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श्रीबगला ध्यानावली
पीत-पीत वसन प्रसार करैं देह-छवि,
अंग-अंग भूषन, सु-पीत झरि लावै है ।
मुख-कान्ति पीत-पीत, तीनों नेत्र पीत-पीत,
अंग-राग पीत-पीत शोभा सरसावै है ।।
निज भीत भक्तन को, हीत देति दौरि आय,
अपनी दया को, रुप प्रकट दिखावै है ।
बगला ! तिहार नाम जपत, स-भक्ति जौन,
भुक्ति पावै मुक्ति पावै, पीता बन जावै है ।। १

baglamukhi
पीले-पीले वसन हैं, भूषन हू पीले-पीले,
सुमुखी विचित्र रुप, आपनो दिखायो है ।
झपटि गही है जीभ, निज भक्त-शत्रु कर,
मारिबे को ताहि बेगि, मुद्गर उठायो है ।।
चकित कियो है ताहि, बार-बार त्रस्त करि,
बोलि न सकत वह, ऐस डरपायो है ।
बगला ! तिहारो देखि, अद्भुत स्वरुप यह,
साधक प्रसन्न मन, तोर यश गायो है ।। १
कोऊ जपै ह्लीम ह्लीम, द्वि-भुज विलोकि रुप,
कोऊ जपै हरीं, ध्याय चार भुज-धारिणी ।
हलरीम कोऊ जपै, हिय लाय दिव्य रुप,
पावत प्रमोद भूरि, भक्ति अन-पायिनी ।।
बगला ! भवानी तोरि, विशद कहानी जग,
जानि-जानि रीझै तो पै, तू ही मन-भाविनी ।
भक्तन को खोजि-खोजि, उर लाय हरै पीर,
अम्बिका तिहारी दया, भुक्ति-मुक्ति-दायिनी ।। २

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