श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-49
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
उनचासवाँ अध्याय
श्रीगणेशजी की पार्थिव पूजा की विधि
अथः एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
गणेश पार्थिवपूजा निरूपणं

पार्वतीजी बोलीं — हे दयानिधि । हे गिरिराज ! हे पिता! सर्वेश्वर जगद्गुरु गणेशजी की उपासना के विषय में शीघ्र कहिये ॥ १ ॥ जिसके द्वारा मैं सम्यक् रूप से शिव की समीपता प्राप्त करके शाश्वत कल्याण को प्राप्त करूँगी। इससे मर्त्यलोक में भी लोगों का महान् उपकार होगा ॥ २ ॥

हिमवान् बोले — हे देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होने से और लोकों के उपकार की इच्छा से मैं यह परम मंगलमय रहस्य कह रहा हूँ, इसे एकाग्र चित्त से सुनो ॥ ३ ॥ [उपासक] प्रात:काल उठकर नैर्ऋत्य (दक्षिण- पश्चिम) दिशा में जाय । शौच करने से पहले तृण, काष्ठ और पत्तों से भूमि को ढक दे। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि उपजाऊ भूमि को छोड़कर मल-मूत्र त्याग के लिये बैठे, किंतु उछल-उछलकर शौच न करे । मल-मूत्र का त्याग करने के बाद यथोक्त [शास्त्र-निर्दिष्ट]-विधि से दाँत और जिह्वा की शुद्धि करके स्नान करने के लिये शुद्धि करे ॥ ४-५ ॥ नदी, तालाब, वापी, सरोवर अथवा कुएँ पर जाय ॥ ६ ॥ पहले मल-प्रक्षालनरूप स्नान करके तब मन्त्र – स्नान करे । तदनन्तर मिट्टी, चन्दन अथवा कुंकुम का तिलक भी लगाये। दो धुले हुए वस्त्र (उत्तरीय और धोती) धारण करके पवित्र आसन पर बैठ जाय और एकाग्रचित्त होकर सन्ध्यादि नित्यकर्म सम्पन्न कर ले ॥ ७-८ ॥

तत्पश्चात् सुन्दर—चिकनी, छोटे कंकड़-पत्थर से रहित; जो बाँबी की न हो — ऐसी अत्यन्त शुद्ध मिट्टी को जल छिड़ककर मर्दित करे। उससे पवित्र और अत्यन्त सुन्दर गणेशमूर्ति का स्वयं निर्माण करे, जो सम्पूर्ण अंगों से परिपूर्ण, चार भुजाओं से शोभायमान हो ॥ ९-१० ॥ वह मूर्ति परशु आदि अपने आयुधों को धारण की हुई, सुन्दर और दृढ़ हो । तत्पश्चात् उसे पीठ पर स्थापितकर बुद्धिमान् उपासक अपने दोनों हाथों का प्रक्षालन करके सम्पूर्ण पूजा-द्रव्यों जल, अष्टगन्ध, अक्षत, लाल फूल, गुग्गुल आदि को यथास्थान रखे ॥ ११-१२ ॥ तीन, पाँच या सात पत्तियों से युक्त सुन्दर एवं पवित्र, हरी तथा सफेद दूब के एक सौ आठ अंकुर वहाँ लाकर रखे। घी का दीपक, तेल का दीपक, अनेक प्रकार के सुन्दर नैवेद्य, मोदक, अपूप (मालपुआ), लड्डू, शर्करायुक्त खीर, तण्डुलचूर्ण से बना खाद्य तथा अनेक प्रकार के व्यंजनों को लाकर रखे। कपूर, सुपारी – चूर्ण, खैर, इलायची, लौंग से युक्त तथा केसरयुक्त चर्वणयोग्य ताम्बूल लाकर रखे ॥ १३–१५१/२

हे ईश्वरि ! जामुन, आम, कटहल, अंगूर, केला तथा नारियल आदि ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाले फल भी वहाँ लाकर रखे । आरती से सम्बन्धित अनेक प्रकार की सामग्री और स्वर्ण-दक्षिणा भी रखे। इस प्रकार एकत्र की गयी सम्पूर्ण सामग्री को ले करके एकान्त स्थल में जाकर वहाँ क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर तथा उस आसन पर आसीन होकर भूतशुद्धि करके प्राण-प्रतिष्ठा करे । तत्पश्चात् दिग्बन्धन करके पहले गणेशादि देवताओं को नमस्कार करे। तदनन्तर आगमविधान से अन्तर्मातृकान्यास और बहिर्मातृकान्यास करे तथा गुरु द्वारा बतायी गयी विधि से सन्निधान आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करे ॥ १६–२० ॥ उसके बाद मन्त्रन्यास और षडंगन्यास करके पूजा- सामग्री का संशोधनकर गजानन गणेशजी का ध्यान करे ॥ २१ ॥

ध्यान —जो एक दाँतवाले हैं, जिनके कान सूप के समान [विशाल ] हैं, जिनका मुख हाथी का है, जिनका स्वरूप चार भुजाओं वाला है, जो अपने हाथों में पाश- अंकुश-मोदक [और वरद मुद्रा] धारण किये हैं, जो लाल फूलों की श्रेष्ठ और सुन्दर माला कण्ठ तथा (या कि सूँड़)-में धारण किये हैं, जो भक्तों को वर प्रदान करने वाले और सिद्धि – बुद्धि से सदा सेवित हैं, जो मनुष्यों को कार्यसिद्धि एवं मेधा प्रदान करने वाले तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष – पुरुषार्थचतुष्टय  देने वाले हैं, जो ब्रह्मा – शिव-विष्णु-इन्द्रादि देवताओं और श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा सम्यक् रूप से स्तुत हैं, [उन भगवान् गजानन गणेशजी का  मैं ध्यान करता हूँ ] ॥ २२–२४ ॥

आवाहन — हे जगत् के आधार ! हे श्रेष्ठ देवताओं एवं असुरों से अर्चित! हे अनाथों के नाथ ! हे सर्वज्ञ ! हे देवताओं द्वारा परिपूजित ! आप पधारिये ॥ २५ ॥
आसन — हे देव! अनेक रत्नों से युक्त दिव्य स्वर्ण सिंहासन मेरे द्वारा आपको समर्पित है, आप उसपर विराजमान हों ॥ २६ ॥
पाद्य — हे देवदेवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे गणों के अधिपति ! गन्ध-पुष्प और अक्षतसहित सम्पूर्ण तीर्थों का जल मैं ले आया हूँ, आप चरणों का प्रक्षालन करने हेतु इसे ग्रहण करें ॥ २७ ॥
अर्घ्य — हे अमोघशक्तिसम्पन्न गणेशजी ! मूँगा, मोती, पूगीफल, ताम्बूल, स्वर्ण, अष्टगन्ध, पुष्प तथा अक्षत से युक्त मेरे द्वारा अर्पित किये गये अर्घ्य को स्वीकारकर सफल करें ॥ २८ ॥
आचमनीय — हे प्रभो ! गंगा आदि सभी तीर्थों से प्रार्थना करके मैं यह उत्तम जल लाया हूँ, यह कपूर, इलायची, लौंग आदिसे समन्वित है, इसे आचमन के लिये स्वीकार करें ॥ २९ ॥
तैलोद्वर्तन [ तेल-उबटन ] —[हे देव!] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, मालती, मोगरा आदि [के पुष्पों ]-से सुवासित, स्निग्धता के हेतुभूत इस सुन्दर तैल को आप ग्रहण करें ॥ ३० ॥
दुग्ध-स्नान — जो कामधेनु से उत्पन्न है और सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जीवनस्वरूप उत्तम पदार्थ है, जो पवित्र और यज्ञ का हेतुभूत है, उस दुग्ध को मैं आपके स्नान हेतु अर्पित करता हूँ ॥ ३१ ॥
दधि-स्नान — जो गाय के दुग्ध से उत्पन्न है, सभी लोगों को प्रिय है; मेरे द्वारा लाये गये, उस श्रेष्ठ दधि को आप स्नान के लिये ग्रहण करें ॥ ३२ ॥
घृत-स्नान — जो नवनीत से सम्यक् रूप से उत्पन्न है, सम्पूर्ण प्राणियों को सन्तुष्टि देने में कारणस्वरूप है, यज्ञ का अंग और देवताओं का आहार है; उस घृत को मैं आपके स्नान के लिये समर्पित करता हूँ ॥ ३३ ॥
मधु-स्नान — जो पुष्पों के सार (पराग) – से उत्पन्न है, सब प्रकार से तेज की वृद्धि करने वाला है, सम्पूर्ण शरीर को पुष्टि प्रदान करने वाला है; हे देव ! वह मधु आपके स्नान के लिये समर्पित है ॥ ३४ ॥
शर्करा-स्नान — ईख के सारतत्त्व (रस) – से उत्पन्न अत्यन्त मनोहर शर्करा, जो शरीर के मल को दूर करने वाली है – वह मेरे द्वारा अर्पित है, आप उसे स्नान हेतु ग्रहण करें ॥ ३५ ॥
गुड़-स्नान — जो सम्पूर्ण माधुर्य का हेतु, स्वादिष्ट, सबको प्रिय लगने वाला और पुष्टिकारक है; वह इक्षु के सार (रस)-से निर्मित गुड़ मैं आपके स्नान के लिये लाया हूँ ॥ ३६ ॥
मधुपर्क — [ हे देव !] कांस्यपात्र में रखे और कांस्यपात्र से ढके हुए दधि, मधु और घृत से पूरित मधुपर्क मेरे द्वारा लाया गया है। इसे आप अपनी पूजा के लिये ग्रहण करें ॥ ३७ ॥
शुद्धोदक-स्नान — हे विभो ! सम्पूर्ण तीर्थों से प्रार्थनापूर्वक यह जल मेरे द्वारा लाया तथा सुवासित किया गया है। हे सुरेश्वर ! सम्यक् रूप से स्नानहेतु इसे ग्रहण करें ॥ ३८ ॥
वस्त्र — लोक-लज्जा का निवारण करने वाले दो बहुमूल्य और अत्यन्त महीन लाल रंग के वस्त्र मेरे द्वारा अर्पित हैं, हे देव! इन्हें ग्रहण कीजिये ॥ ३९ ॥
यज्ञोपवीत — हे देव! मैंने भक्तिपूर्वक रजत तथा सुवर्ण से ब्रह्मसूत्र का निर्माण कराके उसे रत्नों से अलंकृत किया है, हे परमेश्वर ! आप इसे ग्रहण करें ॥ ४० ॥
आभूषण — [ हे देव !] स्वर्णनिर्मित बहुत-से आभूषण, जो अनेक रत्नों से जटित हैं; आपकी आज्ञा से आपके भिन्न-भिन्न अंगों में धारण कराता हूँ ॥ ४१ ॥
रक्तचन्दनानुलेपन — हे देव ! अष्टगन्ध से युक्त उत्तम लाल चन्दन का आपके द्वादश अंगों में लेपन करता हूँ, आप मुझपर कृपा करें ॥ ४२ ॥
अक्षत — हे जगदीश्वर ! आपके [मस्तकपर लगे ] तिलक के ऊपर शोभा के लिये मैं रक्त चन्दन- मिश्रित तण्डुलों को अंकित करता हूँ, आप इसे ग्रहण (स्वीकार) करें ॥ ४३ ॥
पुष्प — पाटल, कर्णिकार, गुलदुपहरिया, लाल कमल, मोगरा और मालती के पुष्प [ आपको समर्पित हैं ], हे परमेश्वर ! इन्हें ग्रहण करें ॥ ४४ ॥
पुष्पमाला — अनेक प्रकार के कमल-पुष्पों और पल्लवों से गूँथकर बनायी गयी बिल्वपत्रों से युक्त अत्यन्त मनोहर इस माला को आप ग्रहण करें ॥ ४५ ॥
धूप — [हे देव !] दशांग गुग्गुल धूप, जो सम्पूर्ण सुगन्धियों का कारक और सभी पापों का नाश करने वाला है; मेरे द्वारा समर्पित है, आप उसे ग्रहण करें ॥ ४६ ॥
दीप — हे सर्वज्ञ ! हे सर्वलोकेश्वर ! अन्धकार का नाश करने वाले इस उत्तम मंगलदीप को आप ग्रहण करें। हे देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है ॥ ४७ ॥
नैवेद्य — [हे देव !] अनेक प्रकार के पक्वान्नों से संयुक्त, उत्तम शालि चावल से निर्मित ओदन, अनेक प्रकार के व्यंजन, शर्करायुक्त पायस (खीर), दधि- दुग्ध-घृत से युक्त [पेय], लौंग – इलायची से समन्वित तथा मरिचचूर्णसहित पकायी गयी बड़ी, राई – धनिया – मेथी से युक्त तक्र, हींग-जीरा- कुम्हड़ा – मरिच-उड़द की पिसी हुई दाल से बने और सुन्दर तले एवं पके हुए बड़े,मोदक-पुआ लड्डू – पूड़ी-मलाई आदि [पदार्थ], हल्दी- हींग-लवण और सैन्धव लवण (सेंधा नमक) – से युक्त उत्तम दाल तथा पापड़ से संयुक्त और अमृतीकरण मुद्रा के माध्यम से अमृतरूप हो चुका यह नैवेद्य भोजन के रूप में उपस्थित है, इसे सादर ग्रहण करें ॥ ४८-५२१/२
उत्तरापोशान —[हे प्रभो! अत्यन्त तृप्तिकारक सुगन्धित जल का इच्छानुसार आप पान करें। महान् आत्मावाले तथा नित्यतृप्त आपके तृप्त हो जाने पर जगत् तृप्त हो जाता है। उत्तरापोशान के लिये मैं आपको सुगन्धित जल प्रदान करता हूँ, पुनः मुख और हाथ की विशुद्धि के लिये आपको जल देता हूँ ॥ ५३-५४१/२
फल — हे देवेश! मीठे अनार, नीबू, जामुन, आम, कटहल, अंगूर, केला आदि पके फल, बेर, खजूर, नारियल, नारंगी, अंजीर, जम्बीर नीबू, पकी ककड़ी आदि इन फलों को आप ग्रहण करें ॥ ५५-५६१/२
मुख- हाथ- प्रक्षालन — [हे देव !] मुख- हाथ की विशेष शुद्धि के लिये मैं पुनः आपको जल प्रदान करता हूँ ॥ ५७ ॥
करोद्वर्तन — [‘हे प्रभो ! ] अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों से निर्मित, पवित्र गन्ध वाले अबीर नामक उत्तम शुभ चूर्ण तथा सुन्दर चन्दन को हाथों में उबटन (लेपन) – हेतु ग्रहण करें ॥ ५८१/२  ॥
सीमन्तभूषण ( सिन्दूर) — शालूर [नामक सुगन्धित द्रव्य]-से उद्भूत एवं बाँस के सार भाग से उत्पन्न तथा लाक्षा (महावर) – से रंजित सीमन्त (माँग)-के लिये आभूषणरूप यह चूर्ण (सिन्दूर) आपके लिये प्रस्तुत है ॥ ५९१/२
ताम्बूल — [हे देव !] कर्पूर और सुपारी के चूर्ण से युक्त, खाने योग्य खैर से संयुक्त और इलायची- लौंग- मिश्रित तथा केसरयुक्त ताम्बूल [ आपको समर्पित है, इसे कृपापूर्वक ग्रहण करें] ॥ ६०१/२
दक्षिणा — हे देव! पूजन में कुछ न्यून या अतिरिक्त हो जाने पर भी सम्पूर्ण फल की प्राप्ति के लिये मैं आपके सम्मुख स्वर्णदक्षिणा रखता हूँ ॥ ६११/२
माला — हे परमेश्वर ! श्वेत, पीत और रक्त- वर्ण के कमलों तथा शुभ पुष्पों से गूँथी गयी सुन्दर माला को ग्रहण करें ॥ ६२१/२
दूर्वा — [हे प्रभो !] हरित या श्वेत वर्णवाले, तीन अथवा पाँच पत्तियोंसे युक्त इक्कीस दूर्वांकुर मेरे द्वारा प्रदान किये गये। [इन्हें आप स्वीकार करें] ॥ ६३१/२
प्रदक्षिणा — हे देव ! गणपतिदेव की इक्कीस प्रदक्षिणा करनी चाहिये – इस विधि वाक्य के अनुसार [मैंने इक्कीस की संख्या में आपकी प्रदक्षिणा की है ।] हे देवेश ! [ प्रदक्षिणा करते हुए] प्रत्येक पद पर मेरे पाप नष्ट हों ॥ ६४१/२
आरती — हे परमेश्वर ! ताँबे, चाँदी, काँसे अथवा स्वर्णनिर्मित पात्र में बनाये गये आँखों को तृप्त करने वाली पाँच वर्तिकाओं से समन्वित दीपकों की इन पाँच आरतियों को ग्रहण करें ॥ ६५-६६ ॥
दीपदान — [ हे प्रभो !] अन्धकार का निवारण करने वाले तथा कर्पूर के द्वारा परिकल्पित इस सुन्दर दीपक को आप ग्रहण करें। जैसे इसमें भस्म नहीं दिखायी देता अर्थात् पूर्णरूप से दग्ध हो जाता है, वैसे ही आप मेरे पापों का [समग्र रूप से] नाश करें ॥ ६७ ॥
पुष्पांजलि — [ भाँति-भाँति के उत्तम] पुष्प तथा पल्लव, जिन्हें मैंने वैदिक मन्त्रों एवं सूक्तों से अभिमन्त्रित किया है, उन्हें पुष्पांजलि के रूप में आप ग्रहण कीजिये ॥ ६८ ॥
स्तुतिपाठ  — तदनन्तर मन को स्थिरकर बैठ करके अनेक प्रकार के स्तोत्रों, सूक्तों और सहस्रनामस्तोत्र से उन [गणेशजी ]-का स्तवन करे ॥ ६९ ॥ हे दीनानाथ ! हे दयानिधान! हे देवगणों द्वारा सम्यक् रूप से सेवित ! हे द्विज * (द्विजन्मा ) ! हे ब्रह्मा, ईशान, महेन्द्र, शेष, गिरिराजनन्दिनी, गन्धर्वों और सिद्धोंद्वारा स्तुत ! सम्पूर्ण अरिष्टों का निवारण करने में अद्वितीय रूप से निपुण ! हे त्रिलोकीनाथ! हे प्रभो ! मेरे अपराधों को क्षमा करके मेरी भक्ति को पूर्ण रूप से सफल कीजिये ॥ ७० ॥

हे देवि! इस प्रकार गणेशजी की मूर्ति का सम्यक् रूप से अर्चन करके दण्डवत् प्रणाम करे, तदनन्तर उनके सर्वसिद्धिप्रदायक मन्त्र का जप करे ॥ ७१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘गणेशपार्थिवपूजानिरूपण’ नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥

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