August 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-72 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ बहत्तरवाँ अध्याय कृतवीर्य की पत्नी का अंगहीन पुत्र को जन्म देना, दत्तात्रेयजी का आना और कृतवीर्यपुत्र को गणेशजी के एकाक्षरमन्त्र का उपदेश देना, कृतवीर्य का पुत्र को गणपति-आराधना के लिये वन में भेजना अथः द्विसप्ततितमोऽध्यायः कार्तवीर्यप्रादुर्भावः शूरसेन बोले — हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र ! व्रत की सम्पूर्ति होने पर राजा और रानी को किस प्रकार के पुत्र की प्राप्ति हुई? हे विभो! मुझ पूछने वाले को यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥ इन्द्र बोले — हे राजन् ! गजानन गणेशजी के प्रसन्न होने पर क्या-क्या नहीं हो सकता ? उनकी कृपा से राजा कृतवीर्य की उस रानी ने गर्भधारण किया ॥ नवम मास में जन्म होने पर रानी ने अपने उस मंगलमय पुत्र का दर्शन किया। उसके दो कन्धे और सुन्दर मुख था, परंतु उसके भुजाएँ और हाथ नहीं थे। इसी प्रकार उसके कमल- जैसे सुन्दर नेत्र और सुन्दर नासिका थी, परंतु उसके घुटने और जंघाएँ नहीं थीं । उसे [हाथ, ] जंघा और पैरों से रहित देखकर माता रोते हुए बोली ॥ ३-४ ॥ वह (रानी) बोली — हे गजानन ! मुझ अभागिन को इस प्रकार का बालक क्यों हुआ ? आपने मुझे हाथ- पैर रहित शिशु क्यों दिया ? ॥ ५ ॥ इससे तो मेरा वन्ध्या होना ही अच्छा था । इस प्रकार के पुत्र से पुत्रवती होने का क्या लाभ ! मेरे पूर्वजन्म में किये गये पापों का नाश क्यों नहीं हुआ ? ॥ ६ ॥ हे गजानन! आपकी कृपा क्यों फलीभूत नहीं हुई? ब्राह्मणों के [आशीर्वादात्मक ] वचन मेरे लिये इस प्रकार से निष्फल क्यों हो गये ? [ इस प्रकार विलाप करती हुई वह] अपने दोनों हाथों से अपने वक्षःस्थल और मस्तक को बार-बार पीट रही थी। उसके रुदन के कारण वहाँ जितनी भी स्त्रियाँ विद्यमान थीं, सब रोने लगीं ॥ ७-८ ॥ उन सबका कोलाहल सुनकर राजा भी वहाँ आ गये। उनका भी रुदन सुनकर [राजा के] प्रमुख मन्त्रीगण भी वहाँ गये। तदनन्तर उन सबका भी रुदन सुनकर नगर के लोग भी वहाँ आकर रोने लगे ॥ ९१/२ ॥ राजा बोले — हे गजानन ! हे देव! दीनों पर आपकी यह कैसी कृपा है! [इस प्रकार का हाथ-पैर से रहित पुत्र देकर] आपने आज किस प्रकार की मुझपर दया प्रदर्शित की है ? हे निष्पाप ! आप स्मरणमात्र से कैसे पापों का हरण करते हैं ? मेरा तो जप, तप, स्मरण, दान, पूजन, द्विजतर्पण, अनुष्ठान तथा हवन सब व्यर्थ हो गया ॥ १०–१२ ॥ इसलिये दैव ही बलवान् होता है, प्रयत्न निरर्थक है । कर्म की गति जानी नहीं जाती कि वह कब या क्या होगी! जैसे पहाड़ खोदने से चूहा प्राप्त हो, वैसे ही मेरे द्वारा जीवनभर किये गये प्रयत्न के फल के रूप में यह पुत्र हुआ है। तब उन शोकाकुल राजा कृतवीर्य से मन्त्रियों ने इस प्रकार कहा — ॥ १३–१४१/२ ॥ मन्त्रिप्रमुखों ने कहा — हे राजन् ! शोक न करो, भावी अन्यथा कैसे हो सकती है ? राम क्या मृग के विषय में नहीं जानते थे [ कि वह सोने का नहीं होता ], फिर भी वे उसके पीछे गये। क्या धर्मराज युधिष्ठिर को ‘द्यूतक्रीड़ा निषिद्ध है’ ऐसा ज्ञान नहीं था, फिर भी वे द्यूतक्रीड़ा के लिये गये और सब कुछ गवाँकर वन को गये। अतः आपके इस दारुण क्रन्दन से भी इस बालक को सर्वांगसुन्दरता नहीं प्राप्त होगी ॥ १५–१७ ॥ यदि इसका अदृष्ट ठीक होगा तो यह आगे सुन्दर हो जायगा । जिस प्रकार से समय आने पर वृक्ष पुष्पित और फलयुक्त हो जाते हैं, वैसे ही समय आने पर यह भी सम्यक् रूप से सुन्दर और पृथ्वी का स्वामी होगा ॥ १८१/२ ॥ इन्द्र बोले — मन्त्रिगणों के इस प्रकार के वचन सुनकर राजा सावधान हो गये और उस [शोकाकुल] रानी से कहा — ‘उठो – उठो, अब तुम शोक न करो’ और स्वयं स्वस्थचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलवाकर गणेशपूजन और स्वस्तिवाचन कराया। तदनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध करके माला, अलंकार, वस्त्र, गाय और बहुत-से रत्न आदि अनेक प्रकार के दान दिये। उन्होंने अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों, अनेक प्रकार के वाद्यों के वादन से जीविका चलाने वालों, वन्दीजनों, चारणों, दीनों, अन्धों और असहायों को भी उनके यथायोग्य वस्त्रों आदि का दान किया ॥ १९-२३ ॥ उसने [नगर के] प्रत्येक घर में ताम्बूल तथा शर्करा भिजवायी तथा ग्यारहवें दिन उस शिशु का ‘कार्तवीर्य’ नाम रखा। [इस अवसर पर] राजा ने महान् उत्साहपूर्वक [सम्पूर्ण] नगर को भोजन कराया। इसके अनन्तर उस पुत्र का बारह वर्ष का समय बीत गया, तो राजा कृतवीर्य के भवन में दत्तात्रेयजी स्वेच्छा से आये। कृतवीर्य ने उनके चरणों में अपना सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ २४-२६ ॥ [तब] उन मुनि ने [चरणों में पड़े हुए] उस श्रेष्ठ राजा को उठाकर उसका आलिंगन किया । [ राजा ने भी उन मुनि को ] एक सुन्दर आसन पर बिठाकर उनका आदरपूर्वक पूजन किया ॥ २७ ॥ राजा ने उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, गाय, वस्त्र, उपवीत, धूप, दीप, नैवेद्य, अनेक प्रकार के फल, उद्वर्तन (उबटन) तथा रत्न और सुवर्ण की दक्षिणा दी। पादसंवाहन आदि से परम प्रसन्न और सुखपूर्वक विराजमान महामुनि दत्तात्रेय से राजा कृतवीर्य ने कहा — ‘हे मुने! आज मेरे जन्म-जन्मान्तर के पुण्यकर्म फलित हो गये, जो मैं अपने चर्म-चक्षुओं से आपका साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ । हे सुव्रत! आपके कृपा-प्रसाद से मेरा भविष्य और अधिक मंगलमय होगा; क्योंकि आप जैसे महापुरुषों का दर्शन पापकर्मियों को नहीं होता’ ॥ २८-३११/२ ॥ कृतवीर्य के वचन सुनकर दत्तात्रेय ने उनसे कहा — ‘ [हे राजन्!] मैं आपके अद्भुत पुत्र को देखने की इच्छा से यहाँ आया हूँ।’ [मुनि के आगमन से] हर्षित राजा ने तब [अपने पुत्र की दुरवस्था से खिन्न होकर ] उन मुनि से पुनः कहा- ॥ ३२-३३ ॥ राजा बोले — [ हे मुने!] मेरे द्वारा देवाराधन- सम्बन्धी किये गये अनुष्ठान, तप, दान और व्रत आदि सब व्यर्थ गये । जगदीश्वर ने यह जो पुत्र मुझे दिया है, वह मेरे लिये हृदय में काँटे के समान हो गया है। उसके अदर्शनीय होने से मैं भी अदर्शनीय हो गया हूँ ॥ ३४१/२ ॥ इन्द्र बोले — [ हे राजन्!] तदनन्तर राजा कृतवीर्य ने उस बालक को लाकर मुनि दत्तात्रेय को दिखाया ॥ ३५ ॥ उन श्रेष्ठ मुनि ने उस राजपुत्र को देखकर अपने कमलसदृश नेत्रों को बन्द कर लिया और ध्यान के द्वारा राजा के कर्म को जानकर पुनः उनसे बोले — ‘ [हे राजन्!] तुम्हारा यह पुत्र समस्त राजाओं को जीतकर [ चक्रवर्ती होकर] राज्य करेगा। तुमने संकष्टचतुर्थीव्रत के जागरण में जँभाई लेने के बाद आचमन नहीं किया, इससे सम्पूर्ण संकटों का नाश करने वाले व्रतराज का अपमान हुआ । इसीलिये यह पुत्र अंगहीन हुआ है, उपाय करने से यह सर्वांगपूर्ण हो जायगा ॥ ३६-३८ ॥ राजा बोले — हे स्वामिन्! आपने सत्य कहा है। अब आप कृपा करके मुझसे उस उपाय को कहिये, जिससे मेरा पुत्र आपकी कृपा से सर्वांगपूर्ण हो जाय ॥ ३९ ॥ इन्द्र बोले — तब उन मुनि ने दया करके उसके पुत्र को अंगोंसहित [गणेशजी के] एकाक्षर मन्त्र का उपदेश दिया और उससे पुनः कहा कि इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक गणेशजी की आराधना करो। हे सुव्रत ! तुम उपवास और एकभुक्ति (दिन-रात्रि के बीच मध्याह्न के बाद केवल एकबार भोजन करना) – के नियमों का पालन करो ॥ ४०-४१ ॥ बारह वर्ष तक इस प्रकार आराधन करने पर वे तुम्हें दर्शन देंगे; उनके दृष्टिपातमात्र से तुम दिव्य देहवाले हो जाओगे। ऐसा कहकर और राजा से अनुमति लेकर वे मुनिश्रेष्ठ अन्तर्धान हो गये। तब मुनि के चले जाने पर पैरों से रहित उस महामनस्वी पुत्र ने [अपने पिता] कृतवीर्य से कहा कि मुझे गहन वन में पहुँचवा दीजिये। गणेशजी की कृपाप्राप्ति हेतु मैं अनुष्ठान करूँगा ॥ ४२–४४ ॥ उसके माता-पिता उसके वचनों को सुनकर रुदन करने लगे। तदनन्तर पिता ( राजा कृतवीर्य) – ने एक सुन्दर पालकी द्वारा उसे वन को भेज दिया ॥ ४५ ॥ राजा के सेवकगण उसे पर्णकुटी में बैठाकर वापस नगर को लौट आये। उस राजपुत्र ने भी वहीं रहकर तपस्या करने का निर्णय किया ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कृतवीर्य को पुत्र की प्राप्ति का वर्णन’ नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥ Content is available only for registered users. 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