श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-53
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तिरपनवाँ अध्याय
हिमवान्-पार्वती-संवाद में राजा चन्द्रांगद का उपाख्यान
अथः त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
चन्द्राङ्गदोपाख्यान

हिमवान् बोले — हे शुभानने! अब मैं राजा चन्द्रांगद और उनकी पत्नी इन्दुमती द्वारा किये गये इस व्रत को तुमसे कहता हूँ। मालवदेश में कर्ण नाम का एक विख्यात नगर है, वहाँ चन्द्रांगद नाम का अत्यन्त पराक्रमी राजा हुआ था ॥ १-२ ॥ वह [राजा] अणिमादि [^1]  सिद्धियों से युक्त, समस्त शास्त्रों के तत्त्वार्थ का ज्ञाता, यज्ञ करने वाला, दानी, महान् ज्ञानी और वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् था ॥ ३ ॥ उसकी राजसभा अलौकिक सुधर्मा सभा को भी पराभूत करने वाली थी, उसमें लगी सूर्यकान्तमणि की किरणों से नेत्रों के तेज का हरण-सा हो जाता था । हे पुत्री ! [ सभा में लगे हुए ] नील, लोहित और पीतवर्ण के रत्नों से जटित स्तम्भों में अत्यन्त स्वच्छ वस्त्र भी प्रतिबिम्बित होकर अनेक वर्णवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ४-५ ॥ राजा की सर्वांगसुन्दरी पत्नी इन्दुमती के नाम से विख्यात थी। वह अत्यन्त साधु स्वभाववाली, महान् भाग्यशालिनी, पतिसेवा में रत रहने वाली, गृहकार्यों में उद्विग्न न होने वाली, देवताओं-अतिथियों की पूजा करने वाली, धार्मिक, व्रतपरायणा और सास-ससुर की सेवा करने वाली थी ॥ ६-७ ॥

धर्मात्मा होने पर भी राजा चन्द्रांगद को [ शिकार खेलने का व्यसन था, अतः ] उनके मन्त्रियों ने ‘पाप को बढ़ानेवाली महाभयंकर जीवहिंसा को रोकिये’ – इस प्रकार की उनसे बहुत प्रार्थना की। दैवयोग से वे किसी समय शिकार खेलने के लिये लकड़बग्घों, रुरु जाति के मृगों, [वन] सूकरों तथा अन्य पशु-पक्षियों से भरे वन में गये ॥ ८-९ ॥ उन्होंने नीले रंग का अँगरखा पहन रखा था और नीले रंग का ही साफा बाँध रखा था तथा ऊपर से उत्तरीय धारण कर रखा था। उन्होंने अँगुलियों की रक्षा के लिये गोह के चर्म के बने दस्ताने पहन रखे थे तथा तलवार – ढाल एवं कटार धारण कर रखी थी ॥ १० ॥ शीघ्रगामी अश्व पर समारूढ़ होकर तथा हाथों में धनुष-बाण धारणकर वे बलवान् राजा वैसे ही वीरों के समुदाय, मन्त्रियों और सेवकों से घिरे, मृगों और वराहों को मारकर नगर को भेजते हुए वन में भ्रमण कर रहे थे कि बलवान् राक्षसों द्वारा देख लिये गये ॥ ११-१२ ॥

उन गुफा-जैसे मुखवाले, गड्ढे-जैसे नेत्रों और फैले हुए जबड़ोंवाले एवं नभःस्पर्शी विशाल शरीर वाले राक्षसों को देखकर वे शीतज्वर से पीड़ित रोगी की भाँति काँपने लगे। उन्हें देखकर [राजा के] सभी वीर सैनिक और सेवकगण भी भाग खड़े हुए। उनमें से कुछ तो मरकर यमलोक को चले गये और कुछ मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ १३-१४ ॥ वहाँ एक क्रूर राक्षसी [भी] थी। वह कामदेव के सौन्दर्य को भी पराभूत करने वाले उन राजा को देखकर काममोहित हो गयी और उसने उनका आलिंगन कर चुम्बन किया। उसने राजा के मन्त्रियों को अपने गुप्तागार में प्रविष्ट कर लिया और उनके सेवकों का भक्षण कर लिया। इसी बीच राजा वहाँ से पलायन कर गये ॥ १५-१६ ॥

वे [भागकर] एक तालाब में छिप गये, जिससे वह राक्षसी उन्हें नहीं देख पायी । [ उधर ] राजा [तालाब में] नागकन्याओं द्वारा पकड़ लिये गये और वे उन्हें पातालस्थित अपने भवन में ले आयीं ॥ १७ ॥ वहाँ नागकन्याओं ने उन्हें वस्त्रालंकारों और आभूषणों से विभूषित किया। तत्पश्चात् नागकन्याओं ने उनसे पूछा कि आपका आगमन कहाँ से हुआ है ॥ १८ ॥ हे नरश्रेष्ठ! आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं ? आपका क्या कार्य है ? सत्य कहिये । उनका यह वचन सुनकर वे राजा बोले — ॥ १९ ॥

‘मैं हेमांगद का बलवान् पुत्र चन्द्रांगद हूँ, मालवदेश के कर्णनगर में मेरा निवास है। राक्षसी के भय से अत्यन्त त्रस्त होकर मैं [ इस तालाब की] विशाल जलराशि में प्रविष्ट हो गया और आप लोगों के द्वारा यहाँ लाया गया। आप लोगों ने जो कुछ पूछा, उसे मैंने निवेदित कर दिया ॥ २०-२१ ॥ आखेटरत मेरे साथ के सभी लोग [ राक्षसी द्वारा ] खा लिये गये। इस सरोवर के जल की कृपा से मैं इस समय जीवित हूँ।’ तब राजा के इस प्रकार के वचनों को सुनकर उन नागकन्याओं ने पुनः उनसे कहा — ॥ २२१/२

वे [ नागकन्याएँ] बोलीं — ‘आप हम लोगों के पति हो जायँ, इससे आपके सभी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायँगे। हम नागकन्याओं के साथ भोग-विलास अत्यन्त दुर्लभ है’ ॥ २३ ॥

उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर उन नृपश्रेष्ठ (राजा चन्द्रांगद)-ने कहा — ‘हे माताओ ! मेरा एकपत्नी- व्रत है, उसका मैं कैसे त्याग करूँ ! चन्द्रवंश में उत्पन्न राजाओं के धर्म का मैं आप सबसे वर्णन करता हूँ — सोमवंश में उत्पन्न साधु स्वभाव वाले राजा परद्रव्य, परद्रोह, परदारा तथा परनिन्दा की इच्छा भी नहीं करते। [वेद-शास्त्रों का ] अध्ययन, यज्ञ, दान, शरणागत की रक्षा, निषिद्धाचरण का त्याग तथा वेदविहित आचार का पालन — ये द्विजसंज्ञक त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) – के धर्म हैं और याजनादि (यज्ञ कराना, दान लेना तथा अध्यापन करना) तीन धर्म केवल ब्राह्मणों के लिये विहित हैं। आतिथ्य विशेष रूप से सभी वर्णों का परम धर्म है । ‘ ॥ २४- २७१/२

राजा की इस प्रकार की बात सुनकर उन सभी नाग- कुमारियों ने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें अपनी पत्नी से बहुधा वियोग होगा। उन कामविह्वल और दुखी नागकन्याओं ने उन्हें जंजीरों से बाँध दिया ॥ २८-२९ ॥ [उधर] उस राक्षसी ने राजा को प्राप्त करने के लिये उस सरोवर का [सम्पूर्ण] जल पी डाला और [उसमें रहने वाले] सम्पूर्ण जलचरों को खा गयी, फिर भी वह सर्वथा तृप्त नहीं हुई ॥ ३० ॥

इस वृत्तान्त को पलंग पर बैठी हुई कमलसदृश नेत्रों वाली रानी ने उस राक्षसी से बचकर आये हुए अपने दूत से सुना । राजा को [सरोवर में] डूब गया सुनकर वह दुखित होकर [ पलंग से] पृथ्वी पर गिर पड़ी और महान् मूर्च्छा को प्राप्त हो गयी । [ उस समय] सखियाँ उसे पंखा झलने लगीं ॥ ३१-३२ ॥ उन सखियों ने बारम्बार रोती हुई रानी पर शीतल जल छिड़का, इससे वह उठकर बैठ गयी और अपने वक्ष, सिर तथा मुख को पीटती हुई रुदन करने लगी ॥ ३३ ॥

वह ‘हे भर्ता ! हे कान्त !’ – इस प्रकार कहती हुई अत्यन्त शोक से विलाप करने लगी । [ रानी कहने लगी – ] हे प्राणनाथ ! मुझ प्रियवादिनी को छोड़कर आप कहाँ चले गये? मेरे शरीर के सभी अंग भलीभाँति ठीक हैं, मैं आपके चरणों में प्रणत रहने वाली हूँ, आपका प्रिय करने वाली हूँ, मैं नित्य पति के कार्य में संलग्न रहनेवाली हूँ और नित्य अतिथियों का पूजन करनेवाली हूँ ॥ ३४-३५ ॥ मेरे स्वामी कहाँ भोजन करते होंगे ? स्वर्णनिर्मित पलंग और बहुमूल्य आस्तरण ( चादर ) – को त्यागकर कहाँ निद्रा लेते होंगे? सुगन्धित तैल का त्यागकर मेरे कान्त कैसे स्नान करते होंगे ? उनके बिना अब प्रजाओं का पालन कौन करेगा ? ॥ ३६-३७ ॥ अपनी सन्तानवत् प्रजाओं का आह्लादन कौन करेगा? आज गुणों और प्रताप के निधान [वे राजा] अस्त क्यों हो गये हैं? उन महात्मा के बिना मैं दिशाओं को शून्य देख रही हूँ। [उनके बिना] अब मैं कहाँ सुख देखूँगी और वे भी कहाँ सुख पायेंगे? ॥ ३८-३९ ॥ हे देव! कुलांगनाओं को स्वामी के साथ जैसा सुख मिलता है, वैसा सुख स्वामी के न रहने पर इहलोक या परलोक में नहीं मिलता । शरण में आये हुए दीनों की रक्षा कौन करेगा? इस प्रकार दीन होकर अत्यन्त विह्वलतापूर्वक वह रोने लगी ॥ ४०-४१ ॥

उसने अपने आभूषण तोड़कर दूर फेंक दिये। सभी कंगनों एवं चूड़ियों आदि को तोड़ डाला तथा मूर्च्छित हो गयी ॥ ४२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें चन्द्रांगदोपाख्यानके अन्तर्गत ‘चन्द्रांगदका निग्रह’ नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

[^1]: अणिमा (अणु जितना हलका हो जाने की सामर्थ्य), लघिमा (अत्यन्त लघु हो जाने की अलौकिक शक्ति), गरिमा (अपने शरीर का भार इच्छानुसार बढ़ा सकने की सामर्थ्य), प्राप्ति (किसी भी पदार्थ को प्राप्त करने की शक्ति), प्राकाम्य (सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकने की शक्ति), महिमा (अपने शरीर को विशाल कर सकने की शक्ति), ईशित्व (दूसरों पर प्रभुत्व कर सकने की शक्ति), वशित्व (वशमें करने की योग प्राप्त शक्ति), कामावशायिता (सत्यसंकल्पता) ।

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