श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-73
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
गणेशजी की आराधना के प्रभाव से कार्तवीर्य को दिव्य देह और सहस्त्र भुजाओं की प्राप्ति
अथः नामत्रिसप्ततितमोऽध्यायः
कृतवीर्यपुत्राय प्रवालक्षेत्रानुष्ठानं गणेशदर्शनं, (कृतवीर्येण) सहस्रभुजानां च प्राप्तिः

इन्द्र बोले — वह राजपुत्र भगवान् गजानन का ध्यान करते हुए उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखकर गुरु (दत्तात्रेयजी) द्वारा उपदिष्ट मन्त्र का नियमपूर्वक जप करने लगा । वायुमात्र का भक्षण कर निराहार रहते हुए वह पाषाण- खण्डसदृश [निश्चल] प्रतीत होता था। इस प्रकार तपस्या करते हुए उसके बारह वर्ष व्यतीत हो गये । हस्तपादरहित उस महामनस्वी बालक के स्थिर स्वरूप को देखकर बारह वर्ष के पश्चात् गणेशजी सरोवर के मध्यभाग में मूँगे की मूर्ति के रूप में प्रकट हुए और उसकी भक्तिनिष्ठा से अत्यन्त सन्तुष्ट हो उसके सम्मुख जाकर बोले — ॥ १-४ ॥

गणेशजी बोले — इस निर्जन वन में; जो कि सिंहों और व्याघ्रों से युक्त और बहुत-से लता – पुष्पों से समन्वित है, उसमें तुमने बारह वर्षों तक रहकर तपस्या की है, इससे मैं तुम्हें वर दूँगा, जो अभिलाषा तुम्हारे मन में हो, वह माँगो। उनकी वाणी को सुनकर वह कृतवीर्यपुत्र देहभावना में स्थित हो, भगवान् गजानन को प्रणामकर विमानों में स्थित सभी मुनियों के सुनते हुए बोला — ॥ ५–७ ॥

[ राज – ] पुत्र बोला — हे देव! मेरी निश्चल भक्ति आपके युगलचरणों में बनी रहे, इसके अतिरिक्त अन्य वर माँगने की मेरी इच्छा नहीं है । तथापि हे देवेश ! मैं अपने माता-पिता के सन्तोष के लिये सभी जनों को आह्लादित करने वाली शारीरिक सुन्दरता की याचना करता हूँ, उसे प्रदान करें ॥ ८-९ ॥

इन्द्र बोले — उस राजपुत्र के वचन को सुनकर उन मायापति गजानन ने अणिमा [सिद्धि] – का आश्रय लेकर प्रयत्नपूर्वक उसके उदर में प्रवेश किया । हे राजन् ! उनके प्रविष्ट होने पर वह पुत्र दिव्य देहवाला हो गया । तदनन्तर वह कृतवीर्यपुत्र सहस्र भुजाओं वाला हो गया ॥ १०-११ ॥ वह दो पैरों से युक्त सीधा पर्वत की भाँति स्थित था। उसपर देवताओं तथा देवर्षियों ने भी पुष्पवर्षा की ॥ १२ ॥ उन्होंने उसकी और देवाधिदेव गणेशजी की गीत और वाद्यध्वनि से स्तुति की । तदनन्तर सहस्त्र भुजाओं से युक्त उस कार्तवीर्य ने गर्जना की। उसके मेघ गर्जन के समान शब्द को सुनकर समवर्ती यमराज [^1]  भी अत्यन्त त्रस्त हो गये तो दूसरों की गिनती ही कहाँ ? ॥ १३-१४ ॥

पृथ्वी के समस्त राजागण उसके भय से काँपते थे कि युद्ध में यह [ अपने एक हजार हाथों से] एक साथ पाँच सौ बाण छोड़ेगा। तब ब्रह्मा आदि देवता अपने- अपने विमानों से उतरकर उसके पास आये और बोले — ‘तुम्हारा स्मरण करने पर देवताओं की भी खोयी या नष्ट हुई वस्तु प्राप्त हो जायगी’ ॥ १५-१६ ॥ तुम सभी लोगों के हृदय में स्थित मानसिक व्यथा को नष्ट करोगे; क्योंकि ‘सहस्रार्जुन’ नाम वाले साक्षात् विष्णुरूप हो। तुम कल्पपर्यन्त तीनों लोकों में विख्यात रहोगे। तुम शरणागतों का पालन करने वाले और सज्जनों की रक्षा में संलग्न रहोगे ॥ १७-१८ ॥ तुम सम्पूर्ण शत्रुओं पर विजय पाने वाले और भूमण्डल के अधिपति होगे – इस प्रकार अनेक वर देकर देवगण अन्तर्धान हो गये । सम्पूर्ण राजाओं ने उसे हाथी, घोड़े, पालकियाँ, छत्र, चामर, मशालें, रथ और अन्यान्य उपहार प्रदान किये ॥ १९-२० ॥

तदनन्तर उस [राजा कार्तवीर्य] ने एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाकर उसके मध्य में गणेशजी की मूँगे की मूर्ति की ब्राह्मणों द्वारा प्रतिष्ठा करवायी । ब्राह्मणों ने उसका ‘प्रवालगणपति’ नाम रखा। [राजा ने] उस स्थापित मूर्ति पूजन के लिये नियुक्त ब्राह्मणों को ग्राम दान में दिये । तबसे वह सिद्धिप्रद क्षेत्र पृथ्वी पर ‘प्रवालक्षेत्र ‘ [^2]  नाम से विख्यात हुआ। पृथ्वी का धारण करने की क्षमता प्राप्त करने के लिये शेषनाग ने [भी पूर्वकाल में] वहाँ अनुष्ठान किया था ॥ २१–२३ ॥ उस अनुष्ठान के फलस्वरूप उन्होंने गणेशजी से पृथ्वी को धारण करने की सामर्थ्य, सर्वज्ञता, सहस्र सिर और नौ नागकुलों में श्रेष्ठता आदि बहुत-से वरदान प्राप्त किये। चूँकि प्राचीन काल में अत्यन्त प्रसन्न मन से उन्होंने इसे स्थापित किया था, इसलिये ‘ धरणीधर’ – यह इसका दूसरा नाम प्रसिद्ध हो गया, जो सुनने और स्मरण करने से भी समस्त कामनाओं को फलीभूत करनेवाला है ॥ २४-२६ ॥

सहस्रबाहु सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजों का पूजनकर और राजाओं से पूछकर माता-पिता को देखने अपने नगर को गया। उसे इस प्रकार का (सर्वांगपूर्ण, सुन्दर और सहस्रभुज) देखकर माता-पिता तथा नगरनिवासी अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने सभी श्रेष्ठ द्विजों को अनेक प्रकार के दान दिये ॥ २७-२८ ॥

इन्द्र बोले — [ हे राजन्!] मैंने तुमसे संकष्टचतुर्थी [व्रत]-की अद्भुत महिमा का वर्णन किया, यह शुभ व्रत मृत्युलोक में राजा कृतवीर्य द्वारा प्रचलित हुआ ॥ २९ ॥ देवगणों और चन्द्रसेन आदि राजाओं ने भी इस व्रत की महिमा का अनुभव किया। यह व्रत अत्यन्त पुण्य प्रदान करने वाला और स्मरणमात्र से भी सिद्धि देनेवाला है। इसी व्रत के प्रभाव से रावण ने सर्वज्ञता प्राप्त कर ली थी। पाण्डवों ने [पूर्वकाल में] इसी व्रत के प्रभाव से पुनः राज्य प्राप्त किया था ॥ ३०-३१ ॥ [हे शूरसेन!] इस व्रत के अनुष्ठान का जो पुण्य है, वह यदि मेरे हाथ में दिया जाय, तभी यह विमान अमरावती के लिये प्रस्थान कर सकेगा ॥ ३२ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास !] शतयज्ञकर्ता इन्द्र के मुख से इस संकष्टचतुर्थीव्रत की महिमा सुनकर राजा शूरसेन स्वात्मानन्दरूपी महासागर में अवगाहन करने लगे, तदनन्तर प्रसन्न मनवाले उन नृपश्रेष्ठ शूरसेन ने [देवराज] इन्द्र के चरणकमलों की वन्दनाकर कहा — ॥ ३३-३४१/२

वे [ राजा शूरसेन ] बोले—मेरे किसी पूर्वजन्मका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप मैंने इस प्रकारके [पुण्यप्रदायक] व्रतके विषयमें सुना। तीनों लोकों में इससे अधिक पुण्य देनेवाला कोई कर्म नहीं है ॥ ३५१/२

[ ब्रह्माजी बोले ] — इन्द्र से ऐसा कहकर वे राजा शूरसेन तबसे स्वयं व्रत करने लगे ॥ ३६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘चतुर्थीव्रतमाहात्म्य’ नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥

[^1]: -प्रत्येक प्राणी के साथ उसके कर्म के अनुसार बिना भेदभाव किये समान व्यवहार करने के कारण यमराज को समवर्ती कहा जाता है।
[^2]: -मुम्बई-भुसावल रेलवे लाइन पर पाचोरा जंक्शन से २४ किमी० की दूरी पर महसावन्द रेलवे स्टेशन है, वहाँ से लगभग ८ किमी० दूर प्राचीन प्रवाल-क्षेत्र है, जिसे वर्तमान में पद्मालयतीर्थ कहा जाता है। यहाँ कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) और शेषजी द्वारा स्थापित दो गणपतिमूर्तियाँ हैं । मन्दिर के सामने ही ‘उगम’ सरोवर है।

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