श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-48
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
त्रिपुर-विजय के उपलक्ष्य में देवताओं द्वारा त्रिपुरारि-महोत्सव (देव-दीपावली ) – का आयोजन, हिमवान् का पार्वती को गणेशजी की महिमा बताना
अथः अष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
पार्वत्यारागमनम्, पार्थिवपूजा (भाद्रपदस्य शुद्धचतुर्थीपर्यन्तम्) महात्म्यम्

व्यासजी बोले — हे पितामह! मैंने त्रिपुरासुर के वध से सम्बन्धित महान् आख्यान का श्रवण किया, फिर भी मैं अब यह सुनना चाहता हूँ कि उस समय जगज्जननी पार्वतीजी कहाँ स्थित थीं? वे कैसे प्रकट हुईं ? किस तिथि को दैत्यराज त्रिपुरासुर दग्ध हुआ था — यह सब आप विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १-२ ॥

ब्रह्माजी बोले — वह महान् असुर (त्रिपुरासुर ) कार्तिकमास की पूर्णिमा को सायंकाल दग्ध हुआ था । उस तिथि को दिन में जो महाभयंकर युद्ध हुआ था, उसका मैंने पहले ही वर्णन कर दिया ॥ ३ ॥ क्योंकि उस तिथि को देवशत्रु त्रिपुरासुर का वध करने वाले विजयी भगवान् शिव का सम्पूर्ण देवताओं द्वारा अर्चन किया गया था, इसलिये उस तिथि को पृथ्वी पर मनुष्य दीपदान करते हैं ॥ ४ ॥ उस तिथि को जो स्नान, दान, जप, होम आदि किये जाते हैं, उनका बहुत अधिक पुण्यफल होता है, इसलिये उसे बाहुली [पूर्णिमा] कहते हैं ॥ ५ ॥

उस तिथि को जो ‘त्रिपुरारि – महोत्सव’ का आयोजन नहीं करते हैं, वे कभी भी विजयी नहीं होते और उनके पुण्य भस्म हो जाते हैं ॥ ६ ॥ अतः उस पूर्णिमा को जो लोग प्रातःकाल शिवार्चन करते हैं, उन्होंने रात्रि में जो पाप किये होते हैं, वे विलीन हो जाते हैं ॥ ७ ॥ हे मुने! उस तिथि को मध्याह्न में शिवार्चन करने से जन्म से (जीवनभर में) किया गया पाप और प्रदोषकाल में शिवार्चन से सप्तजन्मार्जित पाप नष्ट हो जाता है ॥ ८ ॥

[हे व्यासजी!] अब मेरे द्वारा कहे जाने वाले पार्वती के प्राकट्य के विषय में श्रवण करो । शिवपत्नी पार्वती उसकी (त्रिपुरासुर की) मृत्यु [कालान्तर में] शिव के द्वारा जानकर [उस समय ] भय से अन्तर्हित हो गयीं ॥ ९ ॥ पुनः वे जगदम्बिका जब हिमालयपर्वत की गुफा के द्वार से बाहर निकलीं (प्रकट हुईं) तो उन्होंने सिंहों, व्याघ्रों और मृगों से परिपूर्ण उस भयंकर पर्वत को देखा । शिव को [वहाँ] न देखकर विरहाकुल मन:-स्थिति वाली वे शिवा अत्यन्त भयभीत होकर ‘हा तात ! हा शिव!’ कहती हुई विलाप करने लगीं — ॥ १०-११ ॥

[वे कहने लगीं — ] हे सदाशिव ! आप तो सर्वज्ञ हैं, फिर भी इस भयंकर जंगल में कुररी की भाँति क्रन्दन करती हुई मुझ एकाकिनी को आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? मुझे आपके दर्शन कब होंगे ? क्या आप मुझे भूल गये हैं ? हे हर (दुःखों का हरण करने वाले) ! मैं आपका विरह सहने या [ आपके विरह में] जीवन धारण करने में सक्षम नहीं हूँ ॥ १२-१३ ॥ [हे तात (पिताजी)!] आप भी कहाँ हैं ? क्या आप मेरे शोकपूर्ण उद्गार नहीं श्रवण कर रहे हैं ? आपके बिना मैं किसकी शरण में जाऊँ अथवा मैं क्या करूँ? आप मुझे पुनः मंगलमय शिव से संयुक्त कर दीजिये। इस समय आप मुझे पुनः [अपने घर में ] जननी के गर्भ से उत्पन्न हुआ जानिये ॥ १४-१५ ॥ उन सदाशिवरूपी वर का शीघ्र ही मेरे लिये अन्वेषण कीजिये। नहीं तो मैं इस शिखर से [कूदकर ] अपने शरीर का परित्याग कर दूँगी ॥ १६ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यास!] इस प्रकार रुदन करती हुई उन पार्वती की उस उत्तम वाणी को सुनकर किसी मछुवारे ने हिमवान्‌ के पास आकर इस प्रकार निवेदन किया- ॥ १७ ॥

मछुवारा बोला — [ हे पर्वतराज !] मैंने किसी सुन्दर श्रोणिप्रदेशवाली तरुणी को देखा है, जो सम्पूर्ण आभूषणों से विभूषित है। उसने दोनों कानों में कुण्डल धारण कर रखे हैं, जो सूर्यमण्डल के समान प्रकाशित हो रहे हैं। अनेक रत्नों से जटित अत्यन्त दीप्तिमान् मुकुट उसके मस्तक को अलंकृत कर रहा है, उसके ललाटपट्ट में सोलह मोतियों से जटित चतुष्कोण शोभित है। उसकी सीमन्तसरणि में मूल्यवान् मोतियों से निर्मित माँगचोटी लटक रही है, जिसमें बहुमूल्य रत्नयुक्त स्वर्णपुष्प संलग्न है। उसकी सुन्दर नासिका में मोती जड़ी हुई सोने की कील है। उसकी भुजाओं में सुन्दर बाजूबन्द और हाथों में सुन्दर कंगन हैं। उसकी प्रत्येक अँगुली में बहुमूल्य रत्नजटित स्वर्णमुद्रिकाएँ शोभा दे रही हैं। उसकी सुन्दर कंचुकी के ऊपर मोतियों से निर्मित माला आश्रय ले रही है। रत्नमयी सुन्दर स्वर्ण करधनी उसके रेशमी वस्त्र से आवृत कटिप्रदेश पर विभूषित है। उसके गुल्फों में सोने के पायल हैं, जिनमें सुन्दर घुघुरू झंकृत हो रहे हैं। उसके पैरों की पृथक्-पृथक् अंगुलियों में तदनुरूप उत्तम आभूषण विद्यमान हैं। इस प्रकार की वह सर्वांगसुन्दरी [तरुणी] अत्यन्त व्याकुल होकर रो रही है, मेरे पूछने पर भी वह कुछ नहीं बोली; वह केवल आपका ही नाम ले रही है ॥ १८-२४ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ उस मछुवारे का] ऐसा वचन सुनकर बुद्धिमान् हिमवान् शीघ्र ही [अपनी] उस पुत्री के पास गये और तर्कपूर्ण वचनों से उसे सान्त्वना देते हुए [अमृतमयी] वाणी में बोले — ॥ २५ ॥

हिमवान् बोले — हे सुन्दर भौंहोंवाली ! तुम क्यों शोक करती हो ? हे [जगत् के] सृजन, पालन और संहार की हेतुभूता ! हे सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से परिपूर्ण ! हे सम्पूर्ण शक्तियों से युक्त ! हे अघटनघटनापटीयसी ! हे निष्पाप महेश्वरि ! हे पूर्णकामे ! हे सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित ! हे मंगलमयी ! तुम सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित रहने वाली और उन्हें प्रेरणा देने वाली तथा उनके मन की बात जाननेवाली हो । [ यद्यपि] तुम [ वास्तविक रूप में] शिव से वियुक्त नहीं हो, फिर भी मैं उन मंगलकारी शिव से तुम्हें संयुक्त करूँगा ॥ २६-२८ ॥

‘उठो’ ऐसा कहकर हिमवान् पार्वती को साथ लेकर अपने भवन को चले आये। वहाँ माता मेना को उनके पुत्र के सहित देखकर पार्वती बहुत आनन्दित हुईं ॥ २९ ॥ फिर भी शिव को देखने के लिये समुत्सुक वे लम्बी-लम्बी साँसें लेती और छोड़ती रहती थीं। उन्होंने पिता के चरणों में विनीत होकर कहा — [ हे पिता !] आप मुझे शिव की प्राप्ति के लिये सम्यक् उपाय बतायें । व्रत, दान अथवा बहुत कठिनाई से किया जाने वाला तप ही क्यों न हो, मैं उसे करूंगी। हे तात! मैं [इसके लिये] पहले की भाँति उत्तम तप करूँगी ॥ ३०-३१ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — हे मुने! तब पिता हिमवान् ने मन-ही-मन बार-बार विचार करके उनसे कार्य की शीघ्र सिद्धि करने वाला उपाय कहा; उसे तुम [भी] श्रवण करो ॥ ३२ ॥

हिमवान् बोले — हे पार्वती! सुनो, मैं तुम्हें शिवप्राप्ति का समुचित उपाय बताता हूँ । विघ्नेश्वर गणेशजी की उपासना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली है ॥ ३३ ॥ इस उपासना का अनुष्ठान महेन्द्र आदि देवताओं तथा नारद आदि के द्वारा भी किया गया और उनके द्वारा इन्द्रपद आदि तत्-तत् सिद्धियाँ प्राप्त की गयी हैं ॥ ३४ ॥ उन महात्मा गणेशजी ने ही ब्रह्माजी को [जगत् की ] सृष्टि करने की सामर्थ्य प्रदान की थी, उन सर्वेश्वर ने ही विष्णु को [ जगत् की] रक्षा करने की सामर्थ्य प्रदान की ॥ ३५ ॥ उन्हीं सर्वविघ्नहर्ता ने शिवजी को भी संहार करने की दृढ़ सामर्थ्य प्रदान की, उन्हीं सर्वेश्वर ने शेषनाग को भी पृथ्वी को धारण करने की सामर्थ्य प्रदान की है ॥ ३६१/२

जिसके स्वरूप को ब्रह्मा आदि [ देवता] तथा [ नारदादि] मुनि भी नहीं जानते हैं, जो वाणी और मन से भी अगोचर हैं अर्थात् इन्द्रियों के विषय नहीं हैं, वे ही ईश्वर गजानन-स्वरूप से दृष्टिगोचर होते हैं । अतः सभी कार्यों के आरम्भ में उनके उसी रूप की पूजा होती है । तुम उन्हीं सर्वेश्वर गणेशजी की मेरे द्वारा बतायी गयी विधि से पूजा करो ॥ ३७–३९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘पार्वती के प्राकट्य का वर्णन’ नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥

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