श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-05
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चमोऽध्यायः
पाँचवाँ अध्याय
याज्ञवल्क्य द्वारा भगवती सरस्वती की स्तुति
याज्ञवल्क्यकृतं सरस्वतीस्तोत्रवर्णनम्

श्रीनारायण बोले —  हे मुने ! अब आप वाग्देवी सरस्वती का वह स्तोत्र सुनिये, जो सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला है और जिसके द्वारा महामुनि याज्ञवल्क्य ने प्राचीन काल में उन सरस्वती – देवी की स्तुति की थी ॥ १ ॥ गुरुदेव शाप से वे मुनि अपनी विद्या से च्युत हो गये थे। 1  तब दुःखार्त होकर वे पुण्यप्रद सूर्यतीर्थ लोलार्क-क्षेत्र में चले गये। वहाँ पहुँचकर अपनी तपस्या से भगवान् सूर्य के दर्शन प्राप्त करके उन्होंने सूर्य की स्तुति की तथा शोक से सन्तप्त होकर बार-बार रुदन किया ॥ २-३ ॥ उस समय भगवान् सूर्य ने उन याज्ञवल्क्य को वेद तथा वेदांग पढ़ाया और उनसे कहा कि आप स्मरणशक्ति प्राप्त करने के लिये भक्तिपूर्वक सरस्वतीदेवी की स्तुति कीजिये ॥ ४ ॥ उनसे ऐसा कहकर दीनों के नाथ भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये और याज्ञवल्क्य मुनि स्नान करके सिर झुकाकर भक्तिपूर्वक देवी सरस्वती की स्तुति करने लगे ॥ ५ ॥

याज्ञवल्क्य बोले — हे जगज्जननि! गुरु के शाप से इस प्रकार मुझ विनष्ट स्मृति वाले, निस्तेज, विद्याविहीन तथा दुःखित पर कृपा कीजिये ॥ ६ ॥ आप मुझे ज्ञान, स्मरणशक्ति, विद्या, शिष्यों को प्रबोध कराने वाली शक्ति, ग्रन्थनिर्माण का सामर्थ्य, सुप्रतिष्ठित शिष्य तथा सज्जनों की सभा में अभिव्यक्ति हेतु प्रतिभा एवं उत्तम विचार क्षमता प्रदान कीजिये । दैवयोग से मेरी लुप्त हुई इन समस्त शक्तियों को आप पुनः उसी प्रकार नवीनरूप में कर दीजिये, जैसे देवता भस्म में छिपे बीज को पुनः अंकुरित कर देते हैं ॥ ७-८१/२

जो ब्रह्मस्वरूपिणी, परमा, ज्योतिरूपा, शाश्वत तथा सभी विद्याओं की अधिष्ठात्री देवी हैं; उन सरस्वती को बार-बार नमस्कार ॥ ९१/२

विसर्ग, बिन्दु तथा मात्रा – इन तीनों में जो अधिष्ठान-रूप से विद्यमान हैं तथा जो उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उन नित्या देवी को बार-बार नमस्कार है । वे भगवती सरस्वती व्याख्यास्वरूपिणी तथा व्याख्या की अधिष्ठातृ भी हैं ॥ १०-११ ॥ जिनके बिना सुप्रसिद्ध गणक भी गणनाकार्य नहीं कर सकते तथा जो साक्षात् कालसंख्यास्वरूपिणी हैं; उन देवी को बार – बार नमस्कार है ॥ १२ ॥ जो भ्रमसिद्धान्तस्वरूपा हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है । जो स्मरणशक्ति, ज्ञानशक्ति, बुद्धिशक्ति, प्रतिभाशक्ति तथा कल्पनाशक्तिस्वरूपिणी हैं; उन देवी को बार- बार नमस्कार है ॥ १३१/२

एक बार जब सनत्कुमार ने ब्रह्माजी से ब्रह्मज्ञान के विषय में पूछा था, उस समय ब्रह्मसिद्धान्त की व्याख्या करने में वे ब्रह्मा मूक की भाँति अक्षम हो गये थे। उसी समय स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण वहाँ आ गये और उन्होंने कहा — हे प्रजापते ! आप भगवती सरस्वती को अपनी इष्ट देवी बनाकर उनकी स्तुति कीजिये ॥ १४-१५१/२

परमात्मा श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर ब्रह्माजी ने उन सरस्वती की स्तुति की। उसके बाद वे सरस्वती की कृपा से उत्तम सिद्धान्त का विवेचन करने में सफल हो गये ॥ १६१/२

इसी तरह जब पृथ्वी ने शेषनाग से ज्ञान का एक रहस्य पूछा था, तब वे शेष भी मूक  जैसे बन गये और सिद्धान्त का विवेचन करने में असमर्थ रहे । तब अत्यन्त व्यथित हृदय शेष ने कश्यप की आज्ञा के अनुसार उन सरस्वती की स्तुति की। तदनन्तर वे भ्रम का नाश करने वाले उस पवित्र सिद्धान्त का विवेचन कर सके ॥ १७-१८१/२

ऐसे ही जब व्यास ने वाल्मीकि से पुराणसूत्र पूछा, तब वे मौन हो गये और तब उन्होंने उन्हीं जगदम्बा सरस्वती का स्मरण किया। तत्पश्चात् उनके वर से भ्रमरूपी अन्धकार को मिटाने वाला ज्योतिसदृश निर्मल ज्ञान प्राप्त करके मुनीश्वर वाल्मीकि पुराण- सिद्धान्त का प्रतिपादन करने में समर्थ हो सके ॥ १९-२०१/२

भगवान् कृष्ण के अंश से उत्पन्न व्यासजी ने उस पुराणसूत्र को सुनकर उन कल्याणमयी सरस्वती को जाना और पुष्करक्षेत्र में सौ वर्षों तक उनकी उपासना की । [ हे माता ! ] तत्पश्चात् आपसे वर प्राप्त करके वे श्रेष्ठ कवीन्द्र हुए और उसके बाद उन्होंने वेदों का विभाजन तथा पुराणों की रचना की ॥ २१-२२१/२

जब इन्द्र ने भगवान् शंकर से तत्त्वज्ञान के सम्बन्ध में पूछा, तब क्षणभर उन सरस्वती का ध्यान करके ही शिवजी ने उन इन्द्र को ज्ञानोपदेश दिया ॥ २३१/२

[ हे माता !] जब इन्द्र ने शब्दशास्त्र के विषय में बृहस्पति से पूछा था, तब उन्होंने पुष्करक्षेत्र में दिव्य एक हजार वर्षों तक आपकी आराधना की । तदुपरान्त आपसे वर प्राप्त करके वे एक हजार दिव्य वर्षों तक देवपति इन्द्र को शब्दशास्त्र का उपदेश करते रहे। इसी तरह बृहस्पति ने जिन शिष्यों को पढ़ाया तथा अन्य जिन मुनीश्वरों ने उनसे अध्ययन किया, वे सब-के-सब उन भगवती सुरेश्वरी की सम्यक् आराधना करके ही सफल हुए हैं ॥ २४–२६१/२

मुनीश्वरों, मनुगणों, मनुष्यों, दैत्येश्वरों तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं के द्वारा भी सम्यक् रूप से आपकी स्तुति तथा पूजा की गयी है। हजार मुखवाले शेषनाग, पाँच मुख वाले शिव तथा चार मुख वाले ब्रह्मा भी जिनकी स्तुति करने में जड़वत् हो जाते हैं, तब मैं साधारण-सा मनुष्य एक मुख से उन आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ? ॥ २७-२८१/२

[हे नारद!] इस प्रकार स्तुति करके याज्ञवल्क्यमुनि भगवती सरस्वती को प्रणाम करने लगे। उस समय भक्तिभाव से उनका कन्धा झुक गया था, वे आहाररहित थे तथा बार-बार रो रहे थे ॥ २९१/२

इसी बीच ज्योतिस्वरूपिणी महामाया सरस्वती ने उन्हें दर्शन दिया और वे मुनि से बोलीं — ‘तुम महान् कवीन्द्र हो जाओ’ – ऐसा कहकर वे वैकुण्ठ चली गयीं ॥ ३०१/२

[ हे नारद!] जो मनुष्य याज्ञवल्क्य के द्वारा रचित इस सरस्वतीस्तोत्र का पाठ करता है, वह कवीन्द्र तथा बृहस्पति के समान महान् वक्ता हो जाता है। यदि कोई महान् मूर्ख तथा दुर्बुद्धि भी इस स्तोत्र का एक वर्ष तक नियमपूर्वक पाठ करे, तो वह निश्चय ही पण्डित, मेधावी तथा श्रेष्ठ कवि हो जाता है ॥ ३१–३३ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘याज्ञवल्क्यकृत सरस्वतीस्तोत्रवर्णन ‘ नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

1. महर्षि याज्ञवल्क्य वैशम्पायनजी के शिष्य थे । उनसे ही इन्होंने सम्पूर्ण वेदज्ञान प्राप्त किया था। एक बार गुरु से विवाद हो जाने के कारण गुरुजी ने इन्हें शाप दे दिया कि तुम मेरे द्वारा पढ़ी हुई यजुर्वेद की शाखा को उगल दो । गुरु की आज्ञा से याज्ञवल्क्यजी ने अन्नरूप में वे ऋचाएँ उगल दीं, जिन्हें वैशम्पायनजी के अन्य शिष्यों ने तित्तिर बनकर ग्रहण कर लिया, यजुर्वेद की वही शाखा तैत्तिरीय शाखा कहलायी । वेदज्ञान से शून्य याज्ञवल्क्यजी ने सूर्य की उपासनाकर पुनः नवीन वेदमन्त्र को प्राप्त किया; जो यजुर्वेद की वाजसनेय या माध्यन्दिन शाखा कहलायी । ( श्रीमद्भा० स्क० १२ अ० ६ )

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