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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय १३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय १३
अघोरपंथी भैरव हनुमज्जन्म, रुद्रमाहात्म्य और बालशर्मा की उत्पत्ति का वर्णन

बृहस्पति बोले — अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा ने सोलह वर्ष तक कमल में स्थित रहने के उपरान्त पुनः सृष्टि करने का प्रयत्न किया । उसी समय उनके मुख द्वारा शारदा देवी का आविर्भाव हुआ, जिसके दिव्य सौन्दर्यपूर्ण अंगों को देखकर ब्रह्मा ने कामपीड़ित होकर बलात् उसे पकड़कर अपनी अधीरता प्रकट की उन्होंने कहा — मदोन्मत्ते ! रतिदान द्वारा मेरी कामपीड़ा-शान्तिपूर्वक रक्षा करो । इसे सुनकर उस माता ने क्रुद्ध होकर पितामह ब्रह्मा से कहा — यह तुम्हारा पाँचवा मुख अशुभ होने के नाते तुम्हारे कन्धे पर रहने योग्य नहीं है । तुम सर्वेश्वर हो, अतः वेदमय यह चार ही मुख तुम्हारे कन्धे पर रहने योग्य हैं । om, ॐइतना कहकर वह माता अन्तर्हित हो गयी, जिससे ब्रह्मा अत्यन्त क्रुद्ध हो गये । उनके उस क्रोधाग्नि द्वारा पृथ्वी के समस्त जल सूख गये, पश्चात् क्रोध के शान्त होने पर भयंकर रुद्र का आविर्भाव हुआ, जो भैरव, कालात्मा एवं सप्तवाहन के नाम से प्रख्यात हैं । उन्होंने अपने नृसिंह के समान नखों द्वारा उनके उस पाँचवें मुख का छेदन कर दिया । पश्चात् लोककल्याणकर्ता भगवान् शंकर ने उस रुद्र देश में भीषण गर्जना की जिससे भयभीत होकर ब्रह्मा भैरव की शरण में गये । उन्होंने कहा — नाथ ! मुझ पापात्मा को सद्बुद्धि की प्रेरणा दें । इसे सुनकर लोकप्रख्यात भगवान् भैरव ने कहा — हे लोकविश्रुत ! ब्रह्मरूप मैं भी आप वरेण्य (तेजस्वी) के समीप उपस्थित हैं, जो सविता देव का तेज एवं वरेण्य रूप है । पश्चात् उन्होंने अत्यन्त प्रगाढ़ रुदन किया जिससे आकाश से अश्रुबिन्दुओं को अविरल पतन हुआ । उसी से रुद्राक्ष के पृथक्-पृथक् वृक्ष उत्पन्न हुए । शिवजी ने ब्रह्म-वध से भयभीत होकर उनके कपाल को ग्रहण किया, जिससे उन भैरव की कपाली नाम से प्रख्याति हुई । उस समय शिवजी ने सभी लोकों के पवित्र स्थानों एवं मन्दिरों में यात्रा की, किन्तु उस ब्रह्महत्या से मुक्त न हो सके । एक बार भगवान् हर ने भ्रमण करते हुए उन रुद्राक्ष के वृक्षों के आश्रित रहना आरम्भ किया, वहाँ ब्रह्महत्या उन्हें मुक्तकर दूर चली गई । उसी समय से शिव ने उस परमोत्तम रुद्राक्ष को धारण किया और पश्चात् काशी आकर उस कपाल का मोचन किया, जिससे उस स्थान की अघविनाशक कपालमोचन नामक तीर्थपद से विस्तृत ख्याति हुई ।

उसी बीच समस्त देवों समेत ब्रह्मा ने वहाँ आकर स्तुतियों द्वारा महादेव की आराधना की। तदुपरांत ब्रह्मा ने मकर राशिस्थ सूर्य के समय उन कपाली महादेव को चन्द्रमण्डल का अधिनायक बनाया ।

सूत जी बोले — बृहस्पति की ऐसी बात सुनकर उन कपाली भैरव शिव ने अपने मुख द्वारा अपने अंश को निकालकर काशी में अयोनिज जन्म ग्रहण किया, जो कपालमोचन नामक कुण्ड से भूतल पर आकर वेदनिधि’ संन्यासी के नाम से विश्व-विख्यात हुए । उन्होंने अपने शिष्यों को उस कठिन अघोरमंत्र के उपदेश देने के उपरान्त शंकराचार्य की शिष्य सेवा स्वीकार की । उन्होंने एक यंत्र-मंत्रात्मक ग्रन्थ की रचना की है, जिसमें कीलित मंत्रों का उत्कीलन-विधान बताया गया है ।

बृहस्पति ने कहा — मयदानव की पुत्री मन्दोदरी ने, जो त्रिपुराधीश्वर की भगिनी थी, त्रिपुर के नष्ट हो जाने के उपरान्त सनातन विष्णु भगवान् की भक्तिपरक, अनवरत आराधना की । इस प्रकार उसके गुप्तभाव से प्रतिदिन सप्रेम आराधित होने के नाते भगवान् ने प्रसन्नतया उसे योग प्रदान किया, जिससे वह विंध्यपर्वत के उस घोर शिखर पर उनमें तन्मय होकर समाधि द्वारा अदृश्य हो गई । पश्चात् चारों युगों के दो सौ बार व्यतीत होने पर वैवस्वत मन्वन्तर के बारहवें कृतयुग के समय ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य ऋषि के क्रोध द्वारा विश्रवा की उत्पत्ति हुई । तदनन्तर सौ वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त पुलस्त्य पुत्र विश्रवा ने सुमाली दैत्य की कैकसी नामक कन्या के साथ पाणिग्रहण संस्कार सुसम्पन्न कर गन्धमादन पर्वत के उस कदली वन के रमणीक स्थान में उसके साथ रमण किया । उससे राक्षस रावण और कुम्भकर्ण की उत्पत्ति हुई । रावण मातृभक्त और कुम्भकर्ण अपने पिता का परमभक्त था । उन दोनों ने वरदान प्राप्ति के निमित्त एक सहस्र वर्ष तक घोर तप किया, उससे प्रसन्न होकर भगवान् पितामह ब्रह्मा ने वहाँ जाकर उन्हें देव-दानवों द्वारा अजेय होने का वरदान प्रदान किया । पश्चात् उन दोनों ने बलप्रयोग द्वारा पुष्पक यान का अपहरण करके देवों के साथ घोर युद्ध किया । उस युद्ध में होकर देवों ने कैलासपर्वत पर रहकर गिरिजापति भगवान् शंकर की पार्थिवार्चन द्वारा ग्यारह वर्ष तक आराधना की । अनन्तर शंकर द्वारा वरदान प्राप्तकर निर्भीकता प्राप्त की और उधर भगवान् शिव भी अपने पूर्वार्ध भाग द्वारा मानसरोवर के उत्तरीय पर्वत पर स्थित गौतम ऋषि की पुत्री के गर्भ द्वारा अवतरित हुए जो अंजना के नाम से विख्यात एव केसरी वानरेन्द्र की सहधर्मिणी थी, उस रौद्र तेज के उनके मुख द्वारा प्रविष्ट होने के नाते काम विह्वल होकर वानरेन्द्र केसरी ने उस कल्याणमुखी के साथ सम्भोग किया । उसी समय केसरी के शरीर में प्रविष्ट होकर वायु ने भी बलात् उस अंजना के साथ रमण किया । इस प्रकार रमण करते हुए उस दम्पती के बारह वर्ष व्यतीत हो गये पश्चात् उस सुन्दरी के एक वर्ष तक गर्भ धारण करने के उपरान्त भगवान् रुद्र ने वानर रूप से रक्तवर्ण के पुत्र रूप में जन्म ग्रहण किया, किन्तु कुरूप होने के नाते माता द्वारा पर्वत के नीचे भाग में डाल देने पर भी उस बलवान् पुत्र ने बलात् पर्वत के ऊपर आकर वहाँ उपस्थित सूर्य को पकड़ लिया । भगवान् रुद्रदेव के द्वारा सूर्य के पीड़ित होने पर देवेन्द्र ने वहाँ आकर उन पर अपने वज्र का प्रहार किया, किन्तु उस पर भी उन्होंने सूर्य का त्याग नहीं किया । अनन्तर भयभीत होकर देवों ने ‘सूर्यं त्राहि’ (सूर्य की रक्षा करो) की ध्वनि उच्च स्वर से की । उसे सुनकर लोक दुःखदायी रावण ने उस वानर की पूंछ पकड़कर मुष्टि युद्ध करना आरम्भ किया । उस समय केसरी पुत्र ने क्रुद्ध होकर सूर्य के छोड़कर उस राक्षस से एक वर्ष तक महाघोर मल्लयुद्ध किया । पश्चात् उस वानर रूपधारी रुद्र से पीड़ित होने पर श्रान्त एवं भयभीत रावण ने भारों ओर भागना आरम्भ किया । उसी समय भगवान् विश्रवा ऋषि ने वहाँ आकर वैदिक स्तोत्रों द्वारा उनकी आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान् रुद्र ने उस लोकापकारी रावण को छोड़कर पम्पा सरोवर के निकट अपना निवास स्थान बनाया वहाँ स्थाणु की भाँति स्थित रहने के नाते उनकी स्थाणु’ के नाम से प्रख्याति हुई । मुख्य देवों और लोक विद्वेषी रावण को मुष्टि द्वारा प्रताड़ित करने पर भी उन लोगों की मुष्टियों द्वारा हनन न होने के कारण उस वानर रूपधारी रुद्र की ‘हनुमान’ नाम से ख्याति हुई । पश्चात् उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने वहाँ आकर नम्रतापूर्वक कहा — तपोनिधे रुद्र ! मेरी बात सुनने की कृपा कीजिये । वैवस्वत मन्वतर के समय अठ्ठाइसवें त्रेतायुग के प्रथम चरण में साक्षात् भगवान् राम अवतार धारण करेंगे, उस समय उनकी भक्ति की प्राप्तिपूर्वक आप कृतकृत्य होंगे । इतना कहकर उन्हें भाद्रमासकालीन चन्द्र का अधिनायक बनाया और रावण को उस अनुपम रमणी मन्दोदरी को प्रदान किया । वह रावण नैर्ऋत्य दिशा का अधीश्वर होते हुए भी भगवान् राम द्वारा मारा जाने से अल्पायु ही हुआ ।

सूत जी बोले — इसे सुनकर अयोनिज हनुमान ने देहधारणकर इस भूतल में ‘बालशर्मा’ के नाम से विख्याति प्राप्त की । पश्चात् काशी में मणिकर्णिका नामक घाट स्थान पर रामपक्ष की ओर से बालशर्मा और शिवपक्ष की ओर से शंकराचार्य का एक मास तक शास्त्रार्थ हुआ, अनन्तर शंकराचार्य द्वारा पराजित होने पर बालशर्मा ने उनकी शिष्य सेवा स्वीकार की और उसी गुरुसेवा के साथ सर्वजाति की कथा एक तंत्र-मंत्र के ग्रन्थ का निर्माण भी किया ।
(अध्याय १३)

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