भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय ३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय ३
ब्राह्मणों की उत्पत्ति के प्रसंग में शुक्लवंश एवं उसके आगे होनेवाले विभिन्न क्षत्रियवंशों का वर्णन

सूत जी बोले — विप्रवर ! मैं शुक्लवंश का आरम्भ से वर्णन कर रहा हूँ, सुनो ! जिस समय भगवान् कृष्ण ने वृन्दावन नामक अपने दिव्यस्थान को त्यागकर दिव्यलोक की यात्रा की, उस समय कलि के आगमन एवं म्लेच्छ राजाओं की अधीनता न स्वीकार कर जो वैदिक-धर्म के अनुयायी मनुष्य-गण द्वीपों में जा-जाकर निवास कर रहे थे, उन्हें भी म्लेच्छ धर्मानुयायी कलि ने उनके धर्मों से वञ्चित कर दूषित कर दिया।

मुनिसत्तम ! अड़सठ सहस्रवर्ष आज कलि के आगमन में बीत चुका । om, ॐसाठ सहस्र वर्ष तक उसने द्वीपों में राज्य किया। पश्चात् म्लेच्छ के साथ सूर्य की आराधना की। तदुपरान्त भारत वर्ष में म्लेच्छ समेत उसका आगमन हुआ । लोकपालों द्वारा सुरक्षित इस भारत वर्ष को देखकर वह अत्यन्त भयभीत हुआ, किन्तु गन्धर्वो के यशस्वी उस कलि ने सूर्य की आराधना पूर्वक शीघ्र ही समाधि लगाना आरम्भ किया सौ वर्ष के उपरान्त उसकी आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य ने अपनी किरणों द्वारा इस लोक को संतप्त करके महावृष्टि की । मुनिश्रेष्ठ ! इस घटना को हुए आज चार सहस्र वर्ष व्यतीत हो चुके । पश्चात् भारतवर्ष सभी प्रकार से सम्पन्न हुआ, क्योंकि उस समय संसार की पूर्ति न्यूह नामक यवन ने किया था । कलि के एक सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने पर देवसम्राट महेन्द्र ने स्वयं इस महोत्तम ब्रह्मावर्त प्रदेश में काश्यप को भेजा । उन्होंने आर्यवर्ती नामक देवशक्ति का पाणिग्रहण करके उससे दस पुत्रों की उत्पत्ति के उपरान्त मिस्र देश को प्रस्थान किया । वहाँ के दस सहस्र म्लेच्छों को अपने अधीनकर अपने देश लौटने पर उन्हें शिष्य बनाया तथा वे सप्तपुरियों के नष्ट हो जाने पर पवित्र ब्रह्मावर्त नामक प्रदेश में, जो सरस्वती और दृषद्वती के मध्य में स्थित है, उन्हें निवास करने लगे । अनन्तर अपने पुत्र शुक्ल को जो ब्राह्मणश्रेष्ठ एवं महान तपस्वी था, रैवत पर्वत (गिरनार)— के शिखर पर तप करने के लिए आदेश देकर शेष नव पुत्रों और शिष्यों को मनुधर्म का अनुयायी बनाया । शुक्ल ने भी रैवत पर्वत पर पहुँचकर सत्, चित् और आनन्द रूप वाले उस जननाथ वासुदेव को अपने तप द्वारा अत्यन्त सन्तुष्ट किया, जिससे प्रसन्न होकर बली एवं द्वारकाधीश्वर भगवान् ने उस ब्राह्मण का हाथ पकड़कर समुद्र के भीतर प्रस्थान किया । वहाँ दिव्य शोभा सम्पन्न उस द्वारका का दर्शन कराया ।

भृगूत्तम ! दो सहस्र वर्ष बीतने पर वह शुक्ल अग्निमार्ग से अर्बुद (आबू) — पर्वत पर पहुँच गया । वहाँ अपने तीन भाइयों और ब्राह्मणों के साथ बौद्धों को जीतकर भगवान् की कृपावश द्वारका नगर को पुनः स्थापित किया । वहाँ रहते हुए उन्होंने भगवान् कृष्ण का ध्यान करना प्रारम्भ किया । पश्चिमीय भारत में अधीश्वर के पद पर दस वर्ष तक प्रतिष्ठित रहने के उपरान्त भगवान् की कृपा से उनके विष्वक्सेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । बीस वर्ष राज्य करने पर उसके जयसेन हुए जिसके तीस वर्ष तक राज्य करने के उपरान्त विसेन नामक पुत्र हुआ । पचास वर्ष तक राज्य करने के उपरान्त उनके जुड़वाँ बच्चे उत्पन्न हुए । जिनका प्रमोदा और मोदसिंह नाम था । राजा विसेन ने अपनी पुत्री का पाणिग्रहण विक्रम द्वारा सुसम्पन्न कराकर अपना उत्तम राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया । अपने पिता के समानकाल तक राज्य करने पर सिंधुवर्मा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने अपने पिता के राज्य का त्यागकर सिन्धुतट पर अपना दूसरा राष्ट्र स्थापित किया । उसी समय से इस भूतल में वह सिन्धुदेश के नाम से प्रख्यात हुआ । उस सिन्धुधर्मी राजा के सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीप के श्रीपति हुए, श्रीपति ने गौतमकुल में उत्पन्न उस काच्छपी नामक कन्या को रानी बनाकर उसी द्वारा कच्छदेश की प्राप्ति की । वहाँ पुलिन्दों और यवनों पर विजय प्राप्ति पूर्वक देश का निर्माण किया, जो सिन्धुतट पर श्रीपति के नाम से ख्यातिप्राप्त है । श्रीपति के भुजवर्मा हुए, जिन्होंने शबर और भीलों को पराजित कर वहाँ राष्ट्र स्थापित किया । इसी से पृथ्वी में ‘भुजदेश’ के नाम से उनकी ख्याति हुई है । भुजवर्मा के रणवर्मा, रणवर्मा के चित्रवर्मा हुए । चित्रवर्मा ने वन के भीतर चित्रनगरी का निर्माण कराया । चित्रवर्मा के धर्मवर्मा, धर्मवर्मा के कृष्णवर्मा, कृष्णवर्मा के उदय हुए, जिन्होंने वन के मध्य में ‘उदयपुर‘ नामक नगर को स्थापित किया । उदय के वाप्यकर्मा उत्पन्न हुए । वाप्यकर्मा ने वावली, कूप एवं सरोवर आदि और अनेक महलों के निर्माण पूर्वक धर्मार्थ एक नगर का निर्माण कराया ।

उसी बीच वलद (बीरवलद) नामक राजा ने मदान्ध होकर अपने एक लाख सैनिकों समेत वहाँ से आकर इस राजा से युद्ध आरम्भ किया । राजा वाप्यकर्मा ने उस म्लेच्छ राजा को पराजित कर भगवान् कृष्ण का महान् उत्सव कराया । वाप्यकर्मा के गुहिल नामक पुत्र हुआ । गुहिल के कालभोज, कालभोज के राष्ट्रपाल उत्पन्न हुए, जिन्होंने अपने पिता के पद का त्यागकर वैष्णवी शक्ति सर्वमङ्गला शारदा की तप द्वारा आराधना की । उस समय प्रसन्न होकर देवी जी ने ‘महावती’ नामक अत्यन्त सुन्दर पुरी का निर्माण किया, जो सदैव मणिदेव से सुरक्षित रहती थी । उस बुद्धिमान् राजा राष्ट्रपाल के उस पूरी में दा वर्ष तक राज्य करने के उपरान्त उनके विजय और प्रजय नामक दो पुत्र-रत्न उत्पन्न हुए, जिसमें प्रजय ने अपने पिता के पद का त्यागकर गंगातट पर बारह वर्ष तक शारदा देवी की उपासना की । देवी ने कन्यारूप धारणकर वेणुवादन करती हुई घोड़े पर बैठकर उस राजा के सम्मुख जाकर कहा — राजपुत्र ! किसलिए तुमने पार्वती की आराधना की है ? कहो ! मैं वह फल प्रदान करने के लिए तैयार हूँ । यह सुनकर उसने कहा — ‘मधुर भाषण करने वाली कुमारी देवि ! मेरे लिए एक नवीन नगर का निर्माण करो मैं तुम्हें नमस्कार कर रहा हूँ ।’ इसे सुनकर देवी जी ने उस शुभ घोड़े को प्रजय को प्रदानकर आगे-आगे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया । राजा भी उस घोड़े पर बैठकर अपने दोनों नेत्रों को बन्दकर उनके पीछे-पीछे जा रहा था । पश्चात् वह राजा पश्चिम दिशा की ओर आया । वहाँ से पुनः पूर्व दिशा की ओर गया, जहाँ मर्कण नामक पक्षी रहता था। वहाँ पहुँचने पर भयभीत होकरराजा ने अपने नेत्रों को खोला, तो उस स्थान पर उस कन्या द्वारा रचित एक रमणीक नगर सामने दिखाई दिया, जिसके उत्तर की ओर गंगा, दक्षिण की ओर पाण्डुरा, पश्चिम की ओर ईशसरिता और पूर्व की ओर वही मर्कण नामक पक्षी रहता था । वह नगर कुब्ज (ऊँची-नीची भूमि होने के नाते कुब्ज) था, इसीलिए उसका नाम ‘कान्यकुब्ज’ हुआ ।

उस नगर के राजसिंहासन पर दस वर्ष तक आसीन रहने पर उनके वेणुक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वेणुवादन में अधिक रुचि रखता था । राजा वेणुक ने देवी प्रदत्त एक अत्यन्त मनोरम कन्यावती नामक कन्या के साथ पाणिग्रहण करके उसे अपनी पत्नी बनाया । उनकी उस स्त्री से सात कन्यायें उत्पन्न हुई, जो मातृकाओं की माङ्गलिक कला के रूप में थीं । शीतला, पार्वती, कन्या, पुष्पवती, गोवर्धनी, सिन्दूरा और काली उन कन्याओं के नाम थे । जो क्रमशः ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी एवं चामुण्डा के नाम से प्रख्यात हुईं ।

एक बार उस राजा की पत्नी ने नित्य की भाँति उस दिन भी सूत की रस्सी से मिट्टी के घड़े को फाँसकर जल लेने के लिए कुएँ में लटकाया । उसी समय वहाँ और भी स्त्रियों का आगमन हुआ, जो सुन्दर वस्त्र एवं अनेक प्रकार के भूषणों से विभूषित थीं । उन्हें उस प्रकार सुसज्जित और अपने केवल एक ही वस्त्र को देखकर उसके मन में इतनी अधिक ग्लानि उत्पन्न हुई कि वह घड़े को कुएँ से बाहर न निकाल सकी । उन स्त्रियों को आपस में आलाप-संलाप में तन्मय देखकर देवी कन्यावती बिना घड़े के अपने घर चली आई । घर पहुँचने पर उसने अपनी कन्याओं को शिला के रूप में स्थित देखा । उसे सुनकर राजा वेणु अपने घर आये और अपनी पत्नी की अत्यन्त भर्त्सना की । तत्पश्चात् ब्रह्मचर्य का त्यागकर अपनी पत्नी के साथ रमण किया, जिससे उस वीर रानी के गर्भ से मूर्तिमान् यशोविग्रह नामक एक पुत्र की उत्पत्ति हुई, जो बलवान, धर्मी एवं आर्यदेश का अधीश्वर हुआ ।

यशोविग्रह ने इस भूतल पर बीस वर्ष तक राज्य का उपभोग किया । पश्चात् उसके महीचन्द्र नामक पुत्र हुए। महीचन्द्र के चन्द्रदेव और चन्द्रदेव के मन्दपाल उत्पन्न हुए, जिसके राजकाल में सभी राजाओं ने मन्दपाल के त्यागपूर्वक उसके दिये हुए गृहों में निवास किया था । इसने अपने पिता के आधे समय तक राज्यभार को संभाला था । राजा मन्दपाल के कुम्भपाल हुआ, जिसने महामोद को अपनी बुद्धिमानी से लौटा दिया ।

एकबार पिशाचों के बीच में स्थित राजनीया नगरी के अधीश्वर महामोद नामक म्लेच्छ ने अनेक देशों को पराजितकर उसके धनों को लूटते हुए राजा कुम्भपाल की राजधानी के समीप आगमन किया । नृप ! राजा कुम्भपाल ने कलिमूर्ति उस महामोद नामक म्लेच्छ को देखकर विचार किया, पश्चात् उस बुद्धि-कुशल राजा ने वहाँ जाकर उसे सहर्ष प्रणाम किया, जिससे प्रसन्न होकर उस वीर एवं मूर्तिध्वंसी म्लेच्छराज ने इन्हें बहुत-सा धन देकर अपनी राजनीया नामक नगरी को प्रस्थान किया। बीस वर्ष तक राज्य करने पर राजा कुम्भपाल वे देवपाल नामक पुत्र हुआ, जिसने अनंगराज की चन्द्रकान्ति नामक कन्या के साथ सविधान पाणिग्रहण करके उसके समेत कान्यकुब्ज (कन्नौज) आकर अत्यन्त सुखी-जीवन व्यतीत किया । वहाँ रहकर अनेक राजाओं पर विजय प्राप्ति पूर्वक उन्होंने अपने पिता के समान काल तक राज्य का उपभोग किया । देवपाल के जयचन्द्र और रत्नभानु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने उत्तर और पूर्व के आर्य प्रदेशों को जीतकर वैष्णव राज्य की प्राप्ति की । रत्नभानु का पुत्र ख्यातिप्राप्त लक्षण (लाखन) हुए, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के रणस्थल में घोर संग्राम करते हुए प्राण विसर्जन कर स्वर्ग की प्राप्ति की । इस प्रकार बुद्धिमान् वैश्यपाल और वैश्यों के रक्षक शुक्लवंशीय कुम्भपाल के राष्ट्र-वंश का वृत्तान्त समाप्त हुआ । विष्वक्सेन के वंशज राजा लोग विष्वक्सेनवंशीय, विसेन कुल में उत्पन्न क्षत्रिय विसेनवंशीय, गुहिल कुल में उत्पन्न क्षत्रियगण गौहिल और राष्ट्रपाल वंश के क्षत्रिय राजगण राष्ट्रपालवंशीय कहे गये हैं । वैश्यपाल एवं बुद्धिमान् कुम्भपाल के वंशज नृपगण अनेक भाँति के भेद उत्पन्न करने के नाते अनेक भाँति के बताये गये हैं । चन्द्रवंश के धुरंधर राजा लक्षण (लाखन) के स्वर्गीय होने पर उस कुरुक्षेत्र के स्थल में अधिकांश मुख्य क्षत्रियों का नाश हो गया था। उस समय छोटे ही राजागण शेष थे, जिनकी स्त्रियों से बलात रमण करके उन म्लेच्छों ने उस भीपण म्लेच्छराज के समय में वर्णसंकरों की उत्पत्ति की ।
(अध्याय ३)

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