श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-101
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ एकवाँ अध्याय
मयूरेश्वर द्वारा दसवें वर्ष में दैत्य कमलासुर की सेना का वध, मरे हुए सैनिकों का मयूरेश्वर की कृपा से मुक्ति प्राप्त करना
अथः एकशततमोऽध्यायः
दैत्यसेनावध

ब्रह्माजी बोले — दसवें वर्ष की बात है, एक दिन जब भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उनके वामभाग में देवी गिरिजा विराजमान थीं, और वे भगवान् शिव सात करोड़ गणों से घिरे हुए थे तथा अपने आँगन में नृत्य करते हुए शिशु मयूरेश को देख रहे थे, उसी समय गौतम आदि मुनिगण उनके पास आये और उन्होंने भगवान् शिव को प्रणाम किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर वे प्रबुद्ध मतिवाले मुनिगण महान् ओज- समन्वित भगवान् महादेव से बोले — हे शिव ! आप मयूरेश के साथ जितने समय तक यहाँ स्थित रहेंगे, तब तक अनन्त दैत्यों का आगमन यहाँ होता रहेगा, हम लोग इस कारण अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं, अतः हे शिव ! अब आप कहीं अन्यत्र रहने को चले जायँ अथवा हे हर ! आपकी आज्ञा हो तो हम ही कहीं अन्यत्र चले जाते हैं ॥ ३-४१/२

शिव बोले — आप लोगों के साथ मैंने नौ वर्ष अत्यन्त सुखपूर्वक व्यतीत किये हैं । मयूरेश ने आने वाले उन विघ्नों को भी दूर किया है, आप लोगों के चले जाने पर हमारे यहाँ स्थित रहने से क्या प्रयोजन है ? अतः मैं ही किसी निरापद स्थान पर चला जाऊँगा ॥ ५-६१/२

ब्रह्माजी बोले — भगवान् शिव के इस प्रकार के वचनों को सुनकर मुनियों ने उन्हें प्रणाम किया और वे ‘देव मयूरेश की जय हो’ ऐसा कहकर अपने स्थान को चले गये। भगवान् शिव भी अपने गणों को साथ लेकर वृषभ पर आरूढ़ होकर तथा पार्वती से समन्वित होकर एवं मयूर पर विराजमान मयूरेश को आगे करके अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने [अभीष्ट] स्थान को चल पड़े। उस समय विविध प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से समस्त आकाशमण्डल निनादित हो रहा था ॥ ७–९ ॥ शिव के साथ-साथ जा रहे मयूरेश के पीछे सभी मुनिगण भी [ उनको विदा देने हेतु] गये। उनकी पत्नियाँ भी स्नेहपूर्वक गद्गद कण्ठ से बोलने वाले अपने बालकों को साथ में लेकर गयीं। उस समय आकाश के धूलि से आच्छादित हो जाने के कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर भगवान् शिव ने उन सभी मुनियों एवं बालकोंसहित मुनिपत्नियों को लौटाकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥

इसी बीच में वहाँ पर सिन्धुदैत्य के द्वारा भेजा गया महान् [योद्धा] कमलासुर सेना लेकर आ पहुँचा। वह परम मायावी असुर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओं से भी अजेय था । उसे देखकर मुनिगण भाग चले ॥ १२-१३ ॥

[वे आपस में कहने लगे — ] हे मुनियो ! अरे, भगवान् शंकर का परित्याग करके तो कहीं भी नहीं रहा जा सकता। अब हम कहाँ जायँ, अब तो इस दैत्यराज के द्वारा हम मारे ही गये हैं ॥ १४ ॥

इस प्रकार विचार करने के उपरान्त वे सभी भयभीत मुनिगण पुनः भगवान् शंकर के समीप आ पहुँचे और उनसे कहने लगे कि हे महेश्वर! इस दैत्यराज से हमारी रक्षा कीजिये। आप मयूरेश के साथ सर्वदा हमारे साथ रहिये, यदि ऐसा नहीं होगा, तो आपके अनुगामी हम सभी भयभीत होते रहेंगे ॥ १५-१६ ॥

उन सभी ने मार्ग में कमलासुर को आता हुआ देखा, उसके साथ बारह अक्षौहिणी सेना थी, उसने आकाशमण्डल को धूलि से आच्छादित कर दिया था ॥ १७ ॥ उसकी सेना के गजारोही सबसे आगे चल रहे थे । तदनन्तर रथारोही, घुड़सवार और सबसे पीछे पैदल सेना चल रही थी। उन सैनिकों के शस्त्रों की चमचमाहट के सामने सूर्य का प्रकाश कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सेना के विविध प्रकार के शस्त्रों के संघर्षण से मिश्रित महान् कोलाहल की ध्वनि हो रही थी ॥ १८-१९ ॥ आगे-आगे चल रहे शिव के गुप्तचर दूतों ने उस महान् दैत्य को देखा। वह महादैत्य शंखासुर का भाई था और विविध प्रकार के वस्त्राभूषणों को धारण किये हुए था। उसने अनेकों प्रकार के आयुधों को धारण कर रखा था। गणों ने आकर उसके विषय में शिव को समाचार बतलाया। उसके पैर के आघात से तत्काल कूर्म, शेष आदि कम्पित हो उठते थे ॥ २०-२१ ॥ आगे-आगे जा रहे मुनिगण उसे देखकर भयभीत होकर भूमिपर गिर पड़े, तदनन्तर उन्होंने मयूरेश से कहा — हे मयूरेश ! हे महाभाग ! आप हम सबकी रक्षा किस प्रकार से करेंगे ? ॥ २२ ॥

ब्रह्माजी बोले — उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे गुणेश्वर बोले हे मुनिश्रेष्ठो ! भगवान् शिव के रहते हुए आप लोगों को कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। तदनन्तर मयूरेश ने भगवान् शिव को प्रणामकर उनसे कहा ॥ २३१/२

देव गुणेश्वर बोले — कमलासुर नामक दैत्य बहुत बड़ी सेना के साथ आया है, यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मैं शीघ्र ही युद्ध के लिये जाऊँ ॥ २४१/२

शिव बोले — हे पुत्र ! तुमने बहुत अच्छी बात कही है, इससे मेरे हृदय को बड़ा आनन्द हुआ है। वह दैत्यश्रेष्ठ बारह अक्षौहिणी सेना को साथ लेकर आया हुआ है, फिर तुम अकेले क्यों जाओगे, तुम सात करोड़ गणों से समन्वित होकर जाओ। तुम विजय प्राप्त करो । उस महान् बलशाली शत्रु को तुम शीघ्र ही मार डालो ॥ २५–२६१/२

देव बोले — हे स्वामिन्! आपके कृपाप्रसाद से मैं तीनों लोकों को दग्ध कर सकता हूँ, ऐसा मेरा विश्वास है, मैंने कितने ही दैत्यों को मार नहीं डाला है, क्या वह सब आपको ज्ञात नहीं है। फिर इस दैत्य की गणना ही क्या है, मैं शीघ्र ही विजय प्राप्तकर वापस लौटूंगा ॥ २७-२८ ॥

ब्रह्माजी बोले — पुत्र गुणेश्वर का यह वचन सुनकर भगवान् शिव ने उनका आलिंगन किया और सिर पर अपना मंगलमय हाथ रखकर हाथ में त्रिशूल धारण कराया ॥ २९ ॥ तदनन्तर भगवान् शिव ने गणों से समन्वित अपने पुत्र मयूरेश्वर को युद्ध की आज्ञा प्रदान की। महान् जयघोष के साथ दसों दिशाओं को निनादित करते हुए विघ्नों का विनाश करने वाले तथा युद्ध करने की लालसा वाले वे मयूरेश्वर प्रमथगणों के साथ निकल पड़े। उस समय पार्वतीसहित भगवान् शिव भी वृषभ पर आरूढ़ होकर युद्ध देखने की इच्छा से उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३०-३१ ॥

बहुत विशाल दैत्यसेना को देखकर मयूरेश ने अपने शरीर से बहुत बड़ी सेना को प्रकट किया, तदनन्तर दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा ॥ ३२ ॥ मयूरेश के विग्रह से प्रकट वे वीर सैनिक साक्षात् काल के समान ही थे । वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भक्षण करने में तत्पर दिखते थे । वे मेरुपर्वत के समान विशाल थे और अपने [गर्जन की] ध्वनिमात्र से पर्वतशिखर को भी गिरा | डालने वाले थे। तदनन्तर भीषण युद्ध प्रारम्भ होने पर दोनों सेनाओं के वीर परस्पर एक-दूसरे पर आघात करने लगे। उस समय सर्वत्र महान् अन्धकार छा गया। सभी दिशाएँ उठी हुई धूलि से आच्छादित हो गयीं ॥ ३३-३४ ॥ उस समय दैत्यों को यह महान् आश्चर्य हुआ कि पहले तो यह मयूरेश अकेला ही था, फिर कैसे यह अनेक रूपवाला हो गया, निश्चित ही यह कोई परम पुरुष है और पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये यह भगवान् शिव के यहाँ अवतीर्ण हुआ है ॥ ३५१/२

दैत्य के स्वरूप को अत्यन्त विस्तार वाला देखकर उन प्रभु मयूरेश्वर ने भी योगमाया का आश्रय लेकर सहसा ही उससे भी बड़ा अपना स्वरूप बना लिया ॥ ३६१/२

उस समय उन महापराक्रमी देव मयूरेश के दस हाथ थे और दसों हाथों में वे दस आयुध धारण किये हुए थे । तदनन्तर मयूरेश और उस दैत्य का नाना प्रकार के शस्त्रों के प्रहार से और नाना प्रकार की युद्धकलाओं के द्वारा परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३७-३८ ॥ मयूरेश के साथ आये गण तथा उस दैत्य के सैनिक कभी अलग-अलग होकर और कभी समूह बनाकर परस्पर युद्ध कर रहे थे। वे कभी मुट्ठी के प्रहार से तथा कभी दाँतों के काटने से तो कभी अस्त्र-शस्त्रों के द्वारा एक-दूसरे से युद्ध कर रहे थे ॥ ३९ ॥ इस युद्ध में किन्हीं के सिर फूट गये, किन्हीं के मुख भग्न हो गये, कोई-कोई जानु तथा जंघा से रहित हो गये और कोई रणभूमि में गिर पड़े ॥ ४० ॥ अस्त्रों तथा शस्त्रों के घात-प्रतिघात की ध्वनि से दसों दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए वे योद्धा धूल के द्वारा अन्धकार छा जाने के कारण अपना तथा अपने स्वामी का नाम ले-लेकर परस्पर प्रहार कर रहे थे ॥ ४१ ॥ उस युद्ध में सिर कटे हुए धड़ अपने सामने आने वाले अपने पक्ष के तथा शत्रुपक्ष के वीरों को मार रहे थे । अन्ततः दैत्य कमलासुर की सेना के सैनिक पराजित होकर उस दैत्य के समीप चले गये और उन्होंने कमलासुर को बतलाया कि असंख्य दैत्य मारे जा चुके हैं और उनके रक्त की नदियाँ प्रवाहित हो चली हैं ॥ ४२१/२

दैत्य बोला — इन्द्र आदि लोकपालों तथा ब्रह्मा आदि देवताग़णों को जिसने जीत लिया है, उससे युद्ध करने में यहाँ पर कौन समर्थ हो सकता है ! पृथ्वी को उलट देने में अन्य कौन समर्थ हो सकता है ! ॥ ४३-४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर उस दैत्य कमलासुर ने अपने शस्त्रों को लहराया, जिसके कारण सम्पूर्ण जगत् कम्पित हो उठा। क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले उस दैत्यराज ने मयूरेश के उन सभी गणों को मार गिराया, जो नाना वाहनों पर आरूढ़ थे और विविध शस्त्रों को धारण किये हुए थे। उसने युद्ध में उनके सिर, पैर और कमर को काट डाला था तथा हाथों को तोड़ डाला था ॥ ४५-४६ ॥ उस दैत्य के इस प्रकार के उत्कट पराक्रम को देखकर मयूरेश उसके समक्ष गये। उन्होंने अपनी गर्जना से आकाशमण्डल तथा स्वर्ग को निनादित करते हुए अपने दसों शस्त्रों से शत्रुओं को मारा। इस कारण असंख्य दैत्य मृत्यु को प्राप्त हुए और उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ मुक्ति प्राप्त की ॥ ४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘दैत्यसेना के वध का वर्णन’ नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०१ ॥

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