August 31, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-79 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ उन्यासीवाँ अध्याय जमदग्नि द्वारा कामधेनु को देने से मना करने पर कार्तवीर्य का क्रुद्ध होकर अपने सैनिकों को युद्ध का आदेश देना, इधर कामधेनु द्वारा अनेक वीरों का प्रादुर्भाव और उनके द्वारा कार्तवीर्य की सेना का पराभव, क्रुद्ध कार्तवीर्य द्वारा महर्षि जमदग्नि का वध, रेणुका का कार्तवीर्य को शाप देना अथः एकोनाशीतितमोऽध्यायः कामधेनुनोत्पन्नेन सैन्येन कार्तवीर्यस्य पराभवः जमदग्नेश्च हत्या मुनि बोले — [ हे राजन्!] पहले तो तुमने सज्जनों के आचरण का अनुपालन करते हुए उपकार का भाव दिखाया, किंतु अब तुम अपने विनाश को बुलाकर कामधेनु को प्राप्त करने की इच्छा कर रहे हो ॥ १ ॥ हे नृप! तुम निश्चित ही भ्रम में हो; क्योंकि जो वस्तु अप्राप्य है, उसकी तुम अभिलाषा कर रहे हो । निश्चित ही तीनों लोकों को विनष्ट करने से जो पाप होता है, वह तुम्हारे सिर लगेगा ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार के वचनरूपी बाणों से विद्ध वह राजा प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा, और क्रुद्ध होकर अपने मुख से आग उगलता हुआ परम क्रुद्ध होकर उस समय मुनि जमदग्नि से कहने लगा ॥ ३१/२ ॥ राजा बोला — हे शठ ! किसी के भी मुख से मैं कटु- वचन नहीं सुन सकता। क्या करूँ, तुम ब्राह्मण हो — ऐसा विचार करके मैं कटु वचनों को सहन कर रहा हूँ ॥ ४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उठकर उस राजा ने अपने दूतों को शीघ्र ही आज्ञा देते कहा — ‘तुम लोग खूँटे से बँधी हुई कामधेनु को छुड़ाकर शीघ्र ही मेरे पास ले आओ। उसकी आज्ञा से दूतों ने उस समय कामधेनु को चारों ओर से घेर लिया ॥ ५-६ ॥ [परंतु] कामधेनु की फूत्कारमात्र से वे दूत अपने प्राण गवाँकर स्वर्ग चले गये। अन्य राजदूतों को उसने अपनी क्रोधाग्नि से भस्म कर डाला। दूसरे वीर उसकी श्वासरूपी वायु के तीव्र वेग से आकाश में उड़ गये। उस समय उनके द्वारा सूर्यमण्डल आच्छादित हो जाने के कारण कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था ॥ ७-८ ॥ सभी दिशाएँ अन्धकार से व्याप्त हो गयीं, आकाश भी नहीं दिखायी पड़ रहा था। पृथ्वी हिलने-डुलने लगी, प्रकम्पित होकर वृक्ष गिरने लगे ॥ ९ ॥ सभी सैनिक भयभीत होकर दशों दिशाओं में भाग उठे। किसी ने दूर स्थित होकर चाबुक के आघात से उस कामधेनु को प्रताड़ित किया । तब वह गौ उड़-उड़कर उस सेना के पीछे उसी प्रकार दौड़ पड़ी, जैसे कि हाथियों के समूह पर सिंह और सर्पों पर गरुड़ टूट पड़ता है ॥ १०-११ ॥ भागते हुए उन वीरों में महान् हाहाकार मच गया । तब महान् बलशाली कार्तवीर्य ने उनसे कहा — ‘तुम लोगों को भयभीत नहीं होना चाहिये । प्रसन्नतापूर्वक मेरे द्वारा शंखध्वनि किये जाने पर वह कामधेनु भयभीत होकर अपने घर वापस लौट जायगी। उसकी सामर्थ्य ही क्या है ? तुम लोग मेरे कौतुक को देखो ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर उसने अपना महान् शंख बजाया, जिसके नाद से त्रैलोक्य गूँज उठा। किंतु तब भी वह कामधेनु भयभीत नहीं हुई, तदनन्तर उन सभी राजसेवकों ने लाठियों, लोहे के डण्डों से बड़े वेग से उसे पीटना प्रारम्भ किया। उसके शरीर पर जहाँ-जहाँ प्रहार हुआ उस-उस स्थल से अनेक वीर उत्पन्न हुए, जो सभी प्रकार के शस्त्रों से समन्वित थे और युद्ध के लिये सन्नद्ध थे। उस कामधेनु के केशों से शक और बर्बर प्रादुर्भूत हो गये ॥ १४-१६ ॥ इसी प्रकार उसके पैरों से पटच्चर जातिवाले सैनिक, विविध जाति के यवन तथा अन्य भी सभी वीर उत्पन्न हुए। ऐसे ही कामधेनु से घोड़े, हाथी तथा रथों पर सवार अनेक वीरों के समूह उत्पन्न हुए, उन्होंने भी कार्तवीर्य के सैनिकों के साथ युद्ध किया ॥ १७-१८ ॥ उनके प्रहार से राजा कार्तवीर्य के सैनिक भूमि पर गिरने लगे। उसके अन्य सैनिक जैसे रात्रि में पक्षी वृक्ष में छिप जाते हैं, वैसे ही कामधेनु के सैनिकों में मिलकर छिप गये। परस्पर आघात से सैकड़ों पुरुष घायल होकर गिर पड़े। शस्त्रों द्वारा शस्त्रों के काट दिये जानेपर कुछ वीर मल्लयुद्ध करने लगे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकार का भीषण युद्ध छिड़ जानेपर तथा शस्त्रों के गिर जाने पर यह नहीं पता चल पा रहा था कि कौन अपने पक्ष का है और कौन पराये पक्ष का ॥ २१ ॥ धूल के द्वारा सूर्य के आच्छादित हो जाने से वे सैनिक परस्पर में ही एक-दूसरे को मारने लगे । ‘मारो-मारो’– ऐसा कहते हुए महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ २२ ॥ घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों के चिंघाड़, सैनिकों के निनाद, रथों के नेमि की ध्वनि, मृदंग, ताल, वेणु और भेरी के शब्दों से अत्यधिक कोलाहल हो उठा ॥ २३ ॥ इस प्रकार उस कामधेनु से आविर्भूत वीरों तथा कार्तवीर्य के रथारोही, अश्वारोही, गजारोही और पैदल सैनिकों के मध्य अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जो भूतों तथा राक्षसों को भी भय प्रदान करने वाला था ॥ २४ ॥ वह युद्ध चील, कौवे आदि पक्षियों के लिये सुख प्रदान करने वाला और वीरों की पत्नियों को भय प्रदान करने वाला था। युद्ध में किसी की जाँघें टूट गयीं और किसी के सिर कट गये। उस युद्ध में टूटे हुए खड्ग, खेटक, भाले, बाण तथा धनुषों और वीरों एवं रथारूढ़ों की तो गिनती ही नहीं की जा सकती थी ॥ २५-२६ ॥ उस समय राजा कार्तवीर्य के जो बचे हुए सैनिक थे, वे भागने लगे और कामधेनु गौ के सैनिकों ने हँसकर उन्हें दौड़ाया, किंतु मारा नहीं। उन सैनिकों ने कार्तवीर्य के सैनिकों की निन्दा की और कहा — ‘मुनि जमदग्नि ने तुम सबका क्या अनिष्ट किया था ? [ लगता है,] किसी जन्मान्तरीय दोष के कारण उस समय राजा कार्तवीर्य को दुर्बुद्धि पैदा हो गयी थी’ ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेना के विनष्ट हो जाने पर कृतवीर्य का पुत्र वह राजा कार्तवीर्य युद्ध के लिये उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथों में पाँच सौ धनुष तथा पाँच सौ बाण धारण कर लिये ॥ २९ ॥ महान् भुजाओंवाले उस कार्तवीर्य ने भूमि पर बायाँ घुटना टेककर बड़े वेग से धनुषों की प्रत्यंचाओं को खींचकर कामधेनु से उत्पन्न सेनाओं पर बाणों की वर्षा की ॥ ३० ॥ किंतु राजाद्वारा की गयी वह बाणों की वर्षा उसी प्रकार निष्फल हो गयी, जैसे कि नीतिरहित व्यक्ति का उद्यम विफल हो जाता है और जैसे वन्ध्या स्त्री का सहवास विफल हो जाता है । उस समय उस राजश्रेष्ठ कार्तवीर्य ने बार-बार उतने ही बाणों को छोड़ा, किंतु कामधेनु से उत्पन्न अपने बाणों के विफल हो जानेपर उस समय एक वीर भी घायल नहीं हुआ ॥ ३१-३२ ॥ राजा अत्यन्त संतप्त हो उठा, ‘मेरा सामर्थ कहाँ ‘चला गया’ इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह व्याकुल हो गया ॥ ३३ ॥ ‘व्याकुल व्यक्ति पर प्रहार नहीं करना चाहिये’ — ऐसा समझकर वे सभी सैनिक स्वर्गलोक को चले गये और कामधेनु भी प्रसन्न हो गयी तथा सोचने लगी कि तुच्छ व्यक्ति के साथ युद्ध करने से क्या लाभ ? ॥ ३४ ॥ कामधेनु के स्वर्ग चले जाने पर वह राजा कार्तवीर्य मुनि जमदग्नि के समीप गया और क्रुद्ध होकर उनसे बोला — ‘हे ब्रह्मन् ! मैंने तुम्हारा कपट भाव जान लिया है, जिसके हृदय में छल-कपट हो, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये ।’ ऐसा कहकर उसने एक बाण के द्वारा मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि को विद्ध कर डाला ॥ ३५-३६ ॥ उस महान् बाण के हृदय में लगते ही मुनि ने प्राण त्याग दिया। तब मुनिपत्नी रेणुका ने उस राजा से कहा — ‘तुमने व्यर्थ में ही ब्रह्महत्या की है’ ॥ ३७ ॥ आँखें लाल किये हुए वह राजा क्रोध के आवेश में होकर उस रेणुका से बोला —‘अरे मुनि की प्रिय पत्नी ! चुपचाप खड़ी रहो, नहीं तो मैं तुम्हें भी मार डालूँगा’ ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट राजा कार्तवीर्य ने क्रोध करते हुए इक्कीस बाणों से रेणुका पर भी प्रहार किया। उस समय मुनिपत्नी ने अपने मन में मुनि जमदग्नि का स्मरण किया ॥ ३९ ॥ तदनन्तर रेणुका ने उस राजा से कहा —‘अरे दुष्ट चाण्डाल! तुमने यह क्या कर डाला ? बिना अपराध के हम दोनों को तुमने क्यों मारा है ? तुम्हारा और तुम्हारी भुजाओं का विनाश हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है’ ॥ ४०१/२ ॥ रेणुका का ऐसा वचन सुनकर वह राजा वापस चला गया। वह अपने लेकर थोड़े-से बचे हुए सैनिकों को चिन्तामग्न होते हुए अपने नगर को लौट गया। उस समय वह अपने मन में अपनी ही निन्दा कर रहा था और मरे हुए सैनिकों के लिये शोक कर रहा था । उत्साहहीन तथा निश्चेष्ट होकर उसने अपने भवन में प्रवेश किया ॥ ४१-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कार्तवीर्योपाख्यान में’ उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥ Content is available only for registered users. 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