May 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-12 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-द्वादशोऽध्यायः बारहवाँ अध्याय भस्म न धारण करने पर दोष भस्मधारणमाहाम्यवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे देवर्षे ! अब रहस्य तथा विधान के साथ भस्म लगाने से प्राप्त होने वाले समस्त फल के विषय में सुनिये। यह भस्मोद्धूलन सभी कामनाओं को सफल करने वाला है । कपिला गाय का स्वच्छ गोमय भूमि पर गिरने के पूर्व ही हाथों से ग्रहण कर ले। वह न गीला हो, न कठोर हो, न दुर्गन्धयुक्त हो और न बासी हो । यदि गोबर पृथ्वी पर गिर पड़ा हो तो ऊपर तथा नीचे का भाग छोड़कर बीच का अंश लेना चाहिये। तत्पश्चात् उसे पिण्ड के आकार का बनाकर मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित करके शिवाग्नि में डाल देना चाहिये ॥ २-३ ॥ जल जाने पर भस्म को निकालकर तथा उसे किसी शुद्ध वस्त्र से छानकर एक सुन्दर, पवित्र, सुदृढ़, स्वच्छ, सम्यक् प्रक्षालित किये गये तथा प्रोक्षित भस्मपात्र में रख ले। मन्त्रवेत्ता को चाहिये कि मूलमन्त्र का उच्चारण करके ही भस्म को पात्र में रखे । भस्म रखने के लिये किसी धातु ( सोना, ताँबा आदि), काष्ठ, मिट्टी, वस्त्र अथवा किसी अन्य सुन्दर तथा शुद्ध पदार्थ का भस्मपात्र बनाना चाहिये । अथवा किसी अति शुद्ध रेशमी वस्त्र से बने पात्र में धन की तरह भस्म को सुरक्षित रखना चाहिये ॥ ४-६ ॥ कहीं प्रस्थान करते समय भस्मपात्र या तो स्वयं लिये रहे अथवा साथ चलने वाला अनुचर (सेवक) इसे लिये रहे । इसे न किसी अयोग्य व्यक्ति के हाथ में दे और न तो किसी अपवित्र स्थान पर ही रखे ॥ ७ ॥ शरीर के नीचे के अंग (पैर आदि ) – से भस्म को न तो स्पर्श करे, न तो उसे फेंके और न तो लाँघे । उस पात्र से भस्म निकालकर अभिमन्त्रित करने के बाद ही उसे धारण करना चाहिये ॥ ८ ॥ विभूति धारण की जो विधि स्मृतिग्रन्थों में बतायी गयी है, मैंने उसी का वर्णन किया है। जिसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य शिवतुल्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ९ ॥ भगवान् शिव की सन्निधि में वैदिक शिवभक्तों द्वारा बनाये गये भस्म को ही परम श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिये और उसे माँगकर उसकी पूजा करनी चाहिये । तन्त्रशास्त्र में कही गयी विधि से तान्त्रिक पूजकों द्वारा निर्मित किया गया भस्म तान्त्रिकों के लिये ग्राह्य है, वैदिकों के लिये नहीं। वैदिकों को चाहिये कि वे शूद्रों, कापालिकों तथा पाखण्डियों द्वारा ग्राह्य तथा जिस किसी को भी दिये जाने वाले भस्म को ग्रहण न करें । सभी को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये और मन से भी भस्म का तिरस्कार नहीं करना चाहिये । श्रुति द्वारा इसका विधान किया गया है, अतः भस्म का त्याग करने वाला पतित हो जाता है । द्विज को भक्तिपूर्वक मन्त्रोच्चारण के साथ त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये तथा शरीर पर भस्म का अनुलेपन करना चाहिये। इसका परित्याग करने वाले का पतन हो जाता है ॥ १०-१३१/२ ॥ जो लोग भक्तिपूर्वक सभी अंगों में भस्म नहीं लगाते तथा त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते, करोड़ों जन्मों में भी इस संसार से उनकी मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १४१/२ ॥ हे मुनिवर ! जिस मनुष्य ने विहित मार्ग से भस्म धारण नहीं किया; हे मुने! आप उसके जन्म को सूअर के जन्म की भाँति निरर्थक समझिये ॥ १५१/२ ॥ जिन मनुष्यों का शरीर बिना त्रिपुण्ड्र के रहता है, उनका शरीर श्मशान के तुल्य होता है, पुण्यात्मा व्यक्तियों को ऐसे शरीर पर दृष्टि तक नहीं डालनी चाहिये ॥ १६१/२ ॥ भस्मरहित मस्तक को धिक्कार है, शिवालयविहीन ग्राम को धिक्कार है, शिव – अर्चन से विमुख व्यक्ति के जन्म को धिक्कार है तथा शिव का आश्रय प्रदान न कराने वाली विद्या को धिक्कार है ॥ १७१/२ ॥ जो लोग त्रिपुण्ड्र की निन्दा करते हैं, वे वस्तुतः शिव की ही निन्दा करते हैं और जो लोग भक्तिपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे मानो साक्षात् शिवजी को ही धारण करते हैं ॥ १८१/२ ॥ जिस तरह अग्निहोत्र किये बिना ब्राह्मण सुशोभित नहीं होता, उसी प्रकार भस्मरहित होकर किया गया शिवार्चन शोभा नहीं देता, चाहे वह सभी पूजनोपचारों के साथ ही क्यों न किया गया हो ॥ १९१/२ ॥ जो लोग श्रद्धापूर्वक अपने सर्वांग भस्म नहीं लगाते तथा त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते, उनके द्वारा पूर्व में किया गया समस्त सत्कर्म भी विपरीत हो जाता है ॥ २०१/२ ॥ वेदमन्त्र के साथ ही भस्म से त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये। वेदोचित आचार के बिना त्रिपुण्ड्र धारण करना स्मार्तों के लिये अनर्थकारी होता है ॥ २११/२ ॥ जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता, उसके द्वारा किया गया कृत्य न किये हुएके समान, सुना गया वेदवचन न सुने हुए के समान तथा अधीत शास्त्र अध्ययन न किये हुए के समान हो जाता है ॥ २२१/२ ॥ जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता उसके यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तपश्चरण, व्रत तथा उपवास – ये सभी व्यर्थ हो जाते हैं ॥ २३१/२ ॥ जो मनुष्य भस्मधारण का त्याग करके मुक्ति की अभिलाषा रखता है, वह मानो विषपान करके अपने को अमर करना चाहता है ॥ २४१/२ ॥ सृष्टिकर्ता ने मस्तक की सृष्टि के बहाने ही त्रिपुण्ड्र धारण करना बतला दिया है; इसीलिये उन्होंने मस्तक को तिरछा तथा ऊँचा बनाया है, गोल नहीं ॥ २५१/२ ॥ सभी देहधारियों के ललाट पर तिरछी रेखाएँ स्पष्ट-रूपसे दिखायी पड़ती हैं, फिर भी मूर्ख मनुष्य त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते ॥ २६१/२ ॥ ब्राह्मण बिना तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण किये जो कुछ भी अनुष्ठान करता है, वह न तो ध्यान है, न तो मोक्ष है, न तो ज्ञान है और न तप ही है ॥ २७१/२ ॥ जिस तरह शूद्र वेद के अध्ययन का अधिकारी नहीं है, उसी प्रकार बिना त्रिपुण्ड्र धारण किये ब्राह्मण शिव की पूजा का अधिकारी नहीं है ॥ २८१/२ ॥ पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूर्ववत् हाथ-पैर धोकर आचमन करके प्राणायाम करने के अनन्तर संकल्प करके भस्म – स्नान करना चाहिये ॥ २९१/२ ॥ अग्निहोत्रजन्य शुद्ध भस्म लेकर ईशान मन्त्र से अपने मस्तक पर भस्म धारण करना चाहिये । इसके बाद उस भस्म को लेकर तत्पुरुष मन्त्र से मुख पर, अघोर मन्त्र से हृदय पर, वामदेव मन्त्र से गुह्यस्थल पर तथा सद्योजात मन्त्र से दोनों पैरों पर भस्म लगाना चाहिये। तत्पश्चात् प्रणव मन्त्र से शरीर के सभी अंगों में भस्म लगाना चाहिये । महर्षियों के द्वारा इसे आग्नेय स्नान कहा गया है। बुद्धिमान् व्यक्ति को अपने सभी कर्मों की समृद्धि के लिये यह आग्नेयस्नान सबसे पहले करना चाहिये ॥ ३०–३३१/२ ॥ तदनन्तर हाथ-पैर धोकर यथाविधि आचमन करके विधिपूर्वक ‘सद्योजात’ आदि पंच ब्रह्ममन्त्रों का उच्चारण करके निर्मित भस्म से ललाट, हृदयदेश तथा गले में तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करे । इस प्रकार धारण किया गया यह त्रिपुण्ड्र सभी कर्मों में पवित्रता प्रदान करने वाला होता है। शूद्रों को अन्त्यजों के हाथ का भस्म कभी नहीं लगाना चाहिये । अग्निहोत्र – जन्य भस्म लगाकर ही कोई शुभ कर्म करना चाहिये; अन्यथा किये गये सभी कर्म कभी भी फलीभूत नहीं होते ॥ ३४-३७ ॥ जो व्यक्ति त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता; उसका सत्य, शौच, जप, होम, तीर्थ तथा देवपूजन आदि — यह सब व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥ जो विप्रश्रेष्ठ शुद्ध मन से त्रिपुण्ड्र धारण करता है तथा रुद्राक्ष पहनता है; वह रोग, पाप, व्याधि, दुर्भिक्ष तथा चोर आदि को विनष्ट कर देता है । वह परब्रह्म का सांनिध्य प्राप्त कर लेता है, जहाँ से पुनः लौटकर नहीं आता । वह श्राद्ध में पंक्तिपावन ब्राह्मण माना जाता है तथा ब्राह्मणों और देवताओं द्वारा भी पूजित होता है ॥ ३९-४० ॥ श्राद्ध, यज्ञ, जप, होम, वैश्वदेव तथा देवताओं के पूजन आदि में जो त्रिपुण्ड्र धारण किये रहता है, वह पवित्र आत्मा वाला मनुष्य मृत्यु को भी जीत लेता है । अब मैं भस्म धारण करने का और भी माहात्म्य आपसे कह रहा हूँ ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘भस्मधारणमाहात्म्यवर्णन’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥ Content is available only for registered users. 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