श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-70
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सत्तरवाँ अध्याय
संकष्टचतुर्थी व्रत की महिमा
अथः सप्ततितमोऽध्यायः
चतुर्थी व्रतोपाख्यानं कृतवीर्य

राजा बोले — हे प्रभो ! पूर्वकाल में इस व्रत (संकष्टचतुर्थीव्रत)-को किसने किया? भूलोक में इसका प्रचार किसने किया? इस व्रत का क्या पुण्य है ? इसके करने का क्या फल है? दया करके इसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे राजन्! पूर्वकाल में कार्तिकेय [घर से] चले गये थे 1  तो शिवजी के कहने से पार्वतीजी ने चार मास तक इस व्रत को किया था ॥ २ ॥ [उसके फलस्वरूप] पाँचवें महीने में अपर्णा (पार्वतीजी) – को कार्तिकेय दृष्टिगोचर हुए। [इसी प्रकार] पूर्वकाल में अगस्त्यजी ने समुद्र को पी लेने की इच्छा से तीन महीने तक व्रत किया और विघ्नेश्वर गणेशजी के कृपाप्रसाद से वे उसे पी गये। 2  हे राजेन्द्र ! पूर्वकाल में नल की खोज करती हुई दमयन्ती 3  ने [भी] छः मास तक उस व्रत को किया था, तब उन्हें नल का दर्शन हुआ था। हे राजन्! पूर्वकाल में प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध को चित्रलेखा हर ले गयी थी ।4  तब ‘मेरा पुत्र कहाँ है’, कौन उसे ले गया’ – इस प्रकार सोचते हुए पुत्रशोक से दुखी एवं व्याकुल प्रद्युम्न से रुक्मिणी ने कहा — ॥ ३–६ ॥

रुक्मिणीजी बोलीं — हे पुत्र ! सुनो, अब मैं वह घटना बतलाती हूँ, जो अपने [ही] भवन में घटित हुई थी । पूर्वकाल में जब तुम छः दिन के बालक थे, तो शम्बर द्वारा तुम्हें हर लिया गया था 5  ॥ ७ ॥ तुम्हारे वियोग-जनित दुःख से मेरा हृदय व्याकुल था। [सोचती थी कि] मैं अपने अद्वितीय और अत्यन्त सुन्दर पुत्र को कब देखूँगी ? ॥ ८ ॥ अन्य स्त्रियों के पुत्रों को देखकर मैं मन-ही-मन सोचती थी कि मेरा भी पुत्र इतना ही बड़ा होता ॥ ९ ॥ इस प्रकार चिन्ता से व्याकुल रहते हुए मुझे अनेक वर्ष बीत गये, तब दैवयोग से लोमशमुनि मेरे पास आये। हे पुत्र ! तब मैंने उनके द्वारा उपदिष्ट उत्तम संकष्ट- चतुर्थीव्रत का, जो सम्पूर्ण चिन्ताओं का हरण करने वाला है, चार बार अनुष्ठान किया ॥ १०-११ ॥ उसके प्रभाव से शम्बर को रण में मारकर तुम आ गये। [अतः] तुम भी इस व्रत को करो, तब तुम्हें अपने पुत्र के विषय में ज्ञान हो जायगा ॥ १२ ॥

ब्रह्माजी बोले — भगवान् गणेश को प्रसन्न करने वाले इस (संकष्टचतुर्थी) व्रत को पूर्वकाल में प्रद्युम्न ने किया था। [तदनन्तर] उन्होंने नारदजी से सुना कि अनिरुद्ध बाणासुर के नगर (शोणितपुर) – में है ॥ १३ ॥ [वहाँ] ईश्वर (शंकरजी ) – के साथ होने वाले संग्राम से भयभीत कृष्ण ने उद्धव की आज्ञा से उस उत्तम व्रत को विधिपूर्वक एक बार किया । हे नरेन्द्र ! तभी वे शोणितपुर जाकर क्षणभर में बाणासुर को रण में जीतकर उषासहित अनिरुद्ध को ले आये थे ॥ १४-१५ ॥

हे नृपश्रेष्ठ ! सृष्टि करने की इच्छा से मैंने भी इस व्रत को किया था और इसके प्रभाव से मैंने अनेक प्रकार की सृष्टि की। अन्य देवताओं, असुरों, मनुष्यों, ऋषियों, दानवों, यक्षों, किन्नरों, नागों और राक्षसों के द्वारा विघ्नों की शान्ति के लिये यह व्रत किया गया है ॥ १६-१७ ॥ [मनुष्य अपनी] आपत्तियों और कष्टों की शान्ति के लिये इस व्रत को करे। संसार में इसके समान दूसरा कोई सर्वसिद्धिकर व्रत, तप, दान, जप, तीर्थ, मन्त्र और विद्या कुछ भी नहीं है। हे राजन्! इस व्रत की कथा सुनकर स्वयं वाणी पर संयम रखते हुए भोजन करे ॥ १८-१९ ॥ [उस समय] हाथ को घुटने के अन्दर रखे और हृदय में गणेशजी का चिन्तन करे । ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात् जो शेष रहे, उसका बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन करना चाहिये ॥ २० ॥

[इस व्रत को करने से] बहुत बड़ा कार्य भी थोड़े ही महीनों (अल्पकाल ) – में सिद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। बहुत क्या कहा जाय, अन्य कोई भी साधन इससे शीघ्र सिद्धि देने वाला नहीं है ॥ २१ ॥ इसका उपदेश अभक्त, नास्तिक तथा दुष्ट व्यक्ति को न दे। इसका उपदेश केवल पुत्र, शिष्य और भक्तियुक्त सज्जन व्यक्ति को ही दे ॥ २२ ॥ हे राजेन्द्र ! तुम मेरे प्रिय हो, धर्मात्मा हो और क्षत्रियों में श्रेष्ठ हो, प्रजाजनों का उपकार करने वाले हो, इसीलिये मैंने तुम्हें इस व्रत का उपदेश दिया है ॥ २३ ॥ इसलिये सभी व्रतों में श्रेष्ठतम इसी व्रत को तुम्हें करना चाहिये। इससे तुम्हारे समस्त कार्यों की सिद्धि होगी, मेरा वचन अन्यथा नहीं है। जब-जब कोई स्त्री या पुरुष यह देखे कि उसके सामने कोई कठिन कार्य उपस्थित है, तो वह इस श्रेष्ठ व्रत को करे; इससे मनोऽभिलषित कार्य सिद्ध हो जाते हैं। भला, विघ्नेश्वर गणेशजी के प्रसन्न होने से क्या दुर्लभ है ! ॥ २४-२५ ॥

सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] उस नृपश्रेष्ठ ने यह सब सुनकर सम्पूर्ण दुःखों की शान्ति के लिये इस व्रत को किया। व्रत के प्रभाव से उसने वैरियों को जीतकर पुत्रोंसहित निष्कंटक राज्य का भोग किया ॥ २६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘संकष्टचतुर्थीव्रतमाहात्म्यवर्णन’ नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥

1. कार्तिकेयजी के घर छोड़कर चले जाने की कथा शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अध्याय १५ में सविस्तार प्राप्त होती है।
2. कालेय नामक राक्षसगण समुद्र में रहते थे, इसलिये देवगण उनका वध करने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे। देवताओं की प्रार्थना पर महर्षि अगस्त्य ने समुद्र के सम्पूर्ण जल का पान कर लिया, जिससे देवगण अत्याचारी कालेय राक्षसों का वध कर सके। यह कथा महाभारत वनपर्व अध्याय १०४ – १०५ में प्राप्त होती है।
3. नल-दमयन्ती का आख्यान महाभारत के वनपर्व में अध्याय ५३ से अध्याय ६९ तक विस्तार से प्राप्त होता है।
4. चित्रलेखा द्वारा अनिरुद्ध को हर ले जाने की कथा
श्रीमद्भागवतमहापुराण के दशम स्कन्ध के ६२वें अध्याय में प्राप्त होती है।
5. शम्बर द्वारा प्रद्युम्न के हरण की कथा
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के ५५ वें अध्याय में प्राप्त होती है।

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.