श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-28
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
अठ्ठाईसवाँ अध्याय
हिमालय द्वारा बारात का यथोचित सत्कार करना है, शिव-पार्वती के माङ्लिक विवाहोत्सव का वर्णन, शिव-पार्वती के विवाहोत्सव के पाठ की महिमा
अथः अष्टाविंशतितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीशिवस्य हिमालयपुर आगमनं

श्रीमहादेवजी बोले — इसके बाद महेश्वर को आया हुआ जानकर गिरिराज हिमालय ने वहाँ आकर उनकी विधिवत पूजा की और उन्हें स्वयं पुर में प्रवेश कराया । साथ ही हिमालय ने ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं की यथोचित पूजा करके उन्हें भी अपने पुर में प्रवेश कराया । इसी प्रकार प्रसन्नचित गिरिराज हिमालय मरीचि आदि महर्षियों की भी यथोचित पूजा करके उन्हें अपने पुर ले गये ॥ १-३ ॥

रत्नों के आभूषणों से अलङ्कृत, सोने के दिव्य मुकुट से सुशोभित, दो भुजाओं तथा अत्यन्त सुन्दर मुख वाले, चन्द्रमा से सुशोभित सिर वाले और सैकड़ों सूर्यों की प्रभा के तुल्य प्रतीत होने वाले शान्तस्वभाव पार्वतीनाथ शिव को देखकर मेनका और उसी तरह गिरिराज हिमालय भी अत्यन्त आनन्दित हुए ॥ ४-५ ॥ उस अवसर पर जो अन्य देव, गन्धर्व तथा किन्नर आये हुए थे, वे एकटक पार्वतीनाथ शिवजी को ही देख रहे थे और अन्यत्र कहीं भी दृष्टि नहीं ले जा रहे थे । सभी लोग आपस में यह कहते थे कि जैसे गौरी रूपवती हैं, वैसे ही जगत्पति महादेव भी रूपसम्पन्न हैं ॥ ६-७ ॥

इसके बाद सुन्दर लक्षणों से युक्त मुहूर्त आने पर गिरिराज हिमालय ने पार्वती का पूजन करके वैवाहिक विधि से देवाधिदेव शिव को प्रदान कर दी और प्रसन्नमन शम्भु ने जगत् का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली उन हिमालय पुत्री पार्वती का पत्नीरूप पाणिग्रहण किया ॥ ८-९ ॥ उस समय गिरीन्द्र हिमालय के नगर में ऐसा महान् उत्सव सम्पन्न हुआ, जैसा कभी हुआ नहीं था और आगे कहीं होने वाला भी नहीं है । महामते ! उस समय सभी देवताओं के मन में प्रसन्नता छायी हुई थी ॥ १०१/२

इस प्रकार पार्वती के साथ महादेव का विवाह सम्पन्न हो जाने पर देवताओं का मनोरथ पूर्ण हो गया और वे महादेव को मुग्ध करने वाले कामदेव की बार-बार प्रशंसा करने लगे ॥ १११/२

वहाँ पर पार्वती सहित भगवान् शंकर को देखकर सभी देवता, गन्धर्व और ऋषिगण परस्पर कहने लगे — ‘अहो, बुद्धिसम्पन्न गिरिराज हिमालय का महान् सौभाग्य है कि साक्षात जगज्जननी भगवती उन्हें कन्यारूप में प्राप्त हुई हैं’ ॥ १२-१३१/२

जो परा प्रकृति अपनी इच्छा से सम्पूर्ण विश्व का सृजन करती हैं, उन्होंने जो हिमालय के घर में लीलापूर्वक कन्यारूप में जन्म लिया है, वह इन गिरिराज हिमालय की अल्प तपस्या का फल नहीं है । मेना के पूर्वजन्म के संचित अतुलनीय भाग्य का क्या वर्णन किया जाए जो कि ये जगज्जननी इन पार्वती की भी माता के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं । लोक में ऐसा कौन है जो वाणी से परे तथा मन के लिए अत्यन्त दुर्गम महेश्वर के प्रभाव, रूप तथा वैभव का वर्णन करने में समर्थ है? इस प्रकार रूप से सम्पन्न पार्वती तथा परमेश्वर को देखकर सभी लोग आपस में अन्य प्रकार की बहुत-सी बातें कर रहे थे ॥ १४-१८ ॥ ब्रह्मा और भगवान् विष्णु पार्वती सहित हर्षयुक्त तथा शान्त भगवान् महेश्वर से इस प्रकार कहने लगे — ॥ १९ ॥

ब्रह्मा और विष्णु बोले — प्रभो ! देव ! आपकी भार्या ये पार्वती वे ही सती हैं, जिनके वियोगजनित दुःख से व्यथित होकर आप पूर्वकाल में तपस्या में लीन हो गये थे । ये वे ही जगत् की आदिस्वरुपिणी सनातनी भगवती देवी हैं ॥ २०१/२

श्रीमहादेवजी बोले — [मुने !] तदनन्तर हिमालय भक्तिपूर्वक शम्भु की स्तुति करने लगे ॥ २१ ॥

हिमालय बोले — भक्तों पर दया करने वाले देवदेव ! महादेव ! शंकर ! आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है [^1] , आपको नमस्कार है, आपको बार-बार नमस्कार है । आज मेरा जन्म सफल हो गया और मेरा जीवन सज्जीवन बन गया जो कि मैं अपने नेत्रों से जगज्जननी सहित जगन्नाथ शिव को देख रहा हूँ ॥ २२-२३ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — महामुने ! इस प्रकार परा भक्ति से स्तुति करते हुए गिरिराज हिमालय से भगवान् शंकर ने अपनी अमृतरूपी वाणी से उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा — गिरीन्द्र ! महाप्राज्ञ ! आप स्वयं मेरे ही अन्य विग्रह के रूप में हैं, आप भाग्यशाली हैं और देवताओं के लिए भी विशेषरूप से आदरणीय हैं । आज से मैं आपके लिए यज्ञभाग सुनिश्चित कर दे रहा हूँ । गिरीश्वर ! मृत्युलोक में आपके बिना लोग यज्ञ सम्पन्न नहीं करेंगे । गिरे ! जिस प्रकार सभी हविभोक्ता देवतागण यज्ञोत्सव में अपना-अपना भाग प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार आप भी मृत्युलोक में सम्पन्न होने वाले यज्ञों में भाग प्राप्त करेंगे ॥ २४-२७ ॥

हिमालय बोले — प्रभो ! जगद्गुरो ! आपके वरदान से मैं कृतार्थ हो गया हूँ । शम्भो ! कृपानिधे ! अब मैं एक अन्य वरदान के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ । शरणागतों पर वात्सल्यभाव रखने वाले महेश्वर ! देव ! इस पार्वती के साथ आप यहीं पर रमण कीजिए और मुझे पवित्र कर दीजिए ॥ २८-२९ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — पर्वतराज ! मैं देवी पार्वती सहित प्रसन्नचित रहते हुए आपके इस पुर के समीप में आपके शिखर पर वास करूँगा । गिरे ! इसी कारण से लोग मुझे गिरीश के नाम से जानेंगे ॥ ३०-३१ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — [मुने !] इस प्रकार उन हिमालय को यह वर प्रदान करके भगवान् शिव उसी उत्तम हिमालय पर्वत पर सुरम्य नगर का निर्माण कर पार्वती के साथ वहाँ रहने लगे । इसके बाद ब्रह्मा आदि सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गए ॥ ३२१/२

जो प्राणी पार्वती के शुभ विवाहोत्सव सम्बन्धी इस माङ्लिक अध्याय का श्रवण या पाठ करता है, वह भगवती के चरणों की सन्निधि प्राप्त कर लेता है और उसे शत्रु या राजा का भी भय नहीं रह जाता है । इसका एक बार भी श्रवण कर लेने पर मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है और देवी की कृपा से वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३३-३५ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपको वह सब बता दिया, जिस प्रकार भगवान् महेश्वर ने पूर्णाप्रकृति दक्षकन्या सती को फिर से प्राप्त किया था ॥ ३६ ॥ अब आप वह कथा सुनिए, जिस प्रकार देवताओं के रक्षक, तारक का वध करने वाले तथा विशाल भुजाओं वाले शिवपुत्र कार्तिकेय उत्पन्न हुए, जिनके समान महान् बलशाली, पराक्रमी तथा धनुर्धर तीनों लोकों में भी न कोई है और न होगा ही ॥ ३७-३८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव—नारद—संवाद में “पार्वतीविवाहमंगल’ नामक अठ्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

[^1]: यहाँ कायिक, वाचिक तथा मानसिक नमस्कार के तात्पर्य से ‘नमस्तुभ्यम्’ पद का तीन बार प्रयोग किया गया है।

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