत्यन्त प्रिय हैं । अथर्व से केवल वर्णमात्र की उत्पत्ति हुई है एवं पंचम मुख से निकले हुए शब्द सांसारिक कहे जाते हैं, जो प्राकृत तथा चार लाख भेद पूर्ण हैं। अतः जो शुद्धात्मा एवं चतुर्वेद का पारायण करने वाला पुरुष उनके त्याग करता है, वही संसार (जन्ममरण) रूप घने जंगल को पारकर अनामय (ब्रह्म) पद-मोक्ष की प्राप्ति करता है। प्राण के कंठ तक चले आने पर भी यावनी (मुसलमानी) भाषा के उच्चारण और हाथी द्वारा कुचल जाने पर भी जैन मन्दिर में जाना नहीं चाहिए। मुनियों के कहे हुए इन स्मृति वाक्यों को भी मैंने बता दिया । इसलिए उस धर्म का त्याग मैं कैसे कर सकता हूँ, जो सभी लोगों को ख प्रदान करता है। इसे सुनकर उस म्लेच्छ वंश की वेश्रा ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर वेतों द्वारा उन्हें अत्यन्त ताडित किया, पश्चात् शुक बनाकर भोजन भी नहीं दिया । इस दृश्य को देखने के उपरांत स्वर्णवती (सोना) देवी ने अपना स्त्री रूप धारणकर उदयसिंह को ‘मसक’ बनाकर वहाँ से तिरोहित होकर पुनः वाज पक्षी का रूप धारणकर अपने देश को प्रस्थान किया। मशक रूप में उदयसिंह को अपनी पीठ पर बैठाये हुए वह मयूर नगर में पहुँच गई। उसे देखकर मकरन्द ने पहचान लिया कि उदयसिंह के समेत गहू नेत्रसिंह की स्वर्गवती (सोना) नामक कन्या हैं, सादर उसके चरण का स्पर्श किया और अपने महल में निवास कराया । पिंजडे के पास जाकर उसे शून्य देखकर शोभना मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी । पश्चात् चेतना प्राप्त होने पर रुदन करने लगी-‘मैं उस रमण उदयसिंह के बिना अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। इस प्रकार अनेक भाँति से विलाप करने के उपरांत वह मदहीनपुर चली गई । वहाँ के रहने वाले महामदनामक पिशाचकर्मी की जो अत्यन्त मायावी था, पूजा करने के उपरांत उसके सामने वह अपने प्राण विसर्जन के लिए तैयार हो गई। उसे देखकर प्रसन्न होकर वह महामद भगवान् मरुस्थल महादेव के मंदिर में पहुँचकर संस्कृत वाणी द्वारा उनकी आराधना करने लगा। उससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने अपने इस सेवक से कहा- आर्य धर्मावलम्बी एवं वीर उदयसिंह का अपहरण स्वर्णवती ने किया है अतः दर्शनार्थ मेरे साथ मयूर नगर चलने की तैयारी करो। उनके इस प्रकार कहने पर वह मायावी अपने पाँच सहस्र नटों समेत शोभा वेश्या, और सहुर को साथ लेकर वहाँ से चल पड़ा। विष्णु माया (देवी) जी द्वारा इस रहस्य का पता चलने पर इन्दुल (इंदल) आह्लाद (आल्हा) और देवसिंह (डेबा) ने अपने तीन लाख सैनिकों समेत मयूर नगर में पहुँचकर मकरन्द से भेंट किया। उस समय सहर समेत शोभना ने अपने दल-बल के साथ वहाँ पहुँचकर अपनी भीषण माया की, जो समस्त शत्रुओं के लिये भयावह थी। रचना करना आरम्भ किया-वहाँ उस पर बड़े-बड़े मेघों के समान चारों ओर से वायुमंडल उठने लगा, उल्का (लूक) गिरने लगे, और धूल की वर्षा होने लगी । उस भीषण माया को जिसमें चारों ओर से घना अंधेरा छाया हुआ था, देखकर बलवान् मकरन्द रथ पर बैठकर स्वयं वहाँ पहुँचे, जहां से उस माया का संचालन हो रहा था। उस महाबली ने अपने शनिभल्ल नामक अस्त्र द्वारा उस माया को नष्ट करके उस सबल एवं धूर्त सहुर को पकड़कर अपने गृह को आगमन किया। उस समय शोभना वेश्या ने अपनी काम-माया की रचना की उसमें नृत्य-गान में अत्यन्त निपुण अनेक वेश्याओं का जमाव था, सबको लुभाने के लिए वे नृत्य-गान कर रही थीं । उस नृत्य को देखकर देवसिंह और उदयसिंह के अतिरिक्त सभी क्षत्रियगण जड़ की भाँति मोहित हो गये। उस समय स्वर्णवती (सोना) देवी ने कामाक्षी देवी का ध्यान करके उन्हें चेतना प्रदान कर खड़ा किया, पश्चात् उस शोभना को पकड़कर मयूरध्वज के पास लाकर लोहे की जंजीरों से उसे बाँध दिया। इस बात का पता लगने पर महामद ने भगवान रूद्र के ध्यान पूर्वक अपनी शाम्बरी माया का प्रसार किया-उनमें अनेक भाँति के जीव दिखाई देते थे, वाघ, सिंह सूकर, वानर, मसक, दंशक, सर्प, गीध तथा कौवे के झुण्ड चारों ओर से सिंह का भक्षण कर रहे थे। सैनिकों में हाहाकार मच गया वे इधर-उधर भागने लगे। किन्तु उस माया करने वाली शोभना को स्वर्णवती (सोना) का दासीपद स्वीकार करना पड़ा। और उन नटों समेत सहुर को आह्लाद (आल्हा) ने स्वयं चूर्ण कर दिया । पश्चात् उनके रुधिर भरे घड़ों को भूमि के भीतर गड़वा दिया। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार वहाँ चौमासे भर युद्ध का क्रम चलता रहा, पश्चात् वैशाख मास के आरम्भ में वे वीरगण अपने अपने घर चले गये ।
(अध्याय २८)

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