May 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-12 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-द्वादशोऽध्यायः बारहवाँ अध्याय गंगा के ध्यान एवं स्तवन का वर्णन, गोलोक में श्रीराधा-कृष्ण के अंश से गंगा के प्रादुर्भाव की कथा गङ्गोपाख्यानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] कण्वशाखा में कहा गया यह देवी-ध्यान सभी पापों का नाश करने वाला है। श्वेतपङ्कजवर्णाभां गङ्गां पापप्रणाशिनीम् ॥ १ ॥ कृष्णविग्रहसम्भूतां कृष्णतुल्यां परां सतीम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ॥ २ ॥ शरत्पूर्णेन्दुशतकमृष्टशोभाकरां पराम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ॥ ३ ॥ नारायणप्रियां शान्तां तत्सौभाग्यसमन्विताम् । बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् ॥ ४ ॥ सिन्दूरबिन्दुललितं सार्धं चन्दनबिन्दुभिः । कस्तूरीपत्रकं गण्डे नानाचित्रसमन्वितम् ॥ ५ ॥ पक्वबिम्बविनिन्द्याच्छचार्वोष्ठपुटमुत्तमम् । मुक्तापंक्तिप्रभामुष्टदन्तपंक्तिमनोरमम् ॥ ६ ॥ सुचारुवक्त्रनयनं सकटाक्षं मनोहरम् । कठिनं श्रीफलाकारं स्तनयुग्मं च बिभ्रतीम् ॥ ७ ॥ बृहच्छ्रोणि सुकठिनां रम्भास्तम्भविनिन्दिताम् । स्थलपद्मप्रभामुष्टपादपद्मयुगं वरम् ॥ ८ ॥ रत्नपादुकसंयुक्तं कुङ्कुमाक्तं सयावकम् । देवेन्द्रमौलिमन्दारमकरन्दकणारुणम् ॥ ९ ॥ सुरसिद्धमुनीन्द्रैश्च दत्तार्घसंयुतं सदा । तपस्विमौलिनिकरभ्रमरश्रेणिसंयुतम् ॥ १० ॥ मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामिनां सर्वभोगदम् । वरां वरेण्यां वरदां भक्तानुग्रहकारिणीम् ॥ ११ ॥ श्रीविष्णोः पददात्रीं च भजे विष्णुपदीं सतीम् । गंगा का वर्ण श्वेतकमल के समान स्वच्छ है, ये समस्त पापों का नाश करने वाली हैं, भगवान् श्रीकृष्ण के विग्रह से आविर्भूत हैं, परम साध्वी गंगा उन्हीं श्रीकृष्ण के समान हैं, इन्होंने अग्नि के समान पवित्र वस्त्र धारण कर रखा है, ये रत्नमय भूषणों से विभूषित हैं, ये श्रेष्ठ गंगा शरत्कालीन पूर्णिमा के सैकड़ों चन्द्रों की शोभा को तिरस्कृत करने वाली हैं। मन्द मुसकानयुक्त प्रसन्नता से इनका मुखमण्डल शोभा पा रहा है, इनका तारुण्य सदा स्थिर रहने वाला है, ये भगवान् नारायण की प्रिया हैं, शान्त स्वभाव वाली हैं और उनके सौभाग्य से समन्वित हैं, ये मालती के पुष्पों की माला से विभूषित चोटी धारण की हुई हैं, इनका ललाट चन्दन की बिन्दियों के साथ सिन्दूर की बिन्दियों से सुशोभित है । इनके गण्डस्थल पर कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थों से नाना प्रकार की चित्रकारियाँ की हुई हैं, इनके परम मनोहर दोनों होठ पके हुए बिम्बाफल की लालिमा को तिरस्कृत कर रहे हैं, इनकी मनोहर दन्तपंक्ति मोतियों की पंक्ति-प्रभा को भी तिरस्कृत कर रही है, इनके सुन्दर मुखपर कटाक्षपूर्ण चितवन से युक्त मनोहर नेत्र शोभा पा रहे हैं, इन्होंने कठोर तथा श्रीफल के आकारवाले स्तनयुगल धारण कर रखे हैं, ये केले के खम्भों को भी लज्जित कर देने वाले विशाल तथा कठोर जघनप्रदेश से सम्पन्न हैं, इनके मनोहर दोनों चरणारविन्द स्थलपद्म की प्रभा को भी तिरस्कृत कर रहे हैं, रत्नमयी पादुकाओं से युक्त इन चरणों में कुमकुम तथा महावर शोभित हो रहे हैं, देवराज इन्द्र के मुकुट में लगे हुए मन्दार पुष्पों के रजकण से ये चरण लाल हो गये हैं, देवता- सिद्ध- मुनीश्वरगणों के द्वारा प्रदत्त अर्ध से इनके चरण सदा सिक्त रहते हैं, ये चरणकमल तपस्वियों के जटा- समूहरूपी भ्रमरश्रेणियों से सुशोभित हैं, ये चरण मुक्ति की इच्छा रखने वालों को मोक्ष तथा सकाम पुरुषों को सभी प्रकार के भोग प्रदान करने वाले हैं श्रेष्ठ, वरेण्य, वर देने वाली, भक्तों पर कृपा करने वाली, मनुष्यों को भगवान् विष्णु का पद प्रदान करने वाली विष्णुपदी नाम से विख्यात तथा साध्वी भगवती गंगा की मैं उपासना करता हूँ ॥ १-१११/२ ॥ हे ब्रह्मन् ! इसी ध्यान के द्वारा तीन मार्गों से विचरण करने वाली पवित्र गंगा का ध्यान करके सोलह प्रकार के पूजनोपचारों से इनकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, आभूषण, माला, चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या — ये अर्पण योग्य सोलह उपचार हैं। इन्हें भक्तिपूर्वक गंगा को अर्पण करके दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करके उन्हें प्रणाम करे । इस विधि से गंगा की विधिवत् पूजा करके वह मनुष्य अश्व- मेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ १२-१५१/२ ॥ नारदजी बोले — हे देवेश ! हे लक्ष्मीकान्त ! हे जगत्पते ! अब मैं भगवान् विष्णु की चिरसंगिनी विष्णुपदी गंगा के पापनाशक तथा पुण्यदायक स्तोत्र का श्रवण करना चाहता हूँ ॥ १६१/२ ॥ ॥ श्रीनारायण उवाच ॥ शृणु नारद वक्ष्यामि पापघ्नं पुण्यकारकम् ॥ १७ ॥ शिवसङ्गीतसंमुग्धश्रीकृष्णाङ्गसमुद्भवाम् । राधाङ्गद्रवसंयुक्तां तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ १८ ॥ यज्जन्म सृष्टेरादौ च गोलोके रासमण्डले । सन्निधाने शङ्करस्य तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ १९ ॥ गोपैर्गोपीभिराकीर्णे शुभे राधामहोत्सवे । कार्तिकीपूर्णिमायां च तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २० ॥ कोटियोजनविस्तीर्णा दैर्घ्ये लक्षगुणा ततः । समावृता या गोलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २१ ॥ षष्टिलक्षयोजना या ततो दैर्घ्ये चतुर्गुणा । समावृता या वैकुण्ठे तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २२ ॥ त्रिंशल्लक्षयोजना या दैर्घ्ये पञ्चगुणा ततः । आवृता ब्रह्मलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २३ ॥ त्रिंशल्लक्षयोजना या दैर्घ्ये चतुर्गुणा ततः । आवृता शिवलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २४ ॥ लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्ये सप्तगुणा ततः । आवृता धुवलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २५ ॥ लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्ये पञ्चगुणा ततः । आवृता चन्द्रलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम्॥ २६ ॥ षष्टिसहस्रयोजना या दैर्घ्ये दशगुणा ततः । आवृता सूर्यलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २७ ॥ लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्ये पञ्चगुणा ततः । आवृता या तपोलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २८ ॥ सहस्रयोजनायामा दैर्घ्ये दशगुणा ततः । आवृता जनलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ २९ ॥ दशलक्षयोजना या दैर्घ्ये पञ्चगुणा ततः । आवृता या महर्लोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३० ॥ सहस्रयोजनायामा दैर्घ्ये शतगुणा ततः । आवृता या च कैलासे तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३१ ॥ शतयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्ये दशगुणा ततः । मन्दाकिनी येन्द्रलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३२ ॥ पाताले भोगवती च विस्तीर्णा दशयोजना । ततो दशगुणा दैर्घ्ये तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३३ ॥ क्रोशैकमात्रविस्तीर्णा ततः क्षीणा च कुत्रचित् । क्षितौ चालकनन्दा या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३४ ॥ सत्ये या क्षीरवर्णा च त्रेतायामिन्दुसन्निभा । द्वापरे चन्दनाभा या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३५ ॥ जलप्रभा कलौ या च नान्यत्र पृथिवीतले । स्वर्गे च नित्यं क्षीराभा तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ ३६ ॥ यत्तोयकणिकास्पर्शे पापिनां ज्ञानसम्भवः । ब्रह्महत्यादिकं पापं कोटिजन्मार्जितं दहेत् ॥ ३७ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! सुनिये, अब मैं उस पापनाशक तथा पुण्यप्रद स्तोत्र को कहूँगा । जो भगवान् शिव के संगीत से मुग्ध श्रीकृष्ण के आविर्भूत तथा राधा के अंगद्रव से सम्पन्न हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १७-१८ ॥ सृष्टि के आरम्भ में गोलोक के रासमण्डल में जिनका आविर्भाव हुआ है और जो सदा शंकर के सान्निध्य में रहती हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १९ ॥ जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन गोप तथा गोपियों से भरे राधा-महोत्सव के शुभ अवसर पर सदा विद्यमान रहती हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २० ॥ जो गोलोक में करोड़ योजन चौड़ाई तथा उससे भी लाख गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २१ ॥ जो साठ लाख योजन चौड़ाई तथा उससे भी चार गुनी लम्बाई से वैकुण्ठलोक में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २२ ॥ जो ब्रह्मलोक में तीन लाख योजन चौड़ाई तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २३ ॥ जो तीन लाख योजन चौड़ी और उससे भी चार गुनी लम्बी होकर शिवलोक में विद्यमान हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २४ ॥ जो ध्रुवलोक में एक लाख योजन चौड़ाई तथा उससे भी सात गुनी लम्बाई से विराजमान हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २५ ॥ जो एक लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बी होकर चन्द्रलोक में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २६ ॥ जो सूर्यलोक में साठ हजार योजन चौड़े तथा उससे भी दस गुने लम्बे प्रस्तार में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ जो तपोलोक में एक लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बी होकर प्रतिष्ठित हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २८ ॥ जो जनलोक में एक हजार योजन चौड़ाई तथा उससे भी दस गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ जो दस लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बी होकर महर्लोक में फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३० ॥ जो चौड़ाई में एक हजार योजन और लम्बाई में उससे भी सौ गुनी होकर कैलास पर फैली हुई हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३१ ॥ जो एक सौ योजन चौड़ी तथा उससे भी दस गुनी लम्बी होकर ‘मन्दाकिनी’ नाम से इन्द्रलोक में प्रतिष्ठित हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ ॥ जो दस योजन चौड़ी तथा लम्बाई में उससे भी दस गुनी होकर पाताललोक में ‘भोगवती’ नाम से विद्यमान हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥ जो एक कोसभर चौड़ी तथा कहीं-कहीं इससे भी कम चौड़ी होकर ‘अलकनन्दा’ नाम से पृथ्वीलोक में प्रतिष्ठित हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३४ ॥ जो सत्ययुग में दुग्धवर्ण, त्रेतायुग में चन्द्रमा की प्रभा और द्वापर में चन्दन की आभावाली रहती हैं; उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ। जो कलियुग में केवल पृथ्वीतल पर जल की प्रभावाली तथा स्वर्गलोक में सर्वदा दुग्ध के समान आभावाली रहती हैं, उन गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके जलकणों का स्पर्श होते ही पापियों के हृदय में उत्पन्न हुआ ज्ञान उनके करोड़ों जन्मों के संचित ब्रह्महत्या आदि पापों को भस्म कर देता है, [उन भगवती गंगा को मैं प्रणाम करता हूँ] ॥ ३५–३७ ॥ हे ब्रह्मन्! इस प्रकार इक्कीस श्लोकों में गंगा की यह स्तुति कही गयी है । यह श्रेष्ठ स्तोत्र पापों का नाश तथा पुण्यों की उत्पत्ति करने वाला है ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य सुरेश्वरी गंगा की भक्तिपूर्वक पूजा करके प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह नित्य ही अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है; इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३९ ॥ इस स्तोत्र के प्रभाव से पुत्रहीन मनुष्य पुत्र प्राप्त कर लेता है, स्त्रीहीन मनुष्य को स्त्री की प्राप्ति हो जाती है, रोगी मनुष्य रोगरहित हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ प्राणी बन्धनमुक्त हो जाता है, कीर्तिरहित मनुष्य सुन्दर यश से सम्पन्न हो जाता है और मूर्ख व्यक्ति विद्वान् हो जाता है; यह सर्वथा सत्य है । जो प्रातः काल उठकर इस पवित्र गंगास्तोत्र का पाठ करता है, दुःस्वप्न में भी उसका मंगल ही होता है और वह गंगा स्नान का फल प्राप्त कर लेता है ॥ ४०-४११/२ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! इस स्तोत्र के द्वारा गंगा की स्तुति करके और फिर उन्हें अपने साथ लेकर वे भगीरथ उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ राजा सगर के पुत्र जलकर भस्म हो गये थे । गंगा का स्पर्श करके बहने वाली वायु के सम्पर्क में आते ही वे सगरपुत्र तत्काल वैकुण्ठ चले गये। वे गंगा भगीरथ के द्वारा लायी गयीं, इसलिये ‘ भागीरथी’ नाम से विख्यात हुईं ॥ ४२-४३१/२ ॥ [ हे नारद!] इस प्रकार मैंने सारभूत और पुण्य तथा मोक्ष प्रदान करने वाले उत्तम गंगोपाख्यान का सम्पूर्ण वर्णन कर दिया ! अब आप आगे और क्या सुनना चाहते हैं ॥ ४४ ॥ नारदजी बोले — हे प्रभो ! तीन मार्गों से संचरण करने वाली तथा समस्त लोकों को पवित्र करने वाली गंगा किसलिये, कहाँ और किस प्रकार से आविर्भूत हुईं? यह सब मुझे बतलाइये । वहाँ पर जो- जो लोग स्थित थे, उन्होंने क्या श्रेष्ठ कार्य किया ? आप इन सभी बातों को विस्तारपूर्वक बताने की कृपा कीजिये ॥ ४५-४६१/२ ॥ श्रीनारायण बोले — एक समय की बात है – कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर राधा – महोत्सव मनाया जा रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण राधा की विधिवत् पूजा करके रासमण्डल में विराजमान थे । तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवता तथा शौनक आदि ऋषिगण श्रीकृष्ण के द्वारा पूजित उन राधा की प्रसन्नचित्त होकर विधिवत् पूजा करके वहीं पर स्थित हो गये ॥ ४७-४८१/२ ॥ इतने में भगवान् श्रीकृष्ण को संगीत सुनाने वाली देवी सरस्वती वीणा लेकर सुन्दर ताल – स्वर के साथ मनोहर गीत गाने लगीं ॥ ४९१/२ ॥ तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उन सरस्वती को सर्वोत्तम रत्नों से निर्मित एक हार समर्पित किया । इसी प्रकार शिवजी ने उन्हें अखिल ब्रह्माण्ड के लिये दुर्लभ एक उत्तम मणि; भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी रत्नों से श्रेष्ठतम कौस्तुभमणि, राधा ने अमूल्य रत्नों से निर्मित एक श्रेष्ठ हार, भगवान् नारायण ने एक मनोहर माला, लक्ष्मीजी ने बहुमूल्य रत्नों से जटित स्वर्ण- कुण्डल; विष्णुमाया, ईश्वरी, दुर्गा, नारायणी और ईशाना नाम से विख्यात भगवती मूलप्रकृति ने अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मभक्ति; धर्म ने धार्मिक बुद्धि तथा लोक में महान् यश का वरदान; अग्निदेवता ने अग्नि के समान पवित्र वस्त्र तथा पवनदेव ने मणिनिर्मित नूपुर भगवती सरस्वती को प्रदान किये ॥ ५०–५४१/२ ॥ इतने में ब्रह्माजी से प्रेरित होकर भगवान् शंकर रास के उल्लास को बढ़ाने की शक्ति से सम्पन्न श्रीकृष्णसम्बन्धी मधुर गीत गाने लगे। उसे सुनकर सभी देवता सम्मोहित हो गये और चित्र-विचित्र पुतले की भाँति प्रतीत होने लगे। बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार चेतना लौटने पर उन्होंने देखा कि रासमण्डल में सम्पूर्ण स्थल जलमय हो गया है और वह राधा तथा श्रीकृष्ण से रहित है ॥ ५५-५७ ॥ तब सभी गोप, गोपियाँ, देवता और द्विज उच्च स्वर से विलाप करने लगे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माजी ने ध्यान के द्वारा श्रीकृष्ण का सारा पवित्र विचार जान लिया कि वे श्रीकृष्ण ही राधा के साथ मिलकर द्रवमय हो गये हैं । तदनन्तर ब्रह्मा आदि सभी देवता परमेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे । पुनः उन्होंने कहा — हे विभो ! हमलोगों का यही अभिलषित वर है कि आप हमें अपने श्रीविग्रह का दर्शन करा दें ॥ ५८-५९१/२ ॥ इसी बीच आकाशवाणी हुई । पूर्णरूप से स्पष्ट तथा मधुरतायुक्त उस वाणी को सभी लोगों ने सुना कि ‘मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण हूँ तथा मेरी शक्तिस्वरूपा यह राधा भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हैं । [ हम दोनों ने ही यह जलमय विग्रह धारण किया है ।] मेरे तथा इन राधा के देह से आप सबको क्या करना है ? हे सुरेश्वरो ! मनु, मानव, मुनि तथा वैष्णव – ये सभी लोग मेरे मन्त्रों से पवित्र होकर मेरा दर्शन करने के लिये मेरे धाम आयेंगे। इसी प्रकार यदि आपलोग भी मेरे वास्तविक श्रीविग्रह का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहते हैं, तो आपलोग ऐसा प्रयत्न कीजिये जिससे शिवजी वहीं पर रहकर मेरी आज्ञा का पालन करें। हे विधातः ! हे ब्रह्मन् ! आप स्वयं जगद्गुरु शिव को आदेश कीजिये कि वे सम्पूर्ण अभीष्ट फल प्रदान करने वाले बहुत-से अपूर्व मन्त्रों, स्तोत्रों, ध्यानों तथा पूजन की विधियों से युक्त वेदांगस्वरूप अत्यन्त मनोहर तथा विशिष्ट शास्त्र की रचना करें। मेरे मन्त्र, कवच और स्तोत्र से सम्पन्न वह शिवरचित शास्त्र यत्नपूर्वक गुप्त रखा जाना चाहिये। मेरे जिन मन्त्रों के गुप्त रखने से पापी लोग मुझसे विमुख रहें, वैसा ही कीजिये । किंतु हजारों सैकड़ों में यदि कोई मेरे मन्त्र का उपासक पुण्यात्मा मिल जाय, तो उसके समक्ष मेरे मन्त्र का प्रकाशन कर देना चाहिये; क्योंकि सर्वथा गोपनीय रखने से शास्त्र – रचना ही व्यर्थ हो जायगी । इस प्रकार मेरे मन्त्र से पवित्र होकर वे लोग मेरे धाम को प्राप्त होंगे, नहीं तो शास्त्र के अभाव में कोई भी मेरे लोक में नहीं जा पायेगा। साथ ही पुण्यात्माओं के लिये प्रकाशित किये गये पूर्वोक्त मन्त्रोपदेश के कारण यदि परम्परानुसार सभी लोग उस मन्त्र के प्रभाव से गोलोकवासी हो जायँगे, तब तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत प्राणियों के अभाव के कारण ब्रह्माजी का यह ब्रह्माण्ड ही निष्फल हो जायगा । अतः हे ब्रह्मन् ! आप सात्त्विक आदि भेद से पाँच प्रकार के लोगों की रचना प्रत्येक सृष्टि के अन्तर्गत कीजिये, यही सर्वथा समीचीन है । ऐसा होने पर कुछ लोग पृथ्वी पर रहेंगे और कुछ लोग स्वर्ग में रहेंगे। हे ब्रह्मन् ! यदि शिवजी तन्त्रशास्त्र की रचनाहेतु देव – सभा में दृढ़ प्रतिज्ञा करेंगे, तो वे शीघ्र ही मेरे विग्रह का साक्षात् दर्शन भी प्राप्त कर लेंगे ‘ ॥ ६०-७० ॥ आकाशवाणी के रूप में इस प्रकार कहकर सनातन श्रीकृष्ण चुप हो गये । उनकी वाणी सुनकर जगत् की व्यवस्था करने वाले ब्रह्माजी ने उन भगवान् शिव से प्रसन्नतापूर्वक वह बात कही ॥ ७११/२ ॥ ब्रह्माजी की बात सुनकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ ज्ञानेश्वर उन भगवान् शिव ने हाथ में गंगाजल लेकर आज्ञा का पालन करना स्वीकार कर लिया ॥ ७२ ॥ उन्होंने कहा कि मैं प्रतिज्ञापालन के लिये विष्णुमाया के मन्त्र- -समूहों से सम्पन्न तथा वेदों के सारभूत उत्तम तन्त्रशास्त्र की रचना करूँगा । यदि कोई मनुष्य हाथ में गंगाजल लेकर झूठी प्रतिज्ञा करता है तो वह ‘कालसूत्र’ नरक में जाता है और ब्रह्मा की आयुपर्यन्त वहाँ पर उसे रहना पड़ता है ॥ ७३-७४१/२ ॥ हे ब्रह्मन्! गोलोक में देवसभा में शंकरजी के ऐसा कहते ही भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधा के साथ वहाँ प्रकट हो गये। तब उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को प्रत्यक्ष देखकर सभी देवता परम प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और परम आनन्द से परिपूर्ण होकर फिर से उत्सव मनाने लगे ॥ ७५-७६१/२ ॥ [हे नारद!] समयानुसार उन भगवान् शिव ने मुक्तिदीपस्वरूप तन्त्रशास्त्र का निर्माण किया। इस प्रकार मैंने आपसे अत्यन्त गोपनीय तथा दुर्लभ प्रसंग का वर्णन कर दिया । गोलोक से आविर्भूत तथा राधा और श्रीकृष्ण के विग्रह से उत्पन्न वे द्रवरूपिणी गंगा भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हैं । परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने स्थान – स्थान पर उन गंगा की स्थापना की है । श्रीकृष्णस्वरूपा ये अतिश्रेष्ठ गंगा समस्त ब्रह्माण्डों में पूजी जाती हैं ॥ ७७–७९ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण-संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘गंगोपाख्यानवर्णन’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥ Content is available only for registered users. 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