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श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ५८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अट्ठावनवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण के अन्यान्य विवाहों की कथा

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! अब पाण्डवों का पता चल गया था कि वे लाक्षाभवन में जले नहीं हैं । एक बार भगवान् श्रीकृष्ण उनसे मिलने के लिये इन्द्रप्रस्थ पधारे । उनके साथ सात्यकि आदि बहुत-से यदुवंशी भी थे ॥ १ ॥ जब वीर पाण्डवों ने देखा कि सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं तो जैसे प्राण का सञ्चार होने पर सभी इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं, वैसे ही वे सब-के-सब एक साथ उठ खड़े हुए ॥ २ ॥ वीर पाण्डवों ने भगवान् श्रीकृष्ण का आलिङ्गन किया, उनके अङ्ग-सङ्ग से इनके सारे पाप-ताप धुल गये । भगवान् की प्रेमभरी मुसकराट से सुशोभित मुख-सुषमा देखकर वे आनन्द में मग्न हो गये ॥ ३ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और भीमसेन के चरणों में प्रणाम किया और अर्जुन को हृदय से लगाया । नकुल और सहदेव ने भगवान् के चरणों की वन्दना की ॥ ४ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्ण श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान हो गये; तब परमसुन्दरी श्यामवर्णा द्रोपदी, जो नवविवाहिता होने के कारण तनिक लजा रही थी, धीरे-धीरे भगवान् श्रीकृष्ण के पास आयी और उन्हें प्रणाम किया ॥ ५ ॥ पाण्डवों ने भगवान् श्रीकृष्ण के समान ही वीर सात्यकि का भी स्वागत-सत्कार और अभिनन्दन-वन्दन किया । वे एक आसन पर बैठ गये । दूसरे यदुवंशियों का भी यथायोग्य सत्कार किया गया तथा वे भी श्रीकृष्ण के चारों ओर आसनों पर बैठ गये ॥ ६ ॥

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपनी बुआ  कुन्ती के पास गये और उनके चरणों में प्रणाम किया । कुन्तीजी ने अत्यन्त स्नेहवश उन्हें अपने हृदय से लगा लिया । उस समय उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक आये । कुन्तीजी ने श्रीकृष्ण से अपने भाई-बन्धुओं की कुशल-क्षेम पूछी और भगवान् ने भी उनका यथोचित उत्तर देकर उनसे उनकी पुत्रवधू द्रौपदी और स्वयं उनका कुशल-मङ्गल पूछा ॥ ७ ॥ उस समय प्रेम की विह्वलता से कुन्ती का गला रुँध गया था, नेत्रों से आँसू बह रहे थे । भगवान् के पूछने पर उन्हें अपने पहले क्लेश-पर-क्लेश याद आने लगे और वे अपने को बहुत सम्हालकर, जिनका दर्शन समस्त क्लेश का अन्त करने के लिये ही हुआ करता है, उन भगवान् श्रीकृष्ण से कहने लगीं — ॥ ८ ॥ ‘श्रीकृष्ण ! जिस समय तुमने हमलोगों को अपना कुटुम्बी, सम्बन्धी समझकर स्मरण किया और हमारा कुशल-मङ्गल जानने के लिये भाई अक्रूर को भेजा, उसी समय हमारा कल्याण हो गया, हम अनाथों को तुमने सनाथ कर दिया ॥ ९ ॥ मैं जानती हैं कि तुम सम्पूर्ण जगत् के परम हितैषी सुहृद् और आत्मा हो । यह अपना है और यह पराया, इस प्रकार की भ्रान्ति तुम्हारे अंदर नहीं है । ऐसा होने पर भी, श्रीकृष्ण ! जो सदा तुम्हें स्मरण करते हैं, उनके हृदय में आकर तुम बैठ जाते हो और उनकी क्लेश-परम्परा को सदा के लिये मिटा देते हो’ ॥ १० ॥

युधिष्ठिरजी ने कहा — ‘सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ! हमें इस बात का पता नहीं हैं कि हमने अपने पूर्वजन्मों में या इस जन्म में कौन-सा कल्याण-साधन किया हैं ? आपका दर्शन बड़े-बड़े योगेश्वर भी बड़ी कठिनता से प्राप्त कर पाते हैं और हम कुबुद्धियों को घर बैठे ही आपके दर्शन हो रहे हैं’ ॥ ११ ॥ राजा युधिष्ठिर ने इस प्रकार भगवान् का खूब सम्मान किया और कुछ दिन वहीं रहने की प्रार्थना की । इस पर भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ के नर-नारियों को अपनी रूप-माधुरी से नयनानन्द का दान करते हुए बरसात के चार महीनों तक सुखपूर्वक वहीं रहे ॥ १२ ॥ परीक्षित् ! एक बार वीर-शिरोमणि अर्जुन ने गाण्डीव धनुष और अक्षय बाणवाले दो तरकस लिये तथा भगवान् श्रीकृष्ण के साथ कवच पहनकर अपने उस रथ पर सवार हुए, जिस पर वानर-चिह्न से चिह्नित ध्वजा लगी हुई थी । इसके बाद विपक्षी वीरों का नाश करनेवाले अर्जुन उस गहन वन में शिकार खेलने गये, जो बहुत-से सिंह, बाघ आदि भयङ्कर जानवरों से भरा हुआ था ॥ १३-१४ ॥

वहाँ उन्होंने बहुत-से बाघ, सूअर, भैंसे, काले हरिन, शरभ, गवय (नीलापन लिये हुए भूरे रंग का एक बड़ा हिरन), गैंडे, हरिन, खरगोश और शल्लक (साही) आदि पशुओं पर अपने बाणों का निशाना लगाया ॥ १५ ॥ उनमें से जो यज्ञ के योग्य थे, उन्हें सेवकगण पर्व का समय जानकर राजा युधिष्ठिर के पास ले गये । अर्जुन शिकार खेलते-खेलते थक गये थे । अब वे प्यास लगने पर यमुनाजी के किनारे गये ॥ १६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों महारथियों ने यमुनाजी में हाथ-पैर धोकर उनका निर्मल जल पिया और देखा कि एक परमसुन्दरी कन्या वहाँ तपस्या कर रही है ॥ १७ ॥ उस श्रेष्ठ सुन्दरी की जँघा, दाँत और मुख अत्यन्त सुन्दर थे । अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के भेजने पर अर्जुन ने उसके पास जाकर पूछा — ॥ १८ ॥ ‘सुन्दरी ! तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो ? कहाँ से आयी हो ? और क्या करना चाहती हो ? मैं ऐसा समझता हूँ कि तुम अपने योग्य पति चाह रही हो । हे कल्याण ! तुम अपनी सारी बात बतलाओ’ ॥ १९ ॥

कालिन्दी ने कहा —
‘मैं भगवान् सूर्यदेव की पुत्री हूँ । मैं सर्वश्रेष्ठ वरदानी भगवान् विष्णु को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ और इसीलिये यह कठोर तपस्या कर रही हूँ ॥ २० ॥ वीर अर्जुन ! मैं लक्ष्मी के परम आश्रय भगवान् को छोड़कर और किसी को अपना पति नहीं बना सकती । अनाथों के एकमात्र सहारे, प्रेम वितरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ २१ ॥ मेरा नाम हैं कालिन्दी । यमुनाजल में मेरे पिता सूर्य ने मेरे लिये एक भवन भी बनवा दिया है । उसमें मैं रहती हूँ । जब तक भगवान् का दर्शन न होगा, मैं यहीं रहूँगी’ ॥ २२ ॥ अर्जुन ने जाकर भगवान् श्रीकृष्ण से सारी बातें कहीं । वे तो पहले से ही यह सब कुछ जानते थे, अब उन्होंने कालिन्दी को अपने रथ पर बैठा लिया और धर्मराज युधिष्ठिर के पास ले आये ॥ २३ ॥

इसके बाद पाण्डवों की प्रार्थना से भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के रहने के लिये एक अत्यन्त अद्भुत और विचित्र नगर विश्वकर्मा के द्वारा बनवा दिया ॥ २४ ॥ भगवान् इस बार पाण्डवों को आनन्द देने और उनका हित करने के लिये वहाँ बहुत दिनों तक रहे । इसी बीच अग्निदेव को खाण्डव-वन दिलाने के लिये वे अर्जुन के सारथि भी बने ॥ २५ ॥ खाण्डव-वन का भोजन मिल जाने से अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने अर्जुन को गाण्डीव धनुष, चार श्वेत घोड़े, एक रथ, दो अटूट बाणोंवाले तरकस और एक ऐसा कवच दिया, जिसे कोई अस्त्र-शस्त्रधारी भेद न सके ॥ २६ ॥ खाण्डव-दाह के समय अर्जुन ने मय दानव को जलने से बचा लिया था । इसलिये उसने अर्जुन से मित्रता करके उनके लिये एक परम अद्भुत सभा बना दी । उसी सभा में दुर्योधन को जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम हो गया था ॥ २७ ॥

कुछ दिनों के बाद भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की अनुमति एवं अन्य सम्बन्धियों का अनुमोदन प्राप्त करके सात्यकि आदि के साथ द्वारका लौट आये ॥ २८ ॥ वहाँ आकर उन्होंने विवाह योग्य ऋतु और ज्योतिषशास्त्र के अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्न में कालिन्दीजी का पाणिग्रहण किया । इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियों को परम मङ्गल और परमानन्द की प्राप्ति हुई ॥ २९ ॥

अवन्ती (उज्जैन) देश के राजा थे विन्द और अनुविन्द । वे दुर्योधन के वशवर्ती तथा अनुयायी थे । उनकी बहिन मित्रविन्दा ने स्वयंवर में भगवान् श्रीकृष्ण को ही अपना पति बनाना चाहा । परन्तु विन्द और अनुविन्द ने अपनी बहिन को रोक दिया ॥ ३० ॥ परीक्षित् ! मित्रविन्दा श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी (९।२४।३०) की कन्या थी । भगवान् श्रीकृष्ण राजाओं की भरी सभा में उसे बलपूर्वक हर ले गये, सब लोग अपना-सा मुँह लिये देखते ही रह गये ॥ ३१ ॥

परीक्षित् ! कोसलदेश के राजा थे नग्नजित् । वे अत्यन्त धार्मिक थे । उनकी परमसुन्दरी कन्या का नाम था सत्या; नग्नजित की पुत्री होने से वह नाग्नजिती भी कहलाती थी । परीक्षित् ! राजा की प्रतिज्ञा के अनुसार सात दुर्दान्त बैलों पर विजय प्राप्त न कर सकने के कारण कोई राजा उस कन्या से विवाह न कर सके । क्योंकि उनके सींग बड़े तीखे थे और वे बैल किसी वीर पुरुष की गन्ध भी नहीं सह सकते थे ॥ ३२-३३ ॥ जब यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण ने यह समाचार सुना कि जो पुरुष उन बैलों को जीत लेगा, उसे ही सत्या प्राप्त होगी; तब वे बहुत बड़ी सेना लेकर कोसलपुरी (अयोध्या) पहुँचे ॥ ३४ ॥ कोसलनरेश महाराज नग्नजित् ने बड़ी प्रसन्नता से उनकी अगवानी की और आसन आदि देकर बहुत बड़ी पूजा-सामग्री से उनका सत्कार किया । भगवान् श्रीकृष्ण ने भी उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया ॥ ३५ ॥

राजा नग्नजित् की कन्या सत्या ने देखा कि मेरे चिर-अभिलषित रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं, तब उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि ‘यदि मैंने व्रत-नियम आदि का पालन करके इन्हीं का चिन्तन किया है तो ये ही मेरे पति हों और मेरी विशुद्ध लालसा को पूर्ण करें’ ॥ ३६ ॥ नाग्नजिती सत्या मन-ही-मन सोचने लगी — ‘भगवती लक्ष्मी, ब्रह्मा, शङ्कर और बड़े-बड़े लोकपाल जिनके पदपङ्कज का पराग अपने सिर पर धारण करते हैं और जिन प्रभु ने अपनी बनायी हुई मर्यादा का पालन करने के लिये ही समय-समय पर अनेकों लीलावतार ग्रहण किये हैं, वे प्रभु मेरे किस धर्म, व्रत अथवा नियम से प्रसन्न होंगे ? वे तो केवल अपनी कृपा से ही प्रसन्न हो सकते हैं ॥ ३७ ॥ परीक्षित् ! राजा नग्नजित् ने भगवान् श्रीकृष्ण की विधिपूर्वक अर्चा-पूजा करके यह प्रार्थना की — ‘जगत् के एकमात्र स्वामी नारायण ! आप अपने स्वरूपभूत आनन्द से ही परिपूर्ण हैं और मैं हूँ एक तुच्छ मनुष्य ! मैं आपकी क्या सेवा करुँ ?’ ॥ ३८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! राजा नग्नजित् का दिया हुआ आसन, पूजा आदि स्वीकार करके भगवान् श्रीकृष्ण बहुत सन्तुष्ट हुए । उन्होंने मुस्कराते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी से कहा ॥ ३९ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — राजन् ! जो क्षत्रिय अपने धर्म में स्थित है, उसका कुछ भी माँगना उचित नहीं । धर्मज्ञ विद्वानों ने उसके इस कर्म की निन्दा की है । फिर भी मैं आपसे सौहार्द का — प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करने के लिये आपकी कन्या चाहता हूँ । हमारे यहाँ इसके बदले में कुछ शुल्क देने की प्रथा नहीं हैं ॥ ४० ॥

राजा नग्नजित् ने कहा — ‘प्रभो ! आप समस्त गुणों के धाम हैं, एकमात्र आश्रय हैं । आपके वक्षःस्थल पर भगवती लक्ष्मी नित्य-निरन्तर निवास करती हैं । आपसे बढ़कर कन्या के लिये अभीष्ट वर भला और कौन हो सकता है ? ॥ ४१ ॥ परन्तु यदुवंशशिरोमणे ! हमने पहले ही इस विषय में एक प्रण कर लिया हैं । कन्या के लिये कौन-सा वर उपयुक्त है, उसका बल-पौरुष कैसा है — इत्यादि बातें जानने के लिये ही ऐसा किया गया हैं ॥ ४२ ॥ वीरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! हमारे ये सातों बैल किसी के वश में न आनेवाले और बिना सधाये हुए हैं । इन्होने बहुत-से राजकुमारों के अंगों को खण्डित करके उनका उत्साह तोड़ दिया है ॥ ४३ ॥ श्रीकृष्ण ! यदि इन्हें आप ही नाथ लें, अपने वश में कर लें, तो लक्ष्मीपते ! आप ही हमारी कन्या के लिये अभीष्ट वर होंगे’ ॥ ४४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने राजा नग्नजित् का ऐसा प्रण सुनकर कमर में फेंट कस ली और अपने सात रूप बनाकर खेल-खेल में ही उन बैलों को नाथ लिया ॥ ४५ ॥ इससे बैलों का घमंड चूर हो गया और उनका बल-पौरुष भी जाता रहा । अब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें रस्सी से बाँधकर इस प्रकार खींचने लगे, जैसे खेलते समय नन्हा-सा बालक काठ के बैलों को घसीटता है ॥ ४६ ॥

राजा नग्नजित् को बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण को अपनी कन्या का दान कर दिया और सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण ने भी अपने अनुरूप पत्नी सत्या का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ ४७ ॥ रानियों ने देखा कि हमारी कन्या को उसके अत्यन्त प्यारे भगवान् श्रीकृष्ण ही पति के रूप में प्राप्त हो गये हैं । उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और चारों ओर बड़ा भारी उत्सव मनाया जाने लगा ॥ ४८ ॥ शङ्ख, ढोल, नगारे बजने लगे । सब ओर गाना-बजाना होने लगा । ब्राह्मण आशीर्वाद देने लगे । सुन्दर वस्त्र, पुष्पों के हार और गहनों से सज-धजकर नगर के नर-नारी आनन्द मनाने लगे ॥ ४९ ॥ राजा नग्नजित् ने दस हजार गौएँ और तीन हजार ऐसी नवयुवती दासियाँ जो सुन्दर वस्त्र तथा गले में स्वर्णहार पहने हुए थीं, दहेज में दी । इनके साथ ही नौ हजार हाथी, नौ लाख रथ, नौ करोड़ घोड़े और नौ अरब सेवक भी दहेज में दिये ॥ ५०-५१ ॥ कोसलनरेश राजा नग्नजित् ने कन्या और दामाद को रथ पर चढ़ाकर एक बड़ी सेना के साथ विदा किया । उस समय उनका हृदय वात्सल्य-स्नेह के उद्रेक से द्रवित हो रहा था ॥ ५२ ॥

परीक्षित् ! यदुवंशियों ने और राजा नग्नजित् के बैल ने पहले बहुत-से राजाओं का बल-पौरुष धूल में मिला दिया था । जब उन राजाओं ने यह समाचार सुना, तब उनसे भगवान् श्रीकृष्ण की यह विजय सहन न हुई । उन लोगो ने नाग्नजिती सत्या को लेकर जाते समय मार्ग में भगवान् श्रीकृष्ण को घेर लिया ॥ ५३ ॥ और वे बड़े वेग से उन पर बाणों की वर्षा करने लगे । उस समय पाण्डववीर अर्जुन ने अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्ण का प्रिय करने के लिये गाण्डीव धनुष धारण करके-जैसे सिंह छोटे-मोटे पशुओं को खदेड़ दे, वैसे ही उन नरपतियों को मारपीट कर भगा दिया ॥ ५४ ॥ तदनन्तर यदुवंशशिरोमणि देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण उस दहेज और सत्या के साथ द्वारका में आये और वहाँ रहकर गृहस्थोचित विहार करने लगे ॥ ५५ ॥

परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण की बुआ श्रुतकीर्ति (९।२४।३०) केकय-देश में ब्याहीं गयी थी । उनकी कन्या का नाम था भद्रा । उसके भाई सन्तर्दन आदि ने उसे स्वयं ही भगवान् श्रीकृष्ण को दे दिया और उन्होंने उसका पाणिग्रहण किया ॥ ५६ ॥ मद्रप्रदेश राजा की एक कन्या थी लक्ष्मणा । वह अत्यन्त सुलक्षणा थी । जैसे गरुड़ ने स्वर्ग से अमृत का हरण किया था, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयंवर में अकेले ही उसे हर लिया ॥ ५७ ॥

परीक्षित् ! इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण की और भी सहस्रों स्त्रियाँ थीं । उन परम सुन्दरियों को वे भौमासुर को मारकर उसके बंदीगृह से छुड़ा लाये थे ॥ ५८ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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