July 17, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 317 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय सकलादि मन्त्रों के उद्धार का क्रम सकलादिमन्त्रोद्धारः भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द ! सकल, निष्कल, शून्य, कलाढ्य, समलंकृत, क्षपण, क्षय, अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा आठवाँ शिव [^1] —ये प्रासादपरासंज्ञक मन्त्र के आठ स्वरूप माने गये हैं। (‘कलाढ्य’ सकल के और ‘शून्य’ निष्कल के अन्तर्गत है।) यह शब्दमय मन्त्र साक्षात् सदाशिवरूप है। इसके जप से सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है ॥ १-२ ॥ अमृत, अंशुमान्, इन्द्र, ईश्वर, उग्र, ऊहक्, एकपाद, ऐल, ओज, औषध, अंशुमान् और वशी — ये क्रमशः अकार आदि बारह स्वरों के वाचक हैं (यथा — अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः)। तथा आगे जो शब्द दिये जा रहे हैं, ये ककार आदि अक्षरों के सूचक हैं। कामदेव, शिखण्डी, गणेश, काल, शंकर, एकनेत्र, द्विनेत्र, त्रिशिख, दीर्घबाहु, एकपाद, अर्धचन्द्र, वलय, योगिनीप्रिय, शक्तीश्वर, महाग्रन्थि, तर्पक, स्थाणु, दन्तुर, निधीश, नन्दि, पद्म, शाकिनीप्रिय, मुखबिम्ब, भीषण, कृतान्त (यम), प्राण, तेजस्वी, शक्र, उदधि, श्रीकण्ठ, सिंह, शशाङ्क, विश्वरूप तथा नारसिंह (क्ष)। विश्वरूप अर्थात् हकार को बारह मात्राओं से युक्त करके लिखे। (इस प्रकार ये बारह बीज होते हैं, जो अङ्गन्यास एवं करन्यास के उपयोग में आते हैं।) ॥ ३-८ ॥’ विश्वरूप (ह) – को अंशुमान् (अनुस्वार) तथा ओज (ओकार) – से युक्त करके रखा जाय; उसमें शशिबीज (स) का योग न किया जाय तो ‘हों’ — यह प्रथम बीज उद्धृत होता है, जो ‘ईशान’ से सम्बद्ध है। उपर्युक्त बारह बीजों में पाँच ह्रस्वयुक्त बीज माने जाते हैं और छः दीर्घ बीज। पहली और ग्यारहवीं मात्रा में एक ही ‘हं’ बीज बनता है। ‘हं हिं हुं हें हों’ — ये पाँच ह्रस्वयुक्त बीज हैं तथा शेष दीर्घयुक्त। ह्रस्व बीजों में विलोम गणना से (हों) प्रथम है। शेष क्रमशः तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम कहे गये हैं। द्वितीय आदि दीर्घ हैं। तृतीय बीज है बीज — ‘हें’। यह तत्पुरुष-सम्बन्धी बीज है, ऐसा जानो। पाँचवाँ बीज ‘हुं‘ है, जो दक्षिणदिशावर्ती मुख — ‘अघोर’ का बीज है। सातवाँ बीज है — ‘हिं’। इसे ‘वामदेव का बीज’ जानना चाहिये। इसके बाद रस (अमृत) संज्ञक मात्रा (अकार) से युक्त सानुस्वार हकार अर्थात् ‘हं’ बीज है; वह उपर्युक्त गणनाक्रम से नवाँ है और ‘सद्योजात ‘ से सम्बद्ध है। इस प्रकार उक्त पाँच बीजों से युक्त ‘ईशान’ आदि मुखों को ‘ब्रह्मपञ्चक’ कहा गया है। इनके आदि में ‘प्रणव’ तथा अन्त में ‘नमः’ जोड़ दे। ‘ईशान’ आदि नामों का चतुर्थ्यन्त प्रयोग करे तो सभी उनके लिये पूजोपयुक्त मन्त्र हो जाते हैं। यथा — ॐ हों ईशानाय नमः।’ इत्यादि। इसी प्रकार ‘ॐ हं सद्योजाताय नमः।’ यह सद्योजात-देवता का मन्त्र है। द्वितीय, चतुर्थ आदि मात्राएँ दीर्घ हैं, अतः उनका हृदयादि अङ्गों में न्यास किया जाता है। द्वितीय बीज को बोलकर हृदय और अङ्ग-मन्त्र (नमः) बोलकर हृदय में न्यास करे। यथा — ‘हां हृदयाय नमः, हृदि।’ चतुर्थ बीज ‘शिरोमन्त्र’ है, जो हकार में ईश्वर तथा अंशुमान् ( . ) जोड़ने से सम्पन्न होता है। यथा — ‘ह्रीं शिरसे स्वाहा, शिरसि।’ विश्वरूप (ह) में ऊहक (ऊ) तथा अनुस्वार जोड्नेपर छठा बीज ‘हूं’ बनता है। उसे ‘शिखामन्त्र’ जानना चाहिये। यथा — ‘हूं शिखायै वषट्, शिखायां हुम्।’ अर्थात् कवच का मन्त्र आठवाँ बीज ‘हैं’ है। यथा— ‘हैं कवचाय हुम् – बाहुमूलयोः।’ दसवाँ बीज ‘हौं’ नेत्र मन्त्र कहा गया है। यथा — ‘हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रयोः।’ अस्त्र-मन्त्र वशी (विसर्गयुक्त) है। शिखिध्वज ! इसे शिवसंज्ञक माना गया है। यथा — ‘हः अस्त्राय फट्।’ (इससे चारों ओर तर्जनी और अङ्गुष्ठद्वारा ताली बजाये।) हृदयादि अङ्गों की छः जातियाँ क्रमशः इस प्रकार हैं — नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट् । अब मैं ‘प्रासाद-मन्त्र’ बताता हूँ। ‘हीं हौं हूं’ — ये प्रासादमन्त्र के तीन बीज हैं। इसे ‘कुटिल’ संज्ञा दी गयी है। इस प्रकार यह प्रासाद-मन्त्र समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाला है। हृदय- शिखा आदि बीजों का पूर्वोक्त रीति से उद्धार करके फट्कार पर्यन्त सब अङ्गों का न्यास करना चाहिये। अर्धचन्द्राकार आसन दे। ‘भगवान् पशुपति कामपूरक देवता हैं तथा सर्पों से विभूषित हैं।’ इस प्रकार ध्यान करके महापाशुपतास्त्र मन्त्र [^2] का जप करे। यह समस्त शत्रुओं का मर्दन करने वाला है। यह ‘सकल (कलासहित) प्रासाद मन्त्र’ का वर्णन किया गया। अब ‘निष्कल मन्त्र’ कहा जाता है ॥ ९-१९ ॥ औषध (औ), विश्वरूप (ह), ग्यारहवीं मात्रा, सूर्यमण्डल (अनुस्वार) इनसे युक्त अर्धचन्द्र (अनुनासिक) एवं नाद से युक्त जो ‘हौं’ मन्त्र है। यह ‘निष्कल प्रासाद मन्त्र’ है; इसे संज्ञाविहीन ‘कुटिल’ भी कहते हैं। ‘निष्कल प्रासाद-मन्त्र’ भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। सदाशिवस्वरूप ‘प्रासाद-मन्त्र’ ईशानादि पाँच ब्रह्ममूर्तियों से युक्त होता है; अतः वह ‘पञ्चाङ्ग’ या ‘साङ्ग’ कहा गया है’।[^3] अंशुमान् (अनुस्वार), विश्वरूप (ह) तथा अमृत (अ) इन तीनों के योग से व्यक्त हुआ ‘हं’ बीज ‘शून्य’ नाम से अभिहित होता है। (यह ‘हिं हुं हें हों’ — इन सबका उपलक्षण है।) ईशान आदि ब्रह्मात्मक अङ्गों (मुखों) से रहित होने पर ही उसकी शून्य संज्ञा होती है। ईशानादि मूर्तियाँ इन बीजों के अमृततरु हैं। इनका पूजन समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है ॥ २०-२२ ॥ अंशुमान् (अनुस्वार) युक्त विश्वरूप (ह) यदि ऊहक (ऊ) के ऊपर अधिष्ठित हो तो वह ‘हूं’ बीज ‘कलाढ्य’ कहा गया है। वह ‘सकल’ के ही अन्तर्गत है। सकल के ही पूजन और अङ्गन्यास आदि सदा होते हैं। (इसी तरह जो ‘शून्य’ कहा गया है, वह ‘निष्कल’ के ही अन्तर्गत है।) नरसिंह यमराज के ऊपर बैठे हों, अर्थात् क्षकार मकार के ऊपर चढ़ा हो, साथ ही तेजस्वी (र) तथा प्राण (य) का भी योग हो, फिर ऊपर अंशुमान् (अनुस्वार) हो तथा नीचे ऊहक (दीर्घ ऊकार) हो तो ‘क्ष्म्र्यूं‘— यह बीज उद्धृत होता है। इसकी ‘समलंकृत’ संज्ञा है। यह ऊपर और नीचे भी मात्रा से अलंकृत होने के कारण ‘समलंकृत’ कहा गया है। यह भी ‘प्रासादपर’ नामक मन्त्र का एक भेद है। चन्द्रार्धाकार बिन्दु और नाद से युक्त ब्रह्मा एवं विष्णु के नामों से विभूषित क्रमशः उदधि (व) और नरसिंह (क्ष) को बारह मात्राओं से भेदित करे। ऐसा करने पर पूर्ववत् ह्रस्वस्वरों से युक्त बीज ईशानादि ब्रह्मात्मक अङ्ग होंगे तथा दीर्घस्वरों से युक्त बीजसहित मन्त्र हृदयादि अङ्गों में विन्यस्त किये जायेंगे [^4] ॥ २३-२५१/२ ॥ अब दस बीजरूप प्रणव बताये जाते हैं — ओज को अनुस्वार से युक्त करके ‘ओम्’ इस प्रथम वर्ण का उद्धार करे। अंशुमान् और अंशु का योग ‘आं’ यह नायकस्वरूप द्वितीय वर्ण है। अंशुमान् और ईश्वर — ‘ईं’ — यह तृतीय वर्ण है, जो मुक्ति प्रदान करने वाला है। अंशु (अनुस्वार)- से आक्रान्त ऊहक अर्थात् ‘ॐ’ यह चतुर्थ वर्ण है। सानुस्वार वरुण (व्), प्राण (यू) और तेजस् (र)- अर्थात् ‘व्य्रूं‘ इसे पञ्चम बीजाक्षर बताया गया है। तत्पश्चात् सानुस्वार कृतान्त (मकार) अर्थात् ‘मं‘ यह षष्ठ बीज है। सानुस्वार उदक और प्राण (व्यं) सप्तम बीज के रूप में उद्धृत हुआ है। इन्दुयुक्त पद्म — ‘पं’ आठवाँ तथा एकपादयुक्त नन्दीश ‘नें’ नवाँ बीज है। अन्त में प्रथम बीज ‘ओम्’ का ही उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार जो दशबीजात्मक मन्त्र है, इसे ‘क्षपण’ कहा गया है। इसका पहला, तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ तथा नवाँ बीज क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजातस्वरूप है। द्वितीय आदि बीज हृदयादि अङ्गन्यास में उपयुक्त होते हैं। दसों प्रणवात्मक बीजों के एक साथ उच्चारणपूर्वक ‘अस्त्राय फट्’ बोलकर अस्त्रन्यास [^5] करे। ईशानादि मूर्तियों के अन्त में ‘नमः’ जोड़कर ही बोलना चाहिये, अन्यथा नहीं। द्वितीय बीज से लेकर नवम बीज तक के जो आठ बीज हैं, वे आठ विद्येश्वररूप हैं। उनके नाम ये हैं — अनन्तेश, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकमूर्ति, एकरूप, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी — ये आठ विद्येश्वर कहे गये हैं। शिखण्डी से लेकर अनन्तेशपर्यन्त विलोम क्रम से बीजमन्त्रों का सम्बन्ध जोड़ना चाहियें [^6] । (यही प्रासाद मन्त्र का ‘क्षय’ नामक भेद है।) इस तरह यहाँ मूर्ति विद्या बतायी गयी ॥ २६-३४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सकलादि मन्त्रों के उद्धार का वर्णन’ नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१७ ॥ [^1]: ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’ में ‘प्रासादपरा-संज्ञक’ मन्त्र का उद्धार प्राप्त होता है। उसके अनुसार इसका स्वरूप है — ‘हसौं’। यही यदि सादि हो जाय, अर्थात् ‘सहौं’ के रूप में लिखा जाय तो ‘परा-प्रासाद-मन्त्र’ कहलाता है। केवल ‘ह्रौं’ हो अर्थात् सकार से संयुक्त न हो तो वह शुद्ध ‘प्रासाद-मन्त्र’ है। [^2]: ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में महापाशुपतास्त्र-मन्त्र इस प्रकार उद्धृत किया गया है — ‘ॐ श्लीं इसकलहीं पशुहसकलहीं हूं सकल ह्रीं फट् ।’ [^3]: साङ्ग-मन्त्र के बीज ह्रस्व स्वरों से भेदित होते हैं। न्यास तथा पूजन के लिये उनका स्वरूप यों समझना चाहिये — ‘हों ईशानायोर्ध्ववक्त्राय नमः । हें तत्पुरुषाय पूर्ववक्त्राय नमः। हुं अघोराय दक्षिणवक्त्राय नमः। हिं वामदेवाय उत्तरवक्त्राय नमः। हं सद्योजाताय पश्चिमवक्त्राय नमः ।’ [^4]: यथा — वों ब्रह्मणे क्षों विष्णवे ईशानाय नमः। वें ब्रह्मणे क्षं विष्णवे तत्पुरुषाय नमः। हुं ब्रह्मणे क्षुं विष्णवे अघोराय नमः। विं ब्रह्मणे क्षिं विष्णवे वामदेवाय नमः। वं ब्रह्मणे क्षं विष्णवे सद्योजाताय नमः। ये पूजन के मन्त्र हैं। अङ्गन्यास — वां ब्रह्मणे क्षां विष्णवे हृदयाय नमः। वीं ब्रह्मणे क्षीं विष्णवे शिरसे स्वाहा। वूं ब्रह्मणे क्षं विष्णवे शिखायै वषट्। वैं ब्रह्मणे क्षं विष्णवे कवचाय हुम्। वौं ब्रह्मणे क्षौं विष्णवे नेत्रत्रयाय वौषट्। वः ब्रह्मणे क्षः विष्णवे अस्त्राय फट् । [^5]: यथा — ओम् ईशानाय नमः। ईं तत्पुरुषाय नमः। व्यं अघोराय नमः। व्यं वामदेवाय नमः। नें सद्योजाताय नमः ॥ अङ्गन्यास का क्रम इस प्रकार है — आं हृदयाय नमः। ॐ शिरसे स्वाहा। मं शिखायै वषट्। पं कवचाय हुम्। ओम् नेत्रत्रयाय वौषट्। ओं आं ईं ॐ व्य्रूं मं व्यं पं नें ओम् अस्त्राय फट्। इसी क्रम से करन्यास भी कर सकते हैं। [^6]: यथा — आं शिखण्डिने नमः। ईं श्रीकण्ठाय नमः । ॐ त्रिमूर्तये नमः। व्य्रूं एकरूपाय नमः। मं एकमूर्तये नमः । व्यं शिवोत्तमाय नमः । पं सूक्ष्माय नमः । नें अनन्तेशाय नमः । Content is available only for registered users. 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