December 14, 2025 | aspundir | Leave a comment ॥ गणाधिप पंचक स्तोत्र ॥ श्री एवं पुत्र की प्राप्ति के लिये श्रीगणाधिपस्तोत्रम् सरागिलोकदुर्लभं विरागिलोकपूजितं सुरासुरैर्नमस्कृतं जरादिमृत्युनाशकम् । गिरा गुरुं श्रिया हरिं जयन्ति यत्पदार्चका नमामि तं गणाधिपं कृपापयः पयोनिधिम् ॥ गिरीन्द्रजामुखाम्बुजप्रमोददानभास्करं करीन्द्रवक्त्रमानताघसंघवारणोद्यतम् । सरीसृपेशबद्धकुक्षिमाश्रयामि संततं शरीरकान्तिनिर्जिताब्जबन्धुबालसंततिम् ॥ शुकादिमौनिवन्दितं गकारवाच्यमक्षरं प्रकाममिष्टदायिनं सकामनम्रपङ्क्तये । चकासनं चतुर्भुजैर्विकासिपद्मपूजितं प्रकाशितात्मतत्त्वकं नमाम्यहं गणाधिपम् ॥ नराधिपत्वदायकं स्वरादिलोकदायकं जरादिरोगवारकं निराकृतासुरव्रजम् । कराम्बुजैर्धरन्सृणीन् विकारशून्यमानसैर्हृदा सदा विभावितं मुदा नमामि विघ्नपम् ॥ श्रमापनोदनक्षमं समाहितान्तरात्मना समाधिभिः सदार्चितं क्षमानिधिं गणाधिपम् । रमाधवादिपूजितं यमान्तकात्मसम्भवं शमादिषड्गुणप्रदं नमामि तं विभूतये ॥ गणाधिपस्य पञ्चकं नृणामभीष्टदायकं प्रणामपूर्वकं जनाः पठन्ति ये मुदायुताः । भवन्ति ते विदाम्पुरः प्रगीतवैभवा जनाश्चिरायुषोऽधिकश्रियः सुसूनवो न संशयः ॥ ॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं गणाधिपस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ जो विषयासक्त लोगों के लिये दुर्लभ, विरक्तजनों से पूजित, देवताओं और असुरों से वन्दित तथा जरा आदि मृत्यु के नाशक हैं; जिनके चरणारविन्दों की अर्चना करने वाले भक्त अपनी वाणी द्वारा बृहस्पति को और लक्ष्मी द्वारा श्रीविष्णु को भी जीत लेते हैं; उन दयासागर गणाधिपति को मैं प्रणाम करता हूँ। जो गिरिराजनन्दिनी उमा मुखारविन्द को प्रमोद प्रदान करने के लिये सूर्यरूप हैं; जिनका मुख गजराज के समान है; जो प्रणतजनों की पापराशि का नाश करने के लिये उद्यत रहते हैं; जिनकी कुक्षि (उदर) नागराज शेष से आवेष्टित है तथा जो अपने शरीर की कान्ति से बालसूर्य की किरणावली को पराजित कर देते हैं, उन गणेशजी की मैं सदा शरण लेता हूँ । शुक आदि मौनावलम्बी महात्मा जिनकी वन्दना करते हैं; जो गकार के वाच्यार्थ, अविनाशी तथा सकामभाव लेकर चरणों में प्रणत होने वाले भक्तसमूहों के लिये मनचाही अभीष्ट वस्तु को देने वाले हैं; चार भुजाएँ जिनकी शोभा बढ़ाती हैं; जो प्रफुल्ल कमल से पूजित होते हैं और आत्मतत्त्व के प्रकाशक हैं, उन गणाधिपति को मैं नमस्कार करता हूँ। जो नरेशत्व प्रदान करने वाले स्वर्गादि लोकों के दाता, जरा आदि रोगों का निवारण करने वाले तथा असुरसमुदाय का संहार करने वाले हैं; जो अपने करारविन्दों द्वारा अंकुश धारण करते हैं और निर्विकार चित्त वाले उपासक जिनका सदा ही मन के द्वारा ध्यान करते हैं, उन विघ्नपति को मैं सानन्द प्रणाम करता हूँ। जो सब प्रकार के श्रम या पीड़ा का निवारण करने में समर्थ हैं; एकाग्रचित्त वाले योगी के द्वारा सदा समाधि से पूजित हैं; क्षमा के सागर और गणों के अधिपति हैं; लक्ष्मीपति विष्णु आदि देवता जिनकी पूजा करते हैं; जो मृत्युंजय के आत्मज हैं तथा शम आदि छः गुणों के दाता हैं, उन गणेश को मैं ऐश्वर्यप्राप्ति के लिये नमस्कार करता हूँ। यह ‘गणाधिपपंचकस्तोत्र’ मनुष्यों को अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। जो लोग प्रणामपूर्वक प्रसन्नता के साथ इसका पाठ करते हैं, वे विद्वानों के समक्ष अपने वैभव के लिये प्रशंसित होते हैं तथा दीर्घायु, अधिक श्रीसम्पत्ति से सम्पन्न तथा सुन्दर पुत्र वाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है। ॥ इस प्रकार श्रीशंकराचार्यद्वारा विरचित ‘गणाधिपस्तोत्र’ पूरा हुआ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe