श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-46
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
छियालीसवाँ अध्याय
श्रीगणेशसहस्रनाम स्तोत्र
अथः पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
शिवस्य वरदानं

॥ व्यास उवाच ॥
कथं नाम्नां सहस्रं स्वं गणेश उपदिष्टवान् ।
शिवायैतन्ममाचक्ष्व लोकानुग्रहतत्पर ॥ १ ॥

व्यासजी ने पूछा — सम्पूर्ण लोकों के ऊपर अनुग्रह में तत्पर रहनेवाले पितामह! गणेशजी ने भगवान् शिव के प्रति अपने सहस्रनामों का उपदेश किस प्रकार किया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥
देव एवं पुरारातिः पुरत्रयजयोद्यमे ।
अनर्चनाद् गणेशस्य जातो विघ्नाकुलः किल ॥ २ ॥

ब्रह्माजी ने कहा — ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकाल में त्रिपुरारि महादेवजी ने जब त्रिपुरविजय के लिये उद्योग किया, उस समय पहले गणेशजी की अर्चना न करने के कारण वे विघ्नों से घिर गये ॥ २ ॥
मनसा स विनिर्धार्य ततस्तद्विघ्नकारणम् ।
महागणपतिं भक्त्या समभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ३ ॥
विघ्नप्रशमनोपायमपृच्छदपराजितः ।
संतुष्टः पूजया शम्भोर्महागणपतिः स्वयम् ॥ ४ ॥
सर्वविघ्नैकहरणं सर्वकामफलप्रदम्।
ततस्तस्मै स्वकं नाम्नां सहस्रमिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

तदनन्तर विघ्न का क्या कारण है, यह मन-ही-मन निश्चय करके शिवजी ने भक्तिभाव से महागणपति की विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देव ने उनसे विघ्नशान्ति का उपाय पूछा। भगवान् शिव द्वारा की गयी उस पूजा से संतुष्ट होकर महागणपति ने स्वयं उनसे अपने इस सहस्रनाम का वर्णन किया। यह समस्त विघ्नों का एकमात्र हरण करने वाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलों को देने वाला है ॥ ३–५ ॥

विनियोग — अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपतिऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । महागणपतिर्देवता । गं बीजम् । हुं शक्तिः । स्वाहा कीलकम् । चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपादौ विनियोगः ।
इस ‘श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्र’ के महागणपति ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, महागणपति देवता हैं, गं बीज है, ‘हुं’ शक्ति है एवं ‘स्वाहा’ कीलक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चार पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये जप आदि में इसका विनियोग होता है।

ऋष्यादिन्यास —
ॐ महागणपतये ऋषये नमः, शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे । महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि । गं बीजाय नमः, गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः । स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ ।
— इन छः वाक्यों को पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभि का स्पर्श दाहिने हाथ से करे ।

ध्यान
हस्तीन्द्राननमिन्दुचूडमरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा-
दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम् ।
बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल-
ब्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे ॥

जिनका गजराज के समान मुख है; जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है; जिनकी अंगकान्ति अरुण है; जो तीन नेत्रों से सुशोभित हैं; जिन्हें हाथ में कमल धारण करने वाली अंकगत प्रिया (सिद्धि – लक्ष्मी) – का परिष्वंग सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथों में क्रमशः बीजापूर (बिजौरा नीबू या अनार), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, कमल, पाश, उत्पल, धान की बाल तथा अपना ही टूटा दाँत धारण करते हैं एवं शुण्ड में रत्नमय कलश लिये हुए हैं; उन गणपति का मैं भजन (ध्यान) करता हूँ।
गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान्
द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥
कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः ।
रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम्।
माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ॥

गणेशजी के गण्डस्थल से मद की धारा बह रही है। उसका आस्वादन करने के लिये भ्रमरों की भीड़ टूटी पड़ती है। उन भ्रमरों को वे अपने ताडपत्र के समान कानों द्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्ड के अग्रभाग में माणिक्यनिर्मित कलश ले रखा है, जिसके मुखभाग से रत्नों की वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा वे अपने धनार्थी साधक भक्तों को तृप्त कर रहे हैं। कपोलों पर झरते हुए मद से वे विह्वल हैं। उनके मस्तक पर मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणों से विभूषित हैं। ऐसे महागणपति का मैं ध्यान करता हूँ।

इस तरह ध्यान करके ‘ॐ गणेश्वरः’ इत्यादि से आरम्भ होनेवाले ‘श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र’ का पाठ करना चाहिये —

ॐ गणेश्वरो गणक्रीडो गणनाथो गणाधिपः ।
एकदंष्ट्रो वक्रतुण्डो गजवक्त्रो महोदरः ॥ ६ ॥

ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १. गणेश्वरः – आकाशादि प्रपंच के समूह को ‘गण’ कहते हैं, वह गण उनका स्वरूप है और वे उस गण के ईश्वर हैं, इसलिये जिन्हें ‘गणेश्वर’ कहा गया, वे श्रीगणेश; २. गणक्रीडः [^1]  – गणक्रीड नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गण के भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करने के कारण ‘गणक्रीड’ नाम से प्रसिद्ध; ३. गणनाथः – जिनका गणन – गुणों की गणना करना अथः-मंगलमय है, वे भगवान् गणपति; ४. गणाधिपः – आदित्यादि गणदेवताओं के अधिपति; ५. एकदंष्ट्रः – भूमि का उद्धार अथवा जगत् का नाश करने के निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा (दाढ़) है, वे भगवान् गणेश; ६. वक्रतुण्डः – वक्र- टेढ़े तुण्ड-शुण्डदण्ड से युक्त; ७. गजवक्त्रः – गज अर्थात् हाथी समान मुखवाले; ८. महोदरः – अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड को अपने भीतर रखने के कारण महान् उदर वाले ॥ ६ ॥

लम्बोदरो धूम्रवर्णो विकटो विघ्ननायकः ।
सुमुखो दुर्मुखो बुद्धो विघ्नराजो गजाननः ॥ ७ ॥

९. लम्बोदरः – ब्रह्माण्ड के आलम्बनरूप उदरवाले; १०. धूम्रवर्णः – धूम्र के समान वर्णवाले; अथवा वायु का बीज धूम्रवर्ण का है, तत्स्वरूप होने के कारण गणेशजी भी ‘धूम्रवर्ण’ कहे गये हैं; ११. विकटः – कट अर्थात् आवरण से रहित विभुस्वरूप; १२. विघ्ननायकः– अभक्त समुदाय के प्रति विघ्नों का नयन करने वाले; या विघ्नों के अधिपति; अथवा प्राणियों का विहनन एवं नयन करने वाले; १३. सुमुखः – मुख का अर्थ है-आरम्भ; जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; अथवा सुन्दर मुखवाले; १४. दुर्मुखः-जिनके मुख का स्पर्श करना दुष्कर है; अथवा अग्नि और सूर्य के रूप में जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; १५. बुद्धः–नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्ति के नाशक अथवा बुद्धावतारस्वरूप; १६. विघ्नराजः- विघ्नों के साथ विराजमान; अथवा विघ्नों के राजा; किंवा जो विघ्न — भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश; १७. गजाननः – गजों – हाथियों को अनुप्राणित- प्राणशक्ति से सम्पन्न करने वाले ॥ ७ ॥

भीमः प्रमोद आमोदः सुरानन्दो मदोत्कटः ।
हेरम्बः शम्बरः शम्भुर्लम्बकर्णो महाबलः ॥ ८ ॥

१८. भीमः – दुष्टों के लिये भयदायक होने से ‘भीम’ नाम से प्रसिद्ध; १९. प्रमोदः – अभीष्ट वस्तु के लाभ से होने वाले सुख का नाम है- ‘प्रमोद’, तत्स्वरूप; २०. आमोदः-प्रमोद से पहले अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के निश्चय से जो सुख होता है, उसे ‘आमोद’ कहते हैं, ऐसे आमोदस्वरूप; २१. सुरानन्दः – देवताओं के लिये आनन्दप्रद २२. मदोत्कटः – गण्डस्थल से झरने वाले मद के कारण उत्कट; अथवा मद से आवरण का उत्क्रमण करने वाले; २३. हेरम्बः – ‘हे’ का अर्थ है – शंकर तथा ‘रम्ब’ का अर्थ है- शब्द । शैवागम के प्रवर्तक होने से ‘हेरम्ब’ नामवाले; अथवा उद्यम-शौर्य से युक्त होने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध; २४. शम्बरः -‘शम्’ अर्थात् सुख है वर — श्रेष्ठ जिनमें, वे; २५. शम्भुः – जिनसे ‘शम्’ अर्थात् कल्याण का उद्भव होता है, वे; २६. लम्बकर्णः – भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजी का आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं । इसलिये लंबे – सुदूर तक सुननेवाले कान हैं जिनके, वे; २७. महाबलः – जिनके अनुग्रह से बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली ॥ ८ ॥
नन्दनोऽलम्पटोऽभीरुर्मेघनादो गणञ्जयः ।
विनायको विरूपाक्षो धीरशूरो वरप्रदः ॥ ९ ॥

२८. नन्दनः–समृद्धि के हेतुभूत; २९. अलम्पटः– पर्याप्त पट – वस्त्रों से समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; ३०. अभीरुः – भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्री से रहित; ३१. मेघनादः – मेघगर्जना के समान नाद या सिंहनाद करने वाले; अथवा मेघों के नाशक; ३२. गणञ्जयः – शत्रुसमूहों पर अनायास विजय पाने वाले; ३३. विनायकः – ‘वि’ अर्थात् पक्षिरूप जीवसमुदाय के नेता या नायक; ३४. विरूपाक्षः– विरूप – विकट दीखने वाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रों से युक्त; ३५. धीरशूरः– धैर्य और शौर्य से सम्पन्न; ३६. वरप्रदः—अपने भक्तजनों को उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करने वाले ॥ ९ ॥
महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः ।
रुद्रप्रियो गणाध्यक्ष उमापुत्रोऽघनाशनः ॥ १० ॥

३७. महागणपतिः – गुल्म आदि सेना-भेदों को ‘गण’ कहते हैं; वे जिनकी अधीनता में महान् — बहु- संख्यक हैं, वे अथवा महागणों के अधिपति; ३८. बुद्धि- प्रियः – निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; ३९. क्षिप्रप्रसादनः – भक्तों द्वारा ध्यान किये जाने पर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होने वाले; ४०. रुद्रप्रियः – ग्यारहों रुद्रों के प्रिय; ४१. गणाध्यक्षः – छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदाय के पालक; ४२. उमापुत्रः– पार्वती के पुत्र (उमा का पुन्नामक नरकलोक से उद्धार करने वाले); ४३. अघनाशनः– लम्बोदर या महोदर होने पर भी स्वल्पमात्र नैवेद्य से तृप्त होने वाले (अघन- स्वल्प है अशन – भोजन जिनका, वे); अथवा अघ फलस्वरूप दुःखों का नाश करने वाले ॥ १० ॥
कुमारगुरुरीशानपुत्रो मूषकवाहनः।
सिद्धिप्रियः सिद्धिपतिः सिद्धः सिद्धिविनायकः॥ ११ ॥

४४. कुमारगुरुः– सनत्कुमारस्वरूप होते हुए विद्या का उपदेश करने के कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेय से भी पहले उत्पन्न होने के कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; ४५. ईशानपुत्रः – भगवान् शंकर के आत्मज; ४६. मूषकवाहनः– मूषक (चूहे ) – को वाहन बनाने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध; ४७. सिद्धिप्रियः – अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; ४८. सिद्धिपतिः – अणिमा आदि आठ सिद्धियों के पालक; ४९. सिद्धः- गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; ५०. सिद्धिविनायकः– भक्तों तक सिद्धि का नयन करने वाले (भक्तों को सिद्धि प्राप्त कराने वाले) ॥ ११ ॥
अविघ्नस्तुम्बुरुः सिंहवाहनो मोहिनीप्रियः ।
कटंकटो राजपुत्रः शालकः सम्मितोऽमितः ॥ १२ ॥

५१. अविघ्नः– अविभाव; अर्थात् पशुता का हनन (हरण) करने वाले; अथवा विघ्नों से रहित; ५२. तुम्बुरुः– तुम्ब (अलावू या लौकी) के द्वारा जो रव (ध्वनि) करता है, वह ‘तुम्बुरु’ है। तुम्बुरु नाम है-वीणा का । वीणा पर गणपति का यशोगान होने से वे ‘तुम्बुरु’ नाम से प्रसिद्ध हैं; ५३. सिंहवाहनः–मोर और मूषक की भाँति सिंह को भी वाहन बनाने वाले; अथवा सिंहवाहिनीदेवी से अभिन्न होने के कारण सिंहवाहन; ५४. मोहिनीप्रियः– मोहिनीपति शिव से अभिन्न ५५. कटंकटः – ‘कट’ का अर्थ है-आवरण या अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञान को भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये ‘कटंकट’ नाम से प्रसिद्ध हैं; ५६. राजपुत्रः – राजा वरेण्य के यहाँ पुत्रवत् आचरण करने वाले; अथवा राजा — चन्द्रमा को पुत्रवत् मानने वाले; ५७. शालकः– ‘श’ ‘परोक्ष’ अर्थ में है और ‘अलक’ शब्द ‘केश’ या अंशका वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे ‘शालक’ हैं, अथवा शालित-शोभित होते हैं, इसलिये ‘शालक’ हैं; ५८. सम्मितः – सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठमात्र से मित; ५९. अमितः – अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ- चारों प्रकार के प्रमाणों से मित न होने वाले ॥ १२ ॥
कूष्माण्डसामसम्भूतिर्दुर्जयो धूर्जयो जयः ।
भूपतिर्भुवनपतिर्भूतानां पतिरव्ययः ॥ १३ ॥

६०. कूष्माण्डसामसम्भूतिः – ‘कूष्माण्डैर्जुहुयात्।’ —इस कूष्माण्ड-होमविधि में जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजी की विभूति हैं । अतएव वे उक्त नाम से प्रसिद्ध हैं; ६१. दुर्जयः – बलवान् दैत्य जिन्हें मन से भी जीत नहीं सकते, ऐसे; ६२. धूर्जयः – जगच्चक्र की धुरी को अनायास वहन करने वाले; ६३. जयः – जयस्वरूप; अथवा जय – महाभारत आदि इतिहास- पुराण जिनके रूप हैं, वे; ६४. भूपतिः – पृथ्वी के पालक, अथवा भूपति – नाम से प्रसिद्ध अग्निभ्राता; ६५. भुवनपतिः – समस्त भुवनों के स्वामी; अथवा उक्त नाम वाले अग्निभ्राता; ६६. भूतानाम्पतिः – समस्त भूतों के पालक अथवा भूतपति नामक अग्निभ्राता; ६७. अव्ययः – अविनाशी ॥ १३ ॥
विश्वकर्ता विश्वमुखो विश्वरूपो निधिर्घृणिः ।
कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः ॥ १४ ॥

६८. विश्वकर्ता –संसार के स्रष्टा; ६९. विश्व- मुखः – जिनसे विश्वका मुख आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुख में है; या जो मुख की भाँति विश्व की वृत्ति के हेतु हैं, वे गणेश; ७०. विश्वरूपः- सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा प्रजापति के पुत्र देवपुरोहित विश्वरूप से अभिन्न; ७१. निधिः—आकाश आदि सम्पूर्ण जगत् समूह जिनमें नितरां आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव-निधि-स्वरूप; ७२. घृणिः – सूर्यस्वरूप; ७३. कविः – सृष्टिरूप काव्यके कर्ता; ७४. कवीनामृषभः– कवियों में श्रेष्ठ; ७५. ब्रह्मण्यः–ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्मा के प्रति सद्भाव रखने वाले; ७६. ब्रह्मणस्पतिः–ब्रह्म अर्थात् वाणीके अधिपति ॥ १४ ॥
ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिप्रियपतिप्रियः ।
हिरण्मयपुरान्तःस्थः सूर्यमण्डलमध्यगः॥ १५ ॥

७७. ज्येष्ठराजः-‘ज्येष्ठ’ -संज्ञक साम में राजमान; ७८. निधिपतिः– नव निधियों के परिपालक; ७९. निधि- प्रियपतिप्रियः – निधियों को प्रिय मानने वाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; ८०. हिरण्मयपुरान्तःस्थः – हिरण्यपुर – दहराकाश के मध्य में विराजमान; (चिन्मय ब्रह्म के निवासस्थान अन्तर्हृदय में विद्यमान); ८१. सूर्यमण्डलमध्यगः – सूर्यमण्डल के भीतर स्थित ॥ १५ ॥
कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः पूषदन्तभित् ।
उमाङ्ककेलिकुतुकी मुक्तिदः कुलपालनः ॥ १६ ॥

८२. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः– जिन्होंने अपने शुण्ड-दण्ड के आघात से समुद्र के जल को विध्वस्त (निष्कासित) कर दिया था, वे; ८३. पूषदन्तभित्— वीरभद्ररूप से दक्षयज्ञ में पूषा के दाँत को तोड़ने वाले; ८४. उमाङ्ककेलिकुतुकी – उमा के अंक में बैठकर बालोचित क्रीड़ा करने का कौतूहल रखने वाले; ८५. मुक्तिदः – कारागार की बेड़ी से छुड़ाने वाले तथा मोक्षदाता; ८६. कुलपालनः—वंश के तथा कौलतन्त्र के भी पालक ॥ १६ ॥
किरीटी कुण्डली हारी वनमाली मनोमयः ।
वैमुख्यहतदैत्यश्रीः पादाहतिजितक्षितिः ॥ १७ ॥

८७. किरीटी-मस्तक पर मुकुट धारण करने वाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; ८८. कुण्डली – कानोंमें कुण्डल पहननेवाले; अथवा शेषनागरूपधारी; ८९. हारी-मुक्ता आदि मणियों की माला धारण करने वाले, अथवा अत्यन्त मनोहर; ९०. वनमाली — कंधे से लेकर पैरों तक लटकने वाली ‘वनमाला’ धारण करने वाले; ९१. मनोमयः – अपने संकल्प द्वारा निर्मित एक शरीर धारण करने वाले; ९२. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः –जिनके विमुख हो जाने के कारण दैत्यों की लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; ९३. पादाहति- जितक्षितिः – अपने पैरों के आघात से पृथ्वी को नीचे झुका देनेवाले ॥ १७ ॥
सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली दुर्निमित्तहृत् ।
दुःस्वप्नहृत् प्रसहनो गुणी नादप्रतिष्ठितः ॥ १८ ॥

९४. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली – तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंज की मेखला से मण्डित; ९५. दुर्निमित्तहृत् — देवमूर्तियों के फूटने, भूकम्प होने तथा महान् उल्कापात आदि के द्वारा सूचित जो दुर्निमित्त (अपशकुन) हैं, उनका हनन करने वाले; ९६. दुःस्वप्नहृत्— बुरे स्वप्नों के दुष्प्रभाव को दूर करके उन्हें सुस्वप्न में परिणत कर देने वाले; ९७. प्रसहनः – भक्तों के अपराध को सहन करनेवाले भगवान् ९८. गुणी – अनेक सद्गुणों से सम्पन्न; ९९. नादप्रतिष्ठितः – प्रणवनाद के वाच्यार्थरूप से प्रतिष्ठित ॥ १८ ॥
सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनाश्रयः ।
पीताम्बरः खण्डरदः खण्डेन्दुकृतशेखरः ॥ १९ ॥

१००. सुरूपः – अधिक लावण्य से युक्त; अथवा उत्तम तत्त्व का निरूपण करने वाले; १०१. सर्वनेत्राधिवासः – सबके नेत्रों में द्रष्टा पुरुष के रूप में निवास करने वाले; १०२. वीरासनाश्रयः – बायें घुटने पर दायाँ पैर रखकर बैठना ‘वीरासन’ कहलाता है, ऐसे वीरासन से बैठने वाले; १०३. पीताम्बरः – आकाश को पी जाने वाले; अथवा पीतवस्त्र धारण करने वाले; १०४. खण्डरदः – खण्डित दायाँ दाँत धारण करनेवाले; १०५. खण्डेन्दुकृतशेखरः –भालदेश में आधे चन्द्रमा को धारण करने वाले ॥ १९ ॥
चित्राङ्कश्यामदशनो भालचन्द्रश्चतुर्भुजः ।
योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः ॥ २० ॥

१०६. चित्राङ्कश्यामदशनः– जिनमें श्यामरंग की अधिकता है, ऐसे; चित्रों से अंकित या अलंकृत श्याम दन्त वाले; १०७. भालचन्द्रः – भालदेश में चन्द्रमा को धारण करने वाले; अथवा अष्टमी के चन्द्रमा की भाँति ललाट वाले; १०८. चतुर्भुजः– चार भुजावाले; १०९. योगाधिपः – ‘लिंगपुराण’ में वर्णित जो लकुलीशादि अट्ठाईस योगाचार्यावतार हैं, उनसे अभिन्न रूपवाले; अथवा योगेश्वर; ११०. तारकस्थः – तारक अर्थात् प्रणव-मन्त्र के अभिधेय; १११. पुरुषः – समस्त पुरों- शरीरों में शयन करने वाले साक्षी आत्मा; ११२. गजकर्णकः– हाथी के समान विशाल कान वाले ॥ २० ॥
गणाधिराजो विजयस्थिरो गजपतिध्वजी ।
देवदेवः स्मरप्राणदीपको वायुकीलकः ॥ २१ ॥

११३. गणाधिराजः – काव्य के पद्यों में जो मगण, यगण, रगण और सगण आदि गण आते हैं, उनसे राजमान – शोभायमान; अथवा गणों के अधिपति; ११४. विजयस्थिरः – भक्तों की विजय में स्थिररूप से प्रवृत्त; ११५. गजपतिध्वजी – अपने ध्वज में गजराज का चिह्न धारण करने वाले; ११६. देवदेवः – देवताओं के भी देवता – इन्द्र आदि देवताओं के उपास्य; ११७. स्मरप्राणदीपकः – रुद्र द्वारा कामदेव के शरीर के दग्ध कर दिये जाने पर भी उसके प्राणों को उज्जीवित करने वाले; ११८. वायुकीलकः – नव द्वार वाले शरीर में प्राणों का स्तम्भन करने वाले ॥ २१ ॥
विपश्चिद्वरदो नादोन्नादभिन्नबलाहकः ।
वराहरदनो मृत्युञ्जयो व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ २२ ॥

११९. विपश्चिद्वरदः – राजा विपश्चित् को वर देने वाले; १२०. नादोन्नादभिन्नबलाहकः – अपने मन्द या उच्च नाद (घोष)-से मेघों को छिन्न-भिन्न कर देने वाले; १२१. वराहरदनः– महावराह की दंष्ट्रा (दाढ़)- की शोभा को तिरस्कृत करने वाले एक दाँत से सुशोभित; १२२. मृत्युञ्जयः -काल, मृत्यु अथवा प्रमाद पर विजय पाने वाले; १२३. व्याघ्राजिनाम्बरः – वस्त्र के स्थान में व्याघ्रचर्म को धारण करनेवाले ॥ २२ ॥
इच्छाशक्तिधरो देवत्राता दैत्यविमर्दनः ।
शम्भुवक्त्रोद्भवः शम्भुकोपहा शम्भुहास्यभूः ॥ २३ ॥

१२४. इच्छाशक्तिधरः – जगत् की सृष्टि की इच्छा धारण करने वाले होने से इच्छाशक्तिधारी; १२५. देवत्राता– दैत्यों के भय से देवताओं की रक्षा करने वाले; १२६. दैत्यविमर्दनः – दैत्यों का संहार करने वाले; १२७. शम्भुवक्त्रोद्भवः- शिव के मुख से प्रकट होने वाले; १२८. शम्भुकोपहा—अपनी बाल लीलाओं से भगवान् शिव के क्रोध को हर लेने वाले; १२९. शम्भुहास्यभूः – नादान बालक की भाँति चेष्टा करके शिव को हँसा देनेवाले ॥ २३ ॥
शम्भुतेजाः शिवाशोकहारी गौरीसुखावहः ।
उमाङ्गमलजो गौरीतेजोभूः स्वर्धुनीभवः ॥ २४ ॥

१३०. शम्भुतेजाः – शिव के तेज से सम्पन्न; १३१. शिवाशोकहारी – महिषासुर आदि के मर्दनकाल में शिवा (पार्वती)- के बल एवं उत्साह को बढ़ाकर उनके शोक को हर लेने वाले; १३२. गौरीसुखावहः – पार्वतीजी को सुख पहुँचाने वाले; १३३. उमाङ्गमलजः – गिरिराजनन्दिनी उमा के अंगों में लगे हुए उबटन के मैल से प्रकट हुए शरीर में प्रवेश करके उसे सप्राण बनाने वाले; १३४. गौरीतेजोभूः– गौरी के तेज से उत्पन्न; अथवा पार्वती के तेज की आधारभूमि; १३५. स्वर्धुनीभवः – गंगाजी से उत्पन्न स्वामि कार्तिकेय से अभिन्न; अथवा गंगाजी की उत्पत्ति के हेतुभूत ॥ २४ ॥
यज्ञकायो महानादो गिरिवर्ष्मा शुभाननः ।
सर्वात्मा सर्वदेवात्मा ब्रह्ममूर्धा ककुप्श्रुतिः ॥ २५ ॥

१३६. यज्ञकायः– अश्वमेधादि यज्ञस्वरूप; १३७. महानादः – उच्चस्वर से गर्जना करने वाले; १३८. गिरिवर्मा – विराट्स्वरूप से पर्वतों को शरीर के अवयवरूप में धारण करने वाले; १३९. शुभाननः- शुभदायक मुखवाले; अथवा मंगल नामवाले प्राण के जनक; १४०. सर्वात्मा – सर्वस्वरूप; १४१. सर्व- देवात्मा— सकल देवरूप; १४२. ब्रह्ममूर्धा – ब्रह्म ही जिनका मस्तक है, वे; १४३. ककुप्श्रुतिः – दिशाओं को कान के रूप में धारण करने वाले ॥ २५ ॥
ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमभालः सत्यशिरोरुहः।
जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषोऽग्न्यर्कसोमदृक् ॥ २६ ॥

१४४. ब्रह्माण्डकुम्भः – विशाल ब्रह्माण्ड- कपालद्वय औंधा होकर जिनके लिये घट के समान प्रतीत होता है, वे; १४५. चिद्व्योमभालः – चिन्मय आकाशरूप भाल (ब्रह्मरन्ध्र) – वाले; १४६. सत्य- शिरोरुहः – सत्यलोकरूपी केश वाले; १४७. जगज्जन्म- लयोन्मेषनिमेषः – जिनके नेत्र के खुलने पर जगत् का जन्म होता है और बंद होने पर उसका संहार, वे परमेश्वर; १४८. अग्न्यर्कसोमदृक्- अग्नि, सूर्य और चन्द्ररूपी नेत्रवाले ॥ २६ ॥
गिरीन्द्रैकरदो धर्माधर्मोष्ठः सामबृंहितः ।
ग्रहर्क्षदशनो वाणीजिह्वो वासवनासिकः ॥ २७ ॥

१४९. गिरीन्द्रैकरदः – गिरिराज मेरु जिनका एक दाँत है, वे विराट् पुरुष; १५०. धर्माधर्मोष्ठः- धर्म और अधर्मरूप ओष्ठवाले; १५१. सामबृंहितः— सामवेदरूप गर्जनावाले; १५२. ग्रहर्क्षदशनः – सूर्य आदि ग्रहों और कृत्तिका आदि नक्षत्रों को अपने मुख में दाँतों के रूप में धारण करने वाले; १५३. वाणीजिह्वः- वाणीस्वरूप जिह्वावाले; १५४. वासवनासिकः- इन्द्ररूप नासिका वाले ॥ २७ ॥
कुलाचलांसः सोमार्कघण्टो रुद्रशिरोधरः ।
नदीनदभुजः सर्पाङ्गुलीकस्तारकानखः ॥ २८ ॥

१५५. कुलाचलांसः–विन्ध्य आदि कुलपर्वतरूप कंधों वाले; १५६. सोमार्कघण्टः – चन्द्रमा और सूर्यरूप घण्टा वाले; १५७. रुद्रशिरोधरः – रुद्ररूपी गर्दनवाले; १५८. नदीनदभुजः— गंगा आदि नदियाँ और शोणभद्र आदि नद जिनकी भुजाएँ हैं, वे; १५९. सर्पाङ्गुलीकः – शेष आदि नाग जिनकी अंगुलियों में हैं, वे; १६०. तारकानखः— ध्रुव आदि तारों को नख के रूप में धारण करने वाले ॥ २८ ॥
भ्रूमध्यसंस्थितक ब्रह्मविद्यामदोत्कटः ।
व्योमनाभिः श्रीहृदयो मेरुपृष्ठोऽर्णवोदरः ॥ २९ ॥

१६१. भ्रूमध्यसंस्थितकरः – भौंहों के मध्यभाग में स्थित शुण्डदण्ड वाले; १६२. ब्रह्मविद्यामदोत्कटः- ब्रह्मविद्यारूपी मद से उद्भिन्न गण्डस्थल वाले; १६३. व्योमनाभिः – आकाशरूप नाभि वाले; १६४. श्रीहृदयः – ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद- इन तीनों को ‘श्री’ कहते हैं। इनमें संलग्न है हृदय जिनका, ऐसे; १६५. मेरुपृष्ठः – सुमेरु पर्वतरूपी पृष्ठभाग वाले; १६६. अर्णवोदरः–सारे समुद्र जिनके उदरान्तर्गत जल हैं, वे ॥ २९ ॥
कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षः किंनरमानुषः ।
पृथ्वीकटिः सृष्टिलिङ्गः शैलोरुर्दस्त्रजानुकः ॥ ३० ॥

१६७. कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षः किंनरमानुषः- यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, किंनर और मनुष्य जिनकी कुक्षि के अन्तर्गत आँतों के रूप में विराजमान हैं, वे; १६८. पृथ्वीकटिः–विराट् रूप में पृथ्वी ही जिनका कटिभाग है, वे; १६९. सृष्टिलिङ्गः-मैथुनी सृष्टि जिनकी जननेन्द्रिय के स्थान में हैं, वे; १७०. शैलोरुः – पर्वत ही जिनके ऊरु (जाँघें) हैं, वे; १७१. दस्रजानुकः— दोनों अश्विनीकुमार जिनके दो घुटने हैं, वे ॥ ३० ॥
पातालजङ्घो मुनिपात्कालाङ्गुष्ठस्त्रयीतनुः ।
ज्योतिर्मण्डललाङ्गलो हृदयालाननिश्चलः ॥ ३१ ॥

१७२. पातालजङ्घः- सातों पाताल जिनकी पिंडलियों के स्थान में हैं, वे; १७३ मुनिपात् -चरणों की सेवामें संलग्न मुनि ही जिनके चरण हैं, वे; १७४. कालाङ्गुष्ठः-महाकालरूप पादांगुष्ठवाले; १७५. त्रयीतनुः– वेदत्रयीरूप शरीरवाले; १७६. ज्योति- र्मण्डललाङ्गूलः– शिशुमार – संज्ञक ज्योतिर्मण्डल (तारों का समूह) जिनकी पूँछ है, वे; १७७. हृदयालान- निश्चलः– भक्तों के हृदयरूपी आलान (खंभे) – में बँधकर निश्चलरूप से रहने वाले ॥ ३१ ॥
हृत्पद्मकर्णिकाशालिवियत्केलिसरोवरः ।
सद्भक्तध्याननिगडः पूजावारीनिवारितः ॥ ३२ ॥

१७८. हृत्पद्मकर्णिकाशालिवियत्केलिसरोवरः- हृदयकमल की कर्णिका से सुशोभित दहराकाश (हृदय में स्थित आकाश) जिनका क्रीडासरोवर है, वे; १७९. सद्भक्तध्याननिगडः – श्रेष्ठ भक्तजन जिन्हें ध्यानरूपी निगड (बन्धन ) – से आबद्ध कर लेते हैं, वे; १८०. पूजावारीनिवारितः – पूजा रूपी साँकल से अवरुद्ध होने वाले ॥ ३२ ॥
प्रतापी कश्यपसुतो गणपो विष्टपी बली ।
यशस्वी धार्मिकः स्वोजाः प्रथमः प्रथमेश्वरः ॥ ३३ ॥

१८१. प्रतापी–देवशत्रुओं को ताप देने वाले; अथवा पराक्रमसम्पन्न; १८२. कश्यपसुतः – महोत्कट विनायक-नाम से कश्यपमुनि के पुत्ररूप में अवतीर्ण; १८३. गणपः – अध्वर्यु और होता आदि गणों के पालक; १८४. विष्टपी – सम्पूर्ण भुवनों के आधार; १८५ बली – बलसम्पन्न; १८६. यशस्वी – पुण्य कीर्ति वाले; १८७. धार्मिकः – धर्म की वृद्धि करने वाले; १८८. स्वोजाः – श्रेष्ठ ओजवाले; १८९. प्रथमः – सब कार्यों में प्रथमपूज्य देवता; १९०. प्रथमेश्वरः – मुख्य देवता – ब्रह्मा, विष्णु और शिव के भी ईश्वर ॥ ३३ ॥
चिन्तामणिद्वीपपतिः कल्पद्रुमवनालयः ।
रत्नमण्डपमध्यस्थो रत्नसिंहासनाश्रयः॥ ३४ ॥

१९१. चिन्तामणिद्वीपपतिः – चिन्तामणि नामक द्वीप के स्वामी; १९२. कल्पद्रुमवनालयः – कल्पवृक्षोंके वनमें वास करनेवाले; १९३. रत्नमण्डपमध्यस्थः- रत्नमय मण्डपके मध्यमें विराजमान; १९४. रत्न-सिंहासनाश्रयः – रत्नसिंहासन पर आसीन ॥ ३४ ॥
तीव्राशिरोद्धृतपदो ज्वालिनीमौलिलालितः ।
नन्दानन्दितपीठ श्रीर्भोगदाभूषितासनः ॥ ३५ ॥

१९५. तीव्रा[^2] शिरोद्धृतपदः –तीव्रा नामक पीठशक्ति ने जिनके चरणों को अपने मस्तक पर धारण कर रखा है, वे भगवान् गणेश; १९६. ज्वालिनी- मौलिलालितः – ज्वालिनी नामक शक्ति अपने मुकुट से जिनके चरणों का स्पर्श करके लाड़ लड़ाती है, वे; १९७. नन्दानन्दितपीठ श्रीः – नन्दा नामक शक्ति जिनके पीठ की शोभा का अभिनन्दन करती है, वे; १९८. भोगदाभूषितासनः – जिनका सिंहासन भोगदा नामक पीठशक्ति से विभूषित है, वे ॥ ३५ ॥
सकामदायिनीपीठः स्फुरदुग्रासनाश्रयः ।
तेजोवतीशिरोरत्नं सत्यानित्यावतंसितः ॥ ३६ ॥

१९९. सकामदायिनीपीठः – जिनका पीठ कामदायिनी-शक्ति से समलंकृत है, वे; २००. स्फुर- दुग्रासनाश्रयः– तेजस्विनी उग्रा-शक्ति से सुशोभित आसन पर बैठने वाले; २०१. तेजोवतीशिरोरत्नं- तेजोवती नामक शक्ति के सिर के मणिरत्न; २०२. सत्या- नित्यावतंसितः – सत्या नामक शक्ति जिन्हें नित्य अपने मस्तक का आभूषण बनाये रखती है, वे ॥ ३६ ॥
सविघ्ननाशिनीपीठः सर्वशक्त्यम्बुजाश्रयः ।
लिपिपद्मासनाधारो वह्निधामत्रयाश्रयः ॥ ३७ ॥

२०३. सविघ्ननाशिनीपीठः – विघ्ननाशिनी नामक शक्ति से सुशोभित पीठ वाले; २०४. सर्वशक्त्यम्बुजाश्रयः- सम्पूर्ण शक्तियों से युक्त कमल के आसन पर विराजमान; २०५. लिपि[^3]  पद्मासनाधारः – अक्षरों से युक्त कमल (मातृकापद्म)-के आसन पर बैठने वाले; २०६. वह्नि- धामत्रयाश्रयः – कमल की कर्णिका के ऊपर विराजमान सूर्य, चन्द्र और अग्निसंज्ञक त्रिविध तेजोमण्डल में स्थित ॥ ३७ ॥
उन्नत पदो गूढगुल्फः संवृतपाष्णिकः ।
पीनजङ्घः श्लिष्टजानुः स्थूलोरुः प्रोन्नमत्कटिः ॥ ३८ ॥

२०७. उन्नतप्रपदः – जिनके पैरों का अग्रभाग कूर्मपीठ के समान ऊँचा है, वे; २०८. गूढगुल्फः – जिनके गुल्फ (टखने) मांस से छिपे हुए हैं, वे; २०९. संवृतपाष्णिकः – जिनके टखने के नीचे का भाग भी मांसल है, वे; २१०. पीनजङ्घः- पीन (मांसल) पिंडलियों वाले; २११. श्लिष्टजानुः – जिनके दोनों मोटे घुटने स्पष्ट नहीं दिखायी देते, वे; २१२. स्थूलोरुः– जाँघवाले; २१३. प्रोन्नमत्कटिः – ऊँचे कटिप्रदेशवाले ॥ ३८ ॥
निम्ननाभिः स्थूलकुक्षिः पीनवक्षा बृहद्भुजः ।
पीनस्कन्धः कम्बुकण्ठो लम्बोष्ठो लम्बनासिकः ॥ ३९ ॥

२१४. निम्ननाभिः – गहरी नाभिवाले; २१५. स्थूलकुक्षिः – लम्बोदर; २१६. पीनवक्षाः- ऊँची छातीवाले; २१७. बृहद्भुजः- बड़ी बाँहवाले; २१८. पीनस्कन्धः – मांसल कंधेवाले; २१९. कम्बुकण्ठः–त्रिवलीयुक्त शंखाकार ग्रीवावाले; २२०. लम्बोष्ठः – लटकते हुए ओठोंवाले; २२१. लम्बनासिकः – लम्बी नासिका (सूँड़) – वाले ॥ ३९ ॥
भग्नवामरदस्तुङ्गसव्यदन्तो महाहनुः ।
ह्रस्वनेत्रत्रयः शूर्पकर्णो निबिडमस्तकः ॥ ४० ॥

२२२. भग्नवामरदः– जिनके बायें दाँत का अग्रभाग टूट गया है, वे; २२३. तुङ्गसव्यदन्तः – जिनका दाहिना दाँत ऊँचा है, वे; २२४. महाहनुः – लम्बी ठोढ़ी वाले; २२५. ह्रस्वनेत्रत्रयः – छोटे-छोटे तीन नेत्रोंवाले; २२६. शूर्पकर्णः – सूप के समान विशाल कानवाले; २२७. निबिडमस्तकः – घनीभूत कठोर मस्तक वाले ॥ ४० ॥
स्तबकाकारकुम्भाग्रो रत्नमौलिर्निरङ्कुशः ।
सर्पहारकटीसूत्रः सर्पयज्ञोपवीतवान् ॥ ४१ ॥

२२८. स्तबकाकारकुम्भाग्रः – जिनके कुम्भस्थल (मस्तक)-का अग्रभाग गुच्छ के समान दिखायी देता है, वे; २२९. रत्नमौलिः- रत्नमय मुकुट से मण्डित; २३०. निरङ्कुशः – जिनके कुम्भस्थल पर कभी अंकुश का स्पर्श नहीं होता, वे अथवा परम स्वतन्त्र; २३१. सर्पहारकटीसूत्रः – जो सर्पाकार हार और कटिसूत्र (मेखला) धारण करते हैं, वे; २३२. सर्पयज्ञोपवीतवान्–सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले ॥ ४१ ॥
सर्पकोटीरकटकः सर्पग्रैवेयकाङ्गदः।
सर्पकक्ष्योदराबन्धः सर्पराजोत्तरीयकः ॥ ४२ ॥

२३३. सर्पकोटीरकटकः – मुकुट और वलय के रूप में सर्प को धारण करने वाले; २३४. सर्पग्रैवेयकाङ्गदः- सर्प के ही कण्ठहार और बाजूबंद पहनने वाले; २३५. सर्पकक्ष्योदराबन्धः-करधनी के रूप में सर्प को ही धारण करने वाले; २३६. सर्पराजोत्तरीयकः- नागराज वासुकिको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले ॥ ४२ ॥
रक्तो रक्ताम्बरधरो रक्तमाल्यविभूषणः ।
रक्तेक्षणो रक्तकरो रक्तताल्वोष्ठपल्लवः ॥ ४३ ॥

२३७. रक्तः —रक्तवर्ण; २३८. रक्ताम्बरधरः- लाल वस्त्र धारण करने वाले; २३९. रक्तमाल्यविभूषणः- लाल रंग के ही हार और आभूषण धारण करने वाले; २४०. रक्तेक्षणः – लाल नेत्रों वाले; २४१. रक्तकरः- लाल हाथों वाले; २४२. रक्तताल्वोष्ठपल्लवः – रक्तवर्ण के तालु और ओष्ठपल्लव धारण करने वाले ॥ ४३ ॥
श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेतमाल्यविभूषणः ।
श्वेतातपत्ररुचिरः श्वेतचामरवीजितः ॥ ४४ ॥

२४३. श्वेतः – (विद्या की कामना रखने वाले साधकों को भगवान् गणेश के श्वेत रूप का ध्यान करना चाहिये, इस दृष्टि से श्वेत आदि पाँच नाम दिये जाते हैं -) श्वेतवर्ण; २४४. श्वेताम्बरधरः- श्वेत वस्त्रधारी; २४५. श्वेतमाल्यविभूषणः- श्वेत माला और आभूषण धारण करने वाले; २४६. श्वेतातपत्ररुचिरः – श्वेतच्छत्र धारण करने के कारण अत्यन्त सुन्दर दिखायी देनेवाले; २४७. श्वेतचामरवीजितः – श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा की जाती है, वे ॥ ४४ ॥
सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः ।
सर्वाभरणशोभाढ्यः सर्वशोभासमन्वितः ॥ ४५ ॥

२४८. सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः- सम्पूर्ण अंगों में सामुद्रिक शास्त्रोक्त समस्त शुभ लक्षणों से परिपूर्ण दिखायी देने वाले; २४९. सर्वाभरणशोभाढ्यः- सम्पूर्ण आभूषणों की शोभा से सम्पन्न; २५०. सर्वशोभासमन्वितः – लावण्य नामक सम्पूर्ण अंगकान्ति से शोभायमान ॥ ४५ ॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्यः सर्वकारणकारणम्।
सर्वदैककरः शार्ङ्ग बीजापूरी गदाधरः ॥ ४६ ॥

२५१. सर्वमङ्गलमङ्गल्यः — समस्त मंगलों के लिये भी मंगलकारी; २५२. सर्वकारणकारणम् – सम्पूर्ण कारणों के भी कारण; २५३. सर्वदैककरः- जिनका एकमात्र कर (शुण्डदण्ड) सब कुछ देने वाला है, वे; २५४. शार्ङ्ग — शृंगनिर्मित धनुष धारण करनेवाले; (यहाँ ‘शार्ङ्ग’ आदि नामों से उनके दस आयुधों को लक्षित कराया जाता है); २५५. बीजापूरी – बिजौरा नीबू या अनार धारण करने वाले; २५६. गदाधरः- गदाधारी ॥ ४६ ॥
(शुक्लाङ्गो लोकसुखदः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
किरीटी कुण्डली हारी वनमाली शुभाङ्गदः [^4]
 ॥)
इक्षुचापधरः शूली चक्रपाणिः सरोजभृत् ।
पाशी धृतोत्पलः शालीमञ्जरीभृत्स्वदन्तभृत् ॥ ४७ ॥

२५७. इक्षुचापधरः – गन्ने का धनुष धारण करने- वाले; २५८. शूली – शूलधारी; २५९. चक्रपाणिः– हाथ में चक्र धारण करने वाले; २६०. सरोजभृत्- कमलधारी; २६१. पाशी – पाशधारी; २६२. धृतोत्पलः– उत्पल धारण करने वाले; २६३. शालीमञ्जरीभृत्- धान की बाल धारण करने वाले; २६४. स्वदन्तभृत्- एक हाथ में अपने दाँत को लिये रहने वाले ॥ ४७ ॥
कल्पवल्लीधरो विश्वाभयदैककरो वशी ।
अक्षमालाधरो ज्ञानमुद्रावान् मुद्गरायुधः ॥ ४८ ॥

२६५. कल्पवल्लीधरः – हाथ में कल्पलता ग्रहण करने वाले; २६६. विश्वाभयदैककरः – जिनका मुख्य कर सम्पूर्ण विश्व से अभय दान करने वाला है; अथवा एक हाथ में ‘अभय’ नामक मुद्रा धारण करने वाले; २६७. वशी – सम्पूर्ण विश्व को वश में रखने वाले; २६८. अक्षमालाधरः –अक्षमालाधारी; २६९. ज्ञानमुद्रावान्- ज्ञान की मुद्रा से युक्त; २७०. मुद्गरायुधः – मुद्गर नामक शस्त्र धारण करने वाले ॥ ४८ ॥
पूर्णपात्री कम्बुधरो विधृतालिसमुद्गकः ।
मातुलिङ्गधरश्चूतकलिकाभृत् कुठारवान् ॥ ४९ ॥

२७१. पूर्णपात्री – पूर्णपात्र युक्त यज्ञस्वरूप; अथवा अमृत से भरे पात्र वाले; २७२. कम्बुधरः – शंखधारी; २७३. विधृतालिसमुद्गकः – मदजल से आर्द्र गण्डस्थल पर मँडराते हुए भ्रमरसमूह से युक्त; २७४. मातुलिङ्गधरः– बिजौरा नीबू लिये रहने वाले; २७५. चूतकलिकाभृत्—– आम्रमंजरीधारी; २७६. कुठारवान् — कुठारधारी ॥ ४९ ॥
पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः ।
भारतीसुन्दरीनाथो विनायकरतिप्रियः ॥ ५० ॥

२७७. पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः- शून्य में गृहीत सुवर्णमय कलश से पूर्ण रत्नों की वर्षा करने वाले; २७८. भारतीसुन्दरीनाथः- सरस्वती, गौरी तथा लक्ष्मी के स्वामी ब्रह्मा, शिव और विष्णुरूप; २७९. विनायकरतिप्रियः – विनायक नाम वाले अपने गणों के साथ खेलने में रुचि रखने वाले ॥ ५० ॥
महालक्ष्मीप्रियतमः सिद्धलक्ष्मीमनोरमः ।
रमारमेशपूर्वाङ्गो दक्षिणोमामहेश्वरः ॥ ५१ ॥

२८०. महा-लक्ष्मी-प्रियतमः – महालक्ष्मी के प्रियतम (ये महालक्ष्मी विष्णु-पत्नी लक्ष्मी से भिन्न हैं; गणेश की अपनी प्रिया बुद्धिरूपा हैं। सिद्धलक्ष्मी इनकी दूसरी पत्नी हैं); २८९. सिद्ध-लक्ष्मीमनोरमः – सिद्धलक्ष्मी के हृदयवल्लभ; २८२. रमारमेशपूर्वाङ्गः – आवरण- देवताओं में रमा और रमापति (लक्ष्मी तथा विष्णु) गणेशजी के पूर्वभाग में (सम्मुख) विराजमान होते हैं, इसलिये वे उक्त नाम से प्रसिद्ध हैं; २८३. दक्षिणोमामहेश्वरः- आवरण-देवताओं में उमा और महेश्वर को अपने दक्षिणभाग में स्थापित करने वाले ॥ ५१ ॥
महीवराहवामाङ्गो रतिकन्दर्पपश्चिमः ।
आमोदमोदजननः सप्रमोदप्रमोदनः ॥ ५२ ॥

२८४. महीवराहवामाङ्गः–पृथ्वी और वराहभगवान्‌ को अपने वामांग (उत्तर दिशा) – में रखने वाले; २८५. रतिकन्दर्पपश्चिमः – रति और कामदेव को पीछे या पश्चिम दिशा में स्थापित करने वाले; २८६. आमोदमोदजननः [^5] – ‘आमोद’ – को मोद प्रदान करने वाले; २८७. सप्रमोदप्रमोदनः – ‘प्रमोद को प्रमोद देनेवाले ॥ ५२ ॥
समेधितसमृद्धिश्रीर्ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः ।
दत्तसौमुख्यसुमुखः कान्तिकंदलिताश्रयः ॥ ५३ ॥

२८८. समेधितसमृद्धिश्रीः – समृद्धियुक्त श्रीको संवर्धित करनेवाले; २८९. ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः– ऋद्धिदेवी में स्थित सिद्धि के प्रवर्तक; २९०. दत्त- सौमुख्यसुमुखः – सुमुख को सुमुखता प्रदान करने वाले; २९१. कान्तिकंदलिताश्रयः – कान्तिदेवी के आश्रय- स्थान को अंकुरित करने वाले ॥ ५३ ॥
मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः कृत्तदौर्मुख्यदुर्मुखः ।
विघ्नसम्पल्लवोपघ्नः सेवोन्निद्रमदद्रवः ॥ ५४ ॥

२९२. मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः — मदनावती देवी से सेवित चरण वाले; २९३. कृत्तदौर्मुख्यदुर्मुखः– दुर्मुख की दुर्मुखता को काट फेंकने वाले; २९४. विघ्न- सम्पल्लवोपघ्नः – विघ्नविस्तार के आश्रय; अथवा विघ्न विस्तार के निवारक; २९५. सेवोन्निद्रमदद्रवः– मदद्रवा देवी आलस्यरहित हो सदा जिनकी सेवामें जागरूक रहती हैं, वे ॥ ५४ ॥
विघ्नकृन्निघ्नचरणो द्राविणीशक्तिसत्कृतः ।
तीव्राप्रसन्ननयनो ज्वालिनीपालितैकदृक् ॥ ५५ ॥

२९६. विघ्नकृन्निघ्नचरणः — विघ्नकृत् ने भक्ति- भाव से जिनके चरणों को अपने अधीन करके रखा है, वे; २९७. द्राविणीशक्तिसत्कृतः – द्राविणी नामक शक्ति से सम्मानित २९८. तीव्राप्रसन्ननयनः – तीव्रा नामक शक्तिके प्रति जिनके नेत्र प्रसन्नतासे उत्फुल्ल रहते हैं, वे; २९९. ज्वालिनीपालितैकदृक्- जिनकी मुख्य दृष्टि ज्वालिनी-शक्तिके संरक्षणमें संलग्न है, वे ॥ ५५ ॥ मोहिनीमोहनो भोगदायिनीकान्तिमण्डितः ।
कामिनीकान्तवक्त्रश्रीरधिष्ठितवसुन्धरः ॥ ५६ ॥

३००. मोहिनीमोहनः – मोहिनी – शक्ति को भी मोहित करने वाले; ३०१. भोगदायिनीकान्तिमण्डितः- भोगदायिनीशक्ति की कान्ति से मण्डित चरणपादुका वाले; ३०२. कामिनीकान्तवक्त्रश्रीः–कामिनी या कामदायिनी नामक शक्ति के सुन्दर मुख की शोभा के संवर्धक, ३०३. अधिष्ठितवसुन्धरः– वसुन्धरादेवी को अपने आधार पर प्रतिष्ठित करने वाले ॥ ५६ ॥
वसुन्धरामदोन्नद्धमहाशङ्खनिधिप्रभुः ।
नमद्वसुमतीमौलिमहापद्मनिधिप्रभुः ॥ ५७ ॥

३०४. वसुन्धरामदोन्नद्धमहाशङ्खनिधिप्रभुः- वसुन्धरा नामक पत्नी के साथ आनन्दमग्न रहने वाले महाशंख नामक निधि के स्वामी; ३०५. नम- द्वसुमतीमौलिमहापद्मनिधिप्रभुः – जिनके चरणों में वसुमती नामक पत्नी अपना मस्तक झुकाती है, उन महापद्म नामक निधि के अधिपति ॥ ५७ ॥
सर्वसद्गुरुसंसेव्यः शोचिष्केशहृदाश्रयः ।
ईशानमूर्धा देवेन्द्रशिखा पवननन्दनः ॥ ५८ ॥

३०६. सर्वसद्गुरुसंसेव्यः – समस्त सद्गुरुओं के द्वारा सम्यक् रूप से आराधनीय; ३०७. शोचिष्केश- हृदाश्रयः—गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियों के हृदय में ध्येयरूप से विराजमान; ३०८. ईशानमूर्धा – भगवान् शंकर के माननीय; ३०९. देवेन्द्रशिखा – देवराज इन्द्र के आराध्य; ३१०. पवननन्दनः- वायु को आनन्दित करने वाले; अथवा प्राणों के भी प्राण ॥ ५८ ॥
अग्रप्रत्यग्रनयनो दिव्यास्त्राणां प्रयोगवित् ।
ऐरावतादिसर्वाशावारणावरणप्रियः ॥ ५९ ॥

३११. अग्रप्रत्यग्रनयनः सूक्ष्म एवं नूतन दृष्टि वाले; ३१२. दिव्यास्त्राणां प्रयोगवित् – दिव्य अस्त्रों के प्रयोग को जानने वाले; ३१३. ऐरावतादिसर्वाशावारणावरणप्रियः- खेल-खेल में ऐरावत आदि सम्पूर्ण दिग्गजों को ढँक लेना जिन्हें प्रिय लगता है, वे ॥ ५९ ॥
वज्राद्यस्त्रपरीवारो गणचण्डसमाश्रयः ।
जयाजयपरीवारो विजयाविजयावहः ॥ ६० ॥

३१४. वज्राद्यस्त्रपरीवारः – वज्र आदि अस्त्रों तथा इन्द्र आदि दिक्पालों से आवृत; ३१५. गण- चण्डसमाश्रयः–चण्ड आदि गणों के आश्रय; अथवा गणों में जो प्रचण्ड हैं, उनको भी बल या आश्रय देनेवाले; (इसके बाद आठ नामों द्वारा प्राणशक्तियों से गणेशजी की अभिन्नता बताते हैं । वे शक्तियाँ नौ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं — जया, विजया, अजया, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, शौण्डी, अनन्ता और मंगला ( ये सब पीठ – शक्तियाँ हैं ।) ३१६. जया- जयपरीवारः – जया और अजया से घिरे हुए; ३१७. विजयाविजयावहः – विजया को विजय देने वाले ॥ ६० ॥ अजितार्चितपादाब्जो नित्यानित्यावतंसितः ।
विलासिनीकृतोल्लासः शौण्डीसौन्दर्यमण्डितः ॥ ६१ ॥

३१८. अजितार्चितपादाब्जः- अपराजिताशक्ति से पूजित चरणारविन्द वाले; ३१९. नित्यानित्यावतंसितः- नित्याशक्ति ने जिनके चरणों को नित्य अपना शिरोभूषण बना रखा है, वे; ३२०. विलासिनीकृतोल्लासः – विलासिनी की सेवा से उल्लसित होने वाले; ३२१. शौण्डीसौन्दर्यमण्डितः – शौण्डी नामक शक्ति के सौन्दर्य से मण्डित ॥ ६१ ॥
अनन्तानन्तसुखदः सुमङ्गलसुमङ्गलः ।
इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः ॥ ६२ ॥

३२२. अनन्तानन्तसुखदः – अनन्ता नामक शक्ति को अनन्त सुख देने वाले; ३२३. सुमङ्गलसुमङ्गलः– जिस पीठ पर मंगला नामक शक्ति विद्यमान है, उसका नाम ‘सुमंगल’ है। ऐसा सुमंगल पीठ जिनके कारण परम मंगलमय होता है, वे गणेशजी ‘सुमंगलसुमंगल’ हैं; ३२४. इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः- इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति से सेवित ॥ ६२ ॥
सुभगासंश्रितपदो ललितालालिताश्रयः ।
कामिनीकामनः काममालिनीकेलिलालितः ॥ ६३ ॥

३२५. सुभगासंश्रितपदः – सुभगादेवी के द्वारा सेवित चरण-कमल वाले; ३२६. ललिताललिताश्रयः- ललितादेवी के मनोरम आश्रय; ३२७. कामिनीकामनः-कामिनी या कामकला नामक शक्ति की कामना रखनेवाले; ३२८. काममालिनीकेलिलालितः – कामेशी अथवा काममालिनी नामक शक्ति की क्रीडाओं द्वारा प्रसन्न किये गये ॥ ६३ ॥
सरस्वत्याश्रयो गौरीनन्दनः श्रीनिकेतनः ।
गुरुगुप्तपदो वाचासिद्धो वागीश्वरीपतिः ॥ ६४ ॥

३२९. सरस्वत्याश्रयः – सरस्वती (वाग्देवता) – के आश्रय; ३३०. गौरीनन्दनः – पार्वतीदेवी को आनन्द प्रदान करने वाले; ३३१. श्रीनिकेतनः – लक्ष्मी या शोभा के आगार; ३३२. गुरुगुप्तपदः – गणक्रीड आदि गुरुओं द्वारा गोपित पद वाले; ३३३. वाचासिद्धः- जिनकी भक्ति से वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है, वे; ३३४. वागीश्वरीपतिः– वागीश्वरी अर्थात् नकुली नामक शक्ति के प्रियतम ॥ ६४ ॥
नलिनीकामुको वामारामो ज्येष्ठामनोरमः ।
रौद्रीमुद्रितपादाब्जो हुम्बीजस्तुङ्गशक्तिकः ॥ ६५ ॥

३३५. नलिनीकामुकः – नलिनी अर्थात् सुरापगा नामक शक्ति के प्राणवल्लभ; ३३६. वामारामः – वामा नामक शक्ति जिनकी रामा अर्थात् प्रिया हैं, वे; ३३७. ज्येष्ठामनोरमः – ज्येष्ठा नामक शक्ति जिनकी मनोरमा हैं, वे; ३३८. रौद्रीमुद्रितपादाब्जः- रौद्रीनामक शक्ति जिनके चरणारविन्दों को अपनी अंजलि में बाँधे रखती हैं, वे; ३३९. हुम्बीजः-‘वक्रतुण्डाय हुम्’ – इस षडक्षर- मन्त्र का अन्तिम वर्ण जो ‘हुम्’ है, वही समस्त पुरुषार्थों का बीज (कारण) है; अतएव भगवान् गणपति ‘हुं बीज’ नाम से प्रसिद्ध हैं; ३४०. तुङ्गशक्तिकः- उच्चशक्ति से सम्पन्न; अथवा वक्रतुण्डमन्त्र में जो ‘हुम्’ शब्द है, यही उक्त गणेशमन्त्र की शक्ति है। इसलिये वे उक्त नाम से प्रसिद्ध हैं ॥ ६५ ॥
विश्वादिजननत्राणः स्वाहाशक्तिः सकीलकः ।
अमृताब्धिकृतावासो मदघूर्णितलोचनः ॥ ६६ ॥

३४१. विश्वादिजननत्राणः – विश्व के आदिभूत हिरण्यगर्भ के जन्म और पालन जिनसे होते हैं, वे; ३४२. स्वाहाशक्तिः – ‘स्वाहा’ जिनकी शक्ति हैं, वे; ३४३. सकीलकः – कीलकयुक्त; ३४४. अमृताब्धि-कृतावासः- सुधासिन्धु में निवास करनेवाले; ३४५. मदघूर्णितलोचनः – सुधापान के मद से गण्डस्थल से झरते हुए मद से घूरते हुए नेत्रवाले ॥ ६६ ॥
उच्छिष्टगण उच्छिष्टगणेशो गणनायकः ।
सार्वकालिकसंसिद्धिर्नित्यशैवो दिगम्बरः ॥ ६७ ॥

३४६. उच्छिष्टगणः- उत्कृष्ट और शिष्ट गणों के स्वामी; ३४७. उच्छिष्टगणेशः- (उच्छिष्टे नामरूपं च) इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रों के समूह से प्रतिपाद्य ईश्वर; अथवा सतत मोदक भक्षण के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध श्रीगणेश; ३४८. गणनायकः – जिनके गुणों की गणना भक्तों द्वारा होती रहती है, वे; ३४९. सार्वकालिकसंसिद्धिः – जिनकी सिद्धियाँ सब समय बनी रहती हैं, वे; ३५०. नित्यशैवः – सदा शिव का चिन्तन करने वाले; ३५१. दिगम्बरः – दिशाओं को ही वस्त्र बनाने वाले ॥ ६७ ॥
अनपायोऽनन्तदृष्टिरप्रमेयोऽजरामरः ।
अनाविलो ऽप्रतिरथो ह्यच्युतोऽमृतमक्षरम् ॥ ६८ ॥

३५२. अनपायः – अविनाशी; ३५३. अनन्तदृष्टिः – असीम ज्ञानशक्ति से सम्पन्न; ३५४. अप्रमेयः – वाणी, मन एवं ज्ञानेन्द्रियों से अगम्य होने के कारण प्रमाणातीत; ३५५. अजरामरः – जरा और मृत्यु से रहित; ३५६. अनाविलः – कालुष्यरहित; ३५७. अप्रतिरथः– प्रतिद्वन्द्वी से शून्य; ३५८. अच्युतः- मर्यादा से कभी च्युत न होने वाले; अथवा श्रीकृष्ण से अभिन्न; ३५९. अमृतम् – अमृत या मोक्षस्वरूप; ३६०. अक्षरम् – व्यापक अथवा अक्षय ॥ ६८ ॥
अप्रतर्क्याऽक्षयोऽजय्योऽनाधारोऽनामयोऽमलः ।
अमोघसिद्धिरद्वैतमघोरोऽप्रमिताननः ॥ ६९ ॥

३६१. अप्रतर्क्यः- जिसका वेदों के द्वारा अनुमोदन न हो, ऐसे तर्क से अगम्य; ३६२. अक्षयः- क्षयरहित; ३६३. अजय्यः- जिन्हें जीता न जा सके, ऐसे; ३६४. अनाधारः – स्वयं सबके आधार होने के कारण अपने लिये आधार से रहित; ३६५. अनामयः- रोगरहित; ३६६. अमलः- मलिनता से शून्य; ३६७. अमोघसिद्धिः – अमोघ (अव्यर्थ ) – सिद्धिवाले, ३६८. अद्वैतम् – द्वैतप्रपंच से रहित; ३६९. अघोरः- शिवरूप; ३७०. अप्रमिताननः – असंख्य मुखवाले ॥ ६९ ॥
अनाकारोऽब्धिभूम्यग्निबेलघ्नोऽव्यक्तलक्षणः ।
आधारपीठ आधार आधाराधेयवर्जितः ॥ ७० ॥

३७१. अनाकारः – निराकार परमात्मा; ३७२. अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः – जलधि या जल की शक्ति क्लेदन, भूमि की शक्ति स्तम्भन तथा अग्नि की शक्ति दहन का जिन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वे भूमि, जल और अग्नि की शक्ति को प्रतिहत कर देने वाले; ३७३. अव्यक्तलक्षणः – बहिर्मुख मानवों की बुद्धि में जिनके स्वरूप लक्षण तथा तटस्थ – लक्षण की अभिव्यक्ति नहीं होती, वे; ३७४. आधारपीठः – पृथ्वी से लेकर शिवपर्यन्त छत्तीस आधारभूत तत्त्वों के भी आश्रय; ३७५. आधारः — अ – विष्णु तथा आ-ब्रह्मा को भी धारण करने वाले; ३७६. आधाराधेयवर्जितः – आधार – आधेयभाव से रहित, अद्वैतस्वरूप ॥ ७० ॥
आखुकेतन आशापूरक आखुमहारथः ।
इक्षुसागरमध्यस्थ इक्षुभक्षणलालसः ॥ ७१ ॥

३७७. आखुकेतनः— मूषकचिह्न से युक्त ध्वज वाले; ३७८. आशापूरकः—सर्वव्यापी होने से दिशाओं के पूरक अथवा सबकी आशा पूर्ण करनेवाले; ३७९. आखुमहारथः— मूषकरूपी महान् रथ (वाहन) – से युक्त; ३८०. इक्षुसागरमध्यस्थः – ईख के रस के सागर में विराजमान; ३८१. इक्षुभक्षणलालसः – ईख खाने की इच्छा रखने वाले ॥ ७१ ॥
इक्षुचापातिरेक श्रीरिक्षुचापनिषेवितः ।
इन्द्रगोपसमानश्रीरिन्द्रनीलसमद्युतिः ॥ ७२ ॥

३८२. इक्षुचापातिरेकश्रीः – इक्षुधन्वा (कामदेव)- से भी अधिक सौन्दर्य श्री से सम्पन्न; ३८३. इक्षुचापनिषेवितः – इक्षुमय चाप की अधिष्ठात्री देवी अथवा कामदेव से सेवित; ३८४. इन्द्रगोपसमानश्रीः- इन्द्रगोप (बीरबहूटी नामक कीट) के समान अरुण कान्ति वाले; ३८५. इन्द्रनीलसमद्युतिः [^6] – इन्द्रनीलमणि के समान श्याम कान्ति वाले ॥ ७२ ॥
इन्दीवरदलश्याम इन्दुमण्डलनिर्मलः ।
इध्मप्रिय इडाभाग इराधामेन्दिराप्रियः ॥ ७३ ॥

३८६. इन्दीवरदलश्यामः – नीलकमल के समान श्याम; ३८७. इन्दुमण्डलनिर्मलः – चन्द्रमण्डल के समान गौर कान्तिवाले; ३८८. इध्मप्रियः – अग्निस्वरूप से काष्ठ या ईंधन के प्रेमी; ३८९. इडाभागः – ऋत्विक् और यजमान आदि के रूप में यज्ञकर्म में भाग लेने वाले; ३९०. इराधामा – पृथ्वी में अन्तर्यामीरूप से अवस्थित; ३९१. इन्दिराप्रियः – लक्ष्मी द्वारा पूज्य; अथवा विष्णुरूप से लक्ष्मी के प्रियतम ॥ ७३ ॥
इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी इतिकर्तव्यतेप्सितः ।
ईशानमौलिरीशान ईशानसुत ईतिहा ॥ ७४ ॥

३९२. इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी – राजा इक्ष्वाकु के विघ्न का नाश करने वाले; ३९३. इतिकर्तव्यतेप्सितः- इतिकर्तव्यता (क्रतु की अंगभूत सामग्री) – की अपेक्षा रखकर यजमान की मनोवांछापूर्ण करने वाले; ३९४. ईशानमौलिः– नरेश, भूतेश और सुरेश आदि ईशानों (ईश्वरों)–के शिरोमणि; ३९५. ईशानः – ईशों को जीवन देनेवाले; ३९६. ईशानसुतः – ईश्वरपुत्र; ३९७. ईतिहा- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषकजनित उपद्रव, शलभ, शुक आदि पक्षी, स्वमण्डल तथा परमण्डल – इन सबसे प्राप्त होनेवाले भय को ‘ईति-भीति’ कहते हैं; उस  ‘ईति – भीति’ के नाशक ॥ ७४ ॥
ईषत्रकल्पान्त ईहामात्रविवर्जितः ।
उपेन्द्र उड्डुभृन्मौलिरुण्डेरकबलिप्रियः ॥ ७५ ॥

३९८. ईषणात्रयकल्पान्तः – लोकैषणा, पुत्रैषणा और वित्तैषणा – इन त्रिविध एषणाओं के लिये प्रलयंकर अथवा वैराग्यदायक; ३९९. ईहामात्रविवर्जितः – चेष्टामात्र से शून्य; चित्स्वरूप; ४००. उपेन्द्रः – कश्यप और अदिति के यहाँ अवतीर्ण महोत्कट विनायक अथवा वामन से अभिन्न; ४०१. उडुभृन्मौलिः – नक्षत्रपालक चन्द्रमा को भालदेश में धारण करने वाले; ४०२. उण्डेरकबलिप्रियः – गोल-गोल मिष्टान्न के उपहार को प्रिय मानने वाले ॥ ७५ ॥
उन्नतानन उत्तुङ्ग उदारत्रिदशाग्रणीः ।
ऊर्जस्वानूष्मलमद ऊहापोहदुरासदः ॥ ७६ ॥

४०३. उन्नताननः – उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवों को प्राणवान् करने वाले; ४०४. उत्तुङ्गः – वराहरूपधारी भगवान्‌ की दाढ़ से तुंगा नाम वाली एक नदी प्रकट हुई, जिससे वे भगवान् ‘उत्तुंग’ कहलाये। उनसे अभिन्न होने के कारण गणेशजी का भी नाम ‘उत्तुंग’ है; ४०५. उदार-त्रिदशाग्रणीः- उदार देवताओं में श्रेष्ठ; ४०६. ऊर्जस्वान्- तेजस्वी; ४०७. ऊष्मलमदः – गण्डस्थल से गर्म-गर्म मदजल बहाने वाले; ४०८. ऊहापोहदुरासदः – ऊह (वितर्क) और अपोह (उसके बाध)-से दुष्प्राप्य ॥ ७६ ॥
ऋग्यजुस्सामसम्भूतिर्ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः
ऋजुचित्तैकसुलभः ॠणत्रयविमोचकः ॥ ७७ ॥

४०९. ऋग्यजुस्सामसम्भूतिः – अपने निःश्वास से ऋजुचित्तैक सुलभ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को प्रकट करने वाले; ४१०. ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः – राज्यसम्पत्ति तथा अणिमा आदि सम्पत्तियों को देने वाले; ४११. ऋजुचित्तैकसुलभः- सरलचित्त-निर्मल मन से ही एकमात्र सुलभ होने वाले; ४१२. ऋणत्रयविमोचकः – देव – ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण – इन तीनों से छुटकारा दिलानेवाले ॥ ७७ ॥
लुप्तविघ्नः स्वभक्तानां लुप्तशक्तिः सुरद्विषाम् ।
लुप्तश्रीर्विमुखार्चानां लूताविस्फोटनाशनः ॥ ७८ ॥

४१३. स्वभक्तानां लुप्तविघ्नः – अपने भक्तजनों का विघ्न नष्ट करने वाले; ४१४. सुरद्विषां लुप्तशक्तिः– देवद्रोही दैत्यों की शक्ति नष्ट करने वाले; ४१५. विमुखार्चानां लुप्तश्रीः- अपनी पूजा से विमुख या विरुद्ध रहने वालों की धन-सम्पत्ति का नाश करने वाले; ४१६. लूता- विस्फोटनाशनः– मकड़ी और फोड़े-फुंसी आदि रोगों का नाश करनेवाले ॥ ७८ ॥
एकारपीठमध्यस्थ एकपादकृतासनः ।
एजिताखिलदैत्य श्रीरेधिताखिलसंश्रयः ॥ ७९ ॥

४१७. एकारपीठमध्यस्थः– त्रिकोणचक्र के मध्यभाग में विराजमान; ४१८. एकपादकृतासनः- काशी में एक पैर से खड़े रहने वाले; ४१९. एधिताखिलसंश्रयः– समस्त असुरों की राज्य-लक्ष्मी को कम्पित कर देने वाले; ४२०. एजिताखिलदैत्यश्रीः- अपनी शरण लेने वाले भक्तों की श्रीवृद्धि करने वाले ॥ ७९ ॥
ऐश्वर्यनिधिरैश्वर्यमैहिकामुष्मिकप्रदः
ऐरम्मदसमोन्मेष ऐरावतनिभाननः ॥ ८० ॥

४२१. ऐश्वर्यनिधिः – ऐश्वर्यके आधार अथवा भक्तों के यहाँ ऐश्वर्य स्थापित करने वाले; ४२२. ऐश्वर्यम्- ईश्वरकोटि के पुरुषों में ऐश्वर्यरूपा अणिमा आदि विभूतिरूप; ४२३. ऐहिकामुष्मिकप्रदः – लौकिक और पारलौकिक सुख देने वाले; ४२४. ऐरम्मदसमोन्मेषः – जिनकी दृष्टि का उन्मेष (खोलना) विद्युत् के समान प्रकाशमान है, वे; ४२५. ऐरावतनिभाननः – ऐरावत हाथी के समान मुख वाले ॥ ८० ॥
ओंकारवाच्य ओंकार ओजस्वानोषधीपतिः ।
औदार्यनिधिरौद्धत्यधुर्य औन्नत्यनिस्स्वनः ॥ ८१ ॥

४२६. ओंकारवाच्यः—ओंकार अर्थात् प्रणव के वाच्यार्थरूप; ४२७. ओंकारः – ओंकार नाम वाले; ४२८. ओजस्वान् — शौर्य और उत्कर्ष के कारणभूत तेज से सम्पन्न; ४२९. ओषधीपतिः – ओषधियों के स्वामी चन्द्रमारूप; ४३०. औदार्यनिधिः – उदारता के सिन्धु; ४३१. औद्धत्यधुर्यः – अपने भक्तों पर कृपा करने के लिये उनके सामने अपना उत्कर्ष प्रकट करनेमें श्रेष्ठ; ४३२. औन्नत्यनिस्स्वनः- सबकी अपेक्षा उच्चस्वर से गर्जना करनेवाले ॥ ८१ ॥
अङ्कुशः सुरनागानामङ्कुशः सुरविद्विषाम्।
समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः ॥ ८२ ॥

४३३. सुरनागानामङ्कुशः – देवलोक, मर्त्यलोक और पाताललोक–तीनों को अपने नियन्त्रण में रखनेवाले; ४३४. सुरविद्विषामङ्कुशः – देवताओं और विद्वानों के द्वेषियों को दण्डित करने वाले; ४३५. समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः अः–’अ’ से लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त जो ५१ अक्षर हैं, उनके अन्तमें विसर्ग लगानेपर जिसका उच्चारण होता है, वह ‘अः’ गणेशजीका एक नाम है ॥ ८२ ॥
कमण्डलुधरः कल्पः कपर्दी कलभाननः ।
कर्मसाक्षी कर्मकर्ता कर्माकर्मफलप्रदः ॥ ८३ ॥

४३६. कमण्डलुधरः – कमण्डलु धारण करने वाले अथवा सूँड़ से अमृतकलश धारण करने वाले; ४३७. कल्पः – प्रलयकालस्वरूप; अथवा निर्माण में समर्थ; ४३८. कपर्दी – कौड़ी अथवा जटाजूट धारण करने वाले; ४३९. कलभाननः – नाद, कान्ति और प्राणनशक्ति से सम्पन्न; ४४०. कर्मसाक्षी – अदृष्ट कर्मों के भी साक्षी; ४४१. कर्मकर्ता – कर्मठ पुरुषों के अन्तःप्रेरक होने के कारण स्वयं ही कर्म करने वाले; ४४२. कर्माकर्मफलप्रदः – स्वर्ग और मोक्षरूप फल देने वाले ॥ ८३ ॥
कदम्बगोलकाकारः कूष्माण्डगणनायकः।
कारुण्यदेहः कपिलः कथकः कटिसूत्रभृत् ॥ ८४ ॥

४४३. कदम्बगोलकाकारः- समस्त नाड़ियों का जो उद्गमस्थान है, वहाँ कदम्ब – पुष्प के समान गोल आकार का कोई देवता है, जो गणेशजी से अभिन्न है; ४४४. कूष्माण्डगणनायकः – दुष्ट ग्रहों के नायक (उन्हें नियन्त्रण में रखने वाले); ४४५. कारुण्यदेहः – करुणामूर्ति; ४४६. कपिलः– कपिलमुनिस्वरूप; ४४७. कथकः- सम्प्रदायप्रवर्तक; ४४८. कटिसूत्रभृत्-कांची धारण करने वाले ॥ ८४ ॥
खर्वः खड्गप्रियः खड्गखान्तान्तस्थः खनिर्मलः ।
खल्वाटभृङ्गनिलयः खट्वाङ्गी खदुरासदः ॥ ८५ ॥

४४९. खर्वः–वामनरूप; ४५०. खड्गप्रियः- खड्ग (तलवार या गैंड़ा) जिन्हें प्रिय है; ४५१. खड्गखान्तान्तस्थः-खड्ग-शब्दगत खकार से परे जो डकार है, उससे परे जो गकार है, वह गणेशजी का बीजाक्षर है, उसमें विद्यमान; ४५२. खनिर्मलः – आकाश की भाँति सर्वगत होते हुए निर्लिप्त; ४५३. खल्वाटशृङ्गनिलयः–वृक्षविहीन पर्वत के शिखर पर निवास करने वाले; ४५४. खट्वाङ्गी – खट्वांगनाम से प्रसिद्ध अस्त्र धारण करने वाले; ४५५. खदुरासदः – आकाश की भाँति पकड़ में न आ सकनेवाले ॥ ८५ ॥
गुणाढ्यो गहनो गस्थो गद्यपद्यसुधार्णवः ।
गद्यगानप्रियो गर्जो गीतगीर्वाणपूर्वजः ॥ ८६ ॥

४५६. गुणाढ्यः—अनन्त कल्याणमय गुणगण से सम्पन्न; ४५७. गहनः–जहाँ जाना या पहुँचना सम्भ न हो सके, वे; ४५८. गस्थः – अपने बीजस्वरूप गकार में स्थित; ४५९. गद्यपद्यसुधार्णवः – गद्य-पद्य में काव्यरसामृत के सागर; ४६०. गद्यगानप्रियः – गद्य- सामगान के प्रेमी; ४६१. गर्जः – मेघगर्जनस्वरूप; ४६२. गीतगीर्वाणपूर्वजः-नाद से गीत आदि शब्द प्रकट हुए हैं और नाद के अर्थ से देवता आदि; अतः नाद और नादार्थस्वरूप होने के कारण गीत और देवताओं के पूर्वज ॥ ८६ ॥
गुह्याचाररतो गुह्यो गुह्यागमनिरूपितः।
गुहाशय गुहाब्धिस्थो गुरुगम्यो गुरोर्गुरुः ॥ ८७ ॥

४६३. गुह्याचाररतः- हृदयगुहा में प्रविष्ट जीवात्मा और परमात्मा के चिन्तन में लगे हुए अन्तर्मुख साधक संतुष्ट रहने वाले; ४६४. गुह्यः – एकान्त में जानने योग्य; अथवा गुह — कार्तिकेय के हितकारी; ४६५. गुह्यागमनिरूपितः– गुह्य अर्थात् एकान्त वेद्य होने के कारण ‘गुह्यागमनिरूपित’ के नाम से प्रसिद्ध; ४६६. गुहाशयः – हृदयगुहा में शयन करने वाले अन्तर्यामी पुरुष; ४६७. गुहाब्धिस्थः–अव्याकृत आकाश गूढ़ और अगाध होने के कारण गुहाब्धि के तुल्य है, उसमें विराजमान; ४६८. गुरुगम्यः–गुरु के बताये हुए योग या उपाय से प्राप्तव्य; ४६९. गुरोर्गुरुः- ब्रह्मा आदि को भी वेद का ज्ञान देने वाले होने के कारण गुरु के भी गुरु ॥ ८७ ॥
घण्टाघर्घरिकामाली घटकुम्भो घटोदरः ।
(ङकारवाच्यो ङकारो ङकाराकारशुण्डभृत्॥ [^7]
)
चण्डश्चण्डेश्वरसुहृच्चण्डीशश्चण्डविक्रमः ॥ ८८ ॥

४७०. घण्टाघर्घरिकामाली – घण्टा की तरह मनोहर शब्द करने वाली किंकिणी को ‘घर्षरिका’ कहते हैं। बालोचित क्रीड़ा के समय उसकी माला धारण करने वाले; ४७१. घटकुम्भः- उलटे रखे हुए दो घड़ों के समान दो कुम्भस्थल वाले; ४७२. घटोदरः – घट के समान विशाल उदर वाले; ४७३. चण्डः – प्रचण्ड पराक्रमी; ४७४. चण्डेश्वरसुहृत्-शिवपार्षद चण्डेश्वर के सखा; ४७५. चण्डीशः – चण्डीनाथ शिव; ४७६. चण्डविक्रमः- अत्यन्त क्रोधशील दुष्टों पर आक्रमण करके उन्हें वश में करने वाले ॥ ८८ ॥
चराचरपतिश्चिन्तामणिचर्वणलालसः ।
छन्दश्छन्दोवपुश्छन्दोदुर्लक्ष्यश्छन्दविग्रहः ॥ ८९ ॥

४७७. चराचरपतिः-स्थावर-जंगम जगत् के स्वामी; ४७८. चिन्तामणिचर्वणलालसः – अपनी अतिशय उदारता के कारण चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पवृक्ष के गर्व को चूर्ण करने की लालसा वाले; ४७९. छन्दः— गायत्री आदि छन्दःस्वरूप; ४८०. छन्दोवपुः – छन्दोमय शरीर वाले; ४८१. छन्दोदुर्लक्ष्यः – वेद से भी कठिनतापूर्वक लक्षित होने वाले; ४८२. छन्दविग्रहः – अपनी इच्छा के अनुसार या भक्तों की भावना के अनुकूल अवतार – शरीर धारण करने वाले ॥ ८९ ॥
जगद्योनिर्जगत्साक्षी जगदीशो जगन्मयः ।
जपो जपपरो जप्यो जिह्वासिंहासनप्रभुः ॥ ९० ॥

४८३. जगद्योनिः – जगत् के कारण; ४८४. जगत्साक्षी – जगत् के साक्षी या द्रष्टा; ४८५. जगदीशः- जगत् के स्वामी या रक्षक; ४८६. जगन्मयः- जगत्स्वरूप या जगत् के अधिष्ठान; ४८७. जपः – जपकर्मरूप; ४८८. जपपरः – जपकर्ता; ४८९. जप्यः – जपनीय मन्त्ररूप; ४९०. जिह्वासिंहासनप्रभुः – जिनके नाम- कीर्तन के समय जो भक्त की जिह्वारूपी सिंहासन पर विराजमान रहते हैं, वे ॥ ९० ॥
झलझलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः ।
टंकारस्फारसंरावष्टंकारिमणिनूपुरः ॥ ९१ ॥

४९१. झलज्झलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः- कानों के हिलाने से उड़-उड़कर मदजल के आस-पास झंकाररव करने वाले भ्रमरों से व्याप्त; ४९२. टंकार-स्फारसंरावः-काँसे की घंटी या थाली के बजने से होने वाले रण-रणनात्मक रव के समान जिनके आभूषण की झनकार होती है, वे; ४९३. टंकारिमणिनूपुरः – बजते हुए रत्नमय पादकटक की ध्वनि फैलाने वाले ॥ ९१ ॥
ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः ।
डिण्डिमुण्डो डाकिनीशो डामरो डिण्डिमप्रियः ॥ ९२ ॥

४९४. ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः- सम्पूर्ण स्वाहान्त मन्त्रों के एकमात्र सिद्धिदाता; ४९५. डिण्डिमुण्डः – उलटकर रखे हुए नगाड़े के समान कुम्भस्थल वाले; ४९६. डाकिनीशः – योगिनियों के ईश्वर; ४९७. डामरः – डामर नामक तन्त्रस्वरूप; ४९८. डिण्डिमप्रियः – डिण्डिमघोष या दुन्दुभि की ध्वनि से प्रसन्न होने वाले ॥ ९२ ॥
ढक्कानिनादमुदितो ढौको दुण्ढिविनायकः ।
तत्त्वानां परमं तत्त्वं तत्त्वंपदनिरूपितः ॥ ९३ ॥

४९९. ढक्कानिनादमुदितः – पटहध्वनि से प्रसन्न; ५००. ढौकः- सर्वगत; अथवा सर्वज्ञ; ५०१. ढुण्ढिविनायकः – विशिष्ट नायक के रूप में अन्वेषणीय; ५०२. तत्त्वानां परमं तत्त्वम्-तत्त्वों में परम (छब्बीसवें) तत्त्वरूप; ५०३. तत्त्वंपदनिरूपितः – ‘तत् – पदार्थ’ और ‘त्वम्-पदार्थ’ की एकता द्वारा निरूपित ॥ ९३ ॥
तारकान्तरसंस्थानस्तारकस्तारकान्तकः स्थाणुः ।
स्थाणुप्रियः स्थाता स्थावरं जङ्गमं जगत् ॥ ९४ ॥

५०४. तारकान्तरसंस्थानः – आँख की पुतली में चिन्तन करने योग्य; ५०५. तारकः – प्रणव की भाँति भवसागर से पार करने वाले; ५०६. तारकान्तकः- तारकासुर का संहार करने वाले; ५०७. स्थाणुः – सुस्थिर; सर्वथा अकम्पित; ५०८. स्थाणुप्रियः- शिव के प्रिय पुत्र; ५०९. स्थाता- – युद्ध में दृढ़तापूर्वक डटे रहने वाले; ५१०. स्थावरं जङ्गमं जगत् — चराचर जगत्स्वरूप ॥ ९४ ॥
दक्षयज्ञप्रमथनो दाता दानवमोहनः ।
दयावान् दिव्यविभवो दण्डभृद्दण्डनायकः ॥ ९५ ॥

५११. दक्षयज्ञप्रमथनः – दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाले शिवरूप; ५१२. दाता — दानी अथवा शोधक [^8] —पतितपावन; ५१३. दानवमोहनः – दानवोंको मोहित (तत्त्व-विमुख) करनेवाले; ५१४. दयावान् — दयालु; ५१५ दिव्यविभवः – लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले अथवा दिव्य वैभवसे सम्पन्न; ५१६. दण्डभृत्—दण्डनीतिके पालक; ५१७. दण्डनायकः- दण्डके प्रवर्तक ॥ ९५ ॥
दन्तप्रभिन्नाभ्रमालो दैत्यवारणदारणः।
दंष्ट्रालग्नद्विपघटो देवार्थनृगजाकृतिः ॥ ९६ ॥

५१८. दन्तप्रभिन्नाभ्रमालः – सिर हिलाने मात्र से दन्ताघात के द्वारा बादलों की पंक्ति को छिन्न-भिन्न कर देने वाले; ५१९. दैत्यवारणदारणः – दैत्यों को रोकने और विदीर्ण करने वाले; ५२०. दंष्ट्रालग्नद्विपघटः- जिनके दाढ़ के एक देश में भी शत्रुओं के हाथियों का समुदाय संलग्न है, ऐसे; ५२१. देवार्थनृगजाकृतिः – देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये मनुष्य और हाथी की आकृति स्वीकार करने वाले ॥ ९६ ॥
धनधान्यपतिर्धन्यो धनदो धरणीधरः ।
ध्यानैकप्रकटो ध्येयो ध्यानं ध्यानपरायणः ॥ ९७ ॥

५२२. धनधान्यपतिः – धन और धान्यके स्वामी तथा दाता; ५२३. धन्यः – धन से सम्पन्न एवं पुण्यवान्; ५२४. धनदः – धन के दाता; अथवा कुबेरस्वरूप; ५२५. धरणीधरः – शेषनाग तथा आदिवराह के रूप में पृथ्वी को धारण करने वाले; ५२६. ध्यानैकप्रकटः– एकमात्र ध्यान में ही प्रकट होने वाले; ५२७. ध्येयः – ध्यान में द्रष्टव्य; ५२८. ध्यानम् — ध्यानस्वरूप; ५२९. ध्यानपरायणः-ध्यान में संलग्न रहनेवाले ॥ ९७ ॥
नन्द्यो नन्दिप्रियो नादो नादमध्यप्रतिष्ठितः ।
निष्कलो निर्मलो नित्यो नित्यानित्यो निरामयः ॥ ९८ ॥

५३०. नन्द्यः—आनन्दनीय; ५३१. नन्दिप्रियः- नन्दिकेश्वर के प्रिय; ५३२. नादः – नादानुसंधान से प्राप्त होने वाले नादस्वरूप; ५३३. नादमध्यप्रतिष्ठितः- नाद में प्रतिष्ठित; ५३४. निष्कलः – अवयवरहित; ५३५. निर्मलः – दोषरहित; ५३६. नित्यः – नाशरहित; ५३७. नित्यानित्यः- आकाश और पृथ्वी आदि नित्य एवं अनित्य रूप धारण करने वाले; ५३८. निरामयः- अविद्यारूपी महारोग से शून्य ॥ ९८ ॥
परं व्योम परं धाम परमात्मा परं पदम् ।
परात्परः पशुपतिः पशुपाशविमोचकः ॥ ९९ ॥

५३९. परं व्योम–अव्याकृत आकाश या नित्य धामस्वरूप; ५४०. परं धाम – ज्योतिके ज्योतिःस्वरूप;  ५४१. परमात्मा – सम्पूर्ण जीवों से उत्कृष्ट आत्मा— पुरुषोत्तम; ५४२. परं पदम्–परमपदरूप; ५४३. परात्परः – पर से भी पर – ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी उत्तम; ५४४. पशुपतिः – ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त समस्त जीवों के पालक; ५४५. पशुपाशविमोचकः- पशुओं (जीवों)-को विविध पाशों (बन्धनों)-से छुटकारा दिलाने वाले ॥ ९९ ॥
पूर्णानन्दः परानन्दः पुराणपुरुषोत्तमः ।
पद्मप्रसन्ननयनः प्रणताज्ञानमोचनः ॥ १०० ॥

५४६. पूर्णानन्दः– क्रिया, कर्ता और कर्म के भेद से रहित परिपूर्ण सुखस्वरूप; ५४७. परानन्दः- भूलोक से लेकर शत- गुणोत्तर बढ़े हुए ब्रह्मलोक पर्यन्त के सम्पूर्ण आनन्दों को नीचा करके सबसे उत्कृष्ट परमानन्द— महासुखस्वरूप; ५४८. पुराणपुरुषोत्तमः – क्षर-अक्षर भी उत्तम एवं अनादि होने के कारण पुराणपुरुषोत्तम; ५४९. पद्मप्रसन्ननयनः – प्रफुल्ल कमल के समान उल्लासयुक्त नेत्रवाले; ५५०. प्रणताज्ञानमोचनः – शरणागत सेवकों को तत्त्वज्ञान देकर उनके अज्ञान का निवारण करने वाले ॥ १०० ॥
प्रमाणप्रत्ययातीतः प्रणतार्तिनिवारणः ।
फलहस्तः फणिपतिः फेत्कारः फाणितप्रियः ॥ १०१ ॥

५५१. प्रमाणप्रत्ययातीतः — प्रमाणजनित प्रतीतियों से ऊपर उठे हुए नित्यज्ञानैकस्वरूप; ५५२. प्रणतार्तिनिवारणः–प्रणतजनों की पीड़ा को दूर कर देने वाले; ५५३. फलहस्तः- भक्तजनों को अविलम्ब फल देने के कारण मानो समस्त फलों को हाथ में ही लिये रहने वाले; ५५४. फणिपतिः – शेष और वासुकि नाग भी स्वामी; ५५५. फेत्कारः – फेत्कार – तन्त्रस्वरूप; ५५६. फाणितप्रियः – फाणित अर्थात् खाँड के प्रेमी ॥ १०१ ॥
बाणार्चिताङ्घ्रियुगलो बालकेलिकुतूहली ।
ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ॥ १०२ ॥

५५७. बाणार्चिताङ्घ्रियुगलः– बाणासुर से पूजित युगल चरण वाले; ५५८. बालकेलिकुतूहली – बालोचित क्रीड़ा के लिये उत्सुक; ५५९. ब्रह्म—परब्रह्मस्वरूप; ५६०. ब्रह्मार्चितपदः–ब्रह्माजी से पूजित चरण वाले अथवा वेदपूजित पदवाले; ५६१. ब्रह्मचारी – ब्रह्मचर्यनिष्ठ; ५६२. बृहस्पतिः–देवगुरु बृहस्पतिरूप ॥ १०२ ॥
बृहत्तमो ब्रह्मपरो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः ।
बृहन्नादग्रयचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः ॥ १०३ ॥

५६३. बृहत्तमः – बड़े से भी बड़े; ५६४. ब्रह्मपरः- ब्रह्माजी से भी श्रेष्ठ अथवा एकमात्र वेद के ही अनुशीलन में तत्पर; ५६५. ब्रह्मण्यः – ब्राह्मणों को मान देने वाले; अथवा उनके हितकारी; ५६६. ब्रह्मवित्प्रियः – ब्रह्मवेत्ताओं के प्रिय अथवा ब्रह्मवेत्ताओं को प्रिय मानने वाले; ५६७. बृहन्नादाग्रयचीत्कारः – मेघों की गर्जना और बिजली की गड़गड़ाहट से भी अधिक उच्चस्वर से चीत्कार या गर्जना करने वाले; ५६८. ब्रह्माण्डावलिमेखलः – कटिसूत्र में किंकिणी की भाँति समस्त ब्रह्माण्डों को ही गूँथ लेने वाले अथवा विराट्-रूपधारी ॥ १०३ ॥
भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीको भर्गो भद्रो भयापहः ।
भगवान् भक्तिसुलभो भूतिदो भूतिभूषणः ॥ १०४ ॥

५६९. भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीकः – भक्तों को भौंहों के संकेत-मात्र से लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) प्रदान करने वाले; ५७०. भर्गः—तेजःस्वरूप; ५७१. भद्रः – भद्रजातीय गजरूप; ५७२. भयापहः- भयके नाशक; ५७३. भगवान्- षड्विध ऐश्वर्य से सम्पन्न; ५७४. भक्तिसुलभः– भक्ति के द्वारा ही सुगमतापूर्वक प्राप्य; ५७५. भूतिदः– अष्टसिद्धियों के दाता; ५७६. भूतिभूषणः- भस्म धारण करने वाले ॥ १०४ ॥
भव्यो भूतालयो भोगदाता भ्रूमध्यगोचरः ।
मन्त्रो मन्त्रपतिर्मन्त्री मदमत्तमनोरमः ॥ १०५ ॥

५७७. भव्यः—कल्याणस्वरूप; ५७८.भूतालयः – पंचभूतों, भूत-प्रेत आदिकों तथा समस्त भूत-प्राणियों के अधिष्ठान; ५७९. भोगदाता – प्राणियों के कर्मानुसार दुःख और सुख का अनुभव कराने वाले; ५८०. भ्रूमध्यगोचरः – भौंहों के मध्यभाग में ध्येय; ५८१. मन्त्रः– विविध मन्त्रस्वरूप; ५८२. मन्त्रपतिः -मन्त्रणा के अधिकारी, पालक एवं प्रवर्तक; ५८३. मन्त्री- राज्यसंचालनोपयोगी मन्त्रशक्ति के अधिष्ठाता; ५८४. मदमत्तमनोरमः – समाधिजनित आनन्द से मत्त हृदय में ध्येयरूप से रमण करने वाले ॥ १०५ ॥
मेखलावान् मन्दगतिर्मतिमत्कमलेक्षणः ।
महाबलो महावीर्यो महाप्राणो महामनाः ॥ १०६ ॥

५८५. मेखलावान्-करधनी से विभूषित कटिप्रदेशवाले; ५८६. मन्दगतिः – मन्द पुरुषों के भी आश्रयदाता; ५८७. मतिमत्कमलेक्षणः – सद्बुद्धि देने वाले कमलोपम नेत्रों से युक्त; ५८८. महाबलः- महाबल से सम्पन्न; ५८९. महावीर्यः – महापराक्रमी; ५९०. महाप्राणः- महान् प्राणशक्ति से सम्पन्न; ५९१. महामनाः– महामनस्वी ॥ १०६ ॥
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्ञगोप्ता यज्ञफलप्रदः ।
यशस्करो योगगम्यो याज्ञिको याजकप्रियः ॥ १०७ ॥

५९२. यज्ञः– यज्ञस्वरूप; ५९३. यज्ञपतिः – यज्ञों के स्वामी; ५९४. यज्ञगोप्ता – यज्ञों के संरक्षक; ५९५. यज्ञफलप्रदः-यज्ञफल के दाता; ५९६. यशस्करः – सुयश का विस्तार करने वाले; ५९७. योगगम्यः – योग से प्राप्तव्य; ५९८. याज्ञिकः – यज्ञकर्ता; ५९९. याजकप्रियः – यज्ञ कराने वालों के प्रेमी ॥ १०७ ॥
रसो रसप्रियो रस्यो रञ्जको रावणार्चितः ।
रक्षोरक्षाकरो रत्नगर्भो राजसुखप्रदः ॥ १०८ ॥

६००. रसः – परमानन्दस्वरूप; ६०१. रसप्रियः- मधुर आदि रस में प्रीति रखने वाले; ६०२. रस्यः-आस्वाद के विषय; ६०३. रञ्जकः – दूसरों के मन का अनुरंजन करने वाले; ६०४. रावणार्चितः – दशमुख रावण के द्वारा भी पूजित; ६०५. रक्षोरक्षाकरः- राक्षसों को जलाकर राख कर देने वाले; अथवा अपनी आराधना करने वाले राक्षसों के रक्षक; ६०६. रत्नगर्भः– पृथ्वी के आश्रय; ६०७. राजसुखप्रदः – राज – सम्बन्धी सुख देने वाले ॥ १०८ ॥
लक्ष्यं लक्ष्यप्रदो लक्ष्यो लयस्थो लड्डुकप्रियः ।
लानप्रियो लास्यपरो लाभकृल्लोकविश्रुतः ॥ १०९ ॥

६०८. लक्ष्यम् – प्रणवरूपी धनुष के द्वारा चित्तरूपी बाण से वेधने योग्य ब्रह्म; ६०९. लक्ष्यप्रदः – निर्विघ्नता- पूर्वक लक्ष्य की प्राप्ति कराने वाले; ६१०. लक्ष्यः- ‘तत्त्वमसि’ – इत्यादि महावाक्य गत पदों द्वारा लक्षणाशक्ति से बोध्य; ६११. लयस्थः – प्रलयकाल में भी स्थित रहने वाले; अथवा चित्तलय की स्थिति में विद्यमान; ६१२. लड्डुकप्रियः – लड्डू से प्रसन्न रहने वाले; ६१३. लानप्रियः – गजशाला में प्रीति रखने वाले; ६१४. लास्यपरः – विलास योग्य परमधाम वाले; ६१५. लाभकृल्लोकविश्रुतः-लाभकारी (भक्तों को शीघ्र वरदान देने वाले) लोगों में श्रेष्ठता के लिये विख्यात ॥ १०९ ॥
वरेण्यो वह्निवदनो वन्द्यो वेदान्तगोचरः ।
विकर्ता विश्वतश्चक्षुर्विधाता विश्वतोमुखः ॥ ११० ॥

६१६. वरेण्यः– गणपतिभक्त राजा वरेण्य से अभिन्न; ६१७. वह्निवदनः – अग्निरूप मुखवाले; ६१८. वन्द्यः–वन्दनीय; ६१९. वेदान्तगोचरः–उपनिषद्गम्य; ६२०. विकर्ता – -छः भावविकारों के प्रवर्तक; ६२१. विश्वतश्चक्षुः- सब ओर नेत्रवाले; ६२२. विधाता- स्रष्टा; ६२३. विश्वतोमुखः- सब ओर मुखवाले ॥ ११० ॥
वामदेवो विश्वनेता वज्रिवज्रनिवारणः ।
विश्वबन्धनविष्कम्भाधारो विश्वेश्वरप्रभुः ॥ १११ ॥

६२४. वामदेवः–सुन्दर देवता; अथवा शिवस्वरूप; ६२५. विश्वनेता — जगत् के ६२६. वज्रिवज्रनिवारणः– इन्द्र के वज्र को स्तम्भित कर देने वाले; ६२७. विश्वबन्धनविष्कम्भाधारः – विश्व की लिये पर्याप्त देश को ‘विष्कम्भ’ कहते हैं। उसके भी नायक; सृष्टि के आधार; ६२८. विश्वेश्वरप्रभुः – सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों और उनके अधीश्वरों के भी ईश्वर ॥ १११ ॥
शब्दब्रह्म शमप्राप्यः शम्भुशक्तिगणेश्वरः ।
शास्ता शिखाग्रनिलयः शरण्यः शिखरीश्वरः ॥ ११२ ॥

६२९. शब्दब्रह्म – परावाणी से अतीत नादरूपधारी; ६३०. शमप्राप्यः – मनोनिग्रह से प्राप्तव्य; ६३१. शम्भु- शक्तिगणेश्वरः – शैवों और शाक्तों के समुदाय के ईश्वर; ६३२. शास्ता – ‘शास्ता’ नाम से प्रसिद्ध केरलदेशीय देवतास्वरूप अथवा बुद्धरूप; ६३३. शिखाग्रनिलयः – शास्ता के शिखाग्रभाग में निवास करनेवाले; ६३४. शरण्यः- रक्षक; ६३५. शिखरीश्वरः हिमालयस्वरूप ॥ ११२ ॥
षड्ऋतुकुसुमस्रग्वी षडाधारः षडक्षरः ।
संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम् ॥ ११३ ॥

६३६. षऋतुकुसुमस्रग्वी – छहों ऋतुओं में खिलने वाले पुष्पों की माला से अलंकृत; ६३७. षडाधारः – छहों चक्रों के आधारभूत मूलाधारचक्रस्वरूप; ६३८. षडक्षरः -छः अक्षरों वाले वक्रतुण्डमन्त्रस्वरूप; ६३९. संसारवैद्यः- भवरोग का नाश करनेवाले; ६४०. सर्वज्ञः- सब कुछ जानने वाले अथवा बुद्धस्वरूप; ६४१. सर्वभेषजभेषजम्- समस्त रोगों की दवा दिव्य अमृत के भी दोषनिवारक ॥ ११३ ॥
सृष्टिस्थितिलयक्रीडः सुरकुञ्जरभेदनः ।
सिन्दूरितमहाकुम्भः सदसद्व्यक्तिदायकः ॥ ११४ ॥

६४२. सृष्टिस्थितिलयक्रीडः – जगत् की सृष्टि, पालन और संहार जिनकी लीलाएँ हैं, वे; ६४३. सुरकुञ्जरभेदनः – दानव से पूजित होकर देवश्रेष्ठों में भेद उत्पन्न करने वाले; अथवा देवराज के भेदक; ६४४. सिन्दूरितमहाकुम्भः – सिन्दूर से अरुण मस्तक वाले; ६४५. सदसद्व्यक्तिदायकः – अपने भक्तों को सदसद्विवेक प्रदान करने वाले ॥ ११४ ॥
साक्षी समुद्रमथनः स्वसंवेद्यः स्वदक्षिणः ।
स्वतन्त्रः सत्यसंकल्पः सामगानरतः सुखी ॥ ११५ ॥

६४६. साक्षी – विश्वको साक्षात् देखने वाले; ६४७. समुद्रमथनः– समुद्रमन्थन काल में देवताओं द्वारा सर्वप्रथम पूजित; ६४८. स्वसंवेद्यः – स्वयं ज्योतिस्वरूप; ६४९. स्वदक्षिणः – स्वयं समर्थ; ६५०. स्वतन्त्रः – अपराधीन; ६५१. सत्यसंकल्पः—कभी व्यर्थ न जाने वाले संकल्प से युक्त; ६५२. सामगानरतः – साममन्त्रों के गान में संलग्न; ६५३. सुखी-सुख का अनुभव करने वाले ॥ ११५ ॥
हंसो हस्तिपिशाचीशो हवनं हव्यकव्यभुक् ।
हव्यो हुतप्रियो हर्षो हृल्लेखामन्त्रमध्यगः ॥ ११६ ॥

६५४. हंसः- यति-विशेषरूप; अथवा सूर्यरूप; ६५५. हस्तिपिशाचीशः – हस्तिपिशाचीश नामक नवाक्षर-मन्त्र के देवता; ६५६. हवनम् – आहुतिस्वरूप; ६५७. हव्यकव्यभुक् —हव्य-कव्य के भोक्ता देवता- पितृस्वरूप; ६५८. हव्यः — हविष्यरूप; ६५९. हुतप्रियः – आहुति में दिये गये द्रव्य के प्रेमी; ६६०. हर्षः – आनन्दस्वरूप; ६६१. हृल्लेखामन्त्रमध्यगः – हृल्लेखा – मन्त्र के मध्यवर्ती-ह्रीँकारवाच्य ॥ ११६ ॥
क्षेत्राधिपः क्षमाभर्ता क्षमापरपरायणः ।
क्षिप्रक्षेमकरः  क्षेमानन्दः क्षोणीसुरद्रुमः ॥ ११७ ॥

६६२. क्षेत्राधिपः- प्रयाग आदि क्षेत्रों अथवा शरीर आदि के स्वामी; ६६३. क्षमाभर्ता – पृथ्वी अथवा क्षमा को धारण करने वाले; ६६४. क्षमापरपरायणः- क्षमाशील मुनियों के प्राप्य; ६६५. क्षिप्रक्षेमकरः- शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाले; ६६६. क्षेमानन्दः- क्षेम और आनन्दस्वरूप; ६६७. क्षोणीसुरद्रुमः- भूतल पर कल्पवृक्ष के समान समस्त मनोरथों के दाता ॥ ११७ ॥
धर्मप्रदोऽर्थदः कामदाता सौभाग्यवर्धनः ।
विद्याप्रदो विभवदो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ॥ ११८ ॥

६६८. धर्मप्रदः- धर्म प्रदान करनेवाले, ६६९. अर्थदः- धन देनेवाले; ६७०. कामदाता – कामप्रद; ६७१. सौभाग्यवर्धनः- स्त्रियोंको सौभाग्यवृद्धिका वर देनेवाले; ६७२. विद्याप्रदः – ज्ञानदाता ; ६७३. विभवदः- सम्पत्तिदाता; ६७४. भुक्तिमुक्तिफलप्रदः – भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ११८ ॥
आभिरूप्यकरो वीरश्रीप्रदो विजयप्रदः ।
सर्ववश्यकरो गर्भदोषहा पुत्रपौत्रदः ॥ ११९ ॥

६७५. आभिरूप्यकरः – विद्वत्ता एवं सुन्दरता प्राप्त कराने वाले; ६७६. वीरश्रीप्रदः – नामस्मरण करने वाले भक्तों को वीरोचित लक्ष्मी प्रदान करने वाले; ६७७. विजयप्रदः – विजय देनेवाले; ६७८. सर्ववश्यकरः – सबको भक्त के वश में कर देने वाले; ६७९. गर्भदोषहा- गर्भस्राव या गर्भपात आदि बीजदोषों को नष्ट करने वाले; ६८०. पुत्रपौत्रदः – पुत्र और पौत्र प्रदान करने वाले ॥ ११९ ॥
मेधादः कीर्तिदः शोकहारी दौर्भाग्यनाशनः ।
प्रतिवादिमुखस्तम्भो रुष्टचित्तप्रसादनः ॥ १२० ॥

६८१. मेधादः—धारणावती बुद्धि प्रदान करने वाले; ६८२. कीर्तिदः – लोकमें कीर्ति देने वाले; ६८३. शोकहारी – ज्ञानदान करके शोक-मोह को हर लेने वाले; ६८४. दौर्भाग्यनाशनः- स्त्रियों के विधवापन आदि दुर्भाग्यसूचक दोषों को नष्ट करने वाले; ६८५. प्रतिवादिमुखस्तम्भः – प्रतिकूल बोलने वाले दुष्टों का मुख बंद कर देने वाले; ६८६. रुष्टचित्तप्रसादनः- कुपित हुए राजा आदि के चित्त को प्रसन्न (स्नेहयुक्त) करने वाले ॥ १२० ॥
पराभिचारशमनो दुःखभञ्जनकारकः ।
लवस्त्रुटिः कला काष्ठा निमेषस्तत्परः क्षणः ॥ १२१ ॥

६८७. पराभिचारशमनः – दूसरों के द्वारा किये गये मारण आदि उपायों को शान्त करने वाले; ६८८. दुःखभञ्जनकारकः – सब दुःखों को दूर कर देने वाले; ६८९. लवः—लवस्वरूप; ६९०. त्रुटिः- सहस्रलवजनित काल; (यहाँ यह परिभाषा समझ लेनी चाहिये – सौ त्रुटियों का एक तत्पर होता है, तीस तत्परों का एक निमेष होता है, अठारह निमेषों की एक काष्ठा होती है और
तीस काष्ठाओं की एक कला होती है ।) ६९१. कला- तीस काष्ठाका समय; ६९२. काष्ठा-अठारह निमेष का समय; ६९३. निमेषः -तीस तत्पर का काल; ६९४. तत्परः– सौ त्रुटियों का काल; ६९५. क्षणः-
तीस कलाओं का समय ॥ १२१ ॥
घटी मुहूर्तं प्रहरो दिवा नक्तमहर्निशम् ।
पक्षो मासोऽयनं वर्षं युगं कल्पो महालयः ॥ १२२ ॥

६९६. घटी—छः क्षण का समय; ६९७. मुहूर्तम्— दो घटी का समय; ६९८. प्रहरः – चार मुहूर्त का समय; ६९९. दिवा – दिन – चार पहर का समय; ७०० नक्तम्— रात्रि-– चार पहर का समय; ७०१. अहर्निशम् – दिन-रात–आठ पहर का समय; ७०२. पक्षः – पंद्रह दिन-रात का समय; ७०३. मासः–दो पक्षों का समय; ७०४. अयनम्—छः मास का समय; ७०५. वर्षम् – दो अयनों का मानव वर्ष (तीन सौ साठ मानव वर्ष का एक दिव्य वर्ष होता है); ७०६. युगम् – बारह हजार दिव्य वर्षों का चतुर्युग; ७०७. कल्पः – सहस्र चतुर्युग का एक कल्प (जो ब्रह्मा का एक दिन है); ७०८. महालयः-बहत्तर हजार कल्पों का एक महाप्रलय होता है (जिसमें ब्रह्मा का भी लय हो जाता है।) [^9]  ॥ १२२ ॥
राशिस्तारा तिथिर्योगो वारः करणमंशकम् ।
लग्नं होरा कालचक्रं मेरुः सप्तर्षयो ध्रुवः ॥ १२३ ॥

७०९. राशिः- मेष आदि द्वादश राशिरूप; ७१०. तारा – कृत्तिका आदि नक्षत्ररूप; ७११. तिथिः– चन्द्रमा की पंद्रह कलाओं में से एक; ७१२. योगः– अमृतसिद्धि एवं आनन्द आदि योगरूप; ७१३. वारः- रविवार आदि सप्तदिनस्वरूप; ७१४. करणम् – ‘बव’ आदि करणरूप; ७१५. अंशकम् – अंशस्वरूप; ७१६. लग्नम् —– मेष आदि राशियों का उदय; ७१७. होरा– अर्धलग्न; ७१८. कालचक्रम्—शिशुमारचक्रस्वरूप; ७१९. मेरुः–सुवर्णमय पर्वतरूप; ७२०. सप्तर्षयः– कश्यप आदि सात ऋषिरूप; ७२१. ध्रुवः – उत्तानपाद के पुत्ररूप ॥ १२३ ॥
राहुर्मन्दः कविर्जीवो बुधो भौमः शशी रविः ।
कालः सृष्टिः स्थितिर्विश्वं स्थावरं जङ्गमं च यत् ॥ १२४ ॥

७२२. राहुः – राहु नामक ग्रह; ७२३. मन्दः- शनैश्चर; ७२४. कविः – शुक्र; ७२५. जीवः – बृहस्पति; ७२६. बुधः – बुध; ७२७. भौमः – मंगल; ७२८. शशी- सोम; ७२९. रविः – सूर्य; ७३०. कालः – जगत् का संहार करने वाले; ७३१. सृष्टिः– सृष्टिक्रियारूप; ७३२. स्थितिः–पालनकर्मरूप; ७३३. स्थावरं जङ्गमं विश्वम्- चराचर जगत् रुप ॥ १२४ ॥
भूरापोऽग्निमरुद्व्योमाहंकृतिः प्रकृतिः पुमान्।
ब्रह्मा विष्णुः शिवो रुद्र ईशः शक्तिः सदाशिवः ॥ १२५ ॥

७३४. भूः– पृथ्वीरूप; ७३५. आपः – जलरूप; ७३६. अग्निः – तेजः स्वरूप; ७३७. मरुत् – वायुरूप; ७३८. व्योम – आकाशरूप; ७३९. अहंकृतिः – अहंकाररूप; ७४०. प्रकृतिः – जगत् का मूलकारण अव्यक्त प्रकृतिरूप; ७४१. पुमान् — पुरुषरूप; ७४२. ब्रह्मा – सृष्टिकर्ता; ७४३. विष्णुः – पालनकर्ता; ७४४. शिवः–शिव; ७४५. रुद्रः – संहारकर्ता; ७४६. ईशः– ईशान; ७४७. शक्तिः– कामेश्वरी; ७४८. सदाशिवः– कामेश्वर शिव ॥ १२५ ॥
त्रिदशाः पितरः सिद्धा यक्षा रक्षांसि किंनराः ।
साध्या विद्याधरा भूता मनुष्याः पशवः खगाः ॥ १२६ ॥

७४९. त्रिदशाः–देवसमुदायरूप; ७५०. पितरः- पितृसमूह; ७५१. सिद्धाः – सिद्धसमुदाय; ७५२. यक्षाः- यक्षवृन्द; ७५३. रक्षांसि — राक्षससमूह; ७५४. किंनराः-किंनरवर्ग; ७५५. साध्याः – साध्यगण; ७५६. विद्याधराः – विद्याधरगण; ७५७. भूताः – भूतगण; ७५८. मनुष्याः – मनुष्यगण; ७५९. पशवः – पशुगण; ७६०. खगाः – पक्षिगण ॥ १२६ ॥
समुद्राः सरितः शैला भूतं भव्यं भवोद्भवः ।
सांख्यं पातञ्जलं योगः पुराणानि श्रुतिः स्मृतिः ॥ १२७ ॥

७६१. समुद्राः – विभिन्न समुद्र; ७६२. सरितः – नदीसमुदाय; ७६३. शैलाः – पर्वतगण; ७६४. भूतम् – अतीतकाल; ७६५. भव्यम् – भविष्यकाल; ७६६. भवोद्भवः–जगत् की उत्पत्ति के कारण; ७६७. सांख्यम्- कपिलमुनि द्वारा प्रतिपादित शास्त्र; ७६८. पातञ्जलम् – पतञ्जलिप्रोक्त योगसूत्र; ७६९. योगः – नागराज शेष द्वारा प्रतिपादित; ७७०. पुराणानि – ‘ब्राह्म’ आदि पुराणसमुदाय; ७७१. श्रुतिः – ऋग्वेद आदि; ७७२. स्मृतिः – मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र ॥ १२७ ॥
वेदाङ्गानि सदाचारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वं काव्यनाटकम् ॥ १२८ ॥

७७३. वेदाङ्गानि–व्याकरणादि छः वेदांगसमूह; ७७४. सदाचारः– सदाचर – संग्रहात्मक ग्रन्थ; ७७५. मीमांसा – सोलह अध्यायों में वर्णित कर्म मीमांसा- जैमिनिसूत्र तथा चार अध्यायों में कथित ब्रह्ममीमांसा; ७७६. न्यायविस्तरः—कणाद और गौतम मुनियों के द्वारा प्रतिपादित न्यायशास्त्र; ७७७. आयुर्वेदः – धन्वन्तरिप्रोक्त उपवेद; ७७८. धनुर्वेदः—अस्त्रविद्या; ७७९. गान्धर्वम्– संगीतशास्त्र; ७८०. काव्यनाटकम्-श्रव्य काव्य और दृश्य नाटक ॥ १२८ ॥
वैखानसं भागवतं सात्वतं पाञ्चरात्रकम्।
शैवं पाशुपतं कालामुखं भैरवशासनम् ॥ १२९ ॥

७८१. वैखानसम्—विष्णुप्रोक्त वैखानसतन्त्र; ७८२. भागवतम् —वैष्णवशास्त्र; ७८३. सात्वतम् — सात्वततन्त्रः; ७८४. पाञ्चरात्रकम् – पांचरात्र आगम (ये चारों वैष्णवतन्त्र हैं); ७८५. शैवम् – शैवतन्त्र; ७८६. पाशुपतम् —पाशुपतशास्त्र; ७८७, कालामुखम्- कालामुखनाम से प्रसिद्ध तन्त्र; ७८८. भैरवशासनम्- भैरवकथित शास्त्र (ये चारों शैवतन्त्र हैं ) ॥ १२९ ॥
शाक्तं वैनायकं सौरं जैनमार्हतसंहिता ।
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं सचेतनमचेतनम् ॥ १३० ॥

७८९. शाक्तम् – शक्तितन्त्र; ७९०. वैनायकम् — विनायकतन्त्र; ७९१. सौरम् – सूर्यप्रोक्त तन्त्र; ७९२. जैनम् —जैनशास्त्र; ७९३. आर्हतसंहिता – आर्हतशास्त्र; ७९४. सत्— कारणरूप में स्थित; ७९५. असत् कार्यरूप में स्थित; ७९६. व्यक्तम्- सर्वकार्यरूप; ७९७. अव्यक्तम्—कारणरूप; ७९८. सचेतनम् – सचेतन प्राणिमात्र; ७९९. अचेतनम्—अचेतन आकाश आदि ॥ १३० ॥
बन्धो मोक्षः सुखं भोगोऽयोगः सत्यमणुर्महान्।
स्वस्ति हुं फट् स्वधा स्वाहा श्रौषड्वौषड्वषण्णमः ॥ १३१ ॥

८००. बन्धः – आत्मा में अनात्मा का और अनात्मा में आत्मा का जो भ्रम है, तादृश भ्रमात्मक बन्धनरूप; ८०१. मोक्षः – अज्ञाननाशरूप; ८०२. सुखम् – विशुद्धानन्द; ८०३. भोगः–अनुभव; ८०४. अयोगः- अनासक्त; ८०५. सत्यम्-त्रिकाल में अबाधित; ८०६. अणुः – मन- इन्द्रियों के अगोचर; ८०७. महान् – जिससे बढ़कर कोई आनन्द नहीं है, तादृश-भूमा; ८०८. स्वस्ति – सम्यक् सत्तावान्; ८०९ हुम् – अपने से इतर का बाध करने के कारण हुम्स्वरूप ब्रह्म; ८१०. फट् — इतर सत्ता के भ्रम का नाश करने वाले; ८११. स्वधा – श्राद्धरूप; ८१२. स्वाहा – यज्ञकर्मरूप; ८१३. श्रौषड्-श्रौषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१४. वौषड्- वौषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१५. वषट्- वषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१६. नमः – नमस्कारस्वरूप ॥ १३१ ॥
ज्ञानं विज्ञानमानन्दो बोधः संविच्छमो यमः ।
एक एकाक्षराधार एकाक्षरपरायणः ॥ १३२ ॥

८१७. ज्ञानम् – मोक्ष विषयक ज्ञानस्वरूप; ८१८. विज्ञानम् – विज्ञानस्वरूप; ८१९. आनन्दः- आत्मानन्दस्वरूप, ८२०. बोधः – अन्तर्बोधरूप; ८२१. संवित्-बाह्य वृत्तियों को निरस्त करने वाला अन्तर्बोध; ८२२. शमः – मनोनिग्रह; ८२३. यमः – इन्द्रियसंयम; ८२४. एकः – एकमात्र अद्वितीय; ८२५. एकाक्षराधारः – एक अक्षर ‘ग’ बीजमात्र में स्थित रहने वाली; ८२६. एकाक्षरपरायणः – ॐ – इस एकाक्षरमात्र में स्थित ॥ १३२ ॥
एकाग्र धीरेकवीर एकानेकस्वरूपधृक् ।
द्विरूपो द्विभुजो यक्षो द्विरदो द्वीपरक्षकः ॥ १३३ ॥

८२७. एकाग्रधीः- अपने-आपमें एकाग्र रहने वाली बुद्धिरूप; ८२८. एकवीरः – अद्वितीय वीर; ८२९. एकानेकस्वरूपधृक्—एक होते हुए भी अनेक रूप धारण करने वाले; ८३०. द्विरूपः – ‘पर’ और ‘अपर’ ब्रह्मरूप से दो रूप वाले; ८३१. द्विभुजः – दो बाँहों वाले; ८३२. द्व्यक्षः – दो नेत्रों वाले; ८३३. द्विरदः – दो दाँतों वाले, गजरूप; ८३४. द्वीपरक्षकः – सप्तद्वीपाधिपतित्व प्रदान करने के कारण द्वीप के रक्षक ॥ १३३ ॥
द्वैमातुरो द्विवदनो द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः ।
त्रिधामा त्रिकरस्त्रेतात्रिवर्गफलदायकः ॥ १३४ ॥

८३५. द्वैमातुरः–उमा और गंगा—दो माताओं के पुत्र; ८३६. द्विवदनः – अग्निरूप मुख तथा गजमुख दोनों से युक्त होने के कारण दो मुखवाले; ८३७. द्वन्द्वातीतः – सर्दी – गरमी आदि द्वन्द्व दुःखों से ऊपर उठे हुए; ८३८. द्वयातिगः – रजोगुण और तमोगुण – दोनों को लाँघ करके विराजमान; ८३९. त्रिधामा – सूर्य, चन्द्र और अग्नि – इन त्रिविध तेजों से युक्त मूर्तिवाले; ८४०. त्रिकरः – तीनों लोकों के कर्ता; ८४१. त्रेता-त्रिवर्गफलदायकः – त्रिविध अग्नि के चयन से प्राप्त होने वाले धर्म, काम और अर्थरूपी फलों के दाता ॥ १३४ ॥
त्रिगुणात्मा त्रिलोकादिस्त्रिशक्तीशस्त्रिलोचनः ।
चतुर्बाहुश्चतुर्दन्तश्चतुरात्मा चतुर्मुखः॥ १३५ ॥

८४२. त्रिगुणात्मा – त्रिगुणमयी मूल प्रकृति के आधार; ८४३. त्रिलोकादिः – तीनों लोकों के आदिकारण; ८४४. त्रिशक्तीशः – ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ – इन त्रिविध शक्तिमन्त्रों के अथवा प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति  इन तीनों शक्तियों के ईश्वर; ८४५. त्रिलोचनः-तीन नेत्रोंवाले; ८४६. चतुर्बाहुः- चार बाँहवाले; ८४७. चतुर्दन्तः– चार दाँतवाले; ८४८. चतुरात्मा – आत्मा, अन्तरात्मा, ज्ञानात्मा और परमात्मा के भेद से चार आत्मा वाले; ८४९. चतुर्मुखः – मुख में चार प्रकार के वेद धारण करने से चार मुख वाले ॥ १३५ ॥
चतुर्विधोपायमयश्चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः ।
चतुर्विधवचोवृत्तिपरिवृत्तिप्रवर्तकः ॥ १३६ ॥

८५०. चतुर्विधोपाय़ूमयः – भेद, दण्ड, साम और दान – ये चार उपाय हैं । इन चारों उपायों से उत्पन्न फल के साधक; ८५१. चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः – चारों वर्णों और चारों आश्रमों के विहित कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले; अथवा उन वर्णों या आश्रमों के आधार; ८५२. चतुर्विधवचोवृत्तिपरिवृत्तिप्रवर्तकः – अन्तः प्रदेश में पश्यन्ती, मध्यमा तथा परा – इन तीन वाणियों के और बाह्यदेश में वैखरी नामक चतुर्थी वाणी की वृत्तियों के परिवर्तन के प्रवर्तक ॥ १३६ ॥
चतुर्थीपूजनप्रीतश्चतुर्थीतिथिसम्भवः ।
पञ्चाक्षरात्मा पञ्चात्मा पञ्चास्यः पञ्चकृत्यकृत् ॥ १३७ ॥

८५३. चतुर्थीपूजनप्रीतः – चतुर्थी तिथि को पूजन करने से प्रसन्न होने वाले; ८५४. चतुर्थीतिथिसम्भवः- चतुर्थी नामक तिथि को प्रकट होने वाले; ८५५. पञ्चाक्षरात्मा – नाद, बिन्दु, मकार, अकार और उकार- ये प्रणव में स्थित जो पाँच अक्षर हैं, तत्स्वरूप; ८५६. पञ्चात्मा— ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव – इन पाँच विग्रहों से युक्त; ८५७. पञ्चास्यः – विस्तृत मुख वाले; ८५८. पञ्चकृत्यकृत् – सृष्टि, पालन, संहार, तिरोधान और अनुग्रह — ब्रह्मा आदि रूपों से इन पाँच कृत्यों को करने वाले ॥ १३७ ॥
पञ्चाधारः पञ्चवर्णः पञ्चाक्षरपरायणः ।
पञ्चतालः पञ्चकरः पञ्चप्रणवभावितः ॥ १३८ ॥

८५९. पञ्चाधारः–पाँचों भूतों के आधार या धारक; ८६०. पञ्चवर्णः -सदा करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान वर्णवाले होते हुए भी सत्ययुग में चन्द्रमा समान, त्रेता अर्जुनवृक्ष के समान, द्वापर में इन्द्रगोप नामक कीट के समान तथा कलियुग में धुएँ के समान वर्ण वाले होने से पाँच वर्णवाले; ८६१. पञ्चाक्षरपरायणः- शिवपञ्चाक्षरमन्त्र का जप करने वाले; ८६२. पञ्चतालः– हाथ की बिचली अँगुली के अग्रभाग से लेकर अंगुष्ठ तक की लम्बाई को ‘ताल’ कहते हैं। ऐसे पाँच ताल के बराबर शरीर वाले, वामनरूप; ८६३. पञ्चकरः – पाँच हाथ ऊँचे होने के कारण ‘पञ्चकर’ कहे जाने वाले; ८६४. पञ्चप्रणवभावितः – पाँच प्रणवों से प्रतिपादित या अनुभावित ॥ १३८ ॥
पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः पञ्चावरणवारितः ।
पञ्चभक्ष्यप्रियः पञ्चवाणः पञ्चशिवात्मकः ॥ १३९ ॥

८६५. पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः– सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईश्वर – इन पाँच ब्रह्मस्वरूपों की स्फूर्ति से युक्त; ८६६. पञ्चावरणवारितः – पाँच आवरणों अथवा पाँच कोशों से आवृत; ८६७. पञ्चभक्ष्यप्रियः – लड्डू, मण्डक, पूरी, फेणी (सेवई) और वटक (बड़े) नामवाले पाँच प्रकार के भक्ष्य पदार्थों के प्रेमी; ८६८. पञ्चवाणः—कामेश्वरी उमा और कामेश्वर शिव के पाँच बीजों से युक्त होने के कारण ‘पञ्चवाण’ नाम से प्रसिद्ध; ८६९. पञ्चशिवात्मकः -पञ्चशिव- बीजस्वरूप ॥ १३९ ॥
षट्कोणपीठः षट्चक्रधामा षड्ग्रन्थिभेदकः ।
षडध्वध्वान्तविध्वंसी षडगुलमहाह्रदः ॥ १४० ॥

८७०. षट्कोणपीठः–षट्कोणचक्र से युक्त पूजापीठ वाले; ८७१. षट्चक्रधामा – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञा – ये छः चक्र जिनके वासस्थान हैं, वे; ८७२. षड्ग्रन्थिभेदकः- मूलाधार, आज्ञा और मणिपूर- इन तीन चक्रोंमें दो-दो ग्रन्थियोंका भेदन करनेवाले; ८७३. षडध्वध्वान्तविध्वंसी- पद, भुवन, वर्ण, तत्त्व, कला और मन्त्र – इन छहों अध्वाओंको शोधन करनेके कारण उनमें व्याप्त अज्ञानान्धकार को नष्ट करने वाले; ८७४. षडङ्गुल- महाहृदः -छः अंगुल गहरे नाभिरूप महान् ह्रद वाले ॥ १४० ॥
षण्मुखः षण्मुखभ्राता षट्शक्तिपरिवारितः ।
षड्वैरिवर्गविध्वंसी षडूर्मिभयभञ्जनः ॥ १४१ ॥

८७५. षण्मुखः-छः शास्त्र जिनके मुख में हैं, वे; ८७६. षण्मुखभ्राता – षडानन कार्तिकेय के बड़े भाई; ८७७. षट्शक्तिपरिवारितः-छः शक्तियों से घिरे हुए; ८७८. षड्वैरिवर्गविध्वंसी – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर – इन छः शत्रुओं के समुदाय का नाश करने वाले; ८७९. षडूर्मिभयभञ्जनः – भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा और मृत्यु – इन छः ऊर्मियों के भय का निवारण करने वाले ॥ १४१ ॥
षट्तर्कदूरः षट्कर्मनिरतः षड्रसाश्रयः।
सप्तपातालचरणः सप्तद्वीपोरुमण्डलः॥ १४२ ॥

८८०. षट्तर्कदूरः-छः दर्शनों में कथित तर्कों के अगोचर-वाणी से अतीत; ८८१. षट्कर्मनिरतः – यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह – इन छः कर्मों में तत्पर रहने वाले; ८८२. षड्रसाश्रयः- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त — इन छः रसोंके आधार; ८८३. सप्तपातालचरणः – तल, अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल और पाताल – ये नीचे सात लोक जिनके चरणोंके आश्रित हैं, वे; ८८४. सप्तद्वीपोरुमण्डलः – जम्बू आदि सात द्वीप जिनके ऊरुमण्डलके आश्रित हैं, वे ॥ १४२ ॥
सप्तस्वर्लोकमुकुटः सप्तसप्तिवरप्रदः ।
सप्ताङ्गराज्यसुखदः सप्तर्षिगणमण्डितः॥ १४३ ॥

८८५. सप्तस्वर्लोकमुकुट ः– भुवर्लोक से लेकर गोलोकपर्यन्त सात स्वर्लोक जिनके मुकुट हैं, वे; ८८६. सप्तसप्तिवरप्रदः– सूर्य को वर देने वाले; ८८७. सप्ताङ्ग- राज्यसुखदः– स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, सेना और सुहृद् — इन सातों अंगों से युक्त राज्य का सुख देने वाले; ८८८. सप्तर्षिगणमण्डितः – कश्यप आदि सात ऋषियों तथा गणदेवताओं से सेवित एवं सुशोभित ॥ १४३ ॥
सप्तच्छन्दोनिधिः सप्तहोता सप्तस्वराश्रयः ।
सप्ताब्धिकेलिकासारः सप्तमातृनिषेवितः ॥ १४४ ॥

८८९. सप्तच्छन्दोनिधिः – गायत्री से लेकर जगतीपर्यन्त सात छन्दों के आश्रय; ८९०. सप्तहोता- होता से लेकर उद्गातापर्यन्त सात होता जिनके स्वरूप हैं, वे; ८९१. सप्तस्वराश्रयः– षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद – इन सात स्वरों के आश्रय; ८९२. सप्ताब्धिकेलिकासारः – सातों समुद्र जिनके क्रीड़ासरोवर हैं, वे; ८९३. सप्तमातृनिषेवितः – ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि सात मातृकाओं से सेवित ॥ १४४ ॥
सप्तच्छन्दोमोदमदः सप्तच्छन्दोमखप्रभुः ।
अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिरष्ट प्रकृतिकारणम् ॥ १४५ ॥

८९४. सप्तच्छन्दोमोदमदः – पथ्य-संज्ञक सात छन्दों के मोदजनक मद से युक्त; ८९५. सप्तच्छन्दो- मखप्रभुः – सप्त छन्दों के यज्ञ के स्वामी; ८९६. अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिः– अष्टमूर्ति – शिव से ध्येय मूर्ति वाले; अर्थात् भगवान् शिव भी अपने हृदय में जिनके स्वरूप का चिन्तन करते हैं, वे; ८९७. अष्टप्रकृतिकारणम्- पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इन आठ प्रकृतियों की उत्पत्ति के कारण ॥ १४५ ॥
अष्टाङ्गयोगफलभूरष्टपत्राम्बुजासनः ।
अष्टशक्तिसमृद्धश्रीरष्टैश्वर्यप्रदायकः ॥ १४६ ॥

८९८. अष्टाङ्गयोगफलभूः– यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि – इन आठ अंगों से युक्त योग के चित्तवृत्तिनिरोधरूप फल देने वाले; ८९९. अष्टपत्राम्बुजासनः- अष्टदल – कमल पर आसीन होने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध; ९०० . अष्टशक्तिसमृद्ध श्रीः- आठ दलों में निवास करने वाली तीव्रा आदि आठ शक्तियों से सेवित होने के कारण बढ़ी हुई श्री से सम्पन्न; ९०१. अष्टैश्वर्यप्रदायकः- अणिमा आदि आठ सिद्धियों के दाता ॥ १४६ ॥
अष्टपीठोपपीठ श्रीरष्टमातृसमावृतः ।
अष्टभैरवसेव्योऽष्टवसुवन्द्योऽष्टमूर्तिभृत् ॥ १४७ ॥

९०२. अष्टपीठोपपीठ श्रीः- आठ महापीठ और उपपीठों की श्री – सम्पत्ति से युक्तः ९०३. अष्ट- मातृसमावृतः – ब्राह्मी आदि सात मातृकाओं के साथ जो आठवीं महालक्ष्मी हैं, वे आठों आवरणदेवता के रूप में जिन्हें घेरे रहती हैं, वे; ९०४. अष्टभैरवसेव्यः – बटुक आदि आठ भैरवों से सेव्य; ९०५. अष्टवसुवन्द्यः- धर से लेकर प्रभास तक आठ वसुओं से वन्दनीय; ९०६. अष्टमूर्तिभृत् – अष्टमूर्तिधारी ॥ १४७ ॥
अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिरष्टद्रव्यहविः प्रियः ।
नवनागासनाध्यासी नवनिध्यनुशासिता ॥ १४८ ॥

९०७. अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिः– अष्टचक्र वाले यन्त्र में प्रकाशमान मूर्ति वाले; ९०८. अष्टद्रव्यहविः प्रियः- ईख, सत्तू, चिउड़ा, कदली, मोदक, तिल, नारियल और घृतपक्व आदि पदार्थ – इन आठ द्रव्यों के हविष्य से प्रसन्न होने वाले; ९०९. नवनागासनाध्यासी- कर्कोटक आदि नौ नागों के आसन पर बैठने वाले; ९१०. नवनिध्यनुशासिता – नौ निधियों पर अनुशासन रखने वाले ॥ १४८ ॥
नवद्वारपुराधा नवाधारनिकेतनः ।
नवनारायणस्तुत्यो नवदुर्गानिषेवितः ॥ १४९ ॥

९११.नवद्वारपुराधारः— नौ द्वारोंवाले पुर – शरीर को जीवात्मारूप से धारण करने वाले; ९१२. नवाधार- निकेतनः- कुलाकुल, सहस्रार, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और लम्बिका- इन नौ आधारों में निवास करने वाले; ९१३. नव- नारायणस्तुत्यः-धर्मनारायण, आदिनारायण, अनन्तनारायण, बदरीनारायण, रूपनारायण, शंकरनारायण, सुन्दरनारायण, लक्ष्मीनारायण और साध्यनारायण – इन नौ नारायणों से स्तुत्य; ९१४. नवदुर्गानिषेवितः – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री – इन नौ दुर्गाओं से सेवित ॥ १४९ ॥
नवनाथमहानाथो नवनागविभूषणः।
नवरत्नविचित्राङ्गो नवशक्तिशिरोधृतः ॥ १५० ॥

९१५. नवनाथमहानाथः – ज्ञान, प्रकाश, सत्य, आनन्द, विमर्श, स्वभाव, सुभग, प्रतिभ और पूर्ण — इन नौ नाथों के महानाथ; ९१६. नवनागविभूषणः – कर्कोटक आदि नौ नागों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले; ९१७. नवरत्नविचित्राङ्गः – हीरा, मोती आदि नौ रत्नों की शोभा से विचित्र अंग वाले; ९१८. नवशक्तिशिरोधृतः – तीव्रा आदि नौ शक्तियों द्वारा सिंह पर धारित अर्थात् वन्दित ॥ १५० ॥
दशात्मको दशभुजो दशदिक्पतिवन्दितः ।
दशाध्यायो दशप्राणो दशेन्द्रियनियामकः ॥ १५१ ॥

९१९. दशात्मकः – दसों दिशाओं में व्यापक; ९२०. दशभुजः – दस भुजाओं से युक्त; ९२१. दशदिक्पतिवन्दितः – इन्द्र आदि दस दिक्पालों से स्तुत्य; ९२२. दशाध्यायः – चार वेद और छः अंगों के अध्येता; ९२३. दशप्राणः- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान तथा नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय – इन दस प्राणों से युक्त; ९२४. दशेन्द्रियनियामकः– पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों को वश में रखने वाले ॥ १५१ ॥
दशाक्षरमहामन्त्रो दशाशाव्यापिविग्रहः ।
एकादशादिभी रुद्रैः स्तुत एकादशाक्षरः ॥ १५२ ॥

९२५. दशाक्षरमहामन्त्रः – दस अक्षर वाले महामन्त्र-स्वरूप; ९२६. दशाशाव्यापिविग्रहः – दसों दिशाओं में व्याप्त शरीरवाले; ९२७. एकादशादिभी रुद्रैः स्तुतः – ग्यारह से लेकर एक सहस्र तक रुद्र होते हैं, उन सबके द्वारा स्तुत; ९२८. एकादशाक्षरः – एकादश अक्षर वाले मन्त्रस्वरूप ॥ १५२ ॥
द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डो द्वादशान्तनिकेतनः ।
त्रयोदशभिदाभिन्नविश्वेदेवाधिदैवतम् ॥ १५३ ॥

९२९. द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डः – बारह उद्दण्ड (ऊपर उठे हुए) बाहुदण्डों से युक्त; ९३०. द्वादशान्तनिकेतनः- ललाट से ऊपर ब्रह्मरन्ध्र तक के स्थान को ‘द्वादशान्त’ कहते हैं, उसमें निवास करनेवाले; ९३१. त्रयोदश- भिदाभिन्नविश्वेदेवाधिदैवतम् — तेरह विश्वेदेवों के अधिदेवता ॥ १५३ ॥
चतुर्दशेन्द्रवरदश्चतुर्दशमनुप्रभुः ।
चतुर्दशादिविद्याढ्यश्चतुर्दशजगत्प्रभुः ॥ १५४ ॥

९३२. चतुर्दशेन्द्रवरदः – चौदह इन्द्रों को वर देने वाले; ९३३. चतुर्दशमनुप्रभुः – चौदह मनुओं के अधिपति; ९३४. चतुर्दशादिविद्याढ्यः– चार (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति), दस (चार वेद और छः वेदांग) आदि विद्याओं से सम्पन्न; ९३५. चतुर्दशजगत्प्रभुः– चौदह भुवनों के स्वामी ॥ १५४ ॥
सामपञ्चदशः पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः ।
षोडशाधारनिलयः षोडशस्वरमातृकः॥ १५५ ॥

९३६. सामपञ्चदशः – पंद्रह स्तोममन्त्रों के साथ, जो चार आज्यस्तोत्रसम्बन्धी मन्त्र हैं, वे सामयुक्त होकर गणपति के स्वरूप हैं, अतः वे उक्त नाम से प्रसिद्ध हैं; ९३७. पञ्चदशीशीतांशुनिर्मल:– पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान स्वच्छ; ९३८. षोडशाधारनिलयः – षड्दल, नवदल एवं षोडशदल आदि चक्रों में निवास करने वाले; ९३९. षोडशस्वरमातृकः– सोलह स्वर अक्षररूप ॥ १५५ ॥
षोडशान्तपदावासः षोडशेन्दुकलात्मकः ।
कलासप्तदशी सप्तदशः सप्तदशाक्षरः ॥ १५६ ॥

९४०. षोडशान्तपदावासः – ब्रह्मरन्ध्र के अन्तर्गत कमल की कर्णिका से लेकर ऊपर के भाग को ‘ षोडशान्त’ कहते हैं। उसमें निवास करने वाले अर्थात् उन्मनी से परे विराजमान; ९४१. षोडशेन्दुकलात्मकः–अमृता और मानिनी आदि षोडशचन्द्रकलास्वरूप; ९४२. कलासप्तदशी – ‘त्रिपुरागम’ में प्रसिद्ध ‘सप्तदशी’ नामक कलास्वरूप; ९४३. सप्तदशः- सामयुक्त सप्तदशस्तोम- स्वरूप; ९४४. सप्तदशाक्षरः – वषट् (२), ओश्रावय (४), यज (२), अस्तु श्रौषट् (४), ये यजामहे (५) – इस प्रकार सत्रह अक्षरों वाले मन्त्रों से यज्ञ में आहुति ग्रहण करने वाले ॥ १५६ ॥ अष्टादशद्वीपपतिरष्टादशपुराणकृत् ।
अष्टादशौषधीसृष्टिरष्टादशविधिः स्मृतः ॥ १५७ ॥

९४५. अष्टादशद्वीपपतिः – ‘जम्बू’ आदि सात द्वीपों और ‘सिंहल’ आदि ग्यारह उपद्वीपों के अधीश्वर; ९४६. अष्टादशपुराणकृत् – अठारह पुराणों के कर्ता व्यासरूप; ९४७. अष्टादशौषधीसृष्टिः- बारह मुख्य धान्य और छः उपधान्य – इन अठारह ओषधियों (अन्नों)-की सृष्टि करने वाले; ९४८. अष्टादशविधिः- अठारह विधिस्वरूप; (अपूर्व विधि, नियम – विधि और परिसंख्या – विधि – ये प्रयोग और विनियोग आदि के भेद से नौ प्रकार की होती हैं। फिर गौणी और मुख्य भेद से इनके अठारह प्रकार होते हैं ।) ॥ १५७ ॥
अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः ।
एकविंशः पुमानेकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः ॥ १५८ ॥

९४९. अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः- नागरी, द्राविड़ी और आन्ध्री आदि के भेद से भूतल पर विभिन्न अठारह लिपियाँ हैं । उन भाषाओं को तथा उनके अवान्तर-भेदों को भी पृथक्-पृथक् एवं समष्टिरूप से जानने में कुशल; ९५०. एकविंशः पुमान्– पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और पाँच भूत- इन बीस तत्त्वों से परे इक्कीसवाँ तत्त्व आत्मा; ९५१. एकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः– दस हाथ की अंगुलियाँ, दस पैरों की अंगुलियाँ और एक शुण्डदण्ड- इस प्रकार इक्कीस अंगुलिपल्लवों से युक्त ॥ १५८ ॥
चतुर्विंशतितत्त्वात्मा पञ्चविंशाख्यपूरुषः ।
सप्तविंशतितारेशः सप्तविंशतियोगकृत् ॥ १५९ ॥

९५२. चतुर्विंशतितत्त्वात्मा – प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच भूत – इस प्रकार चौबीस तत्त्व हैं; चौबीस तत्त्वस्वरूप; ९५३. पञ्चविंशाख्यपूरुषः–चौबीस तत्त्वों से परे विद्यमान, पचीसवें तत्त्वस्वरूप पुरुष; ९५४. सप्तविंशतितारेशः – अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्रों के स्वामी; ९५५. सप्तविंशतियोगकृत् — सत्ताईस योगों के कर्ता ॥ १५९ ॥
द्वात्रिंशद्भैरवाधीशश्चतुस्त्रिंशन्महाहृदः ।
षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिरष्टात्रिंशत्कलातनुः ॥ १६०॥

९५६. द्वात्रिंशद्भैरवाधीशः – बत्तीस भैरवों के स्वामी ( असितांग आदि चार भैरव हैं, जो आठ-आठ के समुदाय हैं। इस तरह कुल बत्तीस भैरव हैं); ९५७. चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः – पुष्कर आदि जो देवताओं द्वारा खोदे गये विशाल सरोवर हैं, वे पवित्र ‘महाहृद’ कहलाते हैं। उनकी संख्या चौंतीस बतलायी गयी है। ये चौंतीस महाहृद जिनके स्वरूप हैं, वे; ९५८. षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिः– शैवतन्त्रोक्त जो शिव आदि पृथ्वीपर्यन्त छत्तीस तत्त्व हैं, उनकी उत्पत्ति के कारण; ९५९. अष्टात्रिंशत्कलातनुः – अग्नि की दस, सूर्य की बारह और चन्द्रमा की सोलह कलाएँ-कुल अड़तीस कलाएँ होती हैं। ये सब जिनके शरीर हैं, वे गणपति ॥ १६० ॥
नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः ।
पञ्चाशदक्षर श्रेणी पञ्चाशद्गुद्रविग्रहः ॥ १६१ ॥

९६०. नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः- उनचास मरुद्गणों से नमस्कृत एवं अप्रतिहत गतिवाले; ९६१. पञ्चाशदक्षर श्रेणी – पचास अक्षर मालारूप; ९६२. पञ्चाशद्गुद्रविग्रहः–श्रीकण्ठ आदि पचास शिवस्वरूप ॥ १६१ ॥
पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः पञ्चाशन्मातृकालयः।
द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः॥ १६२ ॥

९६३. पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः – केशव आदि विष्णुरूप और कीर्ति आदि उनकी शक्तियाँ- ये सब पचास की संख्या में हैं; इन सबके स्वामी; ९६४. पञ्चा- शन्मातृकालयः- पचास मातृका – वर्णों के आलय अथवा लयस्थान नादस्वरूप; ९६५. द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी- लिंगपुराण में वर्णित जो बावन पाश हैं, वे नूतन शरीर प्रदान करनेवाले हैं; अतः बावन शरीर पङ्क्ति स्वरूप; ९६६. त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः- तिरसठ अक्षरों के आधार[^10] ॥ १६२ ॥
चतुःषष्ट्यर्णनिर्णेता चतुःषष्टिकलानिधिः ।
चतुःषष्टिमहासिद्धयोगिनीवृन्दवन्दितः ॥ १६३ ॥

९६७. चतुःषष्ट्यर्णनिर्णेता- चौंसठ अक्षरों के निर्णायक; ९६८. चतुःषष्टिकलानिधिः- चौंसठ कलाओं आधार; ९६९. चतुःषष्टिमहासिद्धयोगिनीवृन्दवन्दितः- अक्षोभ्य * आदि चौंसठ महासिद्धों और उतनी ही योगिनियोंके समुदायसे वन्दित ॥ १६३ ॥
अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः ।
चतुर्नवतिमन्त्रात्मा षण्णवत्यधिकप्रभुः ॥ १६४ ॥

९७०. अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्र भैरवभावनः– काशीखण्ड और पद्मपुराण में शिव-सम्बन्धी अड़सठ महातीर्थ बताये गये हैं। उन सभी तीर्थक्षेत्रों में भैरव शिव की भावना करने वाले; ९७१. चतुर्नवतिमन्त्रात्मा- अड़तीस कलामन्त्र और पचास मातृका कलाएँ — ये अठासी मन्त्र हुए। इनके अतिरिक्त हंस, शुचि, प्रतद्विष्णु, विष्णु, योनि और त्र्यम्बक – ये छः विष्णु की मूलविद्याएँ हैं। इन सबका योग चौरानबे हुआ। इस प्रकार चौरानबे मन्त्रस्वरूप; ९७२. षण्णवत्यधिकप्रभुः – तन्त्रराज में श्रीचक्र के छियानबे देवता बताये गये हैं । विद्या और गणेश के योग से अधिक देवता हो जाते हैं। इस प्रकार छियानबे से अधिक देवताओं के अधिपति ॥ १६४ ॥
शतानन्दः शतधृतिः शतपत्रायतेक्षणः ।
शतानीकः शतमखः शतधारावरायुधः ॥ १६५ ॥

९७३. शतानन्दः – मानुषादि शतगुणोत्तर आनन्द- स्वरूप; ९७४. शतधृतिः – अनन्त ब्रह्माण्डों को धारण करने वाले; ९७५. शतपत्रायतेक्षणः – प्रफुल्ल कमल के समान विशाल नेत्र वाले; ९७६. शतानीकः – बहुसंख्यक सैन्यशक्ति से सम्पन्न; ९७७. शतमखः – सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले इन्द्रस्वरूप; ९७८. शतधारावरायुधः- सौ धारों अथवा अरों से युक्त ‘वज्र’ नामक श्रेष्ठ आयुध धारण करने वाले ॥ १६५ ॥
सहस्रपत्रनिलयः सहस्रफणभूषणः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ १६६ ॥

९७९. सहस्त्रपत्रनिलयः – ब्रह्मरन्ध्रगत सहस्रदल कमल में विराजमान; ९८०. सहस्रफणभूषणः – सहस्र फणधारी सर्पों से विभूषित; ९८१. सहस्रशीर्षा पुरुषः- असंख्य मस्तक वाले परमात्मा; ९८२. सहस्त्राक्षः – सहस्रों नेत्रोंवाले ९८३. सहस्रपात् — सहस्रों पैरोंवाले ॥ १६६ ॥
सहस्त्रनामसंस्तुत्यः सहस्राक्षबलापहः ।
दशसाहस्रफणभृत्फणिराजकृतासनः ॥ १६७ ॥

९८४. सहस्रनामसंस्तुत्यः – सहस्रनामों द्वारा स्तवनीय; ९८५. सहस्त्राक्षबलापहः – इन्द्र के बल को भी विध्वस्त कर देने वाले; ९८६. दशसाहस्रफण- भृत्फणिराजकृतासनः- दस हजार फण धारण करने वाले नागराज के ऊपर आसीन ॥ १६७ ॥
अष्टाशीतिसहस्त्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः ।
लक्षाधीशप्रियाधारो लक्षाधारमनोमयः ॥ १६८ ॥

९८७. अष्टाशीतिसहस्त्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः- अट्ठासी हजार की संख्या वाले आदि महर्षियों के द्वारा किये गये स्तोत्र के द्वारा वशीभूत; ९८८. लक्षाधीश-प्रियाधारः – लक्षपतियों के प्रिय आधार; ९८९. लक्षाधारमनोमयः – लक्ष (लक्ष्य) – पर एकाग्र किये गये चित्तवाले; अथवा एकाग्रचित्त सत्पुरुषस्वरूप ॥ १६८ ॥
चतुर्लक्षजपप्रीतश्चतुर्लक्षप्रकाशितः ।
चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः ॥ १६९ ॥

९९०. चतुर्लक्षजपप्रीतः- चार लाख मन्त्र के जप से प्रसन्न होने वाले; ९९१. चतुर्लक्षप्रकाशितः – अठारह पुराणों के चार लाख श्लोकों द्वारा प्रकाशित ९९२. चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां रूपवाले; देहसंस्थितः – चौरासी लाख जीवोंके शरीरमें विराजमान ॥ १६९ ॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशः कोटिचन्द्रांशनिर्मलः ।
शिवाभवाध्यष्टकोटिविनायक धुरंधरः ॥ १७० ॥

९९३. कोटिसूर्यप्रतीकाशः –करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी; ९९४. कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः – करोड़ों चन्द्रमाओं की किरणों के समान निर्मल; ९९५. शिवा-भवाध्युष्टकोटिविनायकधुरंधरः – पार्वती और शिव के अधीनस्थ करोड़ों विनायकों के संचालनका भार ढोने वाले ॥ १७० ॥
सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः ।
त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणतपादुकः ॥ १७१ ॥

९९६. सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः- सात करोड़ महामन्त्रों से मन्त्रित अवयवों की कान्ति से प्रकाशमान; ९९७. त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणत- पादुकः – जिनकी चरण-पादुकाओं में तैंतीस करोड़ देवताओं की पंक्ति प्रणाम करती है, वे ॥ १७१ ॥
( अनन्तदेवतासेव्यो ह्यनन्तमुनिसंस्तुतः [^11] ।)
अनन्तनामानन्तश्रीरनन्तानन्तसौख्यदः ।
ॐ इति वैनायकं नाम्नां सहस्रमिदमीरितम् ॥ १७२ ॥

९९८. अनन्तनामा – अनन्त नामवाले; ९९९. अनन्तश्रीः – अनन्तविद्या, सम्पत्ति और कीर्तिवाले; १०००. अनन्तानन्तसौख्यदः–अनन्तानन्त सौख्य प्रदान करनेवाले । इस प्रकार गणेशजी के ये सहस्रनाम बताये गये ॥ १७२ ॥

इदं ब्राह्मे मुहूर्ते वै यः पठेत् प्रत्यहं नरः ।
करस्थं तस्य सकलमैहिकामुष्मिकं सुखम् ॥ १७३ ॥
आयुरारोग्यमैश्वर्यं धैर्यं शौर्यं बलं यशः ।
मेधा प्रज्ञा धृतिः कान्तिः सौभाग्यमतिरूपता ॥ १७४ ॥
सत्यं दया क्षमा शान्तिर्दाक्षिण्यं धर्मशीलता ।
जगत्संयमनं विश्वसंवादो वादपाटवम् ॥ १७५ ॥
सभापाण्डित्यमौदार्यं गाम्भीर्यं ब्रह्मवर्चसम्।
औन्नत्यं च कुलं शीलं प्रतापो वीर्यमार्यता ॥ १७६ ॥
धनधान्याभिवृद्धिश्च सकृदस्य जपाद्भवेत् ॥ १७७ ॥
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं स्थैर्यं विश्वातिशायिता ।

जो मनुष्य प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में इन नामों का पाठ करता है, उसके हाथ में लौकिक और पारलौकिक सारे सुख आ जाते हैं। इसके एक बार जप करने से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, धारणावती बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, कान्ति, सौभाग्य, अतिशय रूप- सौन्दर्य, सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य, धर्मशीलता, जगद्वशीकरण, सबकी अनुकूलता, शास्त्रार्थ में पटुता, सभापाण्डित्य, उदारता, गम्भीरता, ब्रह्मतेज, उन्नति, उत्तम कुल, शील, प्रताप, वीर्य, आर्यत्व, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य, स्थिरता, विश्व में उत्कर्ष और धन-धान्य की वृद्धि — सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥ १७३-१७७ ॥
ये वश्यं चतुर्विधं नृणां जपादस्य प्रजायते ।
राज्ञो राजकलत्रस्य राजपुत्रस्य मन्त्रिणः ॥ १७८ ॥
जप्यते यस्य वश्यार्थं स दासस्तस्य जायते ।
धर्मार्थकाममोक्षाणामनायासेन साधनम् ॥ १७९ ॥

इस मन्त्र के जप से मनुष्यों के लिये चार प्रकार का वशीकरण सिद्ध होता है – राजा का, राजा के अन्तःपुर का, राजकुमार का तथा राज्यमन्त्री का। जिसको वश में करने के लिये इस सहस्रनाम का जप किया जाता है, वह उस प्रयोग करने वाले का दास हो जाता है। इस सहस्रनाम के द्वारा बिना किसी आयास के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है ॥ १७८-१७९ ॥
शाकिनीडाकिनीरक्षोयक्षोरगभयापहम् ।
साम्राज्यसुखदं चैव समस्तरिपुमर्दनम् ॥ १८० ॥

यह स्तोत्र शाकिनी, डाकिनी, राक्षस, यक्ष और सर्प के भय का नाश करने वाला है। साम्राज्य का सुख देने वाला तथा समस्त शत्रुओं का मर्दन करने वाला है ॥ १८० ॥
समस्त कलहध्वंसि दग्धबीजप्ररोहणम् ।
दुःस्वप्नशमनं क्रुद्धस्वामिचित्तप्रसादनम् ॥ १८१ ॥

इस सहस्रनाम से सब प्रकार के कलह-क्लेश का नाश होता है, इससे जले हुए बीज में भी अंकुर निकल आते हैं। यह बुरे स्वप्नों के कुफल को मिटाता है और रोष में भरे हुए स्वामी के चित्त को प्रसन्न करने वाला है ॥ १८१ ॥
षट्कर्माष्टमहासिद्धित्रिकालज्ञानसाधनम् ।
परकृत्याप्रशमनं परचक्रविमर्दनम् ॥ १८२ ॥
संग्रामरङ्गे सर्वेषामिदमेकं जयावहम् ।
सर्ववन्ध्यात्वदोषघ्नं गर्भरक्षैककारणम् ॥ १८३ ॥

यह सहस्रनाम मोहन- आकर्षण आदि छः कर्म, आठ महासिद्धि तथा त्रिकालज्ञान का साधन करने वाला है । शत्रुओं द्वारा अपने ऊपर प्रेरित कृत्या को शान्त करने वाला तथा शत्रुमण्डल का मर्दन करने वाला है। संग्रामकी रंगभूमि में यह अकेला ही सबको विजय दिलाने वाला है । वन्ध्यापन सम्बन्धी सम्पूर्ण दोषों का नाशक और गर्भ की रक्षा का मुख्य साधन है ॥ १८२-१८३ ॥
पठ्यते प्रत्यहं यत्र स्तोत्रं गणपतेरिदम् ।
देशे तत्र न दुर्भिक्षमीतयो दुरितानि च ॥ १८४ ॥

जहाँ प्रतिदिन गणपति के इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है, उस देश में दुर्भिक्ष, ईतिभय और दुराचार नहीं होते ॥ १८४ ॥
न तद्गृहं जहाति श्रीर्यत्रायं जप्यते स्तवः ।
क्षयकुष्ठप्रमेहाश भगंदरविषूचिकाः ॥ १८५ ॥
गुल्मं प्लीहानमश्मानमतिसारं महोदरम् ।
कासं श्वासमुदावर्तं शूलं शोफादिसम्भवम् ॥ १८६ ॥
शिरोरोगं वमिं हिक्कां गण्डमालामरोचकम्।
वातपित्तकफद्वन्द्वत्रिदोषजनितज्वरम् ॥ १८७॥
आगन्तुं विषमं शीतमुष्णं चैकाहिकादिकम्।
इत्याद्युक्तमनुक्तं वा रोगं दोषादिसम्भवम् ॥ १८८ ॥
सर्वं प्रशमयत्याशु स्तोत्रस्यास्य सकृज्जपः ।
सकृत्पाठेन संसिद्धः स्त्रीशूद्रपतितैरपि ॥ १८९ ॥
सहस्त्रनाममन्त्रोऽयं जपितव्यः शुभाप्तये ।

जहाँ इस स्तोत्र का पाठ होता है, उस घर को लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती है। क्षय, कोढ़, प्रमेह, बवासीर, भगंदर, विषूचिका (हैजा), गुल्म, प्लीहा, पथरी, अतिसार, उदरवृद्धि, खाँसी, दमा, ऊपरकी डकार उठना, शूल, शोथ आदि, शिरोरोग, वमन, हिचकी, गण्डमाला (गलसूआ), अरुचि, वात-पित्त-कफजनित द्वन्द्व, त्रिदोषजनित ज्वर, आगन्तुक ज्वर, विषमज्वर, शीतज्वर, उष्णज्वर, एकाहिक आदि ज्वर, यहाँ कथित या अकथित दोषादि-सम्भवरोग- इन सबका इस स्तोत्र के एक बार पाठ से शीघ्र शमन हो जाता है। यह सहस्रनाम एक बार के पाठ से ही सिद्ध हो जाता है। स्त्री, शूद्र और पतितों को भी शुभ की प्राप्ति के लिये इस सहस्रनामस्तोत्र का जप (पाठ) करना चाहिये ॥ १८५–१८९१/२

महागणपतेः स्तोत्रं सकामः प्रजपन्निदम् ॥ १९० ॥
इच्छितान् सकलान् भोगानुपभुज्येह पार्थिवान् ।
मनोरथफलैर्दिव्यैर्व्योमयानैर्मनोरमैः ॥ १९१ ॥
चन्द्रेन्द्रभास्करोपेन्द्रब्रह्मशर्वादिसद्मसु ।
कामरूपः कामगतिः कामतो विचरन्निह ॥ १९२ ॥
भुक्त्वा यथेप्सितान् भोगानभीष्टान् सह बन्धुभिः ।
गणेशानुचरो भूत्वा महागणपतेः प्रियः ॥ १९३ ॥
नन्दीश्वरादिसानन्दी नन्दितः सकलैर्गणैः ।
शिवाभ्यां कृपया पुत्रनिर्विशेषं च लालितः ॥ १९४ ॥
शिवभक्तः पूर्णकामो गणेश्वरवरात् पुनः ।
जातिस्मरो धर्मपरः सार्वभौमोऽभिजायते ॥ १९५ ॥

महागणपति के इस स्तोत्र का सकामभाव से जप करने वाला पुरुष इहलोक में पृथ्वी पर सुलभ समस्त मनोवांछित भोगों को भोगकर मनोरथ-फलों की प्राप्तिपूर्वक दिव्य एवं मनोरम व्योम-विमानों पर बैठकर चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा और शिव आदि के लोकों में इच्छानुसार रूप धारण करके विचरता है; जहाँ-जहाँ इच्छा होती है, वहाँ-वहाँ पहुँचता है; अपने बन्धुजनों के साथ अभीष्ट भोगों को भोगता है; महागणपति का प्रिय अनुचर होता है और नन्दीश्वर आदि के साथ आनन्दित हो सकल शिवगणों द्वारा अभिनन्दित होता है। पार्वती और शिव – ये दोनों पुत्र की भाँति उसका लाड-प्यार करते हैं । वह शिवभक्त तथा पूर्णकाम होता है। फिर गणेशजी के वरदान से इहलोक में धर्मपरायण सार्वभौम सम्राट् होता है और उसे पूर्वजन्म की बातें स्मरण रहती हैं ॥ १९०–१९५ ॥
निष्कामस्तु जपन्नित्यं भक्त्या विघ्नेशतत्परः ।
योगसिद्धिं परां प्राप्य ज्ञानवैराग्यसंस्थितः ॥ १९६ ॥
निरन्तरोदितानन्दे परमानन्दसंविदि ।
विश्वोत्तीर्णे परे पारे पुनरावृत्तिवर्जिते ॥ १९७ ॥
लीनो वैनायके धाम्नि रमते नित्यनिर्वृतः ।

जो भक्तिभाव से गणेश के भजन में तत्पर हो निष्काम- भाव से इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह योगजनित परम सिद्धि को पा लेता है और ज्ञान-वैराग्यनिष्ठ हो जहाँ निरन्तर आनन्द का उदय होता है, जो परमानन्द संवित्स्वरूप, लोकातीत, पुनरावृत्तिरहित तथा परम पाररूप है, उस गणपतिधाम में नित्यलीन एवं परमानन्दनिमग्न हो रमता रहता है ॥ १९६-१९७१/२

यो नामभिर्हुतेदेतैरर्चयेत् पूजयेन्नरः ॥ १९८ ॥
राजानो वश्यतां यान्ति रिपवो यान्ति दासताम् ।
मन्त्राः सिध्यन्ति सर्वेऽपि सुलभास्तस्य सिद्धयः ॥ १९९ ॥

जो मनुष्य इन सहस्रनामोंद्वारा हवन, अर्चन और पूजन करता है, उसके राजालोग वशमें होते और शत्रु दासवत् हो जाते हैं। उसके सारे मन्त्र सिद्ध होते और उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ होती हैं ॥ १९८-१९९ ॥
मूलमन्त्रादपि स्तोत्रमिदं प्रियतरं मम ।
नभस्ये मासि शुक्लायां चतुर्थ्यां मम जन्मनि ॥ २०० ॥
दूर्वाभिर्नामभिः पूजां तर्पणं विधिवच्चरेत् ।
अष्टद्रव्यैर्विशेषेण जुहुयाद्भक्तिसंयुतः ॥ २०१ ॥
तस्येप्सितानि सर्वाणि सिद्ध्यन्त्यत्र न संशयः ।
इदं प्रजप्तं पठितं पाठितं श्रावितं श्रुतम् ॥ २०२ ॥
व्याकृतं चर्चितं ध्यातं विमृष्टमभिनन्दितम् ।
इहामुत्र च सर्वेषां विश्वैश्वर्यप्रदायकम् ॥ २०३ ॥

(गणेशजी कहते हैं—) मूलमन्त्र की अपेक्षा भी यह स्तोत्र मुझे अधिक प्रिय है। भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को मेरे जन्म-दिवस पर इन सहस्रनामों द्वारा दूर्वार्पण करते हुए विधिवत् मेरा पूजन एवं तर्पण करे। विशेषतः अष्टगन्ध-द्रव्यों द्वारा भक्तिपूर्वक हवन करे । जो ऐसा करता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं; इसमें संशय नहीं है। इसके जप, पठन-पाठन, सुनना-सुनाना, व्याख्यान, चर्चा, ध्यान, विचार औ अभिनन्दन – ये इहलोक और परलोक में सबके लिये सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देनेवाले हैं ॥ २००–२०३ ॥
स्वच्छन्दचारिणाप्येष येनायं धार्यते स्तवः ।
स रक्ष्यते शिवोद्भूतैर्गणैरध्युष्टकोटिभिः ॥ २०४ ॥

जो इस स्तोत्र को धारण करता है, वह स्वच्छन्दतापूर्वक कहीं भी क्यों न विचरता रहे, भगवान् शिव के करोड़ों गण उसकी रक्षा करते रहते हैं ॥ २०४ ॥
पुस्तके लिखितं यत्र गृहे स्तोत्रं प्रपूजयेत् ।
तत्र सर्वोत्तमा लक्ष्मीः संनिधत्ते निरन्तरम् ॥ २०५ ॥

जिस घर में इस स्तोत्र को पुस्तकरूप में लिखकर कोई इसका पूजन करता है, वहाँ सर्वोत्कृष्ट लक्ष्मी निरन्तर निवास करती है ॥ २०५ ॥
दानैरशेषैरखिलैर्व्रतैश्च तीर्थैरशेषैः सकलैर्मखैश्च ।
न तत्फलं विन्दति यद्गणेश-सहस्रनाम्नां स्मरणेन सद्यः ॥ २०६ ॥
एतन्नाम्नां सहस्त्रं पठति दिनमणौ प्रत्यहं प्रोज्जिहाने
सायं मध्यंदिने वा त्रिषवणमथवा संततं वा जनो यः ।
स स्यादैश्वर्यधुर्यः प्रभवति च सतां कीर्तिमुच्चैस्तनोति
प्रत्यूहं हन्ति विश्वं वशयति सुचिरं वर्धते पुत्रपौत्रैः ॥ २०७ ॥

श्रीगणेशसहस्रनाम का स्मरण (जप) करके मनुष्य जिस फल को तत्काल प्राप्त कर लेता है, उसे सब प्रकार के दान, व्रत, तीर्थसेवन और यज्ञों के अनुष्ठान द्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय, मध्याह्नकाल में या सायंकाल में अथवा तीनों समय या सदा ही इन सहस्रनामों का पाठ करता है, वह सत्पुरुषों में ऐश्वर्यशाली होता है, अपनी कीर्ति का अतिशय विस्तार करता है, विघ्नों को नष्ट कर देता है, संसार को वश में कर लेता है तथा वह पुत्र- पौत्रों के साथ सुदीर्घकाल तक निरन्तर वृद्धिशील होता है ॥ २०६-२०७ ॥
अकिंचनोऽपि मत्प्राप्तिचिन्तको नियताशनः ।
जपेत्तु चतुरो मासान् गणेशार्चनतत्परः ॥ २०८ ॥
दरिद्रतां समुन्मूल्य सप्तजन्मानुगामपि ।
लभते महतीं लक्ष्मीमित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥ २०९ ॥
आयुष्यं वीतरोगं कुलमतिविमलं सम्पदश्चार्तदानाः ।
कीर्तिर्नित्यावदाता भणितिरभिनवा कान्तिरव्याधिभव्या ।
पुत्राः सन्तः कलत्रं गुणवदभिमतं यद्यदेतच्च सत्यं
नित्यं यः स्तोत्रमेतत् पठति गणपतेस्तस्य हस्ते समस्तम् ॥ २१० ॥

जिसके पास कुछ नहीं है, जो दरिद्र है, वह मेरी प्राप्ति के उद्देश्य से नियमित आहार करके मुझ गणेश के पूजन में तत्पर रहकर चार मास तक इस स्तोत्र का जप करे। ऐसा करने से वह सात जन्मों से चली आने वाली दरिद्रता का भी उन्मूलन करके महती लक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है, यह मुझ परमेश्वर की आज्ञा है । आयु, आरोग्य, निर्मल कुल, पीड़ितों को दी जा सकने वाली सम्पत्ति, नित्य उज्ज्वल कीर्ति, नयी-नयी सूक्ति, रोगहीनता के साथ भव्य कान्ति, सत्पुत्र, मनोनुकूल गुणवती स्त्री और सत्यसंकल्पता – ये सारी वस्तुएँ, जो गणपति के इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसके हाथ में आ जाती हैं ॥ २०८-२१० ॥

गणेशस्यैकविंशतिनामपाठः
ॐ गणञ्जयो गणपतिर्हेरम्बो धरणीधरः ।
महागणपतिर्लक्षप्रदः क्षिप्रप्रसादनः ॥ २११ ॥
अमोघसिद्धिरमितो मन्त्रश्चिन्तामणिर्निधिः ।
सुमङ्गलो बीजमाशापूरको वरदः शिवः ॥ २१२ ॥
काश्यपो नन्दनो वाचासिद्धो ढुण्ढिविनायकः ।
मोदकैरेभिरत्रैकविंशत्या नामभिः पुमान् ॥ २१३ ॥
( उपायनं ददेद्भक्त्या मत्प्रसादं चिकीर्षति
वत्सरं विघ्नराजस्य तथ्यमिष्टार्थसिद्धये ॥ )
यः स्तौति मद्गतमना मदाराधनतत्परः ।
स्तुतो नाम्नां सहस्रेण तेनाहं नात्र संशयः ॥ २१४ ॥

१. गणंजय, २. गणपति, ३. हेरम्ब, ४. धरणीधर, ५. महागणपति, ६. लक्षप्रद, ७. क्षिप्रप्रसादन, ८. अमोघसिद्धि, ९. अमित, १०. मन्त्र, १९. चिन्तामणि, १२. निधि, १३. सुमंगल, १४. बीज, १५. आशापूरक, १६. वरद, १७. शिव, १८. काश्यप, १९. नन्दन, २०.वाचासिद्ध तथा २१. दुण्ढिविनायक – ये इक्कीस नाम-मोदक हैं। जो पुरुष इन मोदकस्वरूप इक्कीस नामों द्वारा (मुझे भक्तिपूर्वक उपहार अर्पित करता है; मेरा प्रसाद चाहता है और अभीष्टसिद्धि के लिये एक वर्ष तक मुझ विघ्नराज के इस यथार्थ स्तोत्र का पाठ करता है;) मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधना में तत्पर रहकर मेरा स्तवन करता है, उसके द्वारा सहस्रनामस्तोत्र से मेरी स्तुति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ २११–२१४ ॥
नमो नमः सुरवरपूजिताये
नमो नमो निरुपममङ्गलात्मने ।
नमो नमो विपुलपदैकसिद्धये
नमो नमः करिकलभाननाय ते ॥ २१५ ॥

श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित चरणवाले गणेश को नमस्कार है, नमस्कार है। अनुपम मंगलस्वरूप गणपति को बारम्बार नमस्कार है। एकमात्र जिनसे विपुलपद- परमधाम की सिद्धि होती है, उन गणाधीश को बारम्बार नमस्कार है। प्रभो! गजशावक के समान मुखवाले आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ २१५ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे ईश्वरमहागणपतिसंवादे श्रीमद्गणेशदिव्यसहस्रनामामृतस्तोत्रकथनन्नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

[^1]: गणेश के शिष्य गणक्रीड़ हैं, जो विकट के गुरु हैं, विकट के शिष्य विघ्ननायक हैं। ये तीनों गुरु एवं गणेशरूप कहे गये हैं। (खद्योत-भाष्य)

[^2]: तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामदायिनी, उग्रा, तेजोवती, सत्या और विघ्ननाशिनी — ये नौ पीठशक्तियाँ हैं।
पीठगत अष्टदल कमल और उसकी कर्णिका में ये पूजित होती हैं। इन नौ शक्तियों और कमल के सम्बन्ध से यहाँ क्रमशः दस नाम वर्णित हुए हैं।

[^3]: अष्टदल कमल के आठ किंजल्कों में क्रमशः दो-दो स्वर, आठ दलों में क्रमशः क, च, ट, त, प, य, श इन आठ वर्गों को तथा कर्णिका में प्रसाद को अंकित करने पर उसे ‘लिपिपद्म’ या ‘मातृकापद्म’ कहते हैं। (खद्योत-भाष्य)

[^4]: यह श्लोक श्रीभास्कराय के खद्योतभाष्य में नहीं पाया जाता है; अतः इसे श्लोकगणना में नहीं लिया गया है। इसका अर्थ यों है — (क) शुक्लाङ्गः–गौर शरीरवाले; (ख) लोकसुखदः– लोगों या लोकों को सुख देने वाले, (ग) सुतन्तुः— सुन्दर तन्तु (संतति)-रूप; (घ) तन्तुवर्धनः- संतति-परम्परा की वृद्धि करने वाले; (ङ) किरीटी – किरीटधारी; (च) कुण्डली -कुण्डलधारी; (छ) हारी – हार से विभूषित या मनोहर; (ज) वनमाली – वनमालाधारी; (झ) शुभाङ्गदः- सुन्दर बाजूबंद धारण करने वाले ।

[^5]: यहाँ आवरण में स्थित युगल देवी-देवों का वर्णन प्रस्तुत है। ऋद्धि और आमोद — ये एक दम्पति हैं, समृद्धि और प्रमोद द्वितीय दम्पति हैं, सुमुख और कान्ति तृतीय दम्पति हैं, दुर्मुख और मदनावती (मदद्रवा) – ये चतुर्थ दम्पति हैं एवं विघ्न (विघ्नकृत्) और द्राविणी — ये पंचम दम्पति हैं।

[^6]: कामनाभेद से भिन्न रूप-रंगमें गणेशजी का ध्यान होता है। अथवा भिन्न-भिन्न युगों में अवतार लेकर वे अरुण एवं श्याम कान्ति धारण करते हैं। (खद्योत – भाष्य)

[^7]: -ङकारवाच्यः —ङकार के वाच्यार्थस्वरूप; २- ङकारः – ङकार अक्षररूप; ३ ङकाराकारशुण्डभृत् —’ङ’ के आकार की सूँड़ धारण करने वाले।

[^8]: शोधनार्थक ‘दै’ धातु से ‘दाता’ बनता है।

[^9]: ‘लव’ से लेकर ‘महालय’ तक सभी कालभेद महाकालस्वरूप गणपतिके अवयव हैं।

[^10]: वर्णों की संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि एवं चार यम कहे गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित वर्ण-जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय (ꣳ क और ꣳ प) और दुःस्पृष्ट लकार — ये तिरसठ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लृकार को और गिन लिया जाय तो वर्णों की संख्या चौंसठ हो जाती है।

[^11]: अनन्तदेवतासेव्यः-असंख्य देवताओंद्वारा सेवनीय; अनन्तमुनिसंस्तुतः- अनन्त मुनिगणोंद्वारा संस्तुत ।

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