August 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-62 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ बासठवाँ अध्याय भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रत के अन्तर्गत गणेशजी को दूर्वार्पण के माहात्म्य का वर्णन अथः द्विषष्टितमोऽध्यायः दूर्वोपाख्यानं कृतवीर्य के पिता ने पूछा — [ हे ब्रह्मन् !] ‘भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा के उदय होने पर ही गणेशजी की पूजा क्यों की जाती है’ – यह मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब मैं उन गणेशजी को दूर्वांकुर के अर्पण का कारण सुनना चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजी को दूर्वांकुर क्यों प्रिय हैं? ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजी को दूर्वांकुर- समर्पण का जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥ दक्षिण देश में जाम्ब नाम की एक नगरी थी, वहाँ सुलभ नाम का क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्, दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसम्पन्न, सम्मान्य जनों का सम्मान करने वाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण शास्त्रों के तात्त्विक अर्थ को जानने वाला और सभी वेदों के तत्त्वार्थ का ज्ञाता था ॥ ४-५ ॥ वह विकट नाम वाले गणेशजी के प्रति नित्य भक्तिमान् और स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति में रत रहता था । उसकी पत्नी सुमुद्रा नाम से अत्यन्त विख्यात थी ॥ ६ ॥ वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी । उसने अपने रूप-सौन्दर्य से अप्सराओं को भी पराभूत कर दिया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियों की सेवामें रत रहने वाली और पति के मनोभावों के अनुकूल आचरण करने वाली थी ॥ ७ ॥ हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओं में सर्वमान्य और श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नान से निर्मल हो जब पुराणार्थ की विवेचना में मन लगाये बैठे थे, तभी मधुसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया ॥ ८-९ ॥ निरन्तर परमेश्वर का चिन्तन करते रहने वाला वह भिक्षा का अभिलाषी था । दारिद्र्य के कारण उसने मलिन वस्त्र धारण कर रखे थे । वस्त्र धारण किये होने पर भी वह प्रायः दिगम्बर ही था ॥ १० ॥ सुलभ ने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया, तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विज को देखकर वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा ॥ ११ ॥ [यह देखकर] उन मुनि के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकों को जला डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए कहा — ‘हे दुर्बुद्धि ! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे थे, अतः प्रतिदिन हल में जोते-जाने वाले बैल हो जाओ और नित्य दुखी रहो’ ॥ १२-१३ ॥ पति के प्रति दिये गये शाप को सुनकर सुमुद्रा क्रोध से मूर्च्छित हो गयी। पदाघात से घायल सर्पिणी की भाँति क्रुद्ध होकर उसने उस ब्राह्मण को शाप दिया — हे दुष्ट ब्राह्मण ! तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंग से मेरे पति को शाप दिया है, अतः तुम भी विष्ठा को भोजनरूप में ग्रहण करने वाले, गाड़ी का बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे ॥ १४-१५ ॥ इस प्रकार दिये गये क्रूर शाप को सुनकर उस ब्राह्मण ने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होने पर भी तुमने मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही तुम दरिद्र, अनेक दोषों से युक्त, मल-मूत्र का भोजन करने वाली और अशुभ कार्य करने वाली होगी। इस प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ शरीरों का त्याग कर दिया ॥ १६-१७ ॥ [तदनन्तर] सुलभ वृषभ के रूप में उत्पन्न हुआ और हल खींचने का दुःख भोगता रहा । ब्राह्मण के शाप के कारण उसे एक क्षण के लिये भी विश्राम नहीं मिलता था। वह ब्राह्मण मधुसूदन भी गर्दभयोनि में उत्पन्न हुआ और सुमुद्रा प्राणियों की हिंसा करने वाली दुष्ट चाण्डाली हुई ॥ १८-१९ ॥ [वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्र का भक्षण करने वाली, अत्यन्त शुष्क शरीर वाली, बाहर निकले दाँतों से युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय भ्रमण करते हुए उसने नगर के दक्षिण भाग में स्थित गणेशजी के परम अद्भुत मन्दिर को देखा ॥ २०-२१ ॥ वह अनेक प्रकार के वृक्षों और लताजालों से आच्छादित तथा अनेक प्रकार के पक्षिसमूहों से युक्त था । वहाँ पर कुछ योगीश्वर सदा अनुष्ठान में रत रहते थे ॥ २२ ॥ वहाँ गणेशजी की उपासना करने वाले लोग [शास्त्रोक्त ] नियमों का पालन करते हुए निवास कर रहे थे । [उनमें से ] कुछ मनोरथपूर्ति की इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष और कुछ धनप्राप्ति की इच्छा वाले थे। किसी समय भाद्रपदमास की चतुर्थी तिथि को उस नगर के प्रत्येक घर में गणेश-महोत्सव का आयोजन हो रहा था ॥ २३-२४ ॥ उसी समय महाप्रलय की – सी सूचना देने वाली अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टि से भयभीत होकर जिस-जिस घर में जाती, वहीं से लोगों द्वारा मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथ में अग्नि लेकर मन्दिर के अन्दर चली गयी ॥ २५-२६ ॥ तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु योगियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। तब वह चाण्डाली [दूब के] तिनकों को अग्नि में जलाकर उससे अपने शरीर को सेंकने लगी ॥ २७ ॥ अकस्मात् वायु के वेग से उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर दैवयोग से गणनायक गणेशजी के मस्तक पर गिर पड़ा ॥ २८ ॥ उसी समय वह गर्दभ भी शीत से भयातुर होकर उस देवालय में चला आया । तत्पश्चात् वह वृषभ भी हल से मुक्त होकर दैवयोग से वहीं गणेशजी के मन्दिर में भावीवश चला आया और उन दोनों ने उस चाण्डाली के तृणों का भक्षण कर लिया ॥ २९-३० ॥ वहाँ लोगों के सो जाने पर गजानन गणेशजी के समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ) – में सींग और पाद-प्रहार से युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ ३१ ॥ उस समय उन दोनों के मुख से निकलकर दूर्वा के अंकुर गणेशजी की सूँड़ तथा उनके पैर पर गिर गये, जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजी की प्रतिमा के समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभ को खूब पीटा तथा पूजा में अर्पित नैवेद्य को स्वयं खा गयी । उन दोनों [गर्दभ और वृषभ] – के खुरों के शब्दों को श्रवणकर निद्रा में लीन लोग भी जग गये। सावधान होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनी का प्रहार कर उन्हें बाहर भगा दिया ॥ ३३-३४ ॥ भागने के लिये तत्पर उस चाण्डाली पर भी लोगों ने कंकड़-पत्थरों से प्रहार किया । चाण्डाली और गधे द्वारा [गणेशप्रतिमा के] स्पर्श की शंका से आकुल लोगों ने अभिमन्त्रित तीर्थजल से गजानन गणेशजी को स्नान कराया तथा अनेक प्रकार के द्रव्यों से उनका अनेक बार पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं वृषभ को लोगों ने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ों से पीटा। मन्दिर का द्वार बन्द होने से वे भागकर बाहर भी नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वर में क्रन्दन करते उन तीनों के स्वर से देवाधिदेव गणेशजी का मन उनकी ओर आकृष्ट हो गया ॥ ३७-३८१/२ ॥ [गणेशजी सोचा कि अहो !] इन्हीं (चाण्डाली, वृषभ और गर्दभ ) – के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है। इन्होंने दूर्वांकुरों द्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी । यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी प्रदक्षिणा भी कर ली । भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य होता है ॥ ३९-४१ ॥ इसलिये मैं इन सबको विमान से अपने धाम को भेज देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो उनके गणों से युक्त था। वे गण गणेशजी के जैसे स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओं के समूह से घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं परागसमन्वित पुष्पों से युक्त था ॥ ४२-४३ ॥ वह विमान दिव्य भोगों से परिपूर्ण और ध्वज- पताकाओं से शोभायमान था । गणेशजी के स्वरूपवाले वे गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)-को उस विमान में बैठाकर गजानन गणेशजी की आज्ञा से उनके धाम को शीघ्रतापूर्वक ले गये ॥ ४४-४५ ॥ यह घटना सब लोगों के देखते-देखते घटित हुई, इससे सभी के हृदय में आश्चर्य का भाव भर गया। वे लोग कहने लगे कि इन (तीनों) को [ न जाने किस] पूर्वपुण्य से इस प्रकार की गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ तब कुछ योगीश्वर ध्यान का त्यागकर गणों के पास गये और उनसे पूछा कि इन तीनों की ऐसी पुण्यमयी ध्रुव सद्गति कैसे हुई — यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियों का लेशमात्र भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे प्राप्त हुई — यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥ हम सब भी अपने अनुष्ठान का त्याग करके शीघ्र ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि बीत जाने पर भी हमें उन देवाधिदेव का दर्शन नहीं हुआ ॥ ४९ ॥ केवल वायु का भक्षणकर अनुष्ठान में लगे रहने वाले हम विरक्तजनों को गणेशजी के धाम की प्राप्ति कब होगी ? – यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘दूर्वोपाख्यान’ नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥ Content is available only for registered users. 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