श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-21
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-एकविंशोऽध्यायः
इक्कीसवाँ अध्याय
देवर्षि नारद द्वारा भगवान् अनन्त की महिमा का गान तथा नरकों की नामावली
नरकस्वरूपवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — ब्रह्मा के पुत्र महाभाग नारद ब्रह्मदेव की सभा में उन भगवान् शेष की महिमा का गान करते हुए उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥ जिनका दर्शन पाकर इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के हेतुभूत सत्त्वादि प्राकृतिक गुणों में अपने कार्य करने की क्षमता आ जाती है, जिनका रूप अनन्त तथा अनादि है, जो अकेले होते हुए ही इस नानात्मक प्रपंच को धारण किये हुए हैं — उन भगवान् संकर्षण के तत्त्व को कोई कैसे जान सकता है ? ॥ २ ॥ जिनमें यह सत्-असत्रूप सारा प्रपंच भास रहा है तथा स्वजनों का चित्त आकर्षित करने के लिये की हुई जिनकी वीरतापूर्ण लीला को परम पराक्रमी मृगराज सिंह ने आदर्श मानकर अपनाया है, उन उदारवीर्य भगवान् संकर्षण ने हम पर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण किया है ॥ ३ ॥ यदि कोई दुःखी अथवा पतित मनुष्य अकस्मात् अथवा हँसी-हँसी में उनके सुने हुए नाम का एक बार भी उच्चारण कर लेता है तो वह दूसरे मनुष्यों के भी सभी पापों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है — ऐसे भगवान् शेष को छोड़कर मोक्ष की इच्छा रखने वाला मनुष्य अन्य किसका आश्रय ग्रहण करे ? ॥ ४ ॥ पर्वत, नदी और समुद्र आदि से पूर्ण यह सम्पूर्ण भूमण्डल उन हजार सिरों वाले भगवान् शेष के एक मस्तक पर धूल के एक कण के समान स्थित है। वे अनन्त हैं, इसलिये उनके पराक्रम का कोई परिमाण नहीं है । किसी के हजार जीभें हों, तो भी उन सर्वव्यापक भगवान्‌ के पराक्रम की गणना वह कैसे कर सकता है ? ॥ ५ ॥ वास्तव में उनका वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम है। ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातल के मूल में अपनी ही महिमा में स्थित होकर स्वतन्त्र हैं और सम्पूर्ण लोकों की स्थिति के लिये पृथ्वी को अपनी लीला से धारण किये हुए हैं ॥ ६ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! निरन्तर भोगों की कामना करने वाले पुरुषों की अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त होने वाली भगवान् की रची हुई ये ही गतियाँ कही गयी हैं। जैसा मुझे उपदेश प्राप्त हुआ, वैसा कह दिया । हे राजेन्द्र ! मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों के प्रवृत्तिधर्म के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली परस्पर विलक्षण ऊँच-नीच गतियाँ इतनी ही हैं। जो आपने पूछा था, उसे मैंने बता दिया और आगे भी सुनिये ॥ ७–९ ॥

नारदजी बोले — सभी प्राणियों के कर्म समान होने पर भी भगवान् ने उन लोगों में यह विभिन्नता क्यों की है ? इसे आप यथार्थरूप में बताइये ॥ १० ॥

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] कर्ता की श्रद्धा के सात्त्विक, राजस और तामस — इन तीन भिन्न-भिन्न कारण गतियाँ भी अलग-अलग होती हैं और इसीलिये उनका फल भी भिन्न-भिन्न होता है ॥ ११ ॥ सात्त्विक श्रद्धा के द्वारा कर्ता को सदा सुख की प्राप्ति होती है, राजसी श्रद्धा से कर्ता को दुःख मिलता है और तामसी श्रद्धा के प्रभाव से कर्ता दुःख और मूढ़ता दोनों का उदय होता है। इस प्रकार श्रद्धाओं के तारतम्य से फलों में भी विचित्रता बतायी गयी है ॥ १२-१३ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! अनादि माया के बनाये हुए कर्मों के परिणामस्वरूप हजारों प्रकार की गतियाँ प्रवृत्त हैं । हे द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं उन गतियों के भेदों का विस्तार से वर्णन करूँगा ॥ १४१/२

हे नारद! त्रिलोकी के भीतर दक्षिण दिशा में अग्निष्वात्ता नामक पितृगण तथा अन्य पितर निवास करते हैं। यह स्थान पृथ्वी से नीचे तथा अतल लोक से ऊपर है। सत्यस्वरूप ये पितृगण सदा परम समाधि से युक्त होकर अपने वंशजों के परम कल्याण की आशा करते हुए यहाँ रहते हैं ॥ १५-१७ ॥ वहाँ पितृराज भगवान् यम अपने गणों के साथ विराजमान रहते हैं । सम्यक् विचार दृष्टि वाले तथा दण्डधारी वे यमराज भगवान्‌ की कही गयी आज्ञा का पालन करते हुए अपने दूतों द्वारा वहाँ लाये गये मृत प्राणियों के लिये उनके कर्मों तथा दोषों के अनुसार वैसे ही फल का विधान करते हैं ॥ १८-१९ ॥ वे परम ज्ञानी यमराज धर्मतत्त्व को जानने वाले, यथास्थान नियुक्त किये गये तथा आज्ञाकारी अपने सभी गणों को सदा प्रेरित करते रहते हैं ॥ २० ॥ संख्या में कुल इक्कीस नरक बताये गये हैं । कुछ लोग नरकों की संख्या अट्ठाईस बताते हैं । मैं क्रमशः उनका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१ ॥

हे देवर्षे ! तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तमूर्ति, वज्रकण्टक-शाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि, अयः पान, क्षारकर्दम, रक्षोगणसंभोज, शूलप्रोत, दंदशूक, अवटारोध, पर्यावर्तनक और सूचीमुख — ये अट्ठाईस नरक बताये गये हैं । हे ब्रह्मापुत्र ! इन नामोंवाले ये नरक यातना भोगनेके परम स्थान हैं; जहाँ प्राणी अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जाते हैं ॥ २२–२८ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘नरक के स्वरूप का वर्णन’ नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥

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