सर्वार्थ-सिद्धि-दायक यन्त्र

विधि-उत्तम योग में निम्न ‘यन्त्र’ बनाएं । कुमकुम में गुलाब- जल या गंगा-जल मिलाकर स्याही बना लें । भोज-पत्न के एक अखण्ड चौरस टुकड़े पर अनार की कलम या सोने अथवा चांदी की शलाका से ‘यन्त्र’ को लिखे । उसे ताँबे की ताबीज मे भरकर अच्छी तरह बन्द करें और लाल डोरे में पिरोकर अपनी दाई भुजा मे बाँधे । साधना मे सफलता मिलेगी । साथ ही अन्य कार्यों मे भी अनुकूलता मिलेगी । श्रद्धा और विश्वास के साथ ‘यन्त्र – रचना’ करनी चाहिए । ‘यन्त्र’ से अंकित भोज-पत्र को शीशे में मढ़वाकर अपन साधना-कक्ष में रखें, तो भी साधना मे सफलता मिलेगी । सर्वार्थ सिद्धि दायक यन्त्र
उक्त यन्त्र वस्तुत: ‘श्रीबाला-त्रिपुर-सुन्दरी देवी’ का पूजा-यन्त्र है । यह यन्त्र शीघ्र लक्ष्मी-दायक ‘३५ अक्षरी नानक-मन्त्र’ से भी सम्बन्धित है ।
उक्त यन्त्र में कुल २५ कोष्ठ हैं- दश प्राण, दश इन्द्रिय, पाँच तन्मात्राएँ । १६ स्वर – सोलह कला और शक्ति-मय ३५ व्यन्जन हैं । यह पूर्व से प्रारम्भ होता है और ईशान मे लय होता है । आठ दिशाएँ – आठ योगिनियाँ हैं । इस यन्त्र को सिद्ध करके मध्य में ‘साधक’ या ‘धारक’ का नाम लिखकर धारण किया जाता है अथवा पूजन में रखकर पूजन-ध्यान (त्राटक) किया जाता है ।

उक्त यन्त्र का एक बहुत सुन्दर प्रयोग है । इस प्रयोग में साधक को नित्य २१ दूर्वांकुर २१ दिनों तक चढ़ाने चाहिए । चढ़ाए हुए दूर्वांकुरों का संग्रह कर २२ वें दिन उन्हें जल में प्रवाहित करना चाहिए । एक-एक करके दूर्वांकुरों को प्रवाहित करे । जो दूर्वा विपरीत गति से लौट कर वापस आए, वह प्रयोग-कर्त्ता साधक के लिए सिद्धि-मयी होगी । प्रयोग में एक बार में सफलता न मिले, तो दुबारा-तिबारा करे । तीसरी बार अवश्य सफलता मिलेगी ।

 

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