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श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अठारहवाँ अध्याय
भिन्न-भिन्न वर्षों का वर्णन

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
भद्रश्रवा और उनके सेवक कहते हैं — “ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नमः”
‘चित्त को विशुद्ध करनेवाले ओङ्कारस्वरूप भगवान् धर्म को नमस्कार हैं’ ॥ २ ॥ अहो ! भगवान् की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोक का संहार करनेवाले काल को देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयों का सेवन करने के लिये पापमय विचारों की उधेड़-बुन में लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादि की लाश को जलाकर भी स्वयं जीते रहने की इच्छा करता है ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग जगत् को नश्चर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं, तो भी जन्महित प्रभो ! आपकी माया से लोग मोहित हो जाते हैं । आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक है, में आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ परमात्मन् ! आप अकर्ता और माया के आवरण से रहित हैं तो भी जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये आपके ही कर्म माने गये हैं । सो ठीक ही हैं, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । क्योंकि सर्वात्मरूप से आप ही सम्पूर्ण कार्यों के कारण हैं और अपने शुद्धस्वरूप में इस कार्य-कारणभाव से सर्वथा अतीत है ॥ ५ ॥ आपका विग्रह मनुष्य और घोड़े का संयुक्त रूप है । प्रलयकाल में जब तमःप्रधान दैत्यगण वेदों को चुरा ले गये थे, तब ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर आपने उन्हें रसातल से लाकर दिया । ऐसे अमोघ लीला करनेवाले सत्यसङ्कल्प आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥

हरिवर्षखण्ड में भगवान् नृसिंहरूप से रहते हैं । उन्होंने यह रुप जिस कारण से धारण किया था, उसका आगे (सप्तम स्कन्ध में) वर्णन किया जायगा । भगवान् के उस प्रिय रूप की महाभागवत प्रह्लादजी उस वर्ष के अन्य पुरुषों के सहित निष्काम एवं अनन्य भक्तिभाव से उपासना करते हैं । ये प्रह्लादजी महापुरुषोचित गुणों से सम्पन्न हैं तथा इन्होंने अपने शील और आचरण से दैत्य और दानवों के कुल को पवित्र कर दिया है । वे इस मन्त्र के तथा स्तोत्र का जप-पाठ करते हैं ॥ ७ ॥ “ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान्रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम्”
‘ओङ्कारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेव को नमस्कार है । आप अग्नि आदि तेजों के भी तेज है, आपको नमस्कार हैं । हे वज्रनख ! हे वज्रदंष्ट्र ! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओं को जला डालिये, जला डालिये । हमारे अज्ञानरूप अन्धकार को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये ॐ स्वाहा । हमारे अन्तःकरण में अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये । ॐ क्ष्रौम् ॥ ८ ॥

‘नाथ ! विश्व का कल्याण हो, दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियों में परस्पर सद्भावना हो, सभी एक दूसरे का हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हम सबको बुद्धि निष्कामभाव से भगवान् श्रीहरि में प्रवेश करे ॥ ९ ॥ प्रभो ! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओं में हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान् के प्रेमी भक्तों में ही । जो संयमी पुरुष केवल शरीरनिर्वाह के योग्य अन्नादि से सन्तुष्ट रहता है, उसे जितना शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती हैं, वैसी इन्द्रिय लोलुप पुरुष को नहीं होती ॥ १० ॥ उन भगवद्भक्तों के सङ्ग से भगवान् के तीर्थतुल्य पवित्र चरित्र सुनने को मिलते हैं, जो उनकी असाधारण शक्ति एवं प्रभाव के सूचक होते हैं । उनका बार-बार सेवन करनेवालों के कानों के रास्ते से भगवान् हृदय में प्रवेश कर जाते हैं और उनके सभी प्रकार के देहिक और मानसिक मलों को नष्ट कर देते हैं । फिर भला, उन भगवद्भक्तों का सङ्ग कौन न करना चाहेगा ? ॥ ११ ॥

जिस पुरुष को भगवान् में निष्काम भक्ति है, उसके हृदय में समस्त देवता धर्म-ज्ञानादि सम्पूर्ण सद्गुणों के सहित सदा निवास करते हैं । किन्तु जो भगवान् का भक्त नहीं हैं, उसमें महापुरुषों के वे गुण आ ही कहाँ से सकते हैं ? वह तो तरह-तरह के सङ्कल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयों की ओर ही दौड़ता रहता है ॥ १२ ॥ जैसे मछलियों को जल अत्यन्त प्रिय-उनके जीवन का आधार होता हैं, उसी प्रकार साक्षात् श्रीहरि ही समस्त देहधारियों के प्रियतम आत्मा हैं । उन्हें त्यागकर यदि कोई महत्त्वाभिमानी पुरुष घर में आसक्त रहता है तो उस दशा में स्त्री-पुरुषों का बड़प्पन केवल आयु को लेकर ही माना जाता हैं; गुण की दृष्टि से नहीं ॥ १३ ॥ अतः असुरगण ! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इछा, भय, दीनता और मानसिक सन्ताप के मूल तथा जन्म-मरणरूप संसारचक्र का वहन करनेवाले गृह आदि को त्यागकर भगवान् नृसिंह के निर्भय चरणकमलों का आश्रय लो’ ॥ १४ ॥

केतुमालवर्ष में लक्ष्मीजी का तथा संवत्सर नामक प्रजापति के पुत्र और पुत्रियों का प्रिय करने के लिये भगवान् कामदेवरूप से निवास करते हैं । उन रात्रि की अभिमानी देवतारूप कन्याओं और दिवसाभिमानी देवतारूप पुत्रों की संख्या मनुष्य की सौ वर्ष की आयु के दिन और रात के बराबर अर्थात् छत्तीस-छत्तीस हजार वर्ष है, और ये ही उस वर्ष के अधिपति हैं । वे कन्याएँ परमपुरुष श्रीनारायण श्रेष्ठ अस्त्र सुदर्शनचक्र के तेज से डर जाती हैं । इसलिये प्रत्येक वर्ष के अन्त में उनके गर्भ नष्ट होकर गिर जाते हैं ॥ १५ ॥ भगवान् अपने सुललित गति-विलास से सुशोभित मधुर-मधुर मन्द-मुसकान से मनोहर लीलापूर्ण चारु चितवन से कुछ उझके हुए सुन्दर भूमण्डल की छबीली छटा के द्वारा वदनारविन्द का राशि-राशि सौन्दर्य उँडेलकर सौन्दर्यदेवी श्रीलक्ष्मी को अत्यन्त आनन्दित करते और स्वयं भी आनन्दित होते रहते हैं ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मीजी परम समाधियोग के द्वारा भगवान् के उस मायामय स्वरूप को रात्रि के समय प्रजापति संवत्सर की कन्याओं सहित और दिन में उनके पतियों के सहित आराधना और वे इस मन्त्र का जप करती हुई भगवान् की स्तुति करती हैं ॥ १७ ॥

“ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ॐ नमो भगवते हृषीकेशाय सर्वगुणविशेषैर्विल-क्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसां विशेषाणां चाधिपतये षोडशकलाय च्छन्दोमयायान्नमयायामृतमयाय सर्वमयाय ओजसे बलाय कान्ताय कामाय नमस्ते” ‘जो इन्द्रियों के नियन्ता और सम्पूर्ण श्रेष्ठ वस्तुओं के आकर हैं, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और सङ्कल्प-अध्यवसाय आदि चित्त के धर्मों तथा उनके विषयों के अधीश्वर हैं, ग्यारह इन्द्रिय और पाँच विषय-इन सोलह कलाओं से युक्त हैं, वेदोक्त कर्मों से प्राप्त होते हैं तथा अन्नमय, अमृतमय और सर्वमय हैं-उन मानसिक, ऐन्द्रियक एवं शारीरिक बलस्वरूप परम सुन्दर भगवान् कामदेव को ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं’ इन बीजमन्त्रों के सहित सब ओर से नमस्कार है ॥ १८ ॥

‘भगवन् ! आप इन्द्रियों के अधीश्वर हैं । स्त्रियाँ तरह-तरह कठोर व्रतों से आपकी ही आराधना करके अन्य लौकिक पतियों की इच्छा किया करती हैं । किन्तु वे उनके प्रिय पुत्र, धन और आयु की रक्षा नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं ही परतन्त्र हैं ॥ १९ ॥ सच्चा पति (रक्षा करनेवाला या ईश्वर) वही है, जो स्वयं सर्वथा निर्भय हो
और दूसरे भयभीत लोगों की सब प्रकार से रक्षा कर सके । ऐसे पति एकमात्र आप ही हैं, यदि एक से अधिक ईश्वर माने जावें, तो उन्हें एक-दूसरे से भय होने की सम्भावना है । अतएव आप अपनी प्राप्ति से बढ़कर और किसी लाभ को नहीं मानते ॥ २० ॥ भगवन् ! जो स्त्री आपके चरणकमलों का पूजन ही चाहती है, और किसी वस्तु की इच्छा नहीं करती — उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं किन्तु जो किसी एक कामना को लेकर आपकी उपासना करती हैं, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं और जब भोग समाप्त होने पर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता हैं ॥ २१ ॥

अजित ! मुझे पाने के लिये इन्द्रिय-सुख के अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरणकमलों का आश्रय लेनेवाले भक्त के सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता, क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है ॥ २२ ॥ अच्युत ! आप अपने जिस वन्दनीय कमल को भक्तों के मस्तक पर रखते हैं, उसे मेरे सिर पर भी रखिये । वरेण्य ! आप मुझे केवल श्रीलाञ्छनरूप से अपने वक्षःस्थल में ही धारण करते हैं; सो आप सर्वसमर्थ हैं, आप अपनी माया से जो लीलाएँ करते हैं, उनका रहस्य कौन जान सकता है ?’ ॥ २३ ॥

रम्पकवर्ष में भगवान् ने वहाँ के अधिपति मनु को पूर्वकाल में अपना परम प्रिय मत्स्य रुप दिखाया था । मनु जो इस समय भी भगवान् के उसी रूप की बड़े भक्तिभाव से उपासना करते हैं और इस मन्त्र का जप करते हुए स्तुति करते हैं —
“ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नमः”
‘सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओङ्कारपद के अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्य को बार-बार नमस्कार हैं’ ॥ २४-२५ ॥

‘प्रभो ! नट जिस प्रकार कठपुतलियों को नचाता है, उसी प्रकार आप ब्राह्मणादि नामों की डोरी से सम्पूर्ण विश्व को अपने अधीन करके नचा रहे हैं । अतः आप ही सबके प्रेरक हैं । आपको ब्रह्मादि लोकपालगण भी नहीं देख सकते; तथापि आप समस्त प्राणियों के भीतर प्राणरूप से और बाहर वायुरूप से निरन्तर सञ्चार करते रहते हैं । वेद ही आपका महान् शब्द है ॥ २६ ॥ एक बार इन्द्रादि इन्द्रियाभिमानी देवताओं ने प्राणस्वरूप आपसे डाह हुआ । तब आपके अलग हो जाने पर वे अलग-अलग अथवा आपस में मिलकर भी मनुष्य, पशु, स्थावर-जङ्गम आदि जितने शरीर दिखायी देते हैं उनमें से किसी की बहुत यत्न करने पर भी रक्षा नहीं कर सके ॥ २७ ॥ अजन्मा प्रभो ! आपने मेरे सहित समस्त औषध और लताओं की आश्रयरूपा इस पृथ्वी को लेकर बड़ी-बड़ी उत्ताल तरङ्ग से युक्त प्रलयकालीन समुद्र में बड़े उत्साह से विहार किया था । आप संसार के समस्त प्राणसमुदाय के नियन्ता हैं; मेरा आपको नमस्कार हैं’ ॥ २८ ॥

हिरण्मयवर्ष में भगवान् कच्छप रूप धारण करके रहते हैं । वहाँ के निवासियों सहित पितृराज अर्यमा भगवान् की उस प्रियतम मूर्ति की उपासना करते हैं और इस मन्त्र को निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं ॥ २९ ॥
“ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्ते”
‘जो सम्पूर्ण सत्त्वगुण से युक्त हैं, जल में विचरते रहने के कारण जिनके स्थान का कोई निश्चय नहीं है तथा जो काल की मर्यादा के बाहर हैं, उन ओङ्कारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान् कच्छप को बार-बार नमस्कार हैं’ ॥ ३० ॥

भगवन् ! अनेक रूपों में प्रतीत होनेवाला यह दृश्यप्रपञ्च यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह माया से प्रकाशित होनेवाला आपका ही रूप है । ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥ एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ञ, जङ्गम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियों से युक्त हैं: कपिलादि विद्वानों ने जो आपमें चौबीस तत्त्वों की संख्या निश्चित की है — वह जिस तत्त्वदृष्टि का उदय होने पर निवृत्त हो जाती हैं, वह भी वस्तुतः आपका हीं स्वरूप हैं, ऐसे सांख्मसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार हैं’ ॥ ३३ ॥

उत्तर कुरुवर्ष में भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं । वहाँ के निवासियों के सहित साक्षात् पृथ्वीदेवी उनकी अविचल भक्तिभाव से उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्र का जप करती हुई स्तुति करती हैं ॥ ३४ ॥
“ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते”
-‘जिनका तत्त्व मन्त्रों से जाना जाता है, जो यज्ञ और क्रतुरूप हैं तथा बड़े-बड़े यज्ञ जिनके अङ्ग हैं — उन ओङ्कारस्वरूप शुक्लकर्ममय त्रियुगमूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् वराह को बार-बार नमस्कार हैं’ ॥ ३५ ॥

‘ऋत्विज् गण जिस प्रकार अरणिरूप काष्ठखण्डॉ में छिपी हुई अग्नि को मन्थन द्वारा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार कर्मासक्ति एवं कर्मफल की कामना से छिपे हुए जिनके रूप को देखने की इच्छा से: परमप्रवीण पण्डितजन अपने विवेकयुक्त मनरूप मन्थनकाष्ठ से शरीर एवं इन्द्रियादि को बिलो डालते हैं । इस प्रकार मन्थन करने पर अपने स्वरूप को प्रकट करनेवाले आपको नमस्कार हैं ॥ ३६ ॥ विचार तथा यम-नियमादि योगाङ्गक साधन से जिनकी बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी हैं — वे महापुरुष द्रव्य (विषय), क्रिया (इन्द्रियों के व्यापार), हेतु (इन्द्रियाधिष्ठाता देवता), अयन (शरीर), ईश, काल और कर्ता (अहङ्कार) आदि माया के कार्यों को देखकर जिनके वास्तविक स्वरूप का निश्चय करते हैं, ऐसे मायिक आकृतियों से रहित आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार लोहा जड़ होने पर भी चुम्बक की सन्निधिमात्र से चलने-फिरने लगता है, उसी प्रकार जिन सर्वसाक्षी इच्छामात्र से — जो अपने लिये नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के लिये होती हैं-प्रकृति अपने गुणों के द्वारा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती रहती हैं, ऐसे सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मों के साक्षी आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥

आप जगत् के कारणभूत आदिसूकर हैं । जिस प्रकार एक हाथी दूसरे हाथी को पछाड़ देता है, उसी प्रकार गजराज के समान क्रीडा करते हुए आप युद्ध में अपने प्रतिद्वन्द्वी हिरण्याक्ष दैत्य को दलित करके मुझे अपनी दाढ़ों की नोक पर रखकर रसातल से प्रलय-पयोधि के बाहर निकले थे । मैं आप सर्वशक्तिमान् प्रभु को बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ३९ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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