November 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-108 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ आठवाँ अध्याय पन्द्रहवें वर्ष में मयूरेश्वर द्वारा व्याघ्ररूपी दैत्य को विकृतरूप वाला बनाने की कथा तथा यमराज के गर्वापहरण का आख्यान अथः अष्टाधिकशततमोऽध्यायः रविजगर्वपरिहारं ब्रह्माजी बोले — पन्द्रहवें वर्ष में एक दिन मयूरेश बालकों के साथ पवित्र जलवाली ब्रह्मकमण्डलु (कमण्डलुभवा) नामक नदी में स्नान करने गये ॥ १ ॥ स्नान करने के अनन्तर शीघ्र ही अपना सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म पूर्ण करके उन बालकों ने अपने हृदय में स्थित गणनायक का मानस षोडश उपचारों के द्वारा पूजन किया। किसी ने कमल के आसन पर विराजमान मयूरेश की तो किसी ने मयूर पर आरूढ़ मयूरेश की दिव्य सुगन्धित द्रव्यों, दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य पुष्पों से पूजा की ॥ २-३ ॥ गार्ग्य नामक मुनि ने मन्दिर में रत्नों से निर्मित आसन पर विराजमान उन मयूरेश्वर का ध्यान करके उनकी पूजा की। इसी बीच अकस्मात् उस मन्दिर का द्वार बन्द हो गया। जबतक वे मुनि उसे खोलते, तबतक वह द्वार और भी दृढ़तापूर्वक बन्द हो गया। वे मुनि उसी के अन्दर चिल्लाने लगे और वे बालक भी रोने-चिल्लाने लगे ॥ ४-५ ॥ बालक बोले — हे देवेश ! आप ही हमारे माता हैं, आप ही पिता भी हैं, द्वार बन्द करके आप अन्दर क्यों स्थित हैं ? आप हमारे अपराधों को क्षमा करें ॥ ६ ॥ ब्रह्माजी बोले — उसी समय की बात है, महान् बल तथा पराक्रम से सम्पन्न एक दैत्य वहाँ आया । उसके महान् शब्द से तीनों लोक कम्पित हो रहे थे। वह दुष्ट दैत्य व्याघ्र का रूप धारण किया हुआ था। उसकी गरदन के खड़े बालों ने मेघों को छिन्न-भिन्न कर डाला था। वह अपने विकराल मुख को फैलाये हुए ऐसा लग रहा था, मानो तीनों लोकों को ग्रस डालेगा ॥ ७-८ ॥ उसे देखकर वे सभी बालक रोते-चिल्लाते हुए दसों दिशाओं में भाग गये । वह दैत्य मन्दिर के द्वार का भेदन कर मयूरेश के समीप आ पहुँचा ॥ ९ ॥ तब मयूरेश भी शार्दूल के समान रूप धारण करके क्षणभर में ही उसके समीप आ गये, उन शार्दूलरूपधारी मयूरेश को देखकर वह व्याघ्ररूपी दैत्य सहसा भाग पड़ा। तब शार्दूलरूपी मयूरेश भी उसके पीछे-पीछे भागे। इधर-उधर घूमते हुए वह व्याघ्र एक वन में पहुँचा और वहाँ एक निकुंज में छिप गया। तदनन्तर शार्दूलरूपधारी मयूरेश एक वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उस निकुंज के मध्य में कूद पड़े ॥ १०-११ ॥ मयूरेश ने अपने दोनों हाथों से उसके मुख को दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और अन्य हाथों से उसे खींचते हुए बाहर लाकर अपने परशु नामक शस्त्र से उसकी नासिका, उसके दोनों कान, दोनों पैर, पूँछ तथा आगे के दोनों हाथों को काट डाला। तदनन्तर गुणेश्वर ने ‘अब अपना मुख नहीं दिखलाना’ यह कहकर उसे छोड़ दिया ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर वह दैत्य व्याघ्ररूप को त्यागकर अपने वास्तविक दैत्यरूप में आकर उसी प्रकार का अर्थात् नासिका आदि अंगों के कट जाने से विकृत स्वरूपवाला हो गया। तदुपरान्त वह दैत्य मयूरेश्वर से बोला — तुम्हारे शरीर को भी मैं ऐसा ही छिन्न-भिन्न अंगों वाला कर दूँगा ॥ १४ ॥ यह कहकर वह दैत्य अपने घर को चला गया और मयूरेश भी अपने स्थान पर चले आये। तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेश कहाँ चला गया — इस प्रकार से दुखी मन से कहते हुए उनको ढूँढ़ने के लिये इधर से उधर घूमने लगे ॥ १४-१५ ॥ भ्रमण करते-करते अत्यन्त थके हुए वे बालक सुन्दर छायायुक्त एक वृक्ष के नीचे लेट गये। वे कहने लगे — इसी रास्ते से वे मयूरेश जायँगे, तब हम उनके चरणकमल का दर्शन करेंगे ॥ १६ ॥ उन बालकों को दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोया हुआ देखकर सूर्यपुत्र यमराज कुपित हो उठे । उनके नेत्र अत्यन्त लाल हो उठे। अपने क्रोध से ब्रह्माण्ड को भी निगल लेने का साहस रखने वाले वे यमराज उन बालकों को बाँधकर अपने स्थान को चले गये। तदनन्तर मयूरेश जब वहाँ आये तो उन्होंने वृक्ष के तल पर उन बालकों को नहीं देखा, तब वे अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गये ॥ १७-१८ ॥ उन बालकों से रहित होकर वे मयूरेश्वर अत्यन्त चिन्तामग्न हो गये। उन्हें कहीं भी सुख प्राप्त नहीं हो रहा था। उसी समय वहाँ मुनिगण आ पहुँचे ॥ १९ ॥ मुनिगण बोले — हे देव! हम लोगों के बालक कहाँ हैं, प्रात:काल आप उन सभी को अपने साथ ले आये थे। इस समय आप तो आ गये हैं, अब उनके बिना हम लोगों के प्राण निश्चित ही निकल जायँगे ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले — उनके ऐसा कहने पर भी देव मयूरेश्वर उनसे तो कुछ नहीं बोले, लेकिन केवल आँखों से बार-बार आँसू गिराने लगे। तदनन्तर वे कुछ सोच-विचारकर भास्करपुत्र यम की पुरी को चले गये। वहाँ यमदूतों ने अपने स्वामी यमराज को [मयूरेश के विषय में] बताया ॥ २१ ॥ दूत बोले — हे यम ! कोई युद्ध करने की इच्छा से यहाँ आया है, वह तीनों लोकों का विनाश करने वाला है, वह अत्यन्त उग्र ध्वनि कर रहा है। उसकी भुजाएँ विशाल हैं, हमारे द्वारा रोके जाने पर भी वह बलपूर्वक आ गया है ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब सिन्दूर के सदृश अरुण वर्ण वाले भयानक महिष पर आरूढ़ होकर दण्डधर यमराज एकाएक मयूरेश के समीप आ गये ॥ २३ ॥ यम बोले — जिसके दण्ड के आघात से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चूर-चूर हो जाता है, उस मेरे सामने एक छोटे- से बालक तुम कैसे युद्ध कर सकोगे ?॥ २४ ॥ देव मयूरेश बोले — हे यम! तुम अपनी महिमा का वर्णन कर रहे हो, किंतु मुझे तो तुम एक दरिद्र की भाँति प्रतीत होते हो। मेरी वक्रदृष्टि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विनाश कर डालेगी ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वे मयूरेश यमराज के कन्धे पर आरूढ़ हो गये और उन्होंने यमराज को उनके वाहन भैंसे के ऊपर से नीचे गिरा दिया, और तत्क्षण ही स्वयं भी उन यम के ऊपर जा गिरे ॥ २६ ॥ उन मयूरेश का ऐसा पराक्रम देखकर यमराज ने दोनों हाथ जोड़कर परम श्रद्धाभक्ति के साथ उन सुरेश्वर की स्तुति की ॥ २७ ॥ यम बोले — [ हे प्रभो !] आपके यथार्थ स्वरूप को न तो ब्रह्मा आदि देवता जानते हैं और न सनकादि महर्षि ही जानते हैं। आप परमेश्वर का वेद नेति नेति कहकर वर्णन करते हैं ॥ २८ ॥ आप अपनी इच्छा से संसार की सृष्टि करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और उसका संहार करने वाले भी आप ही हैं। आप सभी दुष्ट दैत्यों के विनाशक हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमारे द्वारा अकस्मात् किये गये अपराध को क्षमा करने की कृपा करें ॥ २९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करने के अनन्तर यमराज ने वस्त्रों, रत्नों तथा फलों द्वारा उन मयूरेश का पूजन किया। मुनिबालकों को लाकर उन्होंने मयूरेश को समर्पित कर दिया और स्वयं वे हाथ जोड़कर आगे खड़े हो गये। प्रसन्न होकर वे सभी बालक परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे और बोले — ॥ ३०-३१ ॥ बालक बोले — हम लोग आपके दर्शन के लिये प्रतीक्षा करते-करते जब थक गये थे, उसी समय यमराज हमें बाँधकर यमलोक ले गये। आपके दर्शन से हम मुक्त हो गये हैं, अब हम अपने-अपने घरों को जायँगे ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर वे सभी बालक मयूरेश्वर को आगे करके मयूरेशपुरी में स्थित अपने-अपने आश्रम को गये। वहाँ विविध प्रकारके वाद्यों की सर्वत्र ध्वनि हो रही थी। वह नगर अनेक प्रकार के ध्वज तथा पताकाओं से सुशोभित हो रहा था और पुष्पों की मालाओं से विभूषित था। उस महान् कौतुक को देखने के लिये यमराज भी उनके पीछे-पीछे गये ॥ ३३-३४ ॥ वहाँ उन मयूरेश के समक्ष वे सभी मुनिगण आये। उन्होंने देव मयूरेश की पूजा-स्तुति की और बालकों का आलिंगन किया। पहले जो मुनिगण मयूरेश पर कुपित हो उठे थे, उन सभी मुनियों से मयूरेश ने कहा — मैं क्षणभर में यमलोक से इन बालकों को ले आया हूँ ॥ ३५-३६ ॥ मुनिगण बोले — आप हमारी सर्वत्र रक्षा करते हैं, आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहकर और उनकी आज्ञा प्राप्त करके वे सभी मुनिगण अपने आश्रमों को चले गये। यमराज भी उन मयूरेश को प्रणाम करके बड़ी प्रसन्नता के साथ अपनी पुरी को गये। देव मयूरेश भी अपने घर पहुँचे और माता पार्वती तथा पिता भगवान् शंकर को हर्षित किया ॥ ३७-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘यमराज के गर्व के परिहार का वर्णन’ नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०८ ॥ Content is available only for registered users. 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