श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-68
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
अड़सठवाँ अध्याय
भगवती गङ्गा का भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निकलकर सुमेरु पर्वत पर आना, पृथ्वी द्वारा गङ्गा की स्तुति, इन्द्र की प्रार्थना पर गङ्गा की एक धारा का स्वर्ग में प्रतिष्ठित होना तथा दूसरी धारा का सुमेरु के दक्षिण शिखर का भेदन करना
अथः अष्टषष्टितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे गङ्गानिर्गमनं मेरोदक्षिणशृङ्गभेदनान्निर्गमनं

श्रीमहादेवजी बोले — महामुने ! इस प्रकार पुण्यात्मा राजा भगीरथ ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष में हस्त नक्षत्र से युक्त मङ्गलवार शुभ दिन को उच्च ध्वनि में शङ्ख बजाते हुए रथ पर आरूढ़ हो गये । महामुने ! रथ पर आरूढ़ राजा भगीरथ मध्याह्नकालीन सूर्य की भाँति अपरिमित अतीव तेज से सुशोभित हो रहे थे । वे सभी आभूषणों से सम्पन्न, मस्तक पर उज्ज्वल मुकुट धारण किये हुए, तेजसम्पन्न, सुन्दर श्याम वर्ण वाले, शोभनीय वस्त्र धारण किये हुए, रक्तनेत्रों वाले, राजाओं में श्रेष्ठ राजर्षि, कमल की भाँति प्रसन्न मुख वाले, सुविभक्त केशराशि से विभूषित, बली राजाओं में श्रेष्ठ तथा धन्यभाक् थे ॥ १-४१/२

उनका रथ स्वच्छ, कान्तियुक्त, विभिन्न रत्नों से सुशोभित, सुमेरुशृङ्ग के समान विशाल और अपनी अत्यधिक कान्ति से सुशोभित था । राजा का वह महान् रथ सूर्य के रथ के समान, स्वर्णालङ्कारों से सुशोभित घोड़ों तथा विभिन्न ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित था ॥ ५–७ ॥ तदनन्तर पृथ्वी दिव्यरूपवाले नृपश्रेष्ठ भगीरथ को भूमि पर गङ्गा का अवतरण कराने वाला जानकर उनके सम्मुख प्रकट हो गयीं । मुनिश्रेष्ठ ! धर्मात्मा राजा भगीरथ को नमस्कार कर पृथ्वी ने राजा से इस प्रकार सुन्दर वचन कहा — ॥ ८-९ ॥

पृथ्वी बोलीं — राजन्! आप पृथ्वीपालक महात्मा तथा साक्षात् धर्मस्वरूप हैं। मुझे ज्ञात हुआ है कि आप सगर के वंशज अपने पितरों के उद्धार के लिये भगवान् विष्णु के शरीर में स्थित, धन्य, पवित्रतम गङ्गा को वहाँ लायेंगे जहाँ आपके पूर्वज भस्मरूप में अवस्थित हैं ॥ १०-११ ॥ इसलिये भूपते ! मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप पुण्यात्मा वैसा करें, जिससे वे गङ्गा चारों दिशाओं में समुद्रपर्यन्त चार धाराओं में होकर मुझे पवित्र करती रहें ॥ १२१/२

राजा बोले — जब वे शाम्भवी महाशक्ति द्रवरूप होकर भगवान् विष्णु के पदकमल से निकलकर मेरुशृङ्ग को प्राप्त करेंगी तब आप भी सुरेश्वरी भगवती की आराधना कीजियेगा ॥ १३-१४ ॥ मैं भी आपके लिये विशेषरूप से उनसे प्रार्थना करूँगा, तब आपके लिये वे मनोवाञ्छित फल देने वाली होंगी। मैं उन्हें पृथ्वी पर लाने का संकल्प करके स्वर्ग में जा रहा हूँ। आप भी उन श्रेष्ठ भगवती की भक्तिपूर्वक प्रार्थना करने के लिये वहाँ आवें ॥ १५-१६ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — मुने! खिले हुए कमल समान मुखवाली उन पृथ्वी ने राजा भगीरथ के साथ ही स्वर्ग में जाने का दृढ़ निश्चय किया। तब रथियों में श्रेष्ठ राजा ने सारथि से कहा — महाबली ! रथ को शीघ्रता से चलाओ और स्वर्गलोक में ले चलो ॥ १७-१८ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सारथि ने वायुतुल्य तीव्र वेगवाले उत्तम घोड़ों को तुरंत चलाया ॥ १९ ॥ तब वह उत्तम रथ मेरुशृङ्ग पर सहसा पहुँच गया । तदनन्तर राजा ने प्रलयकालीन घनगर्जन के समान महाशङ्ख बजाया ॥ २० ॥ जब शङ्ख की ध्वनि वैकुण्ठधाम को प्राप्त हुई तब नीररूपिणी पराप्रकृति भगवती गङ्गा द्रवरूप में होकर भगवान् विष्णु के पदकमल से निकलकर कल-कल ध्वनि करती हुई वेगपूर्वक मेरुशृङ्ग पर गिरीं ॥ २१-२२ ॥ तब अतिप्रसन्न राजा जलधारारूपी गङ्गा को देखकर कृतकृत्य हो गये और शङ्ख बजाना छोड़कर नाचने लगे ॥ २३ ॥ शङ्ख की ध्वनि शान्त हो जाने पर भगवती गङ्गा ने भी अपने वेग को छोड़कर मेरुपर्वत के शिखरप र कुछ समय तक विश्राम किया ॥ २४ ॥ उसी समय पृथ्वी त्रैलोक्यपावनी गङ्गा के समीप आकर इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगीं — ॥ २५ ॥

॥ पृथ्वी कृत गङगा स्तुति ॥
॥ धरण्युवाच ॥
देवि गङ्गे जगद्धात्रि ब्रह्मरूपे सुरेश्वरि ।
लोकनिस्तारणार्थाय द्रवरूपे प्रसीद मे ॥ २६ ॥
तवाम्बुकणिकां भक्त्याप्यभक्त्या वापि यः स्पृशेत् ।
सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति गङ्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ २७ ॥
ये त्वां पश्यन्ति लोका हि पापात्मानोऽपि वै सकृत् ।
न तेऽपि यमदण्ड्याः स्युर्देवि गङ्गे नमोऽस्तु ते ॥ २८ ॥
ये स्मरन्ति सकृन्नाम गङ्गेति परमाक्षरम् ।
न तस्यास्ति समो लोके देवो वा मानुषोऽपि वा ॥ २९ ॥
त्वां नमन्ति सदा भक्त्या प्रकृतिं द्रवरूपिणीम् ।
न तेषां दुर्गतिः क्वापि न वा भीतिर्यमादपि ॥ ३० ॥
प्राप्नुवन्ति परं मोक्षं गङ्गे देवि नमोऽस्तु ते ।
त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूताशये स्थिता ॥ ३१ ॥
अविद्योच्छेदिनी विद्या गङ्गे देवि नमोऽस्तु ते ।
अविद्याधारिणी विद्या विष्णुदेहकृतालये ।
विष्णुपादाब्जसम्भूते देवि गङ्गे नमोऽस्तु ते ॥ ३२ ॥
विश्वात्मिके जगद्वन्द्ये शिवध्यानपरायणे ।
गिरिराजसुते देवि गङ्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ३३ ॥
त्वयि भक्तिस्त्वयि प्रीतिस्त्वयि श्रद्धा मतिस्त्वयि ।
येषामस्ति न ते मृत्योर्वशमायान्ति कुत्रचित् ॥ ३४ ॥
नवाऽधः पतनं तेषां न वा दुःखं न वा भयम् ।
त्वत्प्रसादाद्भवेद्देवि गङ्गे मातर्नमोऽस्तु ते ॥ ३५ ॥
शुद्धबोधात्मिके सर्वलोकचैतन्यरूपिणि ।
प्रसीद गङ्गे पापानि ध्वंस विश्वेशि ते नमः ॥ ३६ ॥

पृथ्वी बोलीं — जगत् का पालन करने वाली सुरेश्वरी, ब्रह्मरूपिणी तथा लोक का उद्धार करने के लिये द्रवरूप धारण करने वाली देवी गङ्गे ! मुझपर प्रसन्न होइये ॥ २६ ॥ जो व्यक्ति भक्ति अथवा अभक्ति से भी आपके जलकण का स्पर्श करता है; वह भी मुक्ति को प्राप्त करता है। देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥ जो पापीजन आपका एक बार भी दर्शन कर लेते हैं, उन्हें यमराज के दण्ड का भय नहीं होता। देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है ॥ २८ ॥ दिव्य अक्षरों से युक्त ‘गङ्गा’ इस नाम का जो एक बार स्मरण कर लेते हैं, उनके समान इस लोक में देवता अथवा मनुष्य कोई भी नहीं होता ॥ २९ ॥ द्रवरूपिणी पराप्रकृति आपको जो सदा भक्तिपूर्वक नमन करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती और यमराज से भय भी नहीं रहता, वे उत्तम मोक्ष को प्राप्त करते हैं। देवी गङ्गे! आपको नमस्कार है ॥ ३०१/२

आप एकमात्र परम शक्ति हैं, सभी प्राणियों के हृदय में वास करती हैं, अविद्या को दूर करने वाली विद्यास्वरूपिणी हैं, देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है । आप अविद्या (माया)-को धारण करने वाली विद्यास्वरूपा हैं, भगवान् विष्णु के विग्रह में वास करती हैं तथा भगवान् विष्णु के चरणकमल से उत्पन्न हुई हैं, देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है ॥ ३१-३२ ॥ देवि ! आप विश्वात्मा, विश्व की वन्दनीया, भगवान् शङ्कर के ध्यान में लगी रहने वाली तथा गिरिराजपुत्री हैं, देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है ॥ ३३ ॥ जिनकी आपमें भक्ति, प्रीति, श्रद्धा और बुद्धि है, उन्हें कभी भी मृत्यु का भय नहीं होता । देवी गङ्गे ! आपकी कृपा से उनका न अध: पतन होता है, न उन्हें दुःख और भय ही प्राप्त होता है । माता! आपको नमस्कार है ॥ ३४-३५ ॥ विश्वेशि गङ्गे ! आप शुद्ध ज्ञानस्वरूपिणी, सभी प्राणियों में चेतनारूप से स्थित हैं । भगवती ! आप प्रसन्न होइये और पापों का नाश कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ ३६ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — महामुने ! इस प्रकार स्तुति करती हुई उन दिव्यरूपा पृथ्वी से जगदम्बिका गङ्गा ने इस प्रकार कहा — ॥ ३७ ॥

गङ्गाजी बोलीं — धरणी ! क्षिते! आप मुझसे क्या माँगती हैं, वह अपना वाञ्छित मुझे बतायें। मुझ द्रवरूपिणी को देखकर आप किसलिये स्तुति कर रही हैं? ॥ ३८ ॥

पृथ्वी बोलीं — आप महात्मा राजा भगीरथ पर कृपा करके पूर्वकाल में महाराजा सगर के महायज्ञ में मुनि के शाप से जहाँ इनके पूर्वज भस्मीभूत हैं, उस विवर की ओर प्रस्थान कर रही हैं ॥ ३९ ॥ सुरेश्वरि, सरित्श्रेष्ठे । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ कि समुद्रपर्यन्त चारों दिशाओं में चार धाराओं में विभक्त होकर मेरे तल पर विहार करके मेरे इस शरीर को पवित्र कीजिये ॥ ४० ॥

गङ्गाजी बोलीं — राजा भगीरथ द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवान् विष्णु के चरणकमल को छोड़कर मैं आयी हूँ । अतः उन भगीरथ की इच्छा के अतिरिक्त कुछ भी करने में मैं सक्षम नहीं हूँ ॥ ४१ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — तब राजा भगीरथ ने पृथ्वी के हित की इच्छा से साष्टाङ्ग प्रणाम करके उत्तम वेगवाली गङ्गा से इस प्रकार कहा— ॥ ४२ ॥

राजा बोले — महाभागा, पुण्या, पुण्यतमों में श्रेष्ठतमा तथा सुरवन्दिता मा गङ्गे ! इन पृथ्वी पर आप कृपा कीजिये ॥ ४३ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — महाबुद्धिमान् राजा के इस प्रकार के विचार को जानकर त्रैलोक्यपावनी जगन्माता गङ्गा पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशाओं में तीन धाराओं में विभक्त होकर स्वर्गलोक से चल पड़ीं ॥ ४४ ॥ दक्षिण दिशा की ओर राजा भगीरथ के पथ का अनुगमन करती हुई एक दूसरी तीव्रधारा स्वर्ग में सुशोभित हुई ॥ ४५ ॥ सुरतरङ्गिणी की वह धारा स्वर्ग को आप्लावित करती हुई दक्षिणाभिमुखी होकर तीव्र वेग से कुछ दूर तक चली ॥ ४६ ॥ आगे-आगे मध्याह्नकालीन सूर्य की भाँति कान्तिमान् राजा भगीरथ अद्वितीय रथ पर आरूढ़ होकर शङ्ख बजाते हुए चले ॥ ४७ ॥ स्वर्ग को आप्लावित देखकर देवियाँ तथा किन्नरों के साथ देवता गङ्गा के समीप आकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगे ॥ ४८ ॥

सभी देवताओं के साथ देवराज इन्द्र ने महाबाहु सूर्यवंशी राजा भगीरथ से विनयपूर्वक इस प्रकार कहा — पुण्यकीर्ति ! क्षत्रियश्रेष्ठ ! आप त्रैलोक्यदुर्लभ गङ्गा को लेकर पृथ्वीपर जा रहे हैं । महाभाग ! कुछ क्षण रुककर हमारी बात सुन लीजिये ॥ ४९-५० ॥

देवराज इन्द्र की यह बात सुनकर वहां रुककर राजा भगीरथ ने उनको प्रत्युत्तर दिया ॥ ५१ ॥ प्रभो! देवराज! किस प्रयोजन से आप मुझे ऐसा आदेश दे रहे हैं। वह बतायें, मैं आपकी आज्ञा के अधीन हूँ। मैं वैसा ही करूँगा ॥ ५२ ॥

देवराज बोले — राजन् ! ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ गङ्गा आपके द्वारा लायी गयी हैं। आप उन सम्पूर्ण गङ्गा को पृथ्वी पर ही क्यों ले जा रहे हैं ? ॥ ५३ ॥ गङ्गा की एक सुन्दर, ललित धारा स्वर्ग में भी रहे। मृत्युलोक की भाँति स्वर्गलोक में भी आपकी कीर्ति सुशोभित हो ॥ ५४ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — महामुने! देवराज इन्द्र की यह बात सुनकर राजा भगीरथ भगवती गङ्गा की वहीं पर प्रार्थना करने लगे — माता गङ्गे ! महाभागे ! आपकी एक ललित धारा देवताओं को पवित्र करने के लिये स्वर्ग में भी रहे ॥ ५५-५६ ॥

तब राजा के इस प्रकार प्रार्थना करने पर द्रवमयी गङ्गा दूसरी महाधारा के रूप में परिणत होकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ीं ॥ ५७ ॥ मुने! स्वर्गलोक को पवित्र करने वाली वह महापुण्यमयी धारा मन्दाकिनी के नाम से विख्यात होकर स्वर्गलोक  में प्रतिष्ठित हो गयी ॥ ५८ ॥ वहाँ गन्धर्वोंसहित सभी देवता तथा ऋषिगण अत्यन्त आदर के साथ नित्य स्नान तथा अवगाहन करते हैं ॥ ५९ ॥ राजा भगीरथ ने पुनः रथ पर शङ्ख बजाकर भगवती गङ्गा को पीछे करके दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया ॥ ६० ॥ सुमेरु पर्वत दक्षिण शिखर को प्राप्तकर और उसे ऊँचा देखकर महाबाहु राजा भगीरथ ने हाथ जोड़कर भगवती गङ्गा से कहा — माता! शिवे ! मैं इस महाशिख रको भेदकर आपको पृथ्वी पर कैसे ले चलूँ । सुरोत्तमे ! वह मुझे बताइये ॥ ६१-६२ ॥

गङ्गाजी बोलीं — राजन्! मैं यहाँ रुकती हूँ । आप इस रथ से गिरिशिखर को पारकर दक्षिण भाग की ओर चले जाइये ॥ ६३ ॥ वहाँ आपके द्वारा ऊँची ध्वनि में शङ्ख बजाने पर मैं तीव्र वेग से पर्वत शिखर को भेदकर आपके रथ- मार्ग का अनुसरण करके निश्चित ही पीछे-पीछे आ जाऊँगी ॥ ६४ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार गङ्गा की आज्ञा से राजा भगीरथ पर्वत शिखर को पारकर तीव्र वेगवाले रथ से दक्षिण भाग में आ गये ॥ ६५ ॥ वहाँ उन्होंने प्रलयकालीन मेघगर्जन के समान महान् शङ्खध्वनि की, उससे घोर शब्द हुआ, जिससे नभोमण्डल व्याप्त हो गया ॥ ६६ ॥ परमवेगिनी भगवती गङ्गा उस घोर नाद को सुनकर सुमेरु पर्वत के दक्षिण शिखर को भेदकर स्वयं अवतरित हो गयीं ॥ ६७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘गङ्गानिर्गमन- मेरोर्दक्षिणशृङ्गभेदनान्निर्गमन ‘ नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥

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