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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 42
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
बयालीसवाँ अध्याय

अन्धकासुर की उत्पत्ति की कथा, शिव के वरदान से हिरण्याक्ष द्वारा अन्धक को पुत्ररूप में प्राप्त करना, हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी को पाताललोक में ले जाना, भगवान् विष्णु द्वारा वाराहरूप धारणकर हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को यथास्थान स्थापित करना

नारदजी बोले — शंखचूड के वध से सम्बद्ध महादेवजी के चरित्र को सुनकर मैं उसी प्रकार तृप्त नहीं हो रहा हूँ, जिस प्रकार कोई व्यक्ति अमृत का पानकर तृप्त नहीं होता । इसलिये हे ब्रह्मन् ! माया का आश्रय लेकर भक्तों को आनन्द प्रदान करनेवाली उत्तम लीला करनेवाले उन महात्मा महेश का जो चरित है, उसे आप मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥

शिवमहापुराण

ब्रह्माजी बोले — शंखचूड का वध सुनने के पश्चात् सत्यवतीसुत व्यासजी ने ब्रह्मपुत्र मुनीश्वर सनत्कुमार से भी यही बात पूछी थी । व्यास की प्रशंसा करके सनत्कुमार ने मंगलदायक महेश्वर चरित्र को कहा था ॥ ३-४ ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यास!] आप शंकरजी के मंगलदायक उस चरित्र को सुनिये, जिसमें अन्धक ने परमात्मा शंकर के गाणपत्यपद को प्राप्त किया ॥ ५ ॥ हे मुनीश्वर ! पहले तो उसने शंकरजी से घोर युद्ध किया । उसके बाद अपने सात्त्विक भाव से बारंबार उन्हें प्रसन्न किया । शरणागतों की रक्षा करनेवाले, परम भक्तवत्सल तथा नाना प्रकार की लीला करनेवाले शंकर का माहात्म्य अद्भुत है । शंकर के इस प्रकार के माहात्म्य को सुनकर सत्यवतीसुत व्यासजी ने मुनीश्वर सनत्कुमारजी को प्रणाम किया, फिर भक्तिभाव से विनम्र हो ब्रह्मपुत्र मुनीश्वर से महान् अर्थपूर्ण वाणी में कहा — ॥ ६-८ ॥

व्यासजी बोले — हे भगवन् ! हे मुनीश्वर ! यह अन्धक कौन था ? इस पृथ्वी पर उसने किसके वंश में जन्म लिया ? वह किस कारण से इतना बलवान् तथा महात्मा हुआ तथा वह किस नामवाला तथा किसका पुत्र था ? ॥ ९ ॥ हे भगवन् ! ब्रह्मपुत्र ! अब आप इन सारे रहस्यों का वर्णन कीजिये । वैसे तो अनन्तज्ञानसम्पन्न महेशपुत्र स्कन्द के द्वारा मैं इन बातों को जानता हूँ ॥ १० ॥ महातेजस्वी शंकर की कृपा से उसने गाणपत्य पद को किस प्रकार प्राप्त किया । वस्तुतः वह अन्धक महाधन्य है, जो उसे गाणपत्य की प्राप्ति हुई ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे नारद ! व्यासजी के इस प्रकार के वचन को सुनकर ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार ने महामंगलदायक शिवजी के चरित्र को सुनने की इच्छावाले शुकदेवजी के पिता [व्यास]-से कहा ॥ १२ ॥

सनत्कुमार बोले — किसी समय देवसम्राट भक्तवत्सल भगवान् शंकर अपने गणों तथा पार्वती को साथ लेकर कैलास से विहार करने के लिये काशी आये ॥ १३ ॥ उन्होंने काशी को अपनी राजधानी बनाया, भैरव को उसका रक्षक नियुक्त किया तथा पार्वती के साथ मनुष्यों को आनन्द देनेवाली नाना प्रकार की लीलाएँ करने लगे ॥ १४ ॥

किसी समय वरदान के कारण वे अपने गणों के साथ मन्दराचल पर गये और वहाँ पर पार्वती के साथ विहार करने में प्रवृत्त हो गये । उसके बाद पार्वती ने नर्मक्रीडा [प्रेम-परिहास] करते हुए मन्दराचल पर पूर्व दिशा की ओर मुखकर बैठे हुए चण्ड पराक्रमवाले सदाशिव के नेत्र लीलापूर्वक बन्द कर दिये ॥ १५-१६ ॥

मूंगे तथा स्वर्णकमल की कान्ति से युक्त अपनी दोनों भुजाओं से जब पार्वती ने उनके नेत्र बन्द कर दिये, तब शिवजी के नेत्रों के बन्द हो जाने पर क्षणभर में घोर अन्धकार छा गया । तब सदाशिव के ललाट का स्पर्श करते ही उनके ललाट पर स्थित अग्नि की उष्णता से पार्वती के दोनों हाथों से स्वेदबिन्दु टपकने लगे ॥ १७-१८ ॥

तब उससे एक बालक उत्पन्न हुआ, जो भयंकर, विकराल मुखवाला, महाक्रोधी, कृतघ्न, अन्धा, जटाधारी, कृष्णवर्णवाला, कुरूप, मनुष्य से भिन्न स्वरूपवाला, विकृत तथा बहुत रोमों से युक्त था ॥ १९ ॥ उत्पन्न होते ही उसने गाना, हँसना, नाचना, रोना तथा जीभ चाटना प्रारम्भ किया और वह महाघोर शब्द करने लगा । विचित्र दर्शनवाले उस बालक के उत्पन्न होते ही शंकरजी ने गौरी से हँसते हुए कहा — ॥ २० ॥

श्रीमहेश बोले — हे प्रिये ! तुमने मेरे नेत्रों को बन्दकर जो कर्म किया है, अब उससे भयभीत क्यों हो रही हो ? महादेवजी के इस वचन को सुनकर हँसती हुई गौरी ने उनके नेत्रों को छोड़ दिया । तब प्रकाश हो जाने पर वह अन्धा पुरुष अन्धकार से भी अधिक घोर रूपवाला हो गया । तब इस प्रकार के रूपवाले उस पुरुष को देखकर गौरी ने महेश्वर से पूछा — ॥ २१-२२ ॥

गौरी बोलीं — हे भगवन् ! हम दोनों के सामने यह घोर, भयंकर तथा विकृताकार कौन उत्पन्न हो गया है ? आप मुझसे सत्य कहिये, किस कारण से तथा किसने इसकी सृष्टि की है, यह किसका पुत्र है ? ॥ २३ ॥

सनत्कुमार बोले — लीला करनेवाले एवं अन्धक को उत्पन्न करनेवाले भगवान् शंकर ने लीला करनेवाली त्रिजगजननी प्रिया पार्वती की बात सुनकर हँसते हुए कहा — ॥ २४ ॥

महेश बोले — अद्भुत चरित्र करनेवाली हे अम्बिके ! तुम्हारे द्वारा मेरे नेत्रों के बन्द कर दिये जाने पर तुम्हारे हाथों के स्वेदकण से उत्पन्न यह अद्भुत महापराक्रमशाली अन्धक नामवाला असुर प्रकट हुआ है ॥ २५ ॥ तुम्हीं इसकी जन्मदात्री हो, अतः हे आर्ये ! तुम्ही दयापूर्वक अपनी सखियों के साथ गणों से इसकी रक्षा करो और बुद्धि से विचारकर इसके विषय में जो करना चाहती हो, उसे करो ॥ २६ ॥

सनत्कुमार बोले — तदनन्तर अपने पति के इस वचन को सुनकर गौरी [अपनी] सखियों के साथ दयाभाव से अनेक प्रकार के उपायों से अपने पुत्र की रक्षा करने लगीं ॥ २७ ॥

एक बार शिशिरकाल उपस्थित होने पर अपने बड़े भाई की सन्ततिवृद्धि को देखकर अपनी स्त्री से प्रेरित होकर पुत्र की कामनावाला हिरण्याक्ष [तपस्या करने के लिये] वहाँ पहुँचा ॥ २८ ॥ वह कश्यपपुत्र असुर वन का आश्रय लेकर क्रोधादि दोषों को जीतकर पुत्रप्राप्ति के निमित्त काष्ठ के समान स्थिर होकर शंकरजी के दर्शनहेतु तप करने लगा ॥ २९ ॥

हे द्विजेन्द्र ! तब उसकी तपस्या से पूर्ण रूप से प्रसन्न होकर शंकरजी वर देने के लिये गये । उस स्थान पर आकर वे वृषध्वज महेश उस दैत्यश्रेष्ठ से बोले — ॥ ३० ॥

महेश बोले — हे दैत्यराज ! तुम अपनी इन्द्रियों को कष्ट मत दो, तुम किस निमित्त यह व्रत कर रहे हो । तुम अपना मनोरथ कहो, मैं शंकर तुम्हें वर दूंगा । तुम जो चाहते हो, वह सब मैं दूंगा ॥ ३१ ॥

सनत्कुमार बोले — शिवजी का यह सरस वचन सुनकर वह दैत्य हिरण्याक्ष अत्यन्त प्रसन्न हो गया और हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर एवं नमस्कार करके विविध स्तुतिपूर्वक शंकरजी से कहने लगा — ॥ ३२ ॥

हिरण्याक्ष बोला — हे चन्द्रमौले ! मुझे दैत्यवंश के योग्य एवं अति पराक्रमी कोई पुत्र नहीं है, उसीके लिये मैं इस तपस्या में प्रवृत्त हुआ हूँ । अतः हे देवेश ! आप मुझे महाबलवान् पुत्र प्रदान कीजिये; क्योंकि मेरे भाई को प्रह्लाद आदि पाँच महाबलवान् पुत्र हैं, मुझे पुत्र नहीं है, मैं वंशहीन हो गया हूँ, अतः मेरे इस राज्य का भोग कौन करेगा ? जो अपने बाहुबल से दूसरे के राज्य को अपने अधिकार में करके उसका भोग करता है अथवा पिता के राज्य का उपभोग करता है, वही इस लोक में तथा परलोक में पुत्र कहा जाता है और उसी पुत्र से पिता भी पुत्रवान् होता है ॥ ३३–३५ ॥
वरिष्ठ धर्मज्ञ ऋषियों ने पुत्रवानों की ही ऊर्ध्वगति कही है, इसीलिये सभी प्राणी उसी के लिये कामना करते हैं, अन्यथा मरने के पश्चात् वह तेज पशुओं में चला जाता है अर्थात् व्यर्थ हो जाता है । पुत्रहीन को उत्तम लोक नहीं प्राप्त होता है, इसलिये लोग उसके लिये इच्छा रखते हैं और देवताओं के चरण-कमल की आराधनाकर उनसे एक पुत्र की भी याचना करते हैं ॥ ३६-३७ ॥

सनत्कुमार बोले — तब कृपालु शंकर दैत्यराज के उस वचन को सुनकर प्रसन्न हो गये और उससे बोले — हे दैत्यराज ! यद्यपि तुम्हारे वीर्य से पुत्र उत्पन्न नहीं होगा, फिर भी मैं तुम्हें पुत्र प्रदान करता हूँ ॥ ३८ ॥ तुम अन्धक नामक मेरे पुत्र का वरण कर लो. जो तुम्हारे ही समान बलवान् और अजेय है । तुम सब दुःखों को त्यागकर उसी को अपना पुत्र मान लो ॥ ३९ ॥

इस प्रकार कहकर प्रसन्न होकर पार्वतीसहित त्रिपुरारि उग्ररूप महात्मा शंकर ने उस हिरण्याक्ष को पुत्र प्रदान कर दिया ॥ ४० ॥ इसके बाद वह महात्मा दैत्य शंकर से पुत्र प्राप्तकर यथाक्रम उनकी प्रदक्षिणाकर तथा अनेक स्तोत्रों से रुद्र की स्तुतिकर प्रसन्न होकर अपने राज्य को चला गया ॥ ४१ ॥ तदनन्तर प्रचण्ड पराक्रमी वह दैत्य सदाशिव से पुत्र प्राप्तकर सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर इस पृथ्वी को अपने देश पाताल में लेकर चला गया ॥ ४२ ॥

उसके अनन्तर देवताओं, मुनियों एवं सिद्धों ने सर्वात्मक, यज्ञमय तथा महाविकराल प्रधान वाराहरूप का आश्रय लेकर अनन्त पराक्रमवाले विष्णु का आराधन किया ॥ ४३ ॥ तब अपनी नासिका के विविध प्रहारों से पृथ्वी को विदीर्णकर पाताल में प्रविष्ट हो तुण्ड के द्वारा तथा अखण्डित दाढ़ों के अग्रभाग से सैकड़ों दैत्यों को चूर्ण करके वज्र के समान कठोर पादप्रहारों से निशाचरों की सेनाओं को मथकर करोड़ों सूर्यों के समान जाज्वल्यमान अपने सुदर्शन से अद्भुत तथा प्रचण्ड तेजवाले विष्णु ने हिरण्याक्ष के तेजस्वी सिर को काट दिया और दैत्यों को जला भी दिया । हिरण्याक्ष के मर जाने पर उन्होंने प्रसन्न होकर अन्धक को राज्यपद पर अभिषिक्त कर दिया ॥ ४४–४६ ॥

इस प्रकार महात्मा विष्णु पातालतल से पृथ्वी का उद्धारकर अपनी दाढ़ों के अग्रभाग से पृथ्वी को पुनः अपने स्थान पर प्रतिष्ठितकर परम प्रसन्न हो गये और पूर्व की भाँति उसकी रक्षा करने लगे । प्रसन्न हुए समस्त देवता, मुनि तथा ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की । उसके बाद उग्र शरीरवाले तथा उत्तम कार्य करनेवाले वराहरूपधारी विष्णु अपने लोक को चले गये ॥ ४७-४८ ॥
इस प्रकार वराहरूप विष्णुदेव के द्वारा दैत्यराज हिरण्याक्ष के मारे जाने से सभी देवता, मुनि तथा अन्य सभी जीव सुखी हो गये ॥ ४९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में हिरण्याक्षवधवर्णन नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥

 

 

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