April 8, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-तृतीयः स्कन्धः-अध्याय-10 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पूर्वार्द्ध-तृतीयः स्कन्धः-दशमोऽध्यायः दसवाँ अध्याय देवी के बीजमन्त्र की महिमा के प्रसंग में सत्यव्रत का आख्यान सत्यव्रताख्यानवर्णनम् जनमेजय बोले — वह द्विजश्रेष्ठ सत्यत्रत नामक ब्राह्मण कौन था, वह किस देश में पैदा हुआ था तथा कैसा था? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ उस ब्राह्मण ने ‘ऐ’ शब्द कैसे सुना और फिर स्वयं भी कैसे उसका उच्चारण किया? उच्चारण करते ही उसी क्षण उस ब्राह्मण को कैसी सिद्धि प्राप्त हुई ? सर्वत्र विराजमान रहने वाली तथा सब कुछ जानने वाली वे भवानी उस पर किस प्रकार प्रसन्न हो गयीं ? अब आप यह मनोरम कथा विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये ॥ २-३ ॥ सूतजी बोले — राजा जनमेजय के यह पूछने पर सत्यवतीसुत व्यासजी सरस, पवित्र एवं परम उदार वचन कहने लगे ॥ ४ ॥ व्यासजी बोले — हे राजन् ! सुनिये, मैं वह पवित्र पौराणिक कथा कह रहा हूँ। हे कुरुनन्दन ! पूर्वकाल में मुनियों के समाज में मैंने यह कथा सुनी थी ॥ ५ ॥ हे कुरुश्रेष्ठ।। एक बार तीर्थाटन करता हुआ मैं मुनियों द्वारा सेवित पवित्र क्षेत्र नैमिषारण्य में जा पहुँचा। वहाँ सभी मुनियों को प्रणाम करके मैं एक उत्तम आश्रम में ठहर गया, जहाँ ब्रह्मा के पुत्र महाव्रती एवं जीवन्मुक्त मुनि निवास कर रहे थे ॥ ६-७ ॥ उस ब्राह्मण समाज में कथा का ही प्रसंग चल रहा था। सभा में उपस्थित महर्षि जमदग्नि ने सब मुनियों से यह पूछा —॥ ८ ॥ जमदग्नि बोले — हे महाभाग तपस्थवियो! मेरे मन में एक शंका है। निश्चय ही इस मुनि समाज में मैं शंकारहित हो जाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इच्ध, वरुण, अग्नि, कुबेर, वायु, विश्वकर्मा, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, भग, पूषा, चन्द्रमा और सभी ग्रह — इन सबमें सबसे अधिक आराधनीय तथा अभीष्ट फल प्रदान करने वाला कौन है ? उनमें कौन देवता सदा सेव्य और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है ? हे मानद! हे सर्वज्ञ! हे व्रतधारी मुनिगण! आप हमें शीघ्र बतायें ॥ ९-१२ ॥ इस प्रकार जमदग्नि के प्रश्न करने पर लोमश-ऋषि ने कहा — हे जमदग्ने! आपने इस समय जो पूछा है, उसे सुनिये। अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले सभी लोगों के लिये वे एकमात्र महाशक्ति ही आराधनीय हैं। वे ही परा-प्रकृति आदिस्वरूपा, सर्वगामिनी, सर्वदायिनी और कल्याणकारिणी हैं। वे ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं की जननी हैं और वे ही संसाररूपी वृक्ष की मूलरूपिणी आदिप्रकृति हैं ॥ १३-१५ ॥ वे भगवती केवल नाम का उच्चारण तथा स्मरण करते ही निश्चितरूप से अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। जो लोग उनकी उपासना करते हैं, उन्हें वरदान देने के लिये वे सर्वदा दयालुचित्त रहती हैं ॥ १६ ॥ हे मुनिगण! उनके नामाक्षर के उच्चारण- मात्र से ही एक ब्राह्मण ने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की थी, वह पवित्र वृत्तान्त मैं आप लोगों से कहता हूँ, सुनिये — ॥ १७ ॥ कोसलदेश में देवदत्त नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था। वह निःसन्तान था, इसलिये उसने पुत्रप्राप्ति के लिये विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ १८ ॥ तमसा नदी के तट पर पहुँचकर उसने उत्तम यज्ञ- मण्डप बनवाया और वेदज्ञ तथा यज्ञकर्म में निपुण ब्राह्मणों को आमन्त्रित करके विधिपूर्वक यज्ञवेदी बनवाकर तथा अग्नि-स्थापन करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ कर दिया ॥ १९-२० ॥ उसने उस यज्ञ में मुनिवर सुहोत्र को “ब्रह्मा’, याज्ञवल्क्य को ‘अध्वर्यु’ तथा बृहस्पति को “होता’, पैलमुनि को “प्रस्तोता’ तथा गोभिल को “उद्गाता’ बनाया एवं अन्यान्य उपस्थित मुनियों को यज्ञ का सभासद् बनाकर उन्हें विधिवत् प्रचुर धन प्रदान किया ॥ २१-२२ ॥ सामवेद का गान करने वाले श्रेष्ठ उद्गाता गोभिल मुनि सातों स्वरों से युक्त तथा स्वस्ति से समन्वित रथन्तर साम का गान करने लगे ॥ २३ ॥ बार-बार श्वास लेने के कारण गोभिल का स्वर भंग हो गया । तब देवदत्त को क्रोध आ गया और उसने तुरंत गोभिल मुनि से कहा — हे मुनिमुख्य ! तुम मूर्ख हो, तुमने आज मेरे द्वारा पुत्रप्राप्ति के लिये किये जाते हुए इस काम्यकर्म में स्वर भंग कर दिया ॥ २४-२५ ॥ तब गोभिलमुनि अत्यन्त क्रोधित होकर देवदत्त से कहने लगे — [इस यज्ञ के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला] तुम्हारा पुत्र मूर्ख, शठ और गूँगा होगा। हे महामते! सभी प्राणियों के शरीर में श्वास आता-जाता रहता है। इसे रोक पाना बड़ा कठिन है। अतः ऐसी स्थिति में स्वरभंग हो जाने में मेरा कुछ भी दोष नहीं है ॥ २६-२७ ॥ महात्मा गोभिल का यह वचन सुनकर शाप से भयभीत देवदत्त ने अत्यन्त दुःखी होकर उनसे कहा — हे विप्रवर । आप मुझ निर्दोष पर व्यर्थ ही क्यों क्रुद्ध हैं? मुनि लोग तो सदा क्रोधरहित और सुखदायक होते हैं ॥ २८-२९ ॥ हे विप्र! थोड़े से अपराध पर आपने मुझे शाप क्यों दे दिया ? पुत्रहीन होने के कारण मैं तो पहले से ही बहुत दुःखी था, उसपर भी शाप देकर आपने मुझे और भी दुःखी कर दिया। वेद के विद्वानों ने कहा है कि मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पुत्रहीन रहना अच्छा है। उसपर भी मूर्ख ब्राह्मण तो सबके लिये निन्दनीय होता है। वह पशु एवं शूद्र के समान सभी कार्यों में अयोग्य माना जाता है। अतः हे विप्रवर ! मूर्ख पुत्र को लेकर मैं क्या करूँगा ?॥ ३०-३२ ॥ मूर्ख ब्राह्मण शूद्रतुल्य होता है; इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि वह न तो पूजा के योग्य होता है और न दान लेने का पात्र ही होता है। वह सब कार्यों में निन्द्य होता है ॥ ३३ ॥ किसी देश में रहता हुआ वेदशास्त्रविहीन ब्राह्मण कर देने वाले शूद्र की भाँति एक राजा के द्वारा समझा जाना चाहिये ॥ ३४ ॥ फल की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि देव तथा पितृकार्यों के अवसर पर उस मूर्ख ब्राह्मण को आसन पर न बेठाये ॥ ३५ ॥ राजा भी वेदविहीन ब्राह्मण को शूद्र के समान समझे और उसे शुभ कार्यों में नियुक्त न करे, बल्कि उसे कृषि के काम में लगा दे ॥ ३६ ॥ ब्राह्मण के अभाव में कुश के चट से स्वयं श्राद्धकार्य कर लेना ठीक है, किंतु मूर्ख ब्राह्मण से कभी भी श्राद्धकार्य नहीं कराना चाहिये ॥ ३७ ॥ मूर्ख ब्राह्मण को भोजन से अधिक अन्न नहीं देना चाहिये; क्योंकि देनेवाला व्यक्ति नरक में जाता है और लेनेवाला तो विशेषरूप से नरकगामी होता है ॥ ३८ ॥ उस राजा के राज्य को धिक्कार है, जिसके राज्य में मूर्ख लोग निवास करते हैं और मूर्ख ब्राह्मण भी दान, सम्मान आदि से पूजित होते हैं, साथ ही जहाँ मूर्ख और पण्डित के बीच आसन, पूजन और दान में रंचमात्र भी भेद नहीं माना जाता। अतः विज्ञ पुरुष को चाहिये कि वह मूर्ख और पण्डित की जानकारी अवश्य कर ले ॥ ३९-४० ॥ जहाँ दान, मान तथा परिग्रह से मूर्ख लोग महान् गौरवशाली माने जाते हैं, उस देश में पण्डितजन को किसी प्रकार भी नहीं रहना चाहिये । दुर्जन व्यक्तियों की सम्पत्तियाँ दुर्जनों के उपकार के लिये ही होती हैं। जैसे अधिक फलों से लदे हुए नीम के वृक्ष का उपभोग केवल कौए ही करते हैं ॥ ४१-४२ ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्ग में विहार करते हैं ॥ ४३ ॥ अतएव हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने यह क्या कह दिया। इस संसार में मूर्ख पुत्र का पिता होना तो मृत्यु से भी बढ़कर कष्टप्रद होता है ॥ ४४ ॥ हे महाभाग! अब आप इस शाप से मेरा उद्धार करने की कृपा कीजिये। आप दीनों का उद्धार करने में समर्थ हैं। मैं आपके पैरों पर पड़ता हूँ ॥ ४५ ॥ लोमश बोले — यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रों में आँसू भरकर स्तुति करता हुआ मुनि के पैरों पर गिर पड़ा ॥ ४६ ॥ तब उस दीनहृदय देवदत्त को देखकर गोभिल- मुनि को दया आ गयी। महात्मालोग क्षणभर के लिये ही कोप करते हैं, किंतु पापियों का कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। वही जल अग्नि तथा धूप के संयोग से गर्म हो जाता है, किंतु पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है। तब दयालु गोभिलमुनि ने अत्यन्त दुःखित देवदत्त से कहा — तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बाद में विद्वान हो जायगा ॥ ४७-४९ ॥ इस प्रकार वर पा लेने पर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये। उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ब्राह्मणों को विदा किया ॥ ५० ॥ कुछ समय बीतने पर देवदत्त की पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणी के समान शुभ लक्षणें वाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया ॥ ५१ ॥ देवदत्त ने विधि-विधान के साथ गर्भाधान आदि कर्म किये। तत्पश्चात् पुंसवन, श्रृंगाकरण तथा सीमन्तोन्नयन-संस्कार वेद-विधि के साथ सम्पन्न किये। उस समय अपने यज्ञ को सफल जानकर प्रसन्न मन से उन्होंने बहुत-से दान दिये ॥ ५२-५३ ॥ रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिन में रोहिणी ने पुत्र को जन्म दिया। देवदत्त ने शुभ दिन और मुहूर्त में नवजात शिशु का जातकर्म-संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया। पूर्व बातों को जानने वाले देवदत्त ने अपने पुत्र का नाम “उतथ्य’ रखा ॥ ५४-५५ ॥ आठवें वर्ष में शुभ योग तथा शुभ दिन में पिता देवदत्त ने अपने उस पुत्र का विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न किया ॥ ५६ ॥ ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित उतथ्य को आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्द का भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढ की भाँति चुपचाप बैठा रहा ॥ ५७ ॥ उसके पिता ने उसे अनेक प्रकार से पढ़ाने का प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्ख की बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी। वह मूर्ख के समान पड़ा रहता था। इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए ॥ ५८ ॥ इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्ष का हो गया, किंतु भली-भाँति सन्ध्यावन्दन करने तक की विधि भी न जान पाया ॥ ५९ ॥ सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगों में यह बात विस्तृतरूप से फैल गयी कि देवदत्त का पुत्र महामूर्ख निकल गया ॥ ६० ॥ हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे। यहाँ तक कि उसके माता-पिता भी उस मूर्ख को कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे ॥ ६१ ॥ इस प्रकार जब सभी लोग, माता-पिता तथा बन्धु-बान्धव उसको निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मण बालक के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वन में चला गया ॥ ६२ ॥ अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक नहीं है — माता-पिता के ऐसा कहने पर वह वन में चला गया ॥ ६३ ॥ गंगा के किनारे एक उत्तम स्थान पर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासी का जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा ॥ ६४ ॥ “मैं असत्य नहीं बोलूँगा — ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रम में रहने लगा ॥ ६५ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत तृतीय स्कन्ध का सत्यव्रताख्यानवर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥ Content is available only for registered users. 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