December 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणपति-पूजन की विधि यहाँ गणेशजी के पूजन की शास्त्रीय विधि दी जाती है। जो यज्ञोपवीतधारी द्विज हों, वे वैदिक मन्त्रों तथा पौराणिक मन्त्रों से भी गणपति की पूजा कर सकते हैं। जिनके यज्ञोपवीत न हों, वे वैदिक मन्त्रों का उच्चारण न करके केवल पौराणिक मन्त्रों द्वारा पूजन सम्पन्न कर सकते हैं। गणपति की पूजा में सभी वर्ण के लोगों का अधिकार है। पूजा का मुख्य समय पूर्वाह्नकाल है। प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल तीनों समय भगवान् की पूजा करनी चाहिये। जो तीनों समय पूजन करने में असमर्थ हो, उसे प्रातःकाल ही विस्तृत पूजा कर लेनी चाहिये और मध्याह्न तथा संध्याकाल में केवल पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिये । पूजा के सोलह उपचार ये हैं — १ – आवाहन, २– आसन, ३ – पाद्य, ४– अर्घ्य, ५ – आचमनीय, ६– स्नान, ७–वस्त्र, ८ – यज्ञोपवीत, ९- गन्ध, १०- पुष्प (दूर्वांकुर) ) – माला आदि, ११ – धूप, १२ – दीप, १३- नैवेद्य, १४ – ताम्बूल, १५ – आरार्तिक- प्रदक्षिणा और १६ – पुष्पांजलि ।[^1] पूजन में चार प्रकार के पात्र अपेक्षित होते हैं — पाद्य-पात्र[^2] , अर्घ्य-पात्र, आचमनीय-पात्र और स्नानीय- पात्र। १॰ पाद्य-पात्र में जल तो होता ही है, उसकी अंगभूत चार वस्तुएँ और होती हैं — ‘दूर्वा, विष्णुक्रान्ता (सहदेइया), श्यामाक (सावाँ) और कमल ।’ २॰ अर्घ्य-पात्र [^3] में जल के अतिरिक्त आठ वस्तुएँ होती हैं — ‘दही, दूर्वा, कुशाग्र, पुष्प, अक्षत, कुंकुम, पीली सरसों, जल और सुपारी । ‘ इस प्रकार पाद्य-पात्र चतुरंग और अर्घ्य पात्र अष्टांग होता है। ३॰ आचमनीय-पात्र [^4] में जल के अतिरिक्त जायफल, लवंग और कंकोल डालने चाहिये। ४॰ स्नानीय-पात्र [^5] में जल के साथ अक्षत, गन्ध और पुष्प डालें। जिस द्रव्य का अभाव हो, उसके बदले उसके स्मरणपूर्वक अक्षत डालने चाहिये। जाती (चमेली), शमी, कुशा, कंगु, मल्लिका, कनेर, नाग (नागकेसर), पुन्नाग, अशोक, लाल कमल, नील कमल, चम्पा, बकुल (मौलसिरी), पद्म, बिल्व और पवित्रक — ये पत्र – पुष्प सभी देवताओं के लिये ग्राह्य हैं [^6] । गणेशजी के लिये तुलसी निषिद्ध है और दूर्वांकुर अत्यन्त प्रिय । जो कीड़ों से दूषित हों, बिखरे हों, बासी हों, स्वयं पेड़ से नीचे गिरे हों, ऐसे फूल उपहत माने जाते हैं, उनका देवपूजा में उपयोग न करे। अधखिले पुष्प (मुकुल) और अपक्व अन्न (नैवेद्य) देवता को निवेदित न करे । जहाँ तक बने, स्वयं वृक्ष से चुनकर लाये हुए पुष्पों का पूजा में उपयोग करना चाहिये। देवता पर चढ़ा हुआ, बायें हाथ में रखा हुआ, पहनी हुई धोती के पल्ले में लाया हुआ अथवा जल से धोया हुआ पुष्प भी निर्माल्य समझा जाता है; उसे देवता लोग ग्रहण नहीं करते। फूल डाली पर जिस स्थिति में खिला हो, उसी रूप में उसे दायें हाथ से देवता पर चढ़ाना चाहिये; उसे अधोमुख करके नहीं । कुशाग्र से देवविग्रह पर जल नहीं छिड़कना चाहिये; वह वज्रपात-तुल्य माना गया है। फूल तोड़ने का काम स्नान से पहले करना चाहिये। किंतु तुलसीदल का चयन स्नान करके ही करना उचित है। फूल को वस्त्र या हाथ में न लाकर पात्र-विशेष में लाना चाहिये। रेंड के पत्ते में भी नहीं लाना चाहिये। शुष्क और अपवित्र पुष्प पूजा में सर्वथा त्याज्य हैं। (द्रष्टव्य-आह्निकसूत्रावली) उपासक स्नान-संध्या आदि नित्यकर्म का सम्पादन करके शुद्ध एवं सुखद आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठे। पूजन के लिये गंगाजल एवं षोडशोपचार पूजन की सामग्री एकत्र करके अपने पास रख ले। सामने देवता के लिये पीठ (छोटी चौकी) स्थापित करे । उस पर आधारशक्ति की पूजा करके पायों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य की तथा पूर्वादि दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य की पूजा करे। तत्पश्चात् पीठ पर कमल की भावना करके उसकी कर्णिका में गणपतिदेव की प्रतिमा को विराजमान करे । प्रतिमा के अभाव में एक पात्र में चावल भरकर, उसके ऊपर मौली लिपटी हुई सुपारी स्थापित करके उसी में गणपतिदेव की भावना करे । पूजक यदि गृहस्थ हो तो पूजन के समय सपत्नीक बैठकर पूजा करे। पूजन आरम्भ करने से पूर्व घी का दीपक जलाकर देवपीठ के दाहिने भाग में अक्षत- पुंज पर उसे रख दे और ‘ॐ दीपज्योतिषे नमः ‘ – यह मन्त्र बोलकर गन्ध-पुष्प से उसका पूजन करे । फिर उस दीप में इष्टदेव के ज्योतिर्मय रूप की भावना करके इस प्रकार प्रार्थना करे — (क) भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् । यावत् कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥ ‘हे दीप ! तुम देवता के रूप हो, कर्म के साक्षी तथा विघ्न के निवारक हो; जबतक पूजा-कर्म पूरा न हो जाय, तबतक तुम सुस्थिरभाव से संनिकट रहो।’ तदनन्तर पूर्वाभिमुख बैठा हुआ सपत्नीक यजमान निम्नांकित मन्त्रों को पढ़कर तीन बार आचमन करे — ॐ केशवाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः ॥ फिर ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’ कहकर हाथ धो ले और दाहिने हाथ में कुश की पवित्री 7 धारण करे। उस समय इस मन्त्र का पाठ करे- (ख) ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । (यजुर्वेद १ । १२) तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ॥ (यजुर्वेद ४ । १४) इस प्रकार पवित्री धारण करने के बाद तीन बार प्राणायाम करे । तत्पश्चात् — (क) ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ‘ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥’ ‘कोई पवित्र हो, अपवित्र हो, अथवा किसी भी अवस्था को प्राप्त क्यों न हो, जो भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करता है, वह बाहर-भीतर से पवित्र हो जाता है।’ ‘सच्चिदानन्दघन पुण्डरीकाक्ष पवित्र करें ।’ यह मन्त्र पढ़कर अपने ऊपर तथा पूजन- सामग्री पर जल छिड़के। इसके बाद निम्नलिखित मंगल- मन्त्रों का पाठ करे – (ख) ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे ॥ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानाꣳ रातिरभि नो निवर्तताम् । देवानाꣳ सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे ॥ तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्त्रिधम् । अर्यमणं वरुणꣳ सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ॥ तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः । तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदधेषु जग्मयः । अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥ अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ॥ विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ (यजु० २५। १४। २३) द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षꣳ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वꣳ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥ (यजु० ३६ । १७, २२) सुशान्तिर्भवतु । श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातापितृभ्यां नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । ग्रामदेवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । (क) विश्वेशं माधवं दुण्ढि दण्डपाणिं च भैरवम् । वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ॥ १ ॥ वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ २ ॥ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ ३ ॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ ४ ॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ५ ॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ६ ॥ अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः । सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ ७ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् । येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः ॥ ९ ॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ॥ १० ॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥ ११ ॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ १२ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ १३ ॥ स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ १४ ॥ स र्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥ १५ ॥ उपर्युक्त मांगलिक श्लोकों का भावार्थ इस प्रकार है— “विश्वनाथ, माधव, दुण्ढिराज गणेश, दण्डपाणि, भैरव, काशी, गुहा, गंगा तथा भवानी मणिकर्णिका की मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥ कोटि सूर्यों के समान महातेजस्वी, विशालकाय और टेढ़ी सूँड़वाले गणपतिदेव ! आप सदा सब कार्यों में मेरे विघ्नों का निवारण करें ॥ २ ॥ सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन – ये गणेशजी के बारह नाम हैं। जो मनुष्य विद्यारम्भ, विवाह, गृहप्रवेश, यात्रा, संग्राम (युद्ध) तथा संकट के अवसर पर इन बारह नामों का पाठ और श्रवण करता है, उसके कार्य में विघ्न उत्पन्न नहीं होता है ॥ ३–५ ॥ शुक्लवस्त्र धारण करने वाले, चन्द्रमा के समान गौर, चार भुजाधारी और प्रसन्न मुख वाले गणपतिदेव का ध्यान करे। इससे सम्पूर्ण विघ्नों की शान्ति हो जाती है ॥ ६ ॥ देवताओं और असुरों ने भी अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिये जिनका पूजन किया है तथा जो समस्त विघ्नों को हर लेने वाले हैं, उन गणाधिपति को नमस्कार है ॥ ७ ॥ नारायणि! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो; कल्याणदायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, त्रिनेत्रधारिणी गौरी हो; तुम्हें नमस्कार है ॥ ८ ॥ जिनके हृदय में मंगलधाम भगवान् श्रीहरि विराजते हैं; अर्थात् जो मन-ही-मन उनका चिन्तन करते हैं, उनके समस्त कार्यों में और सदा ही अमंगल नहीं होने पाता है ॥ ९ ॥ लक्ष्मीपते ! मैं जो आपके युगल चरणों का स्मरण करता हूँ। वह स्मरण ही शुभ लग्न है, वही सुदिन है, वही ताराबल, वही चन्द्रबल, वही विद्याबल और वही दैवबल है ॥ १० ॥ जिनके हृदय में नील कमल के समान श्याम- कान्तिवाले भगवान् जनार्दन विराज रहे हैं, उन्हीं का लाभ है, उन्हीं की विजय है; उनकी पराजय किससे हो सकती है? ॥ ११ ॥ जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, भूति तथा ध्रुवा नीति है, ऐसा मेरा विश्वास है। ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — ‘जो लोग अनन्यभाव से चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मुझमें नित्य संयुक्त रहने वाले उन भक्तों के योग-क्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ’ ॥ १३ ॥ जिनका स्मरण करते ही मनुष्य समस्त कल्याण का भाजन हो जाता है, उन नित्य, अजन्मा आदिपुरुष श्रीहरि की मैं शरण लेता हूँ ॥ १४ ॥ त्रिभुवन के स्वामी तीन देव-ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु- आरम्भ किये जाने वाले सभी कार्यों में हमें सिद्धि प्रदान – करें” ॥ १५ ॥ इस प्रकार मंगल- पाठ के अनन्तर यजमान पवित्रीयुक्त हाथ में जल, अक्षत और द्रव्य लेकर निम्नांकित वाक्य पढ़ते हुए संकल्प करे — ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्द्ध श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे अमुकनगरे अमुकग्रामे स्थाने वा बौद्धावतारे अमुकनामसंवत्सरे श्रीसूर्ये अमुकायने अमुकर्तौ महामाङ्गल्यप्रदमासोत्तमे मासे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकयोगे अमुककरणे अमुकराशि स्थिते चन्द्रे अमुकराशि स्थिते श्रीसूर्ये अमुकराशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथाराशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुकगोत्रः अमुकशर्मा (अमुकवर्मा अमुकगुप्तः ) अहं ममात्मनः श्रीमहागणपतिप्रीत्यर्थं यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये । — इस प्रकार संकल्प पढ़कर हस्तगत जलाक्षत-द्रव्य किसी भूमिगत पात्र में छोड़ दे। तत्पश्चात् गणपति-पूजन आरम्भ करे। सबसे पहले निम्नांकित श्लोकों के अनुसार गणेश के स्वरूप का चिन्तन करते हुए उनका आवाहन करे — आवाहन — हे हेरम्ब त्वमेह्येहि ह्यम्बिकात्र्यम्बकात्मज । सिद्धिबुद्धिपते त्र्यक्ष लक्षलाभ पितुः पितः ॥ नागास्यं नागहारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम् । भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः ॥ आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थं च मम क्रतोः । इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे ॥ ‘हे माता पार्वती तथा त्रिलोचन महादेव के पुत्र हेरम्ब! आप आइये, आइये । आप सिद्धि और बुद्धि के पति हैं, तीन नेत्रों से सुशोभित हैं; लाखों का लाभ कराने वाले तथा पिता के भी पिता हैं; यहाँ पधारिये । आप गजानन हैं, नागमय हार धारण करते हैं; आपके चार भुजाएँ हैं; आप गणों के राजा हैं; पाश, अंकुश और परशु आदि दिव्य निजी आयुध आपके हाथों की शोभा बढ़ाते हैं। मैं पूजन के लिये और अपने इस यज्ञ की रक्षा के लिये भी आपका आवाहन करता हूँ। यहाँ पधारकर आप पूजा ग्रहण करें और याग की रक्षा भी करें। [^8] (ख) ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिꣳ हवामहे वसो मम ॥ आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (यजु० २३ । १९) ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि स्थापयामि । प्रतिष्ठापन — आवाहन के पश्चात् देवता का प्रतिष्ठापन करे — ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञꣳसमिमं दधातु । विश्वेदेवास इह | मादयन्तामो ३ प्रतिष्ठ ॥ (यजु० २ । १३) अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च । अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥ सिद्धिबुद्धिसहित गणपते सुप्रतिष्ठितो वरदो भव । आसन- अर्पण — इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर दिव्य सिंहासन की भावना से पुष्प अर्पित करे ꣳ (क) विचित्ररत्नखचितं दिव्यास्तरणसंयुतम् । स्वर्णसिंहासनं चारु गृह्णीष्व सुरपूजित ॥ ‘देवपूजित गणेश! यह सुन्दर स्वर्णमय सिंहासन ग्रहण कीजिये। इसमें विचित्र रत्न जड़े गये हैं तथा इसपर दिव्य आस्तरण (बिछावन) पड़ा हुआ है । ‘ (ख) ॐ पुरुष एवेदꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नम:, आसनं समर्पयामि । इसके बाद निम्नांकित मन्त्र से गणेशजी के पाद-प्रक्षालन के लिये पाद्य अर्पित करे — (क) ॐ सर्वतीर्थसमुद्भूतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम् । विघ्नराज गृहाणेदं भगवन् भक्तवत्सल ॥ ‘भक्तवत्सल भगवान् विघ्नराज ! यह सब तीर्थों के जल से तैयार किया गया तथा गन्ध आदि से मिश्रित पाद्य-जल आप ग्रहण कीजिये । ‘ (ख) ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि । अर्घ्यदान — तदनन्तर गन्ध आदिसे युक्त अर्घ्यजल अर्पित करे और निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े — (क) ॐ गणाध्यक्ष नमस्तेऽस्तु गृहाण करुणाकर । अर्घ्यं च फलसंयुक्तं गन्धमाल्याक्षतैर्युतम् ॥ ‘करुणानिधान गणाध्यक्ष ! आपको नमस्कार है। आप गन्ध, पुष्प, अक्षत और फल आदिसे युक्त यह अर्घ्यजल स्वीकार करें।’ (ख) ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (यजु० ३१ । ४) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि । आचमनीय-अर्पण — इसके अनन्तर गंगाजल से आचमन कराये और नीचे दिया हुआ मन्त्र पढ़े — (क) विनायक नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवन्दित । गङ्गोदकेन देवेश कुरुष्वाचमनं प्रभो ॥ ‘देवेश्वर ! देववन्दित प्रभो! विनायक ! आपको नमस्कार है। आप गंगाजल से आचमन करें।’ (ख) ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५) ॐ सिद्धिबुद्धि- सहिताय महागणपतये नमः, मुखे आचमनीयं समर्पयामि । स्नानीय समर्पण — तदनन्तर नीचे दिये हुए मन्त्र को बोलकर गंगाजल से स्नान कराने की भावना से स्नानीय जल अर्पित करे — (क) मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् । तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘देव! मन्दाकिनी (गंगा) – का जो जल समस्त पापहारी और शुभ है, वही आपके स्नान के लिये प्रस्तुत किया गया है; आप इसे स्वीकार करें।’ (ख) ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ६) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, सर्वाङ्गे स्नानं समर्पयामि । पंचामृत-स्नान — इसके बाद नीचे लिखे मन्त्र को पढ़कर पंचामृत से गणपतिदेव को स्नान कराये — (क) पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं पयो दधि घृतं मधु । शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘प्रभो! दूध, दही, घी, मधु और शर्करा को एकत्र मिलाकर तैयार किया गया यह पंचामृत मैं ले आया हूँ; इसे आप स्नान के लिये ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपियन्ति सस्स्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । इसके बाद दूध, दही आदि से पृथक्-पृथक् स्नान कराकर शुद्ध जल से भी स्नान कराना चाहिये । दूध से स्नान कराने के लिये मन्त्र निम्नलिखित है — पयः स्नान — (क) कामधेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥ ‘प्रभो! कामधेनु के थन से प्रकट, सबके लिये परम जीवन, पवित्र तथा यज्ञ का हेतुभूत यह दूध आपको स्नान के लिये अर्पित है । ‘ (ख) ॐ पयः पृथिव्याम्पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः । पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥ (यजु० १८। ३६) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पयः स्नानं समर्पयामि । पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । दधि-स्नान — (क) पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् । दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘देव! यह दूध से उत्पन्न, मीठा-खट्टा, चन्द्रसदृश उज्ज्वल दही मैं ले आया हूँ; आप इसे स्नान के लिये ग्रहण करें । ‘ (ख) ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करत् प्राण आयूꣳषि तारिषत् ॥ (यजु०२३। ३२) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दधिस्नानं समर्पयामि । दधिस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । घृत- स्नान — (क) नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् । घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘भगवन्! नवनीत (मक्खन) – से उत्पन्न तथा सबको संतुष्ट करने वाला यह घृत मैं आपको अर्पित करता हूँ; इसे आप स्नान के लिये स्वीकार करें।’ (ख) ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृ घृतम्वस्य धाम । अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम् ॥ (यजु० १७। ८८) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, घृतस्नानं समर्पयामि । घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । मधु-स्नान — (क) पुष्परेणुसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु । तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘प्रभो! यह पुष्प के पराग से प्रकट और तेज की पुष्टि करने वाला दिव्य सुस्वादु, मधुर मधु सेवामें प्रस्तुत है; आप इसे स्नान के लिये ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः । मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्त् पार्थिवꣳ रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता । मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ २ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गाव भवन्तु नः ॥ (यजु० १३ । २७–२९ ) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मधुस्नानं समर्पयामि । मधुस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । शर्करा-स्नान — (क) इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिदा शुभा । मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘जो ईख के सार-तत्त्व से बनी है, पुष्टि देनेवाली, शुभ तथा मैल को दूर कर देने वाली है; वह दिव्य शर्करा सेवामें प्रस्तुत है; आप इसे स्नान के लिये स्वीकार करें।’ (ख) ॐ अपा ꣳ रसमुद्वयसꣳ सूर्ये सन्तꣳ समाहितम् । अपाꣳ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥ (यजु० ९ । ३) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शर्करास्नानं समर्पयामि । शर्करास्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । इसके बाद सुगन्ध तैल (इत्र) आदि अर्पित करे। मांगलिक स्नान (सुवासित तैल या इत्र ) (क) चम्पकाशोकबकुलमालतीमोगरादिभिः । वासितं स्निग्धताहेतु तैलं चारु प्रगृह्यताम् ॥ ‘प्रभो! चम्पा, अशोक, मौलसिरी, मालती और मोगरा आदि से वासित तथा चिकनाहटहेतुभूत यह सुन्दर तैल आप ग्रहण करें ।’ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, सुवासितं तैलं समर्पयामि । शुद्धोदक स्नान — तदनन्तर गंगाजल या तीर्थ – जल से शुद्ध स्नान कराये । मन्त्र निम्नलिखित है — (क) गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदा सिन्धुः कावेरी स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘ इस शुद्ध जल के रूप में यहाँ गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी उपस्थित हैं; आप स्नान के लिये यह जल ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ (यजु० ११ । ५०) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । वस्त्र-समर्पण — (क) शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम् । देहालंकरणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ ‘प्रभो! यह वस्त्र सेवामें अर्पित है। यह सर्दी, हवा और गरमी से बचाने वाला, लज्जा का उत्तम रक्षक तथा शरीर का अलंकार है; आप इसे स्वीकार करके मुझे शान्ति प्रदान करें ।’ (ख) ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः ॥ (ऋक्० ३ । ८ । ४) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, वस्त्रं समर्पयामि । ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्र (उत्तरीय) – समर्पण — (क) उत्तरीयं तथा देव नानाचित्रितमुत्तमम् । गृहाणेदं मया भक्त्या दत्तं तत् सफलीकुरु ॥’ हे देव! नाना प्रकारके चित्रों (बेल-बूटों) – से सुशोभित यह उत्तम उत्तरीय वस्त्र मैंने भक्तिपूर्वक अर्पित किया है; आप इसे ग्रहण करें और सफल बनायें।’ (ख) ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः । वासो अग्ने विश्वरूपꣳ संव्ययस्व विभावसो ॥ (यजु० ११।४०) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, उपवस्त्रं समर्पयामि । तदन्ते आचमनीयं समर्पयामि । (वस्त्र के अभाव में लाल सूत एवं अलंकरण के लिये अक्षत चढ़ाना चाहिये ।) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, वस्त्रोपवस्त्रार्थे रक्तसूत्रं समर्पयामि । अलंकरण — ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, अलंकरणार्थमक्षतान् समर्पयामि । यज्ञोपवीत- समर्पण — (क) नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् । उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥ ‘परमेश्वर! नौ तन्तुओं से युक्त, त्रिगुण और देवतास्वरूप यह यज्ञोपवीत मैंने समर्पित किया है। आप इसे ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि । ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, आचमनं समर्पयामि । गन्ध — (क) श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘ सुरश्रेष्ठ! यह दिव्य श्रीखण्डचन्दन, सुगन्ध से पूर्ण एवं मनोहर है। विलेपनस्वरूप यह चन्दन आप स्वीकार करें।’ (ख) ॐ त्वां गन्धर्वा अखनस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः । त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत ॥ (यजु० १२ । ९८) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, गन्धं समर्पयामि । अक्षत — (क) अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥ ‘सुरश्रेष्ठ परमेश्वर! ये कुंकुम में रँगे हुए सुन्दर अक्षत हैं; मैंने भक्तिभाव से इन्हें आपकी सेवामें अर्पित किया है; आप इन्हें ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा विन्द्र ते हरी । (यजु० ३ । ५१) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, अक्षतान् समर्पयामि । पुष्प – माला — (क) माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो । मयाहृतानि पुष्पाणि गृह्यन्तां पूजनाय भोः ॥ ‘प्रभो! मालती आदि की सुगन्धित मालाएँ और फूल मेरे द्वारा लाये गये हैं; आप इन्हें पूजार्थ ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ ओषधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः । अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः ॥ (यजु० १२ । ७७) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, पुष्पमालां समर्पयामि । मन्दारपुष्प — (क) वन्दारुजनमन्दार मन्दारप्रिय धीपते । मन्दारजानि पुष्पाणि श्वेतार्कादीन्युपेहि भोः ॥ ‘हे वन्दना करने वाले भक्तों के लिये मन्दार (कल्पवृक्ष)-के समान कामनापूरक ! मन्दारप्रिय ! बुद्धिपते गणेश! मन्दार के तथा श्वेत आक आदि के फूल ग्रहण कीजिये ।’ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मन्दारपुष्पाणि समर्पयामि । शमीपत्र — (क) त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै । शमीदलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक ॥ ‘गणनायक हेरम्ब ! आपके जो प्रिय सुन्दर पुष्प तथा कोमल शुभ शमीपत्र हैं, उन्हें ग्रहण कीजिये।’ (ख) ॐ य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी। शमीभिर्यज्ञमाशत ॥ (ऋक्० १ । २० । २) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, शमीपत्राणि समर्पयामि । दूर्वांकुर — (क) दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान् । आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक ॥ ‘गणनायक! आपकी पूजाके लिये मेरे द्वारा अत्यन्त हरे, अमृतमय तथा मंगलप्रद दूर्वांकुर लाये गये हैं, आप इन्हें स्वीकार करें।’ (ख) ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च ॥ (यजु० १३। २०) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि । सिन्दूर — (क) सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् । शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘प्रभो! सुन्दर, लाल, सौभाग्यस्वरूप, सुखवर्धक, शुभद एवं कामपूरक सिन्दूर सेवामें प्रस्तुत है; इसे ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥ (यजु० १७। ९५) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, सिन्दूरं समर्पयामि । नाना परिमलद्रव्य, अबीर-चूर्ण — (क) नानापरिमलैर्द्रव्यैर्निर्मितं चूर्णमुत्तमम् । अबीरनामकं चूर्णं गन्धाढ्यं चारु गृह्यताम् ॥ ‘भाँति-भाँति के सुगन्धित द्रव्यों से निर्मित यह गन्धयुक्त अबीर-नामक सुन्दर तथा उत्तम चूर्ण ग्रहण कीजिये ।’ (ख) ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमाꣳसं परिपातु विश्वतः ॥ (यजु० २९ । ५१) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । दशांग धूप — (क) वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः । आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘वनस्पति के रस से प्रकट, सुगन्धित, उत्तम गन्धरूप और समस्त देवताओं के सूँघने योग्य यह धूप सेवामें अर्पित है। प्रभो! इसे ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धूर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः । देवानामसि वह्नितमꣳ सस्नितमं पतिमं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥ (यजु० १।८) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, धूपमाघ्रापयामि । दीप-दर्शन — (क) साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥ भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने । त्राहि मां निरयाद् घोराद्दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥ ‘देवेश ! घी में डुबोयी रुई की बत्ती को अग्नि से प्रज्वलित करके दीप आपकी सेवामें अर्पित किया गया है; आप इसे ग्रहण करें; यह त्रिभुवन के अन्धकार को दूर करने वाला है। मैं इष्ट देवता परमात्मा गणपति को दीप देता हूँ। प्रभो! आप मुझे घोर नरक से बचाइये । दीपज्योतिर्मय देव! आपको नमस्कार है।’ (ख) ॐ अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा । अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा । ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥ (यजु० ३ । ९) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, दीपं दर्शयामि । नैवेद्य-निवेदन — दीप-अर्पण के पश्चात् हाथ धोकर नैवेद्य अर्पण करे। नैवेद्य में भाँति-भाँति के मोदक, गुड़ तथा ऋतु के अनुकूल उपलब्ध नाना प्रकार के उत्तमोत्तम फल प्रस्तुत करे। नैवेद्य में देय वस्तु का पहले शुद्ध जल से प्रोक्षण करे। फिर धेनुमुद्रा दिखाकर देवता सम्मुख स्थापित करे। इसके बाद निम्नांकित मन्त्रों को पढ़े — (क) नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु । ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥ शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च । आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘देव! आप यह नैवेद्य ग्रहण करें और अपने प्रति मेरी भक्ति को अविचल कीजिये । वांछित वर दीजिये और परलोक में परम गति प्रदान कीजिये । शक्कर और खाँड़ से तैयार किये गये खाद्य पदार्थ, दही, दूध, घी तथा भक्ष्य-भोज्य आहार नैवेद्य के रूप में प्रस्तुत हैं; आप यह नैवेद्य कृपापूर्वक स्वीकार करें।’ (ख) ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षꣳ शीर्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ २ अकल्पयन् ॥ (यजु० ३९ । १३ ) ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा ॥ ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा ॥ ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, नैवेद्यं मोदकमयं ऋतुफलानि च समर्पयामि । ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, आचमनीयं मध्ये पानीयं उत्तरापोशनं च समर्पयामि । करोद्वर्तन के लिये चन्दन — (क) ॐ चन्दनं मलयोद्भूतं कस्तूर्यादिसमन्वितम् । करोद्वर्तनकं देव गृहाण परमेश्वर ॥ ‘देव! मलयपर्वत से उत्पन्न चन्दन में कस्तूरी आदि मिलाकर मैंने करोद्वर्तन तैयार किया है। परमेश्वर ! इसे स्वीकार करें ।’ (ख) अꣳशुना ते अꣳशुः पृच्यतां परुषा परुः । गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः ॥ (यजु० २० । २७) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, चन्दनेन करोद्वर्तनं समर्पयामि । पूगीफलादिसहित ताम्बूल – अर्पण — (क) ॐ पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् । एलाचूर्णादिसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ ‘प्रभो! महान् दिव्य पूगीफल, इलायची और चूना आदि से युक्त पान का बीड़ा सेवामें प्रस्तुत है; इसे ग्रहण करें ।’ (ख) ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मुखवासार्थमेलापूगीफलादिसहितं ताम्बूलं समर्पयामि । नारिकेलफल- अर्पण — (क) इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥ ‘देव! यह नारियल का फल मैंने आपके सामने रखा है; इससे जन्म-जन्म में मुझे सफलता प्राप्त हो ।’ (ख) ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वꣳहसः ॥ (यजु० १२ । ८९) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, नारिकेलफलं समर्पयामि । दक्षिणा – समर्पण — (क) हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेम बीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ ‘सुवर्ण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के गर्भ में स्थित अग्नि का बीज है। वह अनन्त पुण्य फल प्रदान करने वाला है। भगवन्! वह आपकी सेवामें अर्पित है; अतः इसे स्वीकार कर मुझे शान्ति प्रदान करें ।’ (ख) ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ (यजु० १३ । ४) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थं द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । नीराजन या आरार्तिक ( आरती ) — (क) कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् । आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव ॥ ‘प्रभो! केले के गर्भ से उत्पन्न यह जलाया गया कपूर है; इसी के द्वारा मैं आपकी आरती करता हूँ। आप इसे देखिये और मेरे लिये वरदायक होइये ।’ (ख) ॐ इदं हविः प्रजननं मे अस्तु, दशवीरꣳसर्वगणꣳस्वस्तये । आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि । अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥ (यजु० १९ । ४८) आ रात्रि पार्थिवꣳरजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवः सदाꣳसि बृहती तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥ (यजु० ३४ । ३२) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, कर्पूरनीराजनं समर्पयामि । पुष्पाञ्जलि – समर्पण — (क) नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च । पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ॥ ‘परमेश्वर! यथासमय उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के सुगन्धित पुष्प मैंने पुष्पांजलि के रूप में अर्पित किये हैं; आप इन्हें स्वीकार करें ।’ (ख) ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणिप्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (यजु० ३१ । १६) ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिः हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ (यजु० २३ । १९) ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन । ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥ (यजु० २३ । १८) ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । स मे कामान् काम कामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः । ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात् पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे । आवीक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति । ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सम्बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥ (यजु० १७। १९) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । प्रदक्षिणा — (क) यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञातकृतानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥ ‘मनुष्य द्वारा जाने या अनजाने में जो कोई पाप किये गये हैं, वे परिक्रमा करते समय पद-पद पर नष्ट होते हैं ।’ (ख) ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः । तेषा सहस्त्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥ (यजु० १६ । ६१) ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि । विशेषार्ध्य-समर्पण — तदनन्तर जल, गन्ध, अक्षत, फल, फूल, दूर्वा और दक्षिणा एक ताम्रमय पात्र में रखकर दोनों घुटनों को पृथ्वी पर टेककर उक्त अर्घ्य-पात्र (ताम्र-पात्र) – को दोनों हाथों की अंजलि ले और उसे मस्तक से लगाकर निम्नांकित श्लोकों को पढ़ते हुए श्रीगणपति को अर्घ्य दे — (क) रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक । भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात् ॥ द्वैमातुर कृपासिन्धो षाण्मातुराग्रज प्रभो । वरदस्त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद । अनेन सफलार्घ्येण सफलोऽस्तु सदा मम । “त्रिलोकी की रक्षा करने वाले गणाध्यक्ष ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । आप भक्तों को अभय देने वाले और भव-सागर से उनकी रक्षा करने वाले होइये। दयासागर ! आप दो माताओं के पुत्र होने से ‘द्वैमातुर’ कहे गये हैं। “प्रभो! आप षाण्मातुर स्कन्द के बड़े भाई हैं, वरदाता हैं, वर दीजिये। अभीष्ट वस्तुओं के दाता गणेश ! मेरी वाञ्छा पूर्ण कीजिये। इस फलयुक्त अर्घ्य-दान से आप मेरे लिये सफल-फल दाता होइये। ” ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, विशेषार्घ्यं समर्पयामि । प्रार्थना — विशेषार्घ्य देने के पश्चात् निम्नांकित श्लोक पढ़कर प्रार्थना करे — विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥ भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय । विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते ॥ नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः । नमस्ते रुद्ररूपाय करिरूपाय ते नमः ॥ विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे । भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥ लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति । विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ॥ गणेशपूजने कर्म यन्यूनमधिकं कृतम् । तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम ॥ अनया पूजया सिद्धि-बुद्धिसहितो महागणपतिः प्रीयतां न मम । ” गणनाथ! आप विघ्नेश्वर (विघ्नोंपर शासन करनेवाले) हैं। वरदाता हैं, देवताओं के प्रिय हैं, लम्बोदर हैं, विविध कलाओं से पूर्ण हैं, सम्पूर्ण जगत् के हितैषी हैं, गजानन हैं, वैदिक यज्ञ से विभूषित और गौरी (पार्वती)-के पुत्र हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है । आप भक्तों के संकट मिटाने में सदा लगे रहते हैं, गणों के ईश्वर एवं सर्वेश्वर हैं, कल्याणप्रद एवं देवेश्वर हैं, विद्याधर, विकट और वामन हैं तथा भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें वर देते हैं; आपको बारंबार नमस्कार है । आप ब्रह्मरूप, विष्णुरूप, रुद्ररूप और गजरूप हैं; इन सभी रूपों में आपको बार-बार नमस्कार है । सम्पूर्ण विश्व का रूप आपका ही स्वरूप है; आप ब्रह्मचारी हैं; आपको नमस्कार है । विनायक ! आप भक्तप्रिय देवता हैं; आपको नमस्कार है । लम्बोदर ! आपको मोदक सदा ही प्रिय है; आपको नमस्कार है । देव ! आप सदा मेरे सब कार्यों में विघ्नों का निवारण करें। गणेश ! जो लोग आपको ‘विघ्न-शत्रु-दलन’, ‘सुन्दर’, ‘भक्तप्रिय’, ‘सुखद,’ ‘फलप्रद,’ ‘विद्याप्रद’ और ‘अघहर’ इत्यादि नामों से पुकारकर आपकी स्तुति करते हैं, उनके लिये आप नित्य ही वरदायक हों। गणेशजी की पूजा में जो कर्म न्यून या अधिक किया गया है, उस सबके द्वारा सर्वात्मा गणपति सदा मुझपर प्रसन्न रहें। ” ‘इस पूजा से सिद्धि-बुद्धिसहित महागणपति संतुष्ट हों । इसपर उन्हीं का स्वत्व है, मेरा नहीं ।’ ॥ श्रीगणपति-पूजन-विधि सम्पूर्ण ॥ [^1]: जैसा कि ‘कर्मप्रदीप ‘में वर्णन है— आवाहनासने पाद्यमर्घ्यमाचमनीयकम् । स्नानं वस्त्रोपवीते च गन्धमाल्यान्यनुक्रमात् ॥ १ ॥ धूपं दीपं च नैवेद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणा । पुष्पाञ्जलिरिति प्रोक्ता उपचारास्तु षोडश ॥ २ ॥ [^2]: दूर्वा च विष्णुक्रान्तं च श्यामाकं पद्ममेव च । पाद्याङ्गानि च चत्वारि कथितानि समासतः ॥ (आह्निकसूत्रावली) [^3]: दधिदूर्वाकुशाग्रैश्च कुसुमाक्षतकुङ्कुमैः । सिद्धार्थोदकपूगैश्च अष्टाङ्गं ह्यर्घ्यमुच्यते ॥ (व्रत- परिचय) [^4]: तथाऽऽचमनपात्रेऽपि दद्याज्जातिफलं मुने । लवङ्गमपि कङ्कोलं शस्तमाचमनीयके ॥ [^5]: अक्षता गन्धपुष्पाणि स्नानपात्रे तथा त्रयम् । [^6]: जाती शमी कुशा कङ्गुर्मल्लिका करवीरजम् । नागपुन्नागकाशोकरक्तनीलोत्पलानि च ॥ चम्पकं वकुलं चैव पद्मं बिल्वं पवित्रकम् । एतानि सर्वदेवानां संग्राह्याणि समानि च ॥ (आह्निकसूत्रावली) [^7]: कात्यायन ने पवित्री का लक्षण इस प्रकार बताया है — अनन्तर्गर्भिणं साग्रं कौशं द्विदलमेव च । प्रादेशमात्रं विज्ञेयं पवित्रं यत्र कुत्रचित् ॥ “कुश के प्रादेश-मात्र दो पत्ते, जिनके गर्भ में दूसरा पत्ता न हो और अग्रभाग सुरक्षित हों, वे ही प्रत्येक कर्म में ‘पवित्र’ जानने योग्य हैं।” [^8]: यहाँ आवाहनी मुद्रा का प्रदर्शन करे। दोनों हाथों की अंजलि जोड़कर दोनों अंगुष्ठों को अनामिकाओं के मूल पर्व में लगावे – यही ‘आवाहनी मुद्रा’ है। Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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