श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-37
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सैतीसवाँ अध्याय
गृत्समदमुनि की गणेशाराधना और वरप्राप्ति
अथः सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
वरदाख्यानं

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] मुनि गृत्समद ने भ्रमण करते हुए अपने सम्मुख एक वन को देखा, जिसका नाम पुष्पक था। वह वन विविध प्रकार के वृक्षों और लताओं से युक्त तथा प्रचुर पुष्पों से सुशोभित था ॥ १ ॥ वह वन जलयुक्त झरनों और देवताओं एवं श्रेष्ठ मुनियों से सुशोभित था। गृत्समद ने उन मुनियों को नमस्कार किया और उनकी आज्ञा से वहाँ निवास करने लगे ॥ २ ॥ वहाँ स्नान करके पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर स्थित होकर स्थिर मन से देवाधिदेव सर्वव्यापक भगवान्‌  विघ्नेशवर का ध्यान करते हुए वे जप करने लगे ॥ ३ ॥ दसों दिशाओं की ओर न देखते हुए उन्होंने अपनी दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर स्थिर कर दी थी। वायुमात्र का भक्षण करते हुए उन्होंने इन्द्रियों, श्वास और मन पर  नियन्त्रण कर लिया था ॥ ४ ॥

उन्होंने दिव्य सहस्र वर्षों तक अत्यन्त घोर तप किया। [उसके उपरान्त] जब उन गृत्समदमुनि ने अपने नेत्रों को खोलकर देखा तो उनके नेत्र से उत्पन्न अग्नि देवताओं को [भी] प्रतप्त करने लगी | तब देवता सशंकित हो गये कि यह किसका पद प्राप्त करेगा ?॥ ५-६ ॥ उधर वे गृत्समद मात्र एक गिरे हुए पत्ते का भक्षण करते हुए अत्यन्त यत्नपूर्वक दूँठ वृक्ष को भाँति निश्चलतापूर्वक [तप में] स्थित रहे ॥ ७ ॥ इस प्रकार मन को स्थिर करके उन्होंने पचास हजार वर्षों तक तप किया। तब उनके इस दुष्कर तप को देखकर उन पर अनुग्रह करने के लिये भगवान्‌ विनायक अत्यन्त दीप्तिमान्‌ स्वरूप धारणकर प्रादुर्भूत हुए। जिस प्रकार गाय बछड़े के रँभाने का स्वर सुनकर तीव्रता से दौड़ती है, वैसे ही भगवान्‌ विनायक शीघ्र ही गुत्समद के पास आये। उस समय वे हजारों सूर्यों के सदृश अपने तेज से विश्व को प्रकाशित कर रहे थे ॥ ८-१० ॥

उनके हिलते हुए कानों से शब्द उत्पन्न हो रहे थे, [उनके मुख में] एक विशाल दाँत शोभायमान था, उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न और क्रीडामयी थी, उनके मस्तक पर चन्द्रमा शोभा दे रहा था, उन्होंने कमल-पुष्पों की विशाल माला धारण कर रखी थी, कमल-जाल से समन्वित उनकी सूँड़ थी और उन जगत् के कारणरूप [भगवान्‌ गणेश]-को उनके प्रेमी भक्तजन नमस्कार कर रहे थे ॥ ११ ॥ वे सिंह पर सवार थे, उनके दस भुजाएँ थीं तथा उन्होंने सर्प का यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनका श्रीविग्रह कुंकुम, अगुरु, कस्तूरी और सुन्दर [सुगन्धित] चन्दन से आलेपित था॥ १२॥
हे मुने! करोड़ों सूयाँसे अधिक प्रकाशमान वे श्रीमान्‌ सिद्धि और बुद्धि के साथ थे। यद्यपि उनका स्वरूप वाणी से परे है, तथापि वे लीला करने के लिये [उन गृत्समदमुनि के समक्ष] साकार रूप मे प्रकट हुए ॥ १३ ॥

उनके तेज से उन महात्मा मुनि का तेज वैसे ही मन्द हो गया, जैसे सूर्य के तेज से नक्षत्रों और चन्द्रमा का तेज मन्द पड़ जाता है ॥ १४ ॥ [उन्हें देखकर] गृत्समद ने अपनी आँखें मूँद लीं और वे अत्यन्त भयाकुल होकर काँपने लगे। वे मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े और उन्हें ध्यानादि मांगलिक कार्यों का विस्मरण हो गया ॥ १५ ॥ पुनः चेतन होने पर वे मुनि अनामय गजानन
गणेशजी का ध्यान करके मन-ही-मन यह सोचकर व्याकुल हो गये कि इस विघ्न का कारण क्या है? मेरे समक्ष क्षोभ उत्पन्न करने वाला सहसा यह क्या उपस्थित हो गया है? आज तक मैंने जो तप किया था, वह कैसे व्यर्थं चला गया ?॥ १६-१७ ॥

[तदनन्तर वे मन-ही-मन गणेशजी का ध्यानकर कहने लगे — ] हे देवेश! हे सर्वात्मन्‌! इस भयानक विघ्न से मेरी रक्षा करो। आप जगदीश्वर को छोड़कर मैं अन्य किसकी शरण में जाऊँ ?॥ १८ ॥ हे देव! मुझे सदैव महान्‌ दुःख प्राप्त होता रहा है। “तुम हमारी पंक्ति में बैठकर पूजा पाने योग्य नहीं हो’ अत्रि की यह बात मेरे मन को सदैव जलाया करती है ॥ १९ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] गृत्समद के इस प्रकार के वचन सुनकर उन विघ्नविनायक गणेशजी ने कहा — ॥ १९१/२

गणेशजी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ! तुम पर अनुग्रह करने के लिये उपस्थित हुए मुझे गणों का स्वामी गणेश जानो। चिरकाल तक नियम में स्थित रहने वाले सनकादि [मुनियों]-के लिये भी मैं अप्राप्य हूँ। भय का त्याग करके तुम्हारी जो मनोकामना हो, वह मुझसे कहो। एक अँगूठे पर खड़े रहकर तुम्हारे द्वारा की गयी निरन्तर तपस्या से मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २०-२११/२

ब्रह्माजी कहते हैं देवाधिदेव गणेशजी के ऐसे सुन्दर वचन सुनकर मुनि गृत्समद ने उन्हें दण्डवत्‌ प्रणाम किया। उनका हृदय आनन्द से भर गया, आँखों से आँसू बहाते हुए वे हर्षपूर्वक नृत्य करने लगे और उन वरदाता विनायक से परम प्रेमपूर्वक बोले ॥ २२-२३१/२

गृत्समद बोले — आज मेरा जन्म, तप और नियम सब सफल हो गये, जो मुझे चिदानन्दघन, अखण्ड आनन्दरूप, वेद-शास्त्रों से भी अगोचर, निराकार ब्रह्म का साक्षात्‌ दर्शन हो गया। हे विभो! अब मैं किस वस्तु के लिये प्रार्थना करूँ? फिर भी आपने आज्ञा दी है तो हे गजानन! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ-हे महाभाग! चौरासी लाख योनियों में मनुष्ययोनि श्रेष्ठ कही गयी है। मनुष्यों में वर्ण-धर्म का पालन करने वाले श्रेष्ठतर कहे गये हैं । उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उन ब्राह्मणों में भी ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। उन ज्ञानियों में भी अनुष्ठानपरायण और उनमें भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसलिये हे जगदीश्वर! आप मुझे ब्रह्मज्ञान (वेदज्ञान्‌) और अनुष्ठानसम्बन्धी ज्ञान प्रदान करें। साथ ही अपनी सतत स्मृति और अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ २४-२९ ॥

हे गजानन! आपके सभी भक्तों में मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। हे कल्याणकर! मैं एक अन्य वर की भी याचना करता हूँ, उसे मुझे प्रदान करें ॥ ३०॥ मैं आपकी भक्ति का एकमात्र निवास बन जाउँ, मुझमें त्रैलोक्य को आकर्षित करने की क्षमता हो, मैं तीनों लोकों में विख्यात और देवताओं एवं मनुष्यों से नमस्कृत हो जाऊँ। हे विघ्नराज! हे अखिलार्थकृत्‌! हे सुरेश्वर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह पुष्पक वन [ आपके] नाम से प्रख्यात हो जाय ॥ ३१-३२ ॥  आप यहाँ स्थित होकर भक्तों की कामनाओं को नित्य पूरा करें। हे गजानन! यह पुष्पकपुर सभी दिशाओं में विशेष रूप से ‘गणेशपुर’ — इस नाम से प्रसिद्ध हो जाय ॥ ३३१/२

ब्रह्माजी कहते हैं — मुनि गृत्समद की इस बात को सुनकर गजानन गणेशजी ने कहा — ॥ ३४ ॥

गणेशजी बोले — हे महाबाहो! तुम्हें साधुवाद है। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे प्रसन्न होने पर भक्तों को तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३५ ॥ हे विप्र! तुम्हारे द्वारा जो भी प्रार्थना की गयी है, वह सब कुछ पूरी होगी। विप्रत्व दुर्लभतर है, प्रसन्न होकर यह मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया ॥ ३६ ॥ हे मुने! क्योंकि तुमने “गणानां त्वा०’ इस वैदिक मन्त्र का जप किया है, अतः तुम्हीं इसके ऋषि होगे ॥ ३७ ॥ तुम ब्रह्मादि त्रिदेवों और [इन्द्रादि] देवताओं तथा वसिष्ठादि मुनियों में भी परम श्रेष्ठता को प्राप्त करके सर्वत्र ख्याति प्राप्त करोगे। जो लोग सभी कार्यों के आरम्भ में पहले तुम्हारा और उसके बाद मेरा स्मरण करेंगे, उनको कार्यों में सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ३८-३९ ॥

[मन्त्र के] देवता, ऋषि और छन्द के ज्ञान के बिना किये गये [जपादि] कर्म निष्फल होते हैं। तुम्हारा पुत्र बलवान्‌ और सभी देवताओं के लिये अत्यन्त भयंकर होगा। वह तीनों लोकों में महान्‌ ख्याति अर्जित करेगा। भगवान्‌ रुद्र के अतिरिक्त वह सम्पूर्ण देवताओं के लिये अजेय होगा ॥ ४०-४१ ॥ वह मेरा भक्त होगा, उसके प्राण मुझमें स्थित होंगे, उसकी मुझमें निष्ठा होगी और वह मेरे ही परायण होगा। हे विप्र! यह नगर सत्ययुग में “पुष्पकपुर’ नाम से, त्रेतायुग में “मणिपुर’  नामसे, द्वापर युग मे ‘ भानकपुर’ नाम से और कलियुगमें ‘ भद्रकपुर’ नाम से संसार में विख्यात होगा। यहाँ स्नान और दान करने से मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त करेगा ॥ ४२-४३१/२

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] गृत्समद को इस प्रकार से वर देकर सर्वव्यापक गणेशजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्हित हो जाने पर मुनि ने वहाँ गणेशजी की मूर्ति की स्थापना की तथा उनका सुन्दर मन्दिर बनवाया ॥ ४४-४५ ॥ उन्होंने उस मूर्ति की ‘वरदविनायक’ 1  इस नाम से स्थापना की। गणेशजी की कृपा से वहाँ सिद्धियों का शाश्वत अवस्थान हुआ ॥ ४६ ॥ यहाँ सभी की कामनाएँ पुष्ट होती हैं, इसलिये इस क्षेत्र को पुष्पकक्षेत्र कहा जाता है। मुनि गृत्समद ने उस मूर्ति का भक्तिभावपूर्वक पूजन किया ॥ ४७ ॥ हे मुनीन्द्र! श्रीविघ्नराज गणेशजी द्वारा वरदान प्रदान करने का वर्णन करने वाली इस कथा का जो श्रवण करता है, वह समस्त कामनाओं की प्राप्ति कंरता है और उसे संसार-सागर से पार करने वाली दृढ़ गणेशभक्ति की प्राप्ति होती है ॥ ४८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘वरदाख्यान’ नामक सँतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

1. महाड़ भारत के महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ ज़िले में स्थित एक नगर है। यह उत्तरी कोंकण क्षेत्र में, मुम्बई से 167 किमी की दूरी पर बसा हुआ है। रायगढ़ जिले के कर्जत और खोपोली के पास खालापुर तालुका में महड गांव में स्थित अष्टविनायक का एक मंदिर है। मंदिर का नवीनीकरण 1725 में रामजी महादेव बिवलकर, पेशवा के सरदार और कल्याण के सूबेदार द्वारा किया गया था। इस मंदिर का केंद्र पेशवा काल है और इसका निर्माण हेमाडपंथी है। मंदिर में एक पत्थर का मेहराब है, जिसपर गणेश जी विराजमान है। वरदविनायक मंदिर की मूर्ति स्वयंभू है और इसे सन 1690 में मंदिर के पास एक झील में श्री धोंडू पौढकर द्वारा पायी गयी। गणेशजी की सूंड पूर्व दिशा की ओर है। कहा जाता है कि इस मंदिर में तेल का दीपक 1892 से लगातार जल रहा है। मणिपुर भद्रक, पुष्पक, मध आदि इस जगह के पौराणिक नाम हैं। अब महड नाम प्रचलित है। खोपोली के पास मुंबई-पनवेल-खोपोली 6 किमी पर दायीं ओर कुछ दूरी पर महड की सड़क है।

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