श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-100
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सौवाँ अध्याय
नागलोक में नागकन्याओं द्वारा मयूरेश्वर का स्वागत-सत्कार, नागराज वासुकि को मयूरेश्वर द्वारा आभूषण के रूप में धारण करना, सर्पों तथा मयूर का युद्ध, शेषनाग को आभूषण के रूप में धारण करना, शेषनाग द्वारा मयूरेश की स्तुति, शेषनाग द्वारा सम्पाती आदि को बन्धन-मुक्त करना, मयूरेश्वर का नागलोक से धरती पर आना, भगासुर से बालकों को मुक्त कराकर वापस घर में आना और अपनी माया दिखाना
अथः शततमोऽध्यायः
भगासुरवध

ब्रह्माजी बोले — सम्पूर्ण विश्व के स्वामी और अनेक स्वरूप धारण करने वाले भगवान् मयूरेश अत्यन्त सौन्दर्य-सम्पन्न स्वरूप वाले थे। नागकन्याएँ उनके साथ आनन्द-क्रीड़ा करने के लिये उन्हें अपने घर नागलोक में ले गयीं और वहाँ उन्होंने बहुत विस्तार से पूजन किया । उन्होंने सुगन्धित तैल से उन्हें उबटन लगाकर गरम जल से स्नान कराया ॥ १-२ ॥ दिव्य वस्त्रों, अलंकारों तथा विविध प्रकार के चन्दनों से उनकी पूजाकर, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल तथा सुवर्ण उपचार उन्हें समर्पित किये ॥ ३ ॥

तदनन्तर वे नागकन्याएँ दोनों हाथ जोड़कर कहने  लगीं — हे प्रभो! हम लोग धन्य हैं, जो कि आज आपके उन चरणों का हमने दर्शन किया है, जिनके दर्शन की अभिलाषा ब्रह्मा आदि देवता भी रखते हैं ॥ ४ ॥ आज यह नागलोक अत्यन्त धन्य हो गया है, हम लोगों का जीवन जीना सफल हो गया है। आज हमारे मन के आनन्द-सरोवर में निमग्न होने से उसका सन्ताप  सर्वथा दूर हो गया है ॥ ५ ॥ हे देव मयूरेश! आपको जो-जो भी अभीष्ट हो, वह सब आप यहाँ ग्रहण करें। आप कुछ दिनों तक यहाँ ठहरने के अनन्तर ही अपने घर को जायँ ॥ ६ ॥

मयूरेश बोले — मैं तुम सबकी अभिलाषा को अवश्य पूर्ण करूँगा, परंतु मेरी माता पार्वती मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं, मेरे वियोग के कारण वे अत्यन्त दुखी हैं और कुछ भी भोजन नहीं ग्रहण कर रही हैं। तुम सब किसकी पुत्रियाँ हो, उनका दर्शन मुझे होता तो उचित होता ॥ ७१/२

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर नागकन्याओं ने कहा कि हे प्रभो ! हम उन वासुकि नाग की कन्याएँ हैं, जिनके घर में ब्रह्मा आदि देवता तथा अन्य मुनिगण सर्वदा आते-जाते रहते हैं और जिनके विष से उत्पन्न ज्वाला तीनों लोकों को दग्ध कर सकती है ॥ ८-९ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहने के अनन्तर उन गुणेश्वर को आगे करके वे कन्याएँ पिता वासुकि के पास पहुँचीं। नागराज वासुकि अनेक नागों से समन्वित थे और एक अत्यन्त प्रदीप्त रत्नमय सिंहासन पर विराजमान थे। वे करोड़ों सूर्यों की आभा से कान्तिमान् थे, रत्नों की माला से सुशोभित हो रहे थे, अपने सिर में स्थित मणिरत्न की किरणों से वे समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे ॥ १०-११ ॥ उस अत्यन्त अभिमानी और महाबलशाली वासुकि को देखकर मयूरेश्वर उड़ करके उसके फणों पर जा बैठे और फणों पर स्थित मणि को शीघ्र ही ले लिया ॥ १२ ॥
उस मणि के प्रकाश से पाताललोक में कभी कहीं कोई अन्धकार नहीं होता था । उस समय उसने अपने सिर को हिलाते हुए सातों पर्वतों, सातों समुद्रों, पातालों तथा रसातल को आन्दोलित कर डाला था । तदनन्तर मयूरेश ने खेल-खेल में ही अपने एक हाथ से उस वासुकि नाग को पकड़कर अपने गले में बाँध लिया। इसी कारण स्वर्गलोक में वे मयूरेश ‘सर्पभूषण’ इस नाम से विख्यात हुए। तदनन्तर अत्यन्त आनन्दित होते हुए विभु मयूरेश्वर ने गर्जना की ॥ १३–१५ ॥

उस भीषण गर्जना को सुनकर तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे । तदनन्तर सर्पगणों ने वासुकि को वापस लाने के लिये शेषनाग से कहा ॥ १६ ॥ तब अत्यन्त क्रोध में आविष्ट होकर उस शेषनाग ने अपने सभी फणों को फैलाकर उनसे विषाग्नि उगलते हुए तीनों लोकों को दग्ध करना प्रारम्भ कर दिया ॥ १७ ॥ वह कहने लगा — मेरे बन्धु उस वासुकि को जीतने में कौन समर्थ हो सकता है ? यह कहकर वह जैसे दावाग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार क्रोध के आवेश में जलता हुआ-सा गया ॥ १८ ॥ वह शीघ्र ही गया और उसने मयूरेश को ‘ठहरो- ठहरो’ इस प्रकार से कहा । तदनन्तर नागों के अन्य कुल भी शीघ्र ही उस शेषनाग के पीछे-पीछे गये ॥ १९ ॥

तदनन्तर उस नागसमूह को देखकर देव मयूरेश वहीं ठहर गये और उन्होंने अपने वाहन मयूर के मस्तक पर हाथ रखा और उसे सर्पों के साथ युद्ध करने के लिये प्रेरित किया ॥ २० ॥ अत्यन्त अद्भुत वह मयूर मयूरेश्वर को प्रणाम करके सर्पों को निगलता हुआ-सा आगे बढ़ा। मयूर ने अपने पंखों को फड़फड़ाया, फड़फड़ाने की उस हवा ने बड़े-बड़े सर्पों को उड़ाकर घुमा डाला ॥ २१ ॥ उस मयूर ने किन्हीं-किन्हीं सर्पों का भक्षण कर लिया और दूसरे सर्पों को चूरा-चूरा बना डाला। किन्हीं- किन्हीं अत्यन्त बलवान् सर्पों को उसने मार डाला ॥ २२ ॥ कुछ सर्प उसे देखते ही भय से विह्वल होकर मृत हो गये। तदनन्तर उस मयूर का वैसा बल-पराक्रम देखकर शेषनाग ने विषैली श्वास-वायु छोड़ी ॥ २३ ॥ उस विषैले श्वास से वह मयूर मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ा। तब वह शेषनाग क्रोध से तीनों लोकों को जलाता हुआ-सा मयूरेश की ओर दौड़ा ॥ २४ ॥

तीनों लोकों को विष की अग्नि से परिव्याप्त देखकर गुणेश्वर ने अपना विराट् रूप बना लिया और वे उस शेषनाग के फणों के ऊपर चढ़ बैठे ॥ २५ ॥ बालसुलभ चंचलतावश वे उछलकर दूसरे मेघ के समान गर्जना करने लगे और अपने चरणों के प्रहार से आघात करते हुए ताली बजाकर नृत्य करने लगे ॥ २६ ॥ मात्र एक ब्रह्माण्ड के भार को सहन करने वाला वह शेषनाग अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के भारवाले उन मयूरेश के भार से अत्यन्त पीड़ित हो गया, भला वह कैसे उस भार को सहन कर सकता था ?॥ २७ ॥ उन मयूरेश ने उस शेषनाग को अपनी कमर में वैसे ही बाँध लिया, जैसे बालक क्रीडा करता हुआ अपनी कमर में रस्सी बाँध लेता है । तदनन्तर युद्ध की इच्छा करने वाले वे सभी नाग उन मयूरेश के समीप में आये ॥ २८ ॥ विघ्नराज मयूरेश ने अपने हुंकारमात्र से उन्हें गिरा डाला। कुछ सर्पों को विभु मयूरेश ने अपने मस्तक में बाँध लिया और कुछ को अपने कानों में लपेट लिया । तदनन्तर शेषनाग अत्यन्त थक गया और उसने गुणेश्वर की स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ २९१/२

शेषनाग बोला — [ हे प्रभो ! ] आपके यथार्थ स्वरूप को न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न मुनिगण ही जानते हैं ॥ ३० ॥ आप ही इस विश्व की सृष्टि करते हैं, आप ही इसकी रक्षा करते हैं और इसके संहार करने वाले भी आप ही हैं। आप नाना अवतारों को धारण करने वाले हैं और अनेकों दैत्यों का मर्दन करने वाले हैं ॥ ३१ ॥ आप ही सबके साक्षी हैं, आप ही सबके अन्तर्यामी हैं। आप सर्वत्र सबके कारण और कारणों के भी कारण हैं। हम लोग अज्ञान और अभिमान के कारण ही आपसे युद्ध करने की इच्छा रख रहे थे। अतः आप हमें क्षमा करें ॥ ३२१/२

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर सर्पों का राजा वह शेषनाग सम्पाती, जटायु तथा बाज पक्षी को वहाँ ले आया और उन्हें मयूरेश को समर्पितकर फिर उन्हें प्रणाम कर वह मौन हो गया। उन तीनों ने भी मयूरेश को प्रणामकर कहा — हम सर्पो द्वारा बन्धन में डाले गये थे और आज आप दीनानाथ के कृपाप्रसाद से उस बन्धन से मुक्त हो गये हैं, हे परमेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ ३३-३४१/२

ब्रह्माजी बोले — मयूरेश से इस प्रकार कहकर सम्पाती, जटायु तथा बाज ने अपने बन्धु उस मयूर का अत्यन्त प्रसन्नतायुक्त होकर आलिंगन किया तथा गद्गद वाणी में उससे माता की कुशल पूछी और अपना भी कुशल समाचार बताया ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर वे इन्द्रियजयी गणनायक गुणेश मयूर पर आरूढ़ हुए और उन तीनों – सम्पाती, जटायु तथा बाज को साथ लेकर वे पाताल से धरती पर चले आये ॥ ३७ ॥

आधे रास्ते पर उन्होंने शिशुओं का हरण कर लेने वाले उस भगासुर नामक दैत्य को देखा। तब प्रभु मयूरेश्वर ने चन्द्रमा तथा सूर्यकी-सी आभा वाले तथा अत्यन्त उद्दीप्त अपने परशु नामक आयुध को उठाया और उसे उस असुर के कण्ठ की ओर फेंका और पशु को मारने के समान उसे मार डाला। कटकर उसका सिर उसी प्रकार चक्कर काटने लगा, जैसे वज्र के प्रहार से कटा हुआ पर्वतशिखर लुढ़क पड़ता है ॥ ३८-३९ ॥

तदनन्तर मयूरेश की योगमाया के प्रभाव से मोहित वे बालक उस भगासुर के पेट में उठ खड़े हुए और चिल्लाने लगे कि मयूरेश कहाँ है? बैठने, क्रीडा करने, सोने, जागने तथा भोजन करने के समय भी उन्हीं मयूरेश का ध्यान करने वाले वे सभी बालक उस भगासुर के मुख से बाहर निकल आये ॥ ४०-४१ ॥ वे उसी प्रकार बाहर निकले, जैसे कि गर्भवास से बालक बाहर निकलता है, निकलते ही उन्होंने गुणेश्वर को देखा। उन्हें देखकर वे सभी रोने लगे, स्नेह से उनका आलिंगन करने लगे और अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ४२ ॥

वे बालक बोले — दैत्य भगासुर के पेट में हमें मरा हुआ छोड़कर आप कहाँ चले गये थे ? हम लोग आपकी स्मृति के बल पर ही उसके पेट में जीवित थे और अब बाहर भी निकल आये हैं ॥ ४३ ॥

मयूरेश बोले — मैं सर्वत्र व्याप्त रहने वाला, सर्वत्र गमन करने वाला, सब कुछ जानने वाला और सबका स्वामी हूँ, मैंने तुम लोगों का परित्याग कभी नहीं किया था। तुम लोग कोई चिन्ता न करो ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर बालकों से घिरे हुए वे मयूरेश वापस लौट पड़े। कुछ बालक विचित्र प्रकार के अनेक शब्दों को करते हुए उन गुणेश्वर के आगे-आगे दौड़ रहे थे ॥ ४५ ॥ कुछ बालकों ने मयूरेश का छत्र पकड़ा हुआ था, और कोई बालक दण्ड तथा चँवर लिये हुए थे। मार्ग में धूल तथा ध्वजा देखकर मुनिगण बाहर निकले ॥ ४६ ॥ बालकों से घिरे हुए तथा मयूर पर आरूढ़ मयूरेश को देखकर उन मुनियों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वे सभी परस्पर एक-दूसरे से कहने लगे ॥ ४७ ॥ हमारे घरों में तो हमारे बालक पहले से ही विद्यमान हैं, फिर इस मयूरेश के पास वैसे ही ये दूसरे बालक कहाँ से आये, तब घर में विद्यमान बालकों तथा मयूरेश के पास स्थित उन बालकों से मिलने पर उन सभी मुनियों ने उन सभी बालकों को देवरूप में ही देखा ॥ ४८ ॥

तब मुनियों ने विचार से जाना कि ये सभी परब्रह्म परमात्मास्वरूप ही हैं। यह जानकर वे सभी मुनिजन आनन्द-सरोवर में निमग्न हो गये और वे यह नहीं जान पाते थे कि इनमें कौन बालक अपना है और कौन दूसरे का ! ॥ ४९ ॥ क्षणभर में ही पुनः उन्होंने न तो अपने बालकों को देखा और न मयूरेश के पास स्थित बालकों को ही देखा । वे भ्रमित होकर देख रहे थे । पुनः मयूरेश की माया से मोहित हुए वे सभी मुनिगण केवल अपने-अपने बालकों को ही देख रहे थे, अन्य बालकों को नहीं ॥ ५० ॥ कोई बालक अपने पिता के पास बैठकर वैसे ही पाठ कर रहा था, जैसे पहले करता था, कोई अपनी माता के पास आकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान कर रहा था ॥ ५१ ॥ कोई बालक अपनी माता का आलिंगन कर रहा था, तो कोई पिता का। कोई अपने भाई को मारकर वैसे ही रो रहा था, मानो उसी को मारा गया हो ॥ ५२ ॥ पार्वती ने भी अपने पुत्र मयूरेश को देखकर उसका आलिंगन किया एवं प्रसन्न होकर उसे स्तनपान कराया और प्यार भरे गुस्से से कहने लगीं — [हे वत्स!] तुम इतनी देरी क्यों आये हो ? ॥ ५३ ॥ तदनन्तर देवी पार्वती मयूरेश का हाथ पकड़कर उन्हें घर के अन्दर ले गयीं। वे सभी मुनिगण भी अपने-अपने बालकों को लेकर अपने-अपने आश्रम की ओर गये ॥ ५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें ‘भगासुरका वध’ नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०० ॥

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