श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-43
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
त्रिपुरासुर के साथ युद्ध में भगवान् शंकर की पराजय
अथः त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
शङ्करस्य पराजय, पार्वत्याश्च हिमालयसमीप गमनं

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी ! ] उस द्वन्द्व-युद्ध में गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुर से, षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्ड से और नन्दी चण्ड से युद्ध करने लगे ॥ १ ॥ बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकाय से तथा भुशुण्डी विष के सदृश प्राणहारी कालकूट से युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र – दोनों महान् बलशाली [परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राम में] बलवान् इन्द्र ने भी दैत्य ( त्रिपुरासुर ) – के अमात्य से युद्ध किया। दैत्यपुत्र बलि के साथ रणदुर्मद [ इन्द्रपुत्र ] जयन्त ने और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्य के साथ अस्त्रों के ज्ञाता देवताओं के आचार्य बृहस्पति ने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ इस प्रकार देवताओं और दैत्यों के अनेक जोड़ों में युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करने में मैं सैकड़ों वर्षों में भी समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥

उस युद्ध में रथी रथियों के साथ, गजारोही गजारोहियों के साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियों के साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकों के साथ युद्ध करने लगे। उस भयंकर संग्राम में अनेक प्रकार के वाद्यों के घोष, हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट, वीरों के सिंहनाद और रथों के धुरों के घर्षण से उत्पन्न ध्वनि से [ वह रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥ उस युद्ध में कुछ वीर शस्त्रों का त्याग करके विविध प्रकार से मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगों से दूसरे के अंगों पर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥

तभी प्रचण्ड ने धनुष को कान तक खींचकर पत्थर पर घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणों से षडानन कार्तिकेयजी पर प्रहार किया ॥ ९ ॥ तब भगवान् कार्तिकेय ने उन्हें अपने तक पहुँचने के पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणों से काटकर पाँच बाणों से उसपर प्रहार किया । इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥ १०१ / २ ॥ [उधर] नन्दी ने भी चण्ड पर पाँच तीक्ष्ण बाणों से प्रहार किया, वह भी मूर्च्छित होकर सहसा धरती पर गिर पड़ा। भीमकाय ने पुष्पदन्त पर दस बाणों से प्रहार किया, परंतु पुष्पदन्त ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन्हें समरभूमि में काट डाला और उसपर तीन बाणों से प्रहार किया, जिससे उसने भी भूतल का आश्रय ले लिया अर्थात् पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ ११–१३ ॥ भुशुण्डी ने पाँच बाणों से कालकूट को गिरा दिया। महाबली वीरभद्र ने भी उस समरभूमि में क्रोधित होकर वज्रदंष्ट्र पर चार तीक्ष्ण बाणों का प्रहार किया, उन बाणों का निवारण करके उसने वीरभद्र पर तीन बाणों का प्रहार किया ॥ १४-१५ ॥ उन आते हुए बाणों को वीरभद्र ने शीघ्र ही तीन बाणों से काट डाला और वेगपूर्वक चलाये गये तीन बाणों से वज्रदंष्ट्र को गिरा दिया ॥ १६ ॥

इन्द्र ने भी वज्र के प्रहार से दैत्य त्रिपुरासुर के अमात्य को गिरा दिया। अनेक वीरों का पतन हो जाने पर इन्द्रपुत्र जयन्त को मारने की इच्छा से तीक्ष्ण तलवार उठाये दैत्यपुत्र बलि उसके निकट आया । उसे इस प्रकार आते देखकर एक पंखयुक्त बाण से [जयन्त ने उसके] खड्ग को काट डाला ॥ १७-१८ ॥ पुनः जयन्त ने शीघ्र ही दैत्यपुत्र बलि पर तीन बाणों से प्रहार किया। उससे आहत होकर वह रक्त का वमन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण सेना के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने पर देवसमूह द्वारा पीड़ित होकर चारों ओर पलायन कर रहे दैत्यों को देखकर कुछ विजयी प्रमथगण उनके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार देवताओं की विजय होने और अपनी सेना के पलायन कर जाने पर भी त्रिपुर में अधिष्ठित असुर त्रिपुरासुर स्वयं ही ईश्वर [ भगवान् शंकर ]-से युद्ध करने के लिये आया। पहले उन दोनों ने शस्त्र – युद्ध किया और तत्पश्चात् अस्त्रों से युद्ध किया ॥ २०-२२ ॥

उस दैत्य त्रिपुरासुर ने वरुणास्त्र छोड़ा, जिससे भयंकर से-भी-भयंकर वर्षा होने लगी। उस समय अत्यधिक कुहासा छा जाने के कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ २३ ॥ उस कोलाहलपूर्ण, भयंकर और अत्यन्त कठिनाई से जीते जा सकने वाले युद्ध में कभी-कभी बिजली की चमक से ही अपने-पराये का ज्ञान हो पाता था ॥ २४ ॥ वर्षा और आँधी से पीड़ित उस अपनी सम्पूर्ण सेना को उपलवृष्टि के भय से दसों दिशाओं में भागते देखकर गिरिशायी भगवान् शंकर ने तुरंत वायव्यास्त्र छोड़ा। [उससे उत्पन्न] महान् वायु से विशाल बादल खण्ड-खण्ड होकर आकाश में बिखर गये ॥ २५-२६ ॥ दैत्यों की सम्पूर्ण सेना वायुवेग से घूमने लगी। पक्षियों के पंखों से युक्त वीरों की पगड़ियाँ दूर-दूर तक उड़ गयीं। कुछ रथ, अश्व और हाथी सवार सैनिक गिरकर चूर-चूर हो गये, उन्मूलित वृक्षों और लताओं ने सैनिकों को आच्छादित कर लिया ॥ २७-२८ ॥

तब दैत्य त्रिपुरासुर ने पर्वतास्त्र से उस वायु का निवारण किया और अपने तूणीर से एक बाण लेकर उसे आग्नेयास्त्र से अभिमन्त्रित कर धनुष को कानतक खींचकर शिव की सेना पर छोड़ दिया। उससे सहसा सब कुछ भस्म कर डालने वाली अंगारों की वर्षा होने लगी ॥ २९-३० ॥ उस समय ज्वालामालाओं से पीड़ित सम्पूर्ण शिवसेना उसे प्रलयकाल ही मानने लगी। उन देदीप्यमान ज्वालाओं से एक महाभयंकर पुरुष का प्राकट्य हुआ, जिसका सिर नभतल को स्पर्श कर रहा था। उसका मुख भयंकर दाढ़ों से युक्त था। वह भूख से पीड़ित और उच्च स्वर में चिल्ला रहा था ॥ ३१-३२ ॥ वह अपनी सौ योजन विस्तृत जिह्वा को लपलपा रहा था और अपनी नासिका से छोड़ी गयी वायु के वेग से युद्धभूमि में हाथियों को घुमाते हुए उस सेना का उसी प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पों का भक्षण करते हैं ॥ ३३१/२

तब उस पुरुष से अत्यन्त पीड़ित भगवान् शंकर की सेना भागने लगी और शिव के पीछे छिपकर ‘रक्षा करो, रक्षा करो’ – ऐसा कहने लगी ॥ ३४१/२

तब गिरिजापति शिव ने उस सेना को ‘भय मत करो’ – ऐसा कहकर अभयदान दिया और पर्जन्यास्त्र का प्रक्षेपण करके उस अग्नि का निवारण कर दिया और एक बाण के प्रहार से उस घोर पुरुष को गिरा दिया ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर वह पुरुष [पुनः ] उठकर शिवजी के सैनिकों का भक्षण करने लगा, तब वे प्रमथगण भय से विह्वल होकर भागने लगे ॥ ३७ ॥ वे लुढ़कते, गिरते, हाँफते हुए काँपने लगे थे और शिवजी भी निःसहाय होकर गुफा में चले गये ॥ ३८ ॥ षडानन स्कन्द आदि वीरों ने भी उन्हीं का अनुसरण किया। तब दैत्य त्रिपुरासुर ने [मन में] यह विचारकर कि पर्वत पर गिरिराजनन्दिनी पार्वती अकेली हैं, वह रणभूमि छोड़कर उनके अपहरण की इच्छा से मन्दराचल पर गया। तब दूर से ही उसे आते देखकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती काँपने लगीं और अपने पिता के पास जाकर बोलीं कि क्या वह दैत्य मुझे हरण करके ले ही जायगा ? ॥ ३९-४०१/२

पार्वती के उस वचन को सुनकर [पिता हिमालय ने] उन्हें ले जाकर एक अत्यन्त दुर्गम गृह में रख दिया, जो स्वयं उनके अतिरिक्त सबके लिये अज्ञात था । वहाँ वे पार्वती निर्भयतापूर्वक रहने लगीं । तदनन्तर वह दैत्य (त्रिपुरासुर ) भी उन्हें पकड़ ले जाने की इच्छा से हिमालयपर्वत पर आया, परंतु हे मुनिश्रेष्ठ! उसने कहीं गिरिराजनन्दिनी पार्वती को नहीं देखा ॥ ४१-४२१/२

वहाँ भ्रमण करते हुए उसने चिन्तामणि गणेश की एक मंगलमयी मूर्ति देखी, जो सहस्रों सूर्यों के सदृश प्रकाशमान और अनेक प्रका रके अलंकारों से शोभायमान थी। उस त्रैलोक्यसुन्दरी मूर्ति को शीघ्र ग्रहणकर वह अपने स्थान को चला आया। उस समय वह स्तुतिपाठ करने वाले वन्दीजनों से घिरा हुआ था और अनेक प्रकार के वाद्य बज रहे थे ॥ ४३–४४१/२

तदनन्तर वह सर्वत्र विजयी और बलवान् दैत्य पाताल में गया। वहाँ जाते ही वह चिन्तामणिगणेश की मूर्ति उसके हाथ से अन्तर्धान हो गयी। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। उस घटना को ही अपशकुन मानकर वह पुनः अपने नगर में वापस लौट गया और अत्यन्त खिन्नचित्त होकर घोर चिन्ता में पड़ गया ॥ ४५–४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शंकरजी की पराजय का वर्णन’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥

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