August 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-55 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पचपनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थी व्रत के माहात्म्य के सन्दर्भ में राजा चन्द्रांगद और रानी इन्दुमती के पुनर्मिलन की कथा अथः पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः शिवपार्वती संयोग हिमवान् बोले — [हे पार्वती!] इस प्रकार उस रानी इन्दुमती के गणेशचतुर्थीव्रत के पूर्ण होने पर गणेशजी की कृपा से पाताल में नागकन्याओं की मति बदल गयी ॥ १ ॥ तब उन्होंने राजा को बन्धनमुक्त कर दिया और वस्त्राभूषणों तथा अनेक प्रकार के रत्नों एवं महान् धन- सम्पत्ति से उनका यथाविधि पूजन किया ॥ २ ॥ उन्होंने राजा [चन्द्रांगद]-को मन के समान वेग वाला अश्व प्रदान कर विदा किया। तब वे राजा उस तालाब से बाहर आये और अश्व को एक विशाल वृक्ष से बाँधकर जब स्नान करने लगे, तब कुछ नागरिकों की दृष्टि उन पर पड़ी। कुछ नागरिकों ने उनको राजा चन्द्रांगद समझा और कुछ लोग उन्हें भिन्न व्यक्ति समझ रहे थे । उनमें कुछ कहने लगे कि यह चन्द्रांगद – जैसा तो है, किंतु राजा चन्द्रांगद नहीं है। उनमें से कुछ ने उनके पास जाकर पूछा कि ‘आप कौन हैं ? कहाँ के रहने वाले हैं ? कहाँ से आये हैं ? हे प्रभो! आपका नाम क्या है ? यह सब हमें बताइये’ ॥ ३–५ ॥ उनके इस प्रकार के वचन सुनकर उन नृपश्रेष्ठ [चन्द्रांगद]-ने [रानी] इन्दुमती और राजकुमार का दुखी मन से कुशल- समाचार पूछा। तब उन लोगों ने उन्हें पहचान लिया और प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया ॥ ६-७ ॥ उन्होंने कहा कि हे नृप ! आपकी पत्नी (रानी इन्दुमती) स्नान करके अभी-अभी भवन को गयी हैं । उपवास और व्रत का पालन करती हुई वे अत्यन्त कृश शरीरवाली हो गयी हैं, उनकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं ॥ ८ ॥ वे अपने पुत्र राजकुमार में अपने प्राणों को स्थितकर नाममात्र को जीवित हैं। उनमें कुछ [नागरिकों]-ने नगर में जाकर इस शुभ समाचार की घोषणा कर दी ॥ ९ ॥ तब वह रानी इन्दुमती अत्यन्त आप्त पुरुषों द्वारा ‘राजा आ गये हैं’ इस वचन को सुनकर योगविद् ब्रह्मज्ञानी की भाँति आनन्दसागर में निमग्न हो गयी ॥ १० ॥ तदनन्तर रानी इन्दुमती ने मन्त्रियों के नेतृत्व में सैनिकों को राजा के पास भेजा और नगर को रंग-बिरंगी ध्वजाओं और पताकाओं से सुशोभित करवा दिया ॥ ११ ॥ उसने राजमार्गों पर जल का छिड़काव करा दिया और सभा को यत्नपूर्वक सुसज्जित करा दिया तथा स्वयं को वस्त्रों, अलंकारों और आभूषणों से विभूषित किया। उसने गाय, भूमि, स्वर्ण आदि अनेक प्रकार के दान देकर बहुत-से द्विजों को सन्तुष्ट किया और सौभाग्यवती स्त्रियों के हाथ में आरती [-के थाल] देकर वह उनके साथ गायन और वादन की [मांगलिक] ध्वनिसहित नगर से सरोवर पर आयी ॥ १२-१३१/२ ॥ मन्त्रियों ने उन नृपश्रेष्ठ के सम्मुख जाकर उन्हें प्रणामकर प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया । तत्पश्चात् अन्य सभी नागरिकों ने यथाक्रम उन्हें प्रणाम किया और राजा [चन्द्रांगद] – के बैठ जाने पर उनकी आज्ञा से सभी लोग बैठ गये । तदनन्तर वे श्रेष्ठ राजा सभी को कुशल-प्रश्न आदि से प्रसन्नकर उन्हें यथायोग्य ताम्बूल और वस्त्र देकर सम्मानित करके इन्दुमती के शिविर में गये ॥ १४–१६१/२ ॥ उन्होंने बारह वर्ष की अवधि में शेष रह गये करणीय कृत्यों को धर्मशास्त्रों के द्रष्टा द्विजों द्वारा सम्पन्न कराया। राजा ने गणेशजी का सर्वप्रथम पूजन किया । तत्पश्चात् पुण्याहवाचन करवाया तथा भगवान् शंकर का सम्यक् प्रकार से पूजनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट किया ॥ १७-१८ ॥ तत्पश्चात् नारियल फोड़कर वे इन्दुमती के सम्मुख गये और वहाँ उन्होंने इन्दुमती को चन्द्रमा की क्षीण कलाओं की भाँति [तेजोहीन तथा कृश] देखा ॥ १९ ॥ तब रानी इन्दुमती ने सौभाग्यवती युवतियों से राजा की आरती उतरवायी और उनसे उनके ऊपर लाजा ( धान के लावा) और पुष्पों की वृष्टि करवायी ॥ २० ॥ तब आनन्द के आँसुओं से भरी आँखों को सम्यक् प्रकार से पोंछकर हर्ष और शोक से समन्वित वे दोनों परस्पर वार्ता करने लगे ॥ २१ ॥ उन दोनों ने वियोगजन्य अपने-अपने मानसिक क्लेश को एक-दूसरे से शोकपूर्वक कहा, तब मन्त्रियों ने उनको नियति के विधान की अनिवार्यता बतलाते हुए अनेक प्रकार के वचनोंसे सान्त्वना दी ॥ २२ ॥ तदनन्तर वे राजा को अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत तथा छत्र और पताका से सुशोभित एक महान् गजराज पर बैठाकर [ नगर को] ले गये ॥ २३ ॥ वह महागजराज पादरक्षकों से घिरा हुआ था और उसपर लटकते हुए चार घण्टे सुशोभित हो रहे थे । लाठी लिये हुए सौ पुरुष लोगों को रास्ते से हटाते हुए उसके आगे-आगे चल रहे थे ॥ २४ ॥ बहुत-से आग्नेयास्त्रधारी, अश्वारोही और रथारोही राजा के बायें और दायें पार्श्व में स्थित होकर हाथी को देखते हुए शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे ॥ २५ ॥ राजा के आगे-आगे बहुत-से नट, नृत्यांगनाएँ, वाद्य-वादक और वन्दीजन तथा उनके पीछे गजारोही चल रहे थे। इस प्रकार आदरपूर्वक राजा ने नगर में प्रवेश किया। उस समय सैनिकों के चलने से उठी धूल से [नभमण्डल] व्याप्त हो जाने से सूर्य निस्तेज – से प्रतीत होने लगे थे । यद्यपि वह नगर अलंकृत किया गया था, लेकिन [धूल के कारण] कुछ भी सूझ नहीं रहा था ॥ २६-२७ ॥ तदनन्तर सभी लोग परस्पर एक-दूसरे का अभिवादन करके अपने-अपने घर चले गये, तत्पश्चात् विशिष्ट जनों को राजभवन में ले जाया गया। वहाँ वे सब राजा द्वारा वस्त्र और ताम्बूल देकर सम्मानित होने के बाद उनकी आज्ञा पाकर घर चले गये । राजा ने ब्राह्मणों को भोजन कराकर जाति-बान्धवों के साथ भोजन किया ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर रात्रि में उन दोनों [राजा और रानी] – ने सुन्दर विधि से निर्मित, बहुमूल्य गद्दों से युक्त, जिस पर चादर बिछा था और तकिया लगा था, ऐसे पलंग पर शयन किया। वे दोनों बार-बार शोक करते हुए अपने- अपने दुःखों को कह रहे थे, तब पुरोहित द्वारा सान्त्वना देने पर वे दोनों सुखपूर्वक सो गये ॥ ३०-३१ ॥ नृपश्रेष्ठ चन्द्रांगद ने अपनी पत्नी द्वारा किये गये विनायकव्रत के माहात्म्य को सुनकर स्वयं भी उसे करने का मन में संकल्प किया ॥ ३२ ॥ हे सुमुखि! तदनन्तर श्रावणमास के आने पर राजा चन्द्रांगद ने महोत्सवपूर्वक इस व्रत को किया ॥ ३३ ॥ ऋषि बोले — पिता के इस प्रकार के वचनों को सुनकर पार्वतीजी अत्यन्त हर्षित हुईं और उन्होंने आदरपूर्वक श्रावणमास में [गणेशचतुर्थी का] व्रत किया ॥ ३४ ॥ पार्वतीजी ने यथोक्त (शास्त्रोक्त) विधि से [गणेशजी की] मूर्ति का निर्माणकर गजानन गणेशजी का ध्यान करते हुए पयमात्र का आहारकर प्रयत्नपूर्वक [उनकी] पूजा की। इससे भगवान् शंकर का भी मन चंचल हो उठा और वे शूलपाणि स्वयं उन पार्वतीजी के आश्रम में पधारे ॥ ३५-३६ ॥ गणेशचतुर्थी [भाद्रशुक्ल चतुर्थी ] -को उस शुभव्रत के सम्यक् रूप से पूर्ण हो जाने पर देवी पार्वती ने वृषभ पर आरूढ़ भगवान् शिव को अपने आश्रम में आया हुआ देखा। तब उन्होंने उठकर उनके युगल-चरणकमलों में प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया और सम्पूर्ण लोकों का कल्याण करने वाले भगवान् शंकर का विधिवत् पूजन किया। तदनन्तर प्रेमविह्वल पार्वतीजी ने उन महादेव से कहा — ॥ ३७-३८ ॥ देवी बोलीं — ‘आप मुझे छोड़कर क्यों चले गये थे? आपने मुझे क्यों विस्मृत कर दिया ? हे विभो ! आपका एक निमेष का भी वियोग कल्प-कल्प के समान हो रहा था। पिता के निर्देश पर मैंने गणेशजी के इस व्रत को किया। [उन्हीं] वरदाता गणेशजी की कृपा से मैंने आपका दर्शन प्राप्त किया’ ॥ ३९-४०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी !] उसी समय हिमवान् वहाँ आये। उन्होंने आदरपूर्वक सती [पार्वती]- का हाथ उन शिव के हाथ में दे दिया। तब गन्धर्वोंसहित सभी देवताओं ने आदरपूर्वक गजानन गणेशजी का और सज्जनों का कल्याण करने वाले शिव-शिवा का पूजन किया। उस समय देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाश से फूलों की वृष्टि होने लगी ॥ ४१-४३ ॥ तदनन्तर उन सभी ने गजानन गणेशजी को नमस्कारकर विविध स्तोत्रों से उनका स्तवनकर उन्हें प्रसन्न किया । भगवान् शंकर ने भी जय-जयकार करते हुए गजानन का स्तवन किया ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् [ भगवान् शंकर ]-ने पार्वती को अर्धांगिनी बनाकर शीघ्र ही कैलासपर्वत के लिये प्रस्थान किया तथा अन्य सब लोग भी अपने-अपने स्थान को चले गये ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे व्यासजी ! हे महामुने! तुमने गणाधिपति गणेशजी के व्रत के माहात्म्य के सम्बन्ध में जो कुछ पूछा था, मैंने वह सब कुछ बतला दिया। अब मैं तुमसे पुनः एक अन्य कथानक को कहता हूँ, जिसको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शंकर-पार्वती के मिलन का वर्णन’ नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥ Content is available only for registered users. 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