श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-72
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
बहत्तरवाँ अध्याय
गङ्गाजी के स्मरण, दर्शन और स्नान का माहात्म्य, गङ्गाजी की महिमा के संदर्भ में सर्वान्तक व्याध का आख्यान
अथः द्विसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीगङ्गामाहात्म्यकथनं

श्रीमहादेवजी बोले — ये पुण्यमयी गङ्गा अपना दर्शन करने तथा अपने जल का स्पर्श करने मात्र से प्राणियों के महापातकों का नाश कर देती हैं तथा उन्हें मोक्षफल प्रदान करती हैं ॥ १ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं द्रवरूपिणी गङ्गा के माहात्म्य का संक्षेप में वर्णन करूँगा; आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ २ ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर अनिच्छा से भी गङ्गा का स्मरण कर लेता है, उसे तीनों लोकों में अमङ्गल का भय नहीं होता है । महामते ! उसके घर में सम्पदा आ जाती है, क्षणभर में उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। जन्म-जन्मान्तर में किये गये पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा उसके पुण्य अक्षय हो जाते हैं । दुःस्वप्न देखने पर, विपत्तिकाल में तथा अत्यन्त दुर्गम स्थान पर एक बार भी गङ्गा का स्मरण करने पर मनुष्य कष्टों से छुटकारा पा जाता है, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३-५ ॥ किसी क्रिया के आरम्भ में यदि कोई त्रैलोक्यपावनी गङ्गा का स्मरण करे तो अविधिपूर्वक भी की गयी वह क्रिया सफल हो जाती है । जप, होम आदि अनुष्ठानों में लगा हुआ प्राणी यदि अप्रासंगिक वचन का उच्चारण कर लेता है तब उसे एक बार गङ्गा का स्मरण करके उस कार्य में पुनः प्रवृत्त होना चाहिये । यदि मोक्ष की इच्छा करने वाला मनुष्य जहाँ कहीं भी गङ्गा का स्मरण कर ले तो गङ्गा उसकी मुक्ति के लिये स्वयं उसकी संनिधि में निवास करती हैं ॥ ६–८ ॥

गङ्गा समस्त कामनाओं की सिद्धि करने वाली, सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाली, समग्र अमङ्गलों को मिटा देने वाली तथा सभी सम्पदाओं को प्रदान करने वाली हैं ॥ ९ ॥ साक्षात् परा प्रकृति गङ्गा स्वयं प्रकट होकर मनुष्यों को स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं। जो उनका स्मरण नहीं करता है, उसका जीवन व्यर्थ कहा गया है ॥ १० ॥ जो पुण्य सभी तीर्थों में किये गये स्नान, सभी देवताओं के पूजन, सब प्रकार के यज्ञ-तप-दान आदि, समस्त तीर्थों के दर्शन तथा सभी प्राणियों से पूजित चरणकमल वाले परमेश्वर के वन्दन और स्तवन से नहीं होता है, वह गङ्गा के स्मरणमात्र से प्राप्त हो जाता है ॥ ११-१२ ॥

महामुने! भगवती गङ्गा के हजार नामों में गङ्गा- यह नाम सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, यह कथन सत्य है, सत्य है । गङ्गा स्मरण में तत्पर रहने वाला नीच प्राणी भी श्रेष्ठ कहा गया है और गङ्गा के स्मरण से विमुख रहने वाला उत्तम प्राणी भी नीच कहा गया है । जिस दिन गङ्गा का स्मरण नहीं किया जाता है, वही दिन दुर्दिन है । मेघाच्छन्न दिन दुर्दिन नहीं है ॥ १३–१५ ॥ महामते! मिथ्या भाषण से उत्पन्न, परस्त्रीगमनजन्य, अवैध हिंसा से उत्पन्न, सुरापान आदि से होने वाले तथा अन्य जो कोई भी पाप हों, वे सब गङ्गाजी के नाम के स्मरणमात्र से विलीन हो जाते हैं ॥ १६-१७ ॥ जो विशुद्धात्मा मनुष्य गङ्गास्नान को उद्देश्य करके यात्रा करता है, उसे पग-पग पर अश्वमेध तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ का फल प्राप्त होता है। गङ्गास्नान के निमित्त जाने वाले मनुष्य के सभी पितरगण प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं और उसके महानिन्दनीय पाप भी दूर से ही भाग जाते हैं ॥ १८-१९ ॥ जो आसन्नमृत्यु मनुष्य गङ्गा-यात्रा करता है, उसे देखकर यमदूत भयाक्रान्त हो दूर चले जाते हैं। उस यात्रा में जहाँ-कहीं भी उसका देहावसान हो जाय, वहीं पर उसकी मुक्ति समझ लेनी चाहिये, विशेषरूप से गङ्गा में मृत्यु हो जाने पर तो मुक्ति अवश्य ही होती है ॥ २०-२१ ॥

गङ्गा को उद्देश्य करके जानेवाले मनुष्य को भाग्यवश मार्ग में पाकर जो मनुष्य उसका आतिथ्य करता है, उसे (गङ्गाप्राप्ति का) आधा पुण्य मिल जाता है – ऐसा कहा गया है। साथ ही जो मनुष्य उसे (गङ्गार्थी को) प्रणाम करता है और उससे विनम्रभाव से बातचीत करता है, वह भी पापमुक्त हो जाता है, यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है। नारद! जो पापात्मा मनुष्य अज्ञानवश उसका अनादर करता है, वह चौदह इन्द्रों के स्थितिकाल तक ( कल्पपर्यन्त ) घोर नरक में दुःख भोगता है ॥ २२-२४ ॥ अपराध करने वाला मनुष्य भी यदि गङ्गा के निमित्त गमन करता है तो राजा को चाहिये कि वह ऐसे व्यक्ति को छोड़ दे और उसे किसी प्रकार दण्डित न करे ॥ २५ ॥ गङ्गा को उद्देश्य करके जाने वाला थका हुआ मनुष्य जिसके कुएँ, बावली या सरोवर का जल पी लेता है, उस मनुष्य का महान् भाग्य समझना चाहिये । वत्स! स्वयं चल सकने में असमर्थ जो मनुष्य गङ्गा- स्नान के लिये प्रस्थान करते हुए किसी दूसरे व्यक्ति को वाहन आदि से पहुँचवा देता है; उसे प्राप्त होने वाले पुण्य के विषय में मुझसे सुनो। उसके पितरों को शाश्वत परम प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। उसे पुण्य प्राप्त होता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं । अन्त में उसकी मृत्यु गङ्गा के जल में निश्चित समझनी चाहिये । पृथ्वीलोक में उसे पुत्र-पौत्र से युक्त संतति तथा अक्षय परम कीर्ति की प्राप्ति होती है और अन्तकाल में गङ्गा का स्मरण होता है ॥ २६-२९१/२

मुने! ब्रह्महत्या करने वाला मनुष्य भी गङ्गा के दर्शनमात्र से क्षणभर में घोर पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य गङ्गा के पास आ करके भक्तिपरायण होकर गङ्गादेवी को प्रणाम करता है, उसका शरीर तथा मानव जन्म सार्थक है ॥ ३०-३१ ॥ उसके पितर धन्य हैं और उसे तो धन्यतम कहा गया है। उसे पाप नहीं लगता और मृत्युका भी भय नहीं रह जाता। महामते ! वह मनुष्य परलोक में अतुलनीय सुख प्राप्त करता है, उसकी गङ्गा में मृत्यु होती है और आगे भी निरन्तर उसे गङ्गा-स्मरण बना रहता है ॥ ३२-३३ ॥

भगवती गङ्गा के दर्शन से सभी देवता, ऋषिगण तथा महात्मा भी कृतकृत्य होते हैं, फिर मनुष्यों का क्या कहना ? महामते ! जो मनुष्य सम्पर्क से भी भगवती गङ्गा का दर्शन प्राप्त कर लेता है, हजारों पाप करने वाला होने पर भी वह यमदण्डका भागी नहीं होता ॥ ३४-३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आपसे इतिहाससहित गङ्गा के उत्तम माहात्म्य तथा अत्यन्त सुन्दर रहस्य का वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये — ॥ ३६ ॥

पूर्वकाल में शबर जाति में उत्पन्न सर्वान्तक नामक एक परम पापी, बलवान् तथा अत्यन्त क्रूर व्याध था। वह जीवनभर बहुत-से प्राणियों को बलपूर्वक मारकर उनके मांस आदि बेचकर अपने कुटुम्ब का भरण- पोषण करता था। वह परस्त्रीगमन तथा पराये धन का हरण करता था। उस दुरात्मा ने कभी भी धार्मिक कृत्य  नहीं किया ॥ ३७–३९ ॥ एक समय की बात है उस व्याध ने वन में जाकर अनेक विध पशुओं का वध किया और फिर इधर-उधर घूमते हुए गङ्गानदी तट पर आकर स्नान किया ॥ ४० ॥ इसी बीच नृपश्रेष्ठ राजा चित्रसेन आखेट करने के लिये उसी वन में पहुँच गये। उन्होंने मांस का बोझा लेकर अपने पुर को जाने के लिये तत्पर उस सर्वान्तक नामक दुरात्मा व्याध को देखा ॥ ४१-४२ ॥ इसी समय महाबली राजा चित्रसेन ने एक सुन्दर मृग को  देखकर धनुष पर बाण चढ़ाकर उसकी ओर निशाना साधा ॥ ४३ ॥ वह मृग बाण चलाने को उद्यत, महान् ओजस्वी राजा चित्रसेन को देखकर बड़ी तेजी से भागा, तभी राजा ने बाण चला दिया ॥ ४४ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! बाण से बिधा हुआ वह मृग रक्त से लथपथ होकर उस व्याध के पास आया ॥ ४५ ॥ व्याध ने राजा को नहीं देखा और उस व्याकुल मृग को देखकर उसने उसे पाश में बाँधकर उठा लिया और राजा ने उसे ऐसा करते हुए देखा ॥ ४६ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् उन क्रुद्ध बलशाली राजा चित्रसेन ने भी वहाँ आकर अनेक पाशों से उस पापात्मा व्याध को बाँध दिया। तदनन्तर उस पापी व्याध को तथा मृग को लेकर राजा चित्रसेन उत्तम घोड़े पर सवार होकर अपने पुर की ओर निकल पड़े ॥ ४७-४८ ॥ जाते समय राजा ने नाव पर चढ़कर गङ्गा को पार किया और मुने । उस समय सम्पर्क में आ जाने से व्याध ने उन भगवती गङ्गा को देख लिया ॥ ४९ ॥

तत्पश्चात् अपने पुर आकर अत्यन्त कुपित राजा ने उस पापात्मा व्याध को कठोर कारागार में डाल दिया ॥ ५० ॥ तब कुछ समय बीतने पर वह सर्वान्तक नामक व्याध कारागार में मर गया। इसके बाद यमदूत उसे पाशों से बाँधकर ले जाने लगे ॥ ५१ ॥ ठीक उसी समय भगवान् शंकर की आज्ञा से शिवगण उन यमदूतों को हराकर उस व्याध को शिवलोक ले गये। शिवगणों से पराजित यमदूतों ने धर्मराज के पास पहुँचकर ‘शिवगणों ने जो कुछ किया था वह सब उनसे कह दिया ‘ ॥ ५२-५३ ॥ उसे सुनकर धर्मराज ने महान् बुद्धिवाले चित्रगुप्त से पूछा — ‘यह व्याध सर्वेश्वर शिव के सांनिध्य में क्यों ले जाया गया? आप यह देखिये कि इसका कितना पुण्य है तथा कितना पाप है ? क्योंकि पुण्य तथा पाप के अलावा मैं कुछ भी नहीं देखता हूँ’ ॥ ५४-५५ ॥ तब धर्माधर्म का विवेचन करने वाले चित्रगुप्त ने उस व्याध के द्वारा सम्पर्क के कारण किये गये सभी पापों का हरण करने वाले तथा महापातकों का विनाश करने वाले पुण्यदायक उत्तम गङ्गादर्श नके विषय में बता दिया। महामते ! उसे सुनकर धर्मराज अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए और गङ्गा को प्रणाम करके उन दूतों से यह बात कहने लगे — ॥ ५६-५७ ॥

धर्मराज बोले — दूतो ! जो लोग सम्पर्क से भी अति पावनी भगवती गङ्गा का दर्शन करते हैं, वे सैकड़ों पापों से युक्त रहने पर भी मेरे द्वारा कभी दण्डित नहीं किये जाते । पतितों का उद्धार करने वाली भगवती गङ्गा का जो एक बार भी स्मरण कर लेते हैं, वे सैकड़ों पापों से घिरे रहने पर भी मेरे द्वारा कभी दण्डित नहीं किये जाते ॥ ५८-५९ ॥ जो लोग उन द्रवरूपिणी गङ्गादेवी का भक्तिपूर्वक निरन्तर ध्यान करते हैं, सैकड़ों पाप करने पर भी वे मेरे दण्डनीय नहीं हैं ॥ ६० ॥ जो लोग भगवती गङ्गा का पूजन करते हैं तथा उनके जल में अवगाहन करते हैं, वे महापातकी होते हुए भी मेरे द्वारा कभी दण्डित नहीं होते ॥ ६१ ॥ गङ्गा में देहत्याग करने वाले प्राणियों की आज्ञा के मैं स्वयं अधीन हूँ। वे लोग इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी नमस्कार के योग्य हैं तो फिर मेरे द्वारा उन्हें दण्डित करने की शंका ही कहाँ है ! ॥ ६२ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — मुने! इस प्रकार वे यमदूत धर्मज्ञानी श्रीयमराज के मुखसे  गङ्गा की ऐसी महिमा सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस उत्तम अध्याय का पाठ करता है, उसे महापाप करने पर भी यमदूतों से कोई भय नहीं होता ॥ ६३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव – नारद-संवाद में ‘श्रीगङ्गामाहात्म्यकथन’ नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥

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