शिवमहापुराण — कैलाससंहिता — अध्याय 03
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
कैलाससंहिता
तीसरा अध्याय
प्रणवमीमांसा तथा संन्यासविधिवर्णन

ईश्वर बोले – हे देवि ! आप मुझसे जो पूछ रही हैं, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनिये; उसके सुननेमात्रसे जीव साक्षात् शिव हो जाता है ॥ १ ॥ प्रणवके अर्थको जान लेना ही मेरा ज्ञान है, प्रणव नामक वह मन्त्र सभी विद्याओंका बीज है ॥ २ ॥ उसे वटबीजके समान अति सूक्ष्म तथा [ विशाल ] वटवृक्षके समान महान् अर्थवाला जानना चाहिये, यह वेदका आदि, वेदका सार और विशेषरूपसे मेरा स्वरूप है । तीनों गुणोंसे परे, सर्वज्ञ, सर्वकृत्, देवस्वरूप, सर्वसमर्थ तथा सर्वत्र व्याप्त मैं शिव इस ओम् नामक एकाक्षर मन्त्रमें निवास करता हूँ ॥ ३-४ ॥ [इस जगत् में] जो भी वस्तु है, वह सब गुणोंकी प्रधानतासे और समष्टि या व्यष्टिरूपसे प्रणवार्थ ही है । इसीलिये एकाक्षर ब्रह्मस्वरूप यह प्रणव सभी अर्थोंका साधक है। शिवजी इसी प्रणवसे सबसे पहले समस्त संसारका निर्माण करते हैं ॥ ५-६ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


शिवको ही प्रणवस्वरूप तथा प्रणवको ही शिवस्वरूप कहा गया है; क्योंकि वाच्य – वाचकमें कुछ भी भेद नहीं होता है। इसीलिये वाच्य तथा वाचकमें एकता मानते हुए ब्रह्मर्षिगण मुझ शिवको एकाक्षर कहते हैं ॥ ७-८ ॥ अतः विकाररहित तथा मोक्षकी इच्छावालेको चाहिये कि उस प्रणवको ही मुझ सर्वकारण, निर्गुण परमेश्वरके रूपमें समझे ॥ ९ ॥ हे देवेशि ! मैं काशीमें जीवोंकी मुक्तिके लिये सभी मन्त्रोंमें श्रेष्ठ इसी प्रणवका उपदेश करता हूँ ॥ १० ॥ हे अम्बिके! अब मैं सर्वप्रथम प्रणवोद्धारका वर्णन करूँगा, जिसका ज्ञान हो जानेसे परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ११ ॥

सर्वप्रथम निवृत्तिकलारूप अकारका उद्धार करे, तत्पश्चात् इन्धनकलारूप उकारका, कालकलारूप मकारका, दण्डकलारूप बिन्दुका तथा ईश्वरकलारूप नादका उद्धार करे । इस प्रकार तीन मात्रा, बिन्दु तथा नादस्वरूप पंचवर्णरूप यह प्रणव उद्धृत किये जानेपर जप करनेवालोंको सदा मुक्ति प्रदान करता है ॥ १२-१३ ॥ यह प्रणव ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंका प्राण ही है, अतः इसे प्रणव कहा गया है। इस प्रणवका आदि अक्षर अकार है, उसके बाद उकार, मध्यमें मकार और अन्तमें नाद है, इनके संयोगसे ‘ओम्’ बनता है ॥ १४-१५ ॥ मुनिसत्तम ! आदि वर्ण अकार, जो कि उकारके दक्षिणमें है तथा अकारके उत्तरमें स्थित उकार – ये दोनों जलवत् शुभ्र आभावाले हैं तथा ओंकारके मध्यमें स्थित मकार अग्निकी भाँति तेजोमय है ॥ १६ ॥

अकार, उकार एवं मकार – ये क्रमसे तीन मात्राएँ कही गयी हैं, उसके बाद अर्धमात्रा है । हे महेशानि ! यह अर्धमात्रा ही नाद-बिन्दुस्वरूपवाली है, जिसका निश्चय ही वर्णन नहीं किया जा सकता, उसे तो ज्ञानीलोग ही जान सकते हैं ॥ १७-१८ ॥ ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्’ इत्यादि श्रुतियाँ मुझसे ही प्रकट हुई हैं – ऐसा वेदोंने सत्य कहा है। इसलिये वेदका आदि मैं ही हूँ और प्रणव मेरा वाचक है । मेरा वाचक होनेके कारण यह प्रणव वेदोंका आदि भी कहा जाता है ॥ १९-२० ॥ अकार इसका महान् बीज है, जो रजोगुणयुक्त सृष्टिकर्ता ब्रह्मास्वरूप है । उकार उसकी योनिरूपा प्रकृति है, जो सत्त्वगुणयुक्त पालनकर्ता हरिका स्वरूप है। मकार बीजयुक्त पुरुष है, जो तमोगुणसे युक्त संहारकर्ता सदाशिवका स्वरूप है। बिन्दु साक्षात् प्रभु महेश्वर हैं, उन्हींसे जगत्का तिरोभाव कहा गया है। नादको सदाशिव कहा गया है, जो सबपर अनुग्रह करनेवाले हैं, नादरूप मूर्धामें परात्परतर शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ २१–२३ ॥

वे सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश, निर्मल, अविनाशी, अनिर्देश्य तथा सत्-असत्से परे साक्षात् परब्रह्म हैं ॥ २४ ॥ [प्रणव घटक] वे अकारादि वर्ण क्रमशः उत्तरोत्तर व्यापक हैं और वे ही पूर्व – पूर्व वर्ण व्याप्य हैं, इस प्रकारकी भावना सर्वत्र करनी चाहिये ॥ २५ ॥ अकारादि पाँचों वर्णोंमें क्रमशः सद्योजातसे ईशानपर्यन्त पाँच ब्रह्म स्थित हैं, वे मेरी ही मूर्तियाँ हैं ॥ २६ ॥ हे शिवे! अकारमें सद्योजातसे उत्पन्न आठ कलाएँ कही गयी हैं। उकारमें वामदेवरूपिणी तेरह कलाएँ कही गयी हैं । मकारमें अघोररूपिणी आठ कलाएँ स्थित हैं । बिन्दुमें पुरुषरूपिणी चार कलाएँ स्थित हैं । नादमें ईशानसे प्रादुर्भूत पाँच कलाएँ कही गयी हैं। छ: पदार्थोंकी एकताके अनुसन्धानसे [प्रणवकी] प्रपंचात्मकता कही जाती है । मन्त्र, यन्त्र, देवता, प्रपंच, गुरु एवं शिष्य – ये ही छः पदार्थ हैं । हे प्रिये ! इन छः पदार्थोंका अर्थ सुनो ॥ २७–३० ॥

प्रणवमन्त्र पाँच वर्णोंका समुदाय है, यह पहले ही कहा गया है, देवता ही यन्त्रभावको प्राप्त होता है, अब मैं उसके मण्डलक्रमको कहता हूँ । यन्त्र देवतास्वरूप है और देवता विश्वरूप है, गुरुको विश्वरूप कहा गया है और शिष्यको गुरुका शरीर कहा गया है ॥ ३१-३२ ॥ ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ – इस श्रुतिसे सारा प्रपंच ही ओंकारस्वरूप है, इसी वाच्य – वाचक सम्बन्धसे [प्रपंचकी वाचकता तथा ब्रह्मकी वाच्यतारूप] अर्थ भी कह दिया गया ॥ ३३ ॥ हे देवेशि ! मूलाधार, मणिपूर, हृदय, विशुद्धि, आज्ञा, शक्ति, शान्ति और परात्पर शान्त्यतीत- ये [आठ] स्थान हैं, जिसे दृढ़ वैराग्य होता है, वही इस प्रणवका अधिकारी है ॥ ३४-३५ ॥

हे देवि ! मैं ही जीव और ब्रह्मकी एकत्व भावनासे इस प्रणवका विषय हूँ । हे देवेशि ! प्रणवका विषय [नामक अनुबन्ध ] भलीभाँति कह दिया, अब सम्बन्धको सुनिये। जीवात्माका मुझ परमात्माके साथ ऐक्य इस प्रणवका विषय है और वाच्यवाचकभाव ही यहाँपर सम्बन्ध है ॥ ३६-३७ ॥ व्रत आदिमें निरत, शान्त, तपस्वी, जितेन्द्रिय, पवित्र आचरणसे युक्त, इस लोक तथा परलोकके विषयोंसे विरक्त, देवताओं तथा ब्राह्मणोंमें उत्तम भक्ति रखनेवाले, बुद्धिमान्, शिवव्रती, शान्ति आदि गुणोंसे युक्त, सुशील तथा श्रेष्ठ वेदवेत्ता ब्राह्मण शिष्यको चाहिये कि सभी शास्त्रोंके अर्थको तत्त्वतः जाननेवाले, वेदान्तज्ञानमें पारंगत, तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यति आचार्यके पास जाकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम आदिके द्वारा प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे ॥ ३८–४१ ॥ जो गुरु हैं, वे ही शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं, वे ही गुरु कहे गये हैं- ऐसा मनसे सोचकर अपना विचार निवेदन करना चाहिये ॥ ४२ ॥

बुद्धिमान् शिष्यको चाहिये कि गुरुसे आज्ञा प्राप्त करके बारह दिनपर्यन्त केवल दूध पीकर रहे, पुनः समुद्रके तटपर, नदीके किनारे, पर्वतपर अथवा शिवालयमें शुक्लपक्षकी पंचमी अथवा एकादशीके दिन प्रातः काल स्नान करके शुद्धचित्त होकर नित्यकृत्य करके गुरुको बुलाकर विधिपूर्वक नान्दीश्राद्ध करके कक्ष (काँख) तथा गुह्यस्थानके केशोंको छोड़कर सिर, दाढ़ी, मूँछके बालोंको बनवाकर, नाखून कटवाकर पुनः स्नान करके जितेन्द्रिय हो सन्ध्योपासन करके सत्तूका भोजन करके सायंकाल पुनः स्नानकर सन्ध्योपासन करे । ब्राह्मणको चाहिये कि गुरुके साथ सन्ध्याकालकी उपासना करके गुरुरूपी शिवको शास्त्रोक्त दक्षिणा देकर अपने गृह्यसूत्रमें बताये गये विधानके अनुसार होमद्रव्य लेकर लौकिक आदि भेदसे अग्निका आधान करे । इस प्रकार अग्न्याधान करके जो ब्राह्मण प्राजापत्य यज्ञके अनुसार हवन कर चुका है, वह वेदसहित सम्पूर्ण धनको दक्षिणामें देकर अग्निको आत्मामें धारणकर घरसे संन्यास ग्रहण करे । पुनः चरु तैयार करके समिधा, अन्न, घृतके द्वारा जितेन्द्रिय होकर पुरुषसूक्तकी प्रत्येक ऋचासे हवन उस अग्निमें करके पुनः अपने [गृह्य ] सूत्रके अनुसार स्विष्टकृत् आहुतियोंसे हवन करे ॥ ४३ – ५१ ॥

इस प्रकार हवन करके एकतन्त्रसे अग्निके उत्तरमें उदीच्यकर्म करे | बुद्धिमान् शिष्यको कुशाके ऊपर मृगचर्म एवं उसके ऊपर कपड़ेके आसनपर बैठकर मौन तथा स्थिरचित्त होकर ब्राह्ममुहूर्तपर्यन्त गायत्रीका जप करना चाहिये ॥ ५२ ॥ इसके बाद प्रात:काल स्नान करके चरुका निर्माणकर पुरुषसूक्तसे आरम्भकर विरजापर्यन्त वामदेव अथवा शौनकादिके मतानुसार हवन करे । इनमें वामदेवका मत अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वामदेवमुनि गर्भमें ही योगयुक्त हो गये थे ॥ ५३-५४ ॥

इसके बाद शेष हवनको समाप्तकर प्रातः कालकी उपासनाका हवन सम्पन्न करे । तदनन्तर आत्मामें अग्निका आरोपणकर प्रात: कालिक सन्ध्योपासन करके सूर्यके उदय हो जानेपर सावित्रीमें क्रमशः प्रवेश करे और तीनों एषणाओं (लोकैषणा, पुत्रैषणा तथा धनैषणा ) – का त्यागकर प्रैषोच्चारण करके क्रमसे शिखा, उपवीतका त्याग करके पुनः कटिसूत्र आदिको भी त्यागकर पूर्व अथवा उत्तरदिशाकी ओर मुख करके गमन करना चाहिये और लोकव्यवहारके लिये उचित दण्ड तथा कौपीन आदि धारण करना चाहिये, जिसे लोकव्यवहारका ध्यान न हो, वह इन्हें धारण न भी करे ॥ ५५-५८ ॥ गुरुके समीप जाकर तीन बार दण्डवत् प्रणाम करना चाहिये, पुनः उठकर गुरुके चरणोंके समीप बैठना चाहिये ॥ ५९ ॥

इसके बाद गुरुको चाहिये कि विरजा अग्निसे उत्पन्न श्वेत भस्म लेकर उससे विधिपूर्वक शिष्यके शरीरपर उद्भूलन करके ‘अग्निरिति भस्म’ इत्यादि मन्त्रोंसे त्रिपुण्ड्र धारण कराये और हृदयकमलमें स्थित पार्वतीसहित मेरा ध्यान कराये । तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त होकर श्रेष्ठ गुरु शिष्यके मस्तकपर अपना हाथ रखकर उसके दाहिने कानमें ऋषि आदिके सहित तीन बार प्रणवका उच्चारण करे और पुनः सविस्तार उसके षड्विध अर्थका समग्रतः उपदेश करे ॥ ६० – ६३ ॥ तदनन्तर वह शिष्य गुरुको बारह प्रकारसे भूमिपर दण्डवत् करके उनके अधीन रहकर वेदान्तका नित्य अभ्यास करे और अपने निर्विकार एवं विशुद्ध मनमें सदा मुझ ब्रह्म, साक्षी तथा अव्यय परमात्माका चिन्तन करे । शम आदि धर्मोंमें निरत, वेदान्तज्ञानमें पारंगत तथा ईर्ष्यारहित यति ही इस प्रणवका अधिकारी कहा गया है ॥ ६४–६६ ॥

स्वच्छ, शोकरहित, परम उज्ज्वल, अष्टपत्रयुक्त, कर्णिकामें विराजमान मकरन्दयुक्त हृत्कमलके मध्यमें आधारशक्तिसे आरम्भ करके मणिपूरकपर्यन्त दहर आकाशमें त्रितत्त्वयुक्त प्रणवकी भावना करे ॥ ६७-६८ ॥ सावधानचित्त होकर ‘ओम्’ इस एकाक्षरमन्त्रका उच्चारण करते हुए उस दहराकाशके मध्य तुम्हारे साथ मेरा स्मरण सदा करता रहे ॥ ६९ ॥ हे प्रिये ! इस प्रकारके उपासकको मेरा लोक प्राप्त होता है और वह मुझसे ज्ञान पाकर मेरे सायुज्यका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ७० ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें संन्यासपद्धतिवर्णन नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

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