भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १०३
सूर्य-पूजाका माहात्म्य

ब्रह्माजी बोले — मधुसूदन ! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सूर्यदेव का मन्दिर बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियों को दिव्य सूर्यलोक प्राप्त करा देता है । सूर्यदेवके मन्दिरमें जितने वर्षपर्यन्त भगवान् सूर्य की पूजा होती है, उतने हजार वर्षों तक वह सूर्यलोक में आनन्द प्राप्त करता है । जिसके घर में अर्घ्य, पुष्प, चन्दन, नैवेद्य आदिके द्वारा भगवान् सूर्यकी विधि-पूर्वक आराधना होती है, यह चाहे सकाम हो या निष्काम, वह सूर्यकी साम्यता प्राप्त कर लेता है ।om, ॐ भगवान् सूर्यमें अपने मनको लगाकर जो व्यक्ति अत्यन्त सुगन्धित मनोहारी पुष्प, विजय तथा अमृतादि नामक धूप, अत्यधिक सुगन्धित कर्पूरादि के विलेपनका लेप, दोपदान, नैवेद्य आदि उपहार भगवान् सूर्यनारायणको प्रतिदिन अर्पण करता है, वह अपनी अभीष्ट इच्छा प्राप्त कर लेता है । यज्ञाधिपति भगवान् भास्कर यज्ञोंसे भी प्रसन्न होते हैं, किंतु धनवान् तथा लोकसंचयी मनुष्य ही बहुत-से संसाधनों और नाना प्रकारके सम्भारों से युक्त एवं विस्तृत (अश्वमेध तथा राजसूयादि) यज्ञ सम्पन्न कर पाते हैं, इसलिये यदि मनुष्य भगवान् सूर्यको भक्तिभाव से दूर्वाङ्करों से भी पूजा करते हैं तो सूर्यदेव उन्हें इन सभी यज्ञों के करने से प्राप्त होनेवाले अति दुर्लभ फल को प्रदान कर देते हैं ।
सूर्यदेव को अर्पित करने योग्य पुष्प, भोज्य-पदार्थ—नैवेद्य, धूप, गन्ध और शरीर में लगाने वाला अनुलेप्य-पदार्थ, भूषण और लाल वस्त्र जो भी उपहार तथा भक्ष्य फल है, वह सब सूर्यदेवके अनुरूप होना चाहिये । उन आदिदेव यज्ञपुरुषकी आप यथाशक्ति आराधना करें । भगवान् सूर्यके मन्दिरमें जो चित्रभानु भगवान् दिवाकर को तीर्थके पवित्र जल, गन्ध, मधु, घृत और दूधसे स्नान कराता है, यह स्वर्गलोकके समान मधुर दूध-दहीसे सम्पन्न हो जाता है अथवा शाश्वत शान्तिको प्राप्त कर लेता है । अनेक विदेहवंशीय जनक नामसे प्रख्यात राज्ञा और हैहयवंशी नृपतिगण भगवान् सूर्य की आराधनासे अमरत्व को प्राप्त हो गये हैं । इसलिये आप भी विधिपूर्वक उपासनासे भगवान् भास्करको संतुष्ट करें, इससे प्रसन्न हुए भगवान सूर्य शान्ति प्रदान करते हैं ।

विष्णुने पूछा — ब्रह्मन् ! भगवान् सूर्य उपवास से कैसे संतुष्ट होते हैं ? उपवास करने वाले भक्त के द्वारा इनकी आराधना किस प्रकार की जाय ? इसे आप बतायें ।
ब्रह्माज़ीने कहा — जब भोगपरायण व्यक्ति भी धूप, पुष्प आदि उपचारों से भगवान् सूर्य को तन्मयता-पूर्वक आराधना कर कल्याण प्राप्त कर लेता है तो फिर उपवास-परायण व्यक्ति यदि आराधना करता है तो उसके कल्याणके विषय में कहना ही क्या है ?

पापों से दूर रहना, सद्गुणों का आचरण करना और सम्पूर्ण भोगों से विरत रहना उपवास कहलाता है । जो उपवास-परायण पुरुष भक्तिभाव से एक रात, दो रात अथवा तीन रात भगवान् सूर्य का ध्यान करता है, उनके नाम का जप करता है और उनके उद्देश्य से ही सम्पूर्ण कार्य करता है तथा उन्हीं में अपना मन लगाये हुए है ऐसा अनासक्त पुरुष भगवान् सूर्य की पूजाकर उस परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य किसी कामनावश अपने मनको भगवान् सूर्य में लगाकर ध्यानपूर्वक उनकी उपासना करता है, वह वृषध्वज भगवान् सूर्य के प्रसन्न होने पर उस उद्देश्यको प्राप्त कर लेता है ।
विष्णु ने पूछा — विभो ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्री आदि सभी सांसारिक पङ्क में फँसे हुए हैं, उन्हें सुगति कैसे प्राप्त होगी ?

ब्रह्माजी ने कहा — मनुष्य निष्कपट-भावसे तिमिरहर भगवान् भास्कर की आराधना करके सद्गति प्राप्त कर सकता है । जो व्यक्ति विषय में आसक्त है तथा भगवान् सूर्य में मन नहीं लगाता ऐसा पाप-कर्म करनेवाला मनुष्य सद्गति कैसे प्राप्त कर सकेगा ? संसार के दुःख से पीड़ित व्यक्ति सद्गति प्राप्त करना चाहता है तो उस लोकपूज्य सर्वेश्वर भगवान् ग्रहाधिपति सूर्यकी पुष्य, सुगन्धित धूप, अगरु, चन्दन, वस्त्र, आभूषण तथा भक्ष्य-नैवेद्यादि उपचारों से उपवास-परायण होकर आराधना करे । यदि संसारसे विरक्त होकर सद्गति प्राप्त करने की अभिलाषा हो तो कालके स्वामी सूर्यदेवकी आराधना करे । यदि उनकी आराधन के लिये पुष्प नहीं हैं तो शुभ वृक्षों के कोमल पल्लवों एवं दूर्वाङ्कुरों से भी पूजा की जा सकती है । अपनी सामर्थ्यके अनुसार पुष्प-पत्र-जल तथा धूपसे भक्तिभावपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजाकर वह अतुलनीय संतुष्टि प्राप्त कर सकता है । सूर्यदेवके लिये विधिवत् एक बार भी किया गया प्रणाम दस अश्वमेध-यज्ञके बराबर होता है । दस अश्वमेध-यज्ञ को करनेवाला मनुष्य बार-बार जन्म लेता है, किंतु सूर्यदेवको प्रणाम करनेवाला पुनः संसार में जन्म नहीं लेता एकोऽपि हेलेः सुकृतः प्रणामो शाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म हेलिप्रगामी न पुनर्भवाय ॥ (ब्राह्मपर्व १०३ । ४५)
इस प्रकार भक्तिपूर्वक जिसके द्वारा विधि-विधान से भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है, वह उत्तम गति प्राप्त करता है । उन्हीं की आराधना करके मैंने संसार-पूज्य इस ब्रह्मत्व को प्राप्त किया है। आपने भी पहले उन्हीं सूर्यदेव से अपनी अभीष्ट इच्छाओं को प्राप्त किया । भगवान् शङ्कर भी उन्हीं की आराधनासे ब्रह्म-हत्या से मुक्त हुए । भगवान् दिवाकर की आराधना से किन्हीं मनुष्यों ने देवत्व, किन्हीं ने गन्धर्वत्व और किन्हीं ने विद्याधरत्व प्राप्त किया है । लेख नामक इन्द्र ने एक सौ यज्ञों द्वारा इन्हीं भगवान् सूर्य की आराधना करके इन्द्रत्व प्राप्त किया, इसलिये भगवान् सूर्य के अतिरिक्त अन्य कोई देव पूजनीय नहीं है । ब्रह्मचारी को अन्य देवों की अपेक्षा अपने श्रेष्ठ गुरु भगवान् भास्कर की ही आराधना करनी चाहिये, क्योंकि ये यज्ञ-पुरुष विवस्वान् भगवान् सूर्य सर्वदा पूज्य हैं । स्त्रियोंके लिये पति के अतिरिक्त विभावसु भगवान् सूर्यदेव हो पूज्य हैं । गृहस्थ-पतिके लिये भी गोपति अंशुमान् ही पूजने योग्य हैं । वैश्यों को भी तमोनाशक सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये । संन्यासियों के लिये भी सदैव विभावसु ही ध्यान करने योग्य हैं ।
इस प्रकार सभी वर्णों तथा सभी आश्रमों के लिये चित्रभानु भगवान् सूर्यनारायण ही उपास्य हैं । उनकी आराधना से सद्गति प्राप्त हो जाती है ।
(अध्याय १०३)

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