श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-61
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
इकसठवाँ अध्याय
गणेशजी द्वारा चन्द्रमा को शाप देना तथा देवताओं की प्रार्थना पर पुनः अनुग्रह करना, चन्द्रमा द्वारा वरद विनायक की स्थापना
अथः एकषष्ठितमोऽध्यायः
चन्द्रशापानुग्रहवर्णनं

ब्रह्माजी बोले — हे राजन् ! एक बार मैं गिरिशायी भगवान् शंकर के निवास स्थान कैलासपर्वत पर गया हुआ था। वहाँ सभा के मध्य में बैठे हुए मैंने नारदजी को आते हुए देखा। उन्होंने शंकरजी को एक अद्वितीय फल निवेदित किया, तब उस (फल) – के विषय में गणेश और कुमार कार्तिकेय – दोनों ने शम्भु से याचना की ॥ १-२ ॥ उस समय भगवान् शंकर ने ‘यह फल मुझे किसे देना चाहिये’ – ऐसा मुझसे भी पूछा। तब मैंने उनसे कहा कि कुमार बालक हैं, अत: उन्हें यह फल दे दीजिये ॥ ३ ॥

तब शिवजी ने उस फल को कुमार को दे दिया, [इस पर ] गणेशजी क्रुद्ध हो गये । तदनन्तर जब मैंने अपने निवास ब्रह्मलोक में जाकर सृष्टि करने की इच्छा की तो विघ्नकर्ता [उन] गणेशजी ने एक अत्यन्त अद्भुत विघ्न की सृष्टि कर दी, और वे उग्ररूप धारणकर मुझे भयभीत करने लगे ॥ ४-५ ॥

[उस रूप को देखकर ] मेरे भ्रमित हो जाने पर चन्द्रमा गजानन गणेशजी के क्रूरतर रूप को देखकर अपने गणोंसहित हँस पड़े। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दिया कि मेरे वचनानुसार [अब] तुम तीनों लोकों में अदर्शनीय हो जाओगे ॥ ६-७ ॥ कदाचित् यदि कोई तुम्हें देख लेगा तो वह महापातकी हो जायगा । इस प्रकार शाप देकर वे देवाधिदेव अपने गणों के साथ अपने धाम को चले गये। चन्द्रमा भी मलिन, दीन और चिन्ता-समुद्र में लीन हो गये कि अणिमादि सिद्धियों से समन्वित, जगत् के कारण के भी कारण उन भगवान् गणेश के प्रति अज्ञानवश बालक की भाँति मैंने दुष्टता क्यों की; जिसके कारण मैं सभी के लिये अदर्शनीय, विवर्ण और मलिन हो गया हूँ! ॥ ८–१० ॥ अब मैं कैसे स्वरूपवान्, वन्दनीय और [पुनः] अपनी कलाओं से देवताओं को प्रसन्नता प्रदान करने वाला बनूँगा? इसी बीच में देवताओं ने चन्द्रमा को प्राप्त महान् शाप के विषय में सुना। तब अग्नि, इन्द्र आदि [देवता] वहाँ गये, जहाँ गजानन गणेशजी थे। उन देवगणों ने सम्पूर्ण विघ्नों का प्रवर्तन एवं हरण करने वाले गणेशजी से प्रार्थना की — ॥ ११-१२ ॥

देवताओं ने कहा — हे देवाधिदेव ! आप सम्पूर्ण संसार के लिये वन्दनीय हैं। हे ईश ! आप अपनी इच्छा से इस संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं । हे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) – के स्वामी ! आप निर्गुण [स्वरूप] होते हुए भी गुणवानों के गुणों के कर्ता हैं । हे देव ! आज हम आपकी ही शरण में आये हैं ॥ १३ ॥ हे ईश ! सम्पूर्ण जगत् आपके शाप से भयभीत है, आप हमारी रक्षा करें। चन्द्रमा के अपराध के कारण हम सब पर यह महान् कष्ट कैसे आ गया है ? हे जगदीश ! हे भुवनेश! अतः आप ऐसा विधान करें, जिससे हम सब, यह सम्पूर्ण संसार और चन्द्रमा भी शान्ति प्राप्त कर सकें ॥ १४ ॥ हे प्रभो ! चन्द्रमा के अदृश्य हो जाने से यह संसार कष्ट में पड़ गया है, इसलिये आप इन चन्द्रमा पर अनुग्रह करके तीनों लोकों पर कृपा करें ॥ १५ ॥ [हे प्रभो!] आपके जिस स्वरूप और महिमा को वेदत्रयी भी नहीं जान सकती, उसका स्तवन कोई कैसे कर सकता है, तथापि हम सभी आपकी स्तुति कर रहे हैं। आपका दर्शन करके और आपसे सम्भाषण करके हम सब कृतकृत्य हो गये। हे शरणागतों के कष्ट का हरण करने वाले अविनाशी [प्रभु !] हम सब आपकी शरण में आये हैं ॥ १६-१७ ॥

[तब] उनके इस प्रकार के वचन सुनकर और उनके द्वारा किये हुए स्तवन से अत्यन्त प्रसन्न हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देनेवाले गजानन गणेशजी बोले — ॥ १८ ॥

विकट [^1]  (गणेशजी ) बोले — हे देवताओ ! मैं आप सबकी स्तुति से प्रसन्न हूँ, आप लोग अपना मनोऽभिलषित वर माँगें। यदि वह तीनों लोकों में महान् असाध्य होगा, तो भी उसे आप लोगों को प्रदान करूँगा ॥ १९ ॥

देवताओं ने कहा — [हे प्रभो!] हम सब लोग अमृतमयी किरणों वाले चन्द्रमा पर आपका अनुग्रह चाहते हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जाने पर हम सब पर आपका अनुग्रह हो जायगा ॥ २० ॥

गणेशजी बोले — एक वर्ष या उसका आधा यानी छः मास या उस आधे का आधा तीन मास तक चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय । हे देवताओ ! अब आप लोग कोई दूसरा वर भी माँगें ॥ २१ ॥

तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजी को दण्डवत् प्रणाम किया [शापनिवारण की प्रार्थना की]। तब उन प्रणतजनों से गणेशजी ने भावपूर्वक कहा — अहो ! आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचन को अप्रमाणित करने के लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ ? शरण में आये हुए प्रपन्नजनों का त्याग करने की भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाश से पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ ! मेरे द्वारा कही जा रही बातों को सुनो। [मैं अपने शाप को सीमित कर रहा हूँ, मात्र ] भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को ज्ञान में अथवा अज्ञान में भी जो अभिशप्त चन्द्र को देख लेगा, वह महान् दुःख का भाजन होगा । उनके इस प्रकार के वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये। उन सब देवताओं ने [स्वीकारसूचक ] ‘ओम्’ शब्द का उच्चारणकर उनके चरणों में प्रणिपात किया और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर चन्द्रमा के पास चले गये ॥ २२–२७ ॥

[वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमा को उलाहना देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम गजानन गणेशजी पर हँसे । श्रेष्ठों के प्रति अपराध करने वाले तुमने तीनों लोकों को संकट में डाल दिया ॥ २८ ॥ तुमने तीनों लोकों के स्वामी, तीनों लोकों के विधाता, अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु भगवान् गजानन गणेशजी के प्रति अपराध किया है, अतः सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा रखने वाले गणेशजी ने तुम्हें दण्डित किया था ॥ २९-३० ॥ हम लोगों के द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा —] भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को तुम कभी दर्शनीय नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव गजानन की शरण में जाओ। उनकी कृपा से तुम शुद्ध शरीर वाले होकर परम ख्याति को प्राप्त करोगे ॥ ३१-३२ ॥

देवताओं के इस प्रकार के हितकारी वचन को सुनकर चन्द्रमा शिव आदि देवताओं द्वारा वन्दित शरणागतवत्सल देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजी की शरण में गये और पापों का नाश करने वाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्र का जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ इन्द्र द्वारा उपदिष्ट [मन्त्र का जप करते हुए ] चन्द्रमा ने परम समाधि में स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाली गंगाजी के दक्षिणी किनारे पर बाईस वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी तपस्या से] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख आये ॥ ३५-३६ ॥

[वे भगवान् गणेश] लाल रंग के पुष्पों की माला और लाल रंग के वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीर में लाल चन्दन का आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओं से युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूर से लिप्त होने के कारण अरुण वर्ण का था ॥ ३७ ॥ करोड़ों सूर्यों से भी अधिक प्रभावाले वे अपनी आभा से सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित कर रहे थे। उस तेज:पुंज को देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [ भयभीत होकर ] कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥

तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके सम्मुख हाथ जोड़कर मन में यह विचार करने लगे कि ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देने के लिये यहाँ आये हैं — ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और अपनी परमभक्ति से उन देवाधिदेव गजानन गणेशजी को प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥

चन्द्रमा बोले — मैं उन भगवान् गजानन गणेशजी को प्रणाम करता हूँ, जो लोगों के सम्पूर्ण विघ्नों का हरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और काम की उपलब्धि कराते हैं, उन विघ्नविनाशक को नमस्कार है ॥ ४१ ॥ हे कृपानिधान! हे विश्व का विधान करने में दक्ष ! आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्व के बीजरूप, जगन्मय, त्रैलोक्य का संहार करने वाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर, नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥ हे महात्मन्! मैंने अज्ञानदो षके कारण जो अपराध किया है, दया करने वाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर दया कीजिये; क्योंकि शरणागत के त्याग से आपको भी दोष होगा ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — चन्द्रमा के इस प्रकार के वचन सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन देवाधिदेव ने चन्द्रमा के स्तवन और नमस्कार से सन्तुष्ट होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥

गजानन बोले — [हे चन्द्र!] तुम्हारा स्वरूप जैसे पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और मूर्खता की प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओं के साथ वार्तालाप में पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी तिथि] – को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥ [भाद्रपदमास के] कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को मनुष्यों द्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय होने पर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे जाओगे। उस तिथि पर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे, इसके विपरीत होने पर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो जायगा । हे शशि ! तुम मुझे प्रसन्न करने वाले हो, अतः तुम अपनी एक कला से मेरे ललाट पर स्थित रहो। तुम प्रतिमास की [शुक्लपक्ष की] द्वितीया तिथि को सबके लिये प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त करके चन्द्रदेव पहले की ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये । उन्होंने देवताओं और ऋषियों के साथ वरद विनायक नामक मूर्ति की स्थापना की। देवताओं और मुनियों ने उस मूर्ति का ‘भालचन्द्र’ यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥ चन्द्रमा ने उस मूर्ति के लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिर का निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारों से पूजन किया ॥ ५२ ॥ सम्पूर्ण देवताओं और मुनियों ने भी उस मूर्ति का पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसार में यह स्थान सिद्धक्षेत्र के रूप में विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करने वालों के लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाला होगा ॥ ५३१/२

तदनन्तर उन देवताओं और मुनियों ने गजानन गणेशजी को नमस्कार किया और प्रसन्न मन से अपने- अपने स्थान को हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और मुनियों के चले जाने पर देवाधिदेव गणेशजी ने भी अपने शरीर को अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजी के अन्तर्धान हो जाने पर चन्द्रमा भी अपने तेज को प्राप्तकर प्रसन्न मन से अपने धाम को चले गये ॥ ५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘चन्द्रशापानुग्रहवर्णन’ नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥

[^1]: मुद्गलपुराण के अनुसार कामासुर का पराभव करने के लिये गणेशजी ने ‘विकट’ नाम का अवतार लिया था ।

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