श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-14
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-चतुर्दशोऽध्यायः
चौदहवाँ अध्याय
भस्म-स्नान का महत्त्व
विभूतिधारणमाहात्म्यवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — जो मनुष्य शरीर में भस्म धारण करने वाले को प्रसन्नतापूर्वक धन देता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १ ॥ सभी श्रुतियाँ, स्मृतियाँ एवं समस्त पुराण भी विभूति के माहात्म्य का वर्णन करते हैं, अतएव द्विज को विभूति धारण करना चाहिये ॥ २ ॥ जो तीनों सन्ध्याओं (प्रातः, मध्याह्न एवं सायं)-के समय श्वेत भस्म से त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥ जो योगी तीनों सन्ध्याओं को करते समय पैरों के तलवे से लेकर मस्तकपर्यन्त सभी अंगों में नित्य भस्म लगाता है (भस्म स्नान करता है), वह शीघ्र ही योगस्थिति प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ भस्मस्नान से मनुष्य अपने कुल का उद्धार करने वाला हो जाता है । भस्मस्नान जलस्नान की अपेक्षा असंख्य गुना फलदायी होता है ॥ ५ ॥ सभी तीर्थों का सेवन करने से जो पुण्य होता है तथा जो फल मिलता है, वह फल केवल भस्मस्नान से ही प्राप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥ मनुष्य चाहे जितने भी महापातकों अथवा उप- पातकों से युक्त हो; केवल भस्मस्नान उसके सभी पापों को उसी प्रकार दग्ध कर देता है, जैसे अग्नि ईंधन को ॥ ७ ॥

‘भस्मस्नान से बढ़कर पवित्र कोई दूसरा स्नान नहीं है ‘ – ऐसा शिवजी ने कहा है और शिवजी ने ही सर्वप्रथम स्वयं भस्मस्नान किया था ॥ ८ ॥ उसी समय से कल्याण की इच्छा वाले ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण सभी कर्मों में तत्परतापूर्वक भस्मस्नान करने लगे ॥ ९ ॥ अतएव जो मनुष्य यह आग्नेय नामक शिरः स्नान करता है, वह इसी शरीर से साक्षात् रुद्रस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥ जो लोग धारण किये हुए व्यक्ति को देखकर आनन्दित होते हैं; वे देवताओं, दैत्यों तथा महर्षियों से नित्य पूजित होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११ ॥ अपने शरीर के सभी अंगों में भस्म धारण किये हुए व्यक्ति को देखकर जो मनुष्य [ श्रद्धा के साथ] उठ जाता है, उसे देखकर देवराज इन्द्र भी दण्डवत् प्रणाम करते हैं ॥ १२ ॥ हे मुने! जो लोग भस्म धारण करके अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करते हैं, उनके लिये वह भी भक्ष्य हो जाता है; इस विषय में सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ जो जल में स्नान करने के अनन्तर श्रद्धापूर्वक नित्य भस्मस्नान करता है, वह ब्रह्मचारी हो अथवा गृहस्थ हो अथवा वानप्रस्थी हो, सभी पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है । यतियों के लिये भस्म के द्वारा अग्निस्नान को विशिष्ट कहा गया है ॥ १४-१५ ॥

जलस्नान की अपेक्षा भस्मस्नान श्रेष्ठ होता है; इसी से आर्द्र (प्रकृति-बन्धन) – का नष्ट होना सम्भव है। आर्द्र को ‘प्रकृति’ समझना चाहिये और इस प्रकृति को ही ‘बन्धन’ कहा गया है। अतएव इस प्रकृतिरूप बन्धन को काटने के लिये भस्म से स्नान करना चाहिये । हे ब्रह्मन् ! तीनों लोकों में भस्म के समान कुछ भी नहीं है ॥ १६-१७ ॥ पूर्व काल में देवताओं ने अपनी रक्षा के लिये; अपने कल्याण के लिये और पवित्रता के लिये भस्म को स्वीकार किया था । हे मुने! सबसे पहले शिवजी ने भस्म प्राप्त करके इसे देवी पार्वती को दिया था ॥ १८ ॥ अतएव जो मनुष्य इस आग्नेय शिरः स्नान को करता है, वह सांसारिक बन्धनों से विमुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ १९ ॥ ज्वर, राक्षस, पिशाच, पूतनारोग, कुष्ठ, गुल्मरोग, सभी प्रकार का भगंदर रोग, अस्सी प्रकार के वातरोग, चौंसठ प्रकार के पित्तरोग, एक सौ पाँच प्रकार के कफरोग, बाघ आदि जन्तुओं का भय, चोरों का भय और अन्य प्रकार के दुष्टग्रह — ये सब भस्मस्नान से उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सिंह के द्वारा हाथी विनष्ट कर दिये जाते हैं ॥ २०-२११/२

जो मनुष्य शुद्ध तथा शीतल जल मिलाकर भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है । (जो कोई भी मनुष्य भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है; इसमें संशय नहीं है ) । ललाटपर विधिपूर्वक इस अग्निवीर्यरूपी भस्मको धारण करनेसे यह मनुष्यके भालपर अंकित यमकी लिपिको भी निश्चितरूपसे मिटा देता है। कण्ठके ऊपरी भागसे किया गया पाप भी उसके धारणसे नष्ट हो जाता है ॥ २२–२४ ॥ कण्ठ द्वारा अभक्ष्य पदार्थों के भोगजनित पाप कण्ठ पर भस्म धारण करने से, बाहु द्वारा किया गया पाप दोनों बाहुओं पर भस्म लगाने से तथा मन द्वारा किये गये पाप वक्षःस्थल पर भस्म धारण करने से नष्ट हो जाते हैं । नाभि पर भस्म लगाने से लिंगजनित पाप तथा गुदा पर भस्म लगाने से गुदेन्द्रिय-जनित पाप मिट जाता है। हे ब्रह्मन् ! दोनों पार्श्व में भस्म धारण करने से परनारी का आलिंगन आदि करने से लगा हुआ पाप विनष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥

सर्वत्र तीन तिर्यक् रेखावाला (त्रिपुण्ड्र ) भस्म प्रशस्त माना गया है। जिसने त्रिपुण्ड्र धारण कर लिया, उसने मानो ब्रह्मा, विष्णु, महेश; तीनों अग्नि (गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि); तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) और तीनों लोकोंको धारण कर लिया ॥ २७१/२

भस्म धारण करने वाला विद्वान् द्विज महापातक- जन्य दोषों से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २८१/२

भस्म धारण करने वाले मनुष्य के दोष भस्म की अग्नि के सम्पर्क से नष्ट हो जाते हैं । भस्म – स्नान से विशुद्ध आत्मा वाला व्यक्ति आत्मनिष्ठ कहा गया है ॥ २९१/२

अपने सर्वांग भस्म लगाने वाला, भस्म से प्रदीप्त त्रिपुण्ड्र धारण करने वाला तथा भस्म पर ही शयन करने वाला पुरुष ‘भस्मनिष्ठ’ कहा गया है ॥ ३० ॥ भूत, प्रेत, पिशाच आदि बाधाएँ तथा अति दुःसह रोग भस्म धारण करने वाले के पास से भाग जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३११/२

इस भस्म को ब्रह्म का भास कराने से ‘ भसित’, पाप का भक्षण करने के कारण ‘भस्म’, मनुष्यों को भूति (ऐश्वर्य तथा सिद्धियाँ आदि) प्रदान करने से ‘भूति’ तथा रक्षा करने के कारण ‘रक्षा’ कहा गया है ॥ ३२१/२

त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए मनुष्य को अपने सम्मुख देखकर भूत-प्रेत आदि भयभीत होकर काँपने लगते हैं और वे शीघ्र ही उसी प्रकार विनष्ट हो जाते हैं, जैसे भगवान् रुद्र के स्मरणमात्र से पाप दग्ध हो जाते हैं ॥ ३३-३४ ॥ हजारों प्रकार के दुष्कृत्यों को करके भी जो मनुष्य भस्म से स्नान करता है, उसके उन सभी कुकर्मों को भस्म उसी प्रकार जला डालता है; जैसे अग्नि अपने तेज से वन को भस्म कर देती है ॥ ३५ ॥ जो द्विज घोर पाप करके भी यदि मृत्यु के समय भस्मस्नान कर लेता है, वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ भस्मस्नान करके शुद्ध आत्मावाला, क्रोध को जीत लेने वाला तथा इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लेने वाला मनुष्य मेरे सांनिध्य में आकर पुनः जन्म-मरण के बन्धन में नहीं पड़ता ॥ ३७ ॥ सोमवती अमावास्या के दिन भस्म से अनुलिप्त देहवाला व्यक्ति पूजित हुए भगवान् शिव का दर्शन करके सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३८ ॥ दीर्घ आयु की इच्छा रखने वाले, विपुल ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले अथवा मोक्ष की कामना
करने वाले विद्वान् द्विज को भस्म और ब्रह्मा, विष्णु, शिव के स्वरूप वाले परम पवित्र त्रिपुण्ड्र को नित्य धारण करना चाहिये ॥ ३९१/२

भयंकर राक्षस, प्रेत तथा जो भी अन्य क्षुद्र जन्तु हैं, वे सभी त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए मनुष्य को देखकर भाग जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४०१/२

शौच आदि कार्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ जल में स्नान करने के पश्चात् मस्तक से लेकर पैर के तलवे तक भस्म धारण करना चाहिये ॥ ४११/२

जल का स्नान केवल बाह्य मल को धोने वाला है, किंतु पवित्र भस्मस्नान बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार के मलों को नष्ट करने वाला है । अतः जलस्नान का परित्याग करके भी भस्मस्नान के लिये तत्पर होना चाहिये; इसमें संशय नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ हे मुने! भस्मस्नान के बिना किया गया कृत्य न किये हुएके बराबर हो जाता है, यह सत्य है । यह वेदोक्त भस्मस्नान ही ‘ आग्नेयस्नान’ कहा जाता है ॥ ४४ ॥ भीतर तथा बाहर से शुद्ध होने पर ही मनुष्य शिवपूजा का फल प्राप्त कर सकता है। जो जलस्नान है वह तो केवल बाह्य मल का नाश करता है, किंतु वह भस्मस्नान प्राणी बाहरी तथा भीतरी दोनों प्रकार के मलों को बड़ी तीव्रतापूर्वक विनष्ट कर देता है ॥ ४५१/२

हे मुने! नित्य करोड़ों बार श्रद्धापूर्वक जलस्नान करके भी कोई मनुष्य बिना भस्मस्नान किये पवित्र आत्मावाला नहीं हो सकता ॥ ४६१/२

भस्मस्नान का जो माहात्म्य है, उसे तात्त्विकरूप से या तो वेद जानते हैं और या समस्त देवताओं के शिखामणिस्वरूप भगवान् महादेव जानते हैं ॥ ४७१/२

जो मनुष्य भस्मस्नान किये बिना ही वैदिक कर्म करता है, वह वस्तुतः उस कर्म की चौथाई कला के बराबर भी फल नहीं प्राप्त करता ॥ ४८१/२

मनुष्य प्रयत्नपूर्वक विधि-विधान से भस्मस्नान करता है, एकमात्र वही समस्त कर्मों का अधिकारी है; वेदों में ऐसा प्रतिपादित किया गया है ॥ ४९१/२

यह वेदप्रतिपादित भस्मस्नान पवित्रों को भी पवित्र करने वाला है । जो अज्ञानवश भस्मस्नान नहीं करता, वह महापातकी होता है ॥ ५०१/२

द्विजगण असंख्य बार जलस्नान करके जो पुण्य प्राप्त करते हैं, उसका अनन्तगुना पुण्य केवल भस्मस्नान से ही उन्हें मिल जाता है ॥ ५११/२

तीनों कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं ) – में प्रयत्न-पूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये । भस्मस्नान श्रौतकर्म कहा गया है, अतः इसका परित्याग करने वाला पतित हो जाता है ॥ ५२ ॥ मल-मूत्र आदि का त्याग करने के पश्चात् प्रयत्न के साथ भस्मस्नान करना चाहिये, अन्यथा इसे न करने वाले मनुष्य पवित्र नहीं होंगे ॥ ५३१/२

विधिपूर्वक शौच आदि कृत्य करने के बाद भी बिना भस्मस्नान के कोई द्विज पवित्र अन्तःकरणवाला नहीं हो सकता और वह किसी कृत्य को सम्पादित करने का अधिकारी भी नहीं हो सकता है ॥ ५४१/२

अपान वायु निकलने पर, जम्हाई आने पर दस्त हो जाने पर तथा श्लेष्मा (कफ) निकलने पर प्रयत्नपूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये ॥ ५५१/२

मुनिश्रेष्ठ ! यह मैंने श्रीभस्मस्नान के मात्र एक अंश का वर्णन आपसे किया है। अब मैं भस्मस्नान से प्राप्त होने वाले फल के विषय में पुनः बताऊँगा, सावधान मन से सुनिये ॥ ५६-५७ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘विभूतिधारणमाहात्म्यवर्णन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥

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