श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-110
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ दसवाँ अध्याय
सिन्धु दैत्य द्वारा गण्डकीनगर में बन्दी बनाये गये देवताओं को लिये मयूरेश का नन्दीश्वर को वहाँ प्रेषित करना
अथः दशाधिकशततमोऽध्यायः
दूतप्रेषणं

ब्रह्माजी बोले — प्रसन्नता में भरे हुए विजयी मयूरेश सबसे आगे चल रहे थे और उनके पीछे वे मुनिबालक जा रहे थे, और फिर वृषभ पर आसीन भगवान् शिव चल रहे थे। उनके पीछे गौतम आदि मुनिगण मयूरेश के विवाह के लग्न की सिद्धि करने के लिये जा रहे थे । अन्त में [ भगवान् शिव के गण] गरजते हुए तथा दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए चल रहे थे ॥ १-२ ॥ गण्डकीनगर जब एक योजन दूर रह गया था, तब मयूरेश अपने वाहन मयूर से उतर पड़े और एक श्रेष्ठ आसन पर बैठ गये। तदनन्तर अन्य सभी को, भगवान् शिव को, उनके गणों को तथा मुनीश्वरों को बैठाकर वे मयूरेश उनसे कहने लगे, उस समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे ॥ ३-४ ॥

दैत्य सिन्धु ने अपने कारागार में इन्द्र आदि सभी देवताओं को बन्दी बनाकर रखा है। अतः बिना उन्हें वहाँ से छुड़ाये विवाहकार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है ॥ ५ ॥ अतः उनको मुक्त कराने के लिये किसी श्रेष्ठ एवं बुद्धिमान् दूत को दैत्य सिन्धु के पास प्रेषित करना चाहिये। वह दूत यदि उन देवों को साथ लेकर यहाँ आ जाय तो सामनीति का आश्रय लेकर सभी का कुशल-मंगल हो जायगा। यदि ऐसा न हो सकेगा तो उस महान् बलशाली दैत्य सिन्धु को हम युद्ध करके जीतेंगे और देवताओं को बन्धन-मुक्त कर डालेंगे, उसके अनन्तर ही विवाह सम्पन्न होगा ॥ ६–७१/२

ब्रह्माजी बोले — उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे सभी लोग गुणेश्वर मयूरेश से कहने लगे । हे मयूरेश! एक बुद्धिमान्‌ की भाँति आपने बहुत उत्तम बात कही है। छोटे-से बालक होने पर भी आपकी बुद्धि देवगुरु बृहस्पति के समान अत्यन्त मंगलकारिणी है ॥ ८-९ ॥ बन्धन से मुक्त कराने के लिये पुष्पदन्त को वहाँ भेजना चाहिये। वे पुष्पदन्त महान् बुद्धिमान्, नीतिशास्त्र में पारंगत, उत्तम वक्ता, महान् बलशाली तथा श्रेष्ठ हैं, उन्होंने अपनी स्तुति (शिवमहिम्नः स्तोत्र ) – के द्वारा भगवान् साम्बसदाशिव को सन्तुष्ट किया हुआ है ॥ १०१/२

ब्रह्माजी बोले — यह सुनकर गन्धर्व पुष्पदन्त सुरेश्वर से बोले — हे मयूरेश ! आपकी महिमा मन तथा वाणी आदि के लिये भी अगोचर है, हे नित्यद्रष्टा ! आपकी माया से मोहित हुए जन आपको जान नहीं पाते हैं ॥ ११-१२ ॥ आप पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये भगवान् शिव के भवन में अवतीर्ण हुए हैं। इस समय कृपा करके आप मुझे वहाँ न भेजें, किसी दूसरे को वहाँ भेजें ॥ १३ ॥ वह सिन्धु दैत्य महान् बलशाली है और उसके पास बहुत बड़ी सेना है, वह पराक्रमी है और उद्धत भी है, अतः [शान्तिपूर्वक] उसका सामना करने में मैं सक्षम नहीं हो सकूँगा ॥ १४ ॥ तब मैं अपने बाहुओं के तेज से युद्ध ही करूँगा । यदि सामनीति से कार्य सिद्ध हो जाय तो ऐसी स्थिति में युद्धनीति को अपनाना व्यर्थ ही बताया गया है । साम के द्वारा यदि कार्य सिद्ध हो जाय तो दण्ड आदि उपाय व्यर्थ हैं। दान, भेद तथा दण्ड — इन तीनों उपायों का प्रयोग यदि सामनीति से कार्य न बने, तब करना चाहिये। यही सनातनी नीति है ॥ १५१/२

उन पुष्पदन्त के इस प्रकार के वचनों को सुनकर पार्वतीपति भगवान् शंकर कहने लगे — हे पुष्पदन्त ! तुमने ठीक ही कहा है, यही पुरातन नीतिमार्ग है। जो क्रोधी है, वह सामनीति का पालन करने में सक्षम नहीं होता; वह तो केवल वीरोचित वाक्यों का ही प्रयोग करना जानता है ॥ १६-१७ ॥ यदि कार्तिकेय को वहाँ भेजा जाय तो वे उस महान् दुष्ट सिन्धु दैत्य को पकड़ लायेंगे। यदि वीरभद्र को भेजा जाय तो वे केवल क्रोध ही करेंगे ॥ १८ ॥ यदि शृंगी को वहाँ भेजा जाय तो विनिश्चित ही संहार कर डालेंगे। यदि प्रमथ को वहाँ भेजा जाय तो मत्त होकर वे न जाने क्या कर बैठेंगे ॥ १९ ॥ यदि भूतराज को प्रेषित किया जाय तो वे उस दैत्य की सभा को भयभीत कर डालेंगे। यदि रक्तलोचन को भेजा जाय तो वे वहाँ विषयोपभोग में निरत हो जायँगे ॥ २० ॥

तदनन्तर उन सभी के भेजे जाने के प्रस्तावों के निरस्त हो जाने पर मयूरेश बोले — नन्दीश्वर को सामनीति का आश्रयण करने के लिये वहाँ भेजना चाहिये; क्योंकि वे नन्दी गम्भीरता में समुद्र के समान हैं, धैर्य में पर्वत के समान अडिग हैं, बुद्धि में देवगुरु बृहस्पति के समान हैं और बल-पराक्रम में जम्भ दैत्य के शत्रु अर्थात् इन्द्र के समान हैं, वे वंचना में निपुण और दूसरे के मन की बात को जानने वाले भी हैं ॥ २१-२२ ॥

शिव बोले — हे मयूरेश ! आपने बहुत अच्छी बात कही है, आप गुण तथा दोष को भलीभाँति जानने वाले हैं। नन्दी को विविध वस्त्र एवं रत्न प्रदान किये जायँ ॥ २३ ॥

तब मयूरेश ने शिव की आज्ञा से उन्हें रत्न और वस्त्र प्रदान किये और आज्ञा दी कि आप महान् बलशाली उस सिन्धु दैत्य के पास जायँ और जिस प्रकार से भी देवता बन्धनमुक्त हो जायँ, वैसी नीति का आश्रय लें। तदनन्तर वे बुद्धिमान् नन्दीश्वर शिव- पार्वतीसहित मयूरेश को प्रणाम करके और गणों को प्रणाम करके तथा महान् स्तुतियों के द्वारा भगवान् शिव एवं देवी पार्वती का स्तवन करके इस प्रकार समयानुकूल बात बोले — ॥ २४–२६ ॥

नन्दी बोले —  संसार में जिस पर भी आपका अनुग्रह होता है, वह महान् हो जाता है। आपने मुझे श्रेष्ठ बनाया है, अतः मैं आपके प्रयोजन को सिद्ध करूँगा ॥ २७ ॥ आपके अनुग्रह से मैं सम्पूर्ण पृथ्वी को भी शीघ्र ही उलट दूँगा। शेषनाग तथा सूर्य को भी आपके पास ले आऊँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २८ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहने के अनन्तर नन्दीश्वर सेना लेकर दैत्य सिन्धु के समीप गये। धैर्य धारणकर वे नन्दी मन के समान तीव्र गति से सिन्धु के नगर के द्वार के पास पहुँचे ॥ २९ ॥ उस समय उन्होंने गणेश, भगवान् शिव तथा सम्पूर्ण प्रयोजनों को सफल बनाने वाली देवी पार्वती का ध्यान किया, फिर वे अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये पार्वतीजी से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगे ॥ ३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘नन्दीश्वर के दौत्य के प्रस्ताव का वर्णन’ नामक सौ दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११० ॥

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