November 14, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-111 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय नन्दीश्वर का दैत्य सिन्धु की सभा में प्रवेश करके मयूरेश का सन्देश सुनाना, किंतु दैत्य सिन्धु के द्वारा देवताओं को मुक्त करने से मना कर देना, नन्दीश्वर का वापस लौटकर मयूरेश को सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाना, मयूरेश द्वारा गणों को युद्ध की आज्ञा देना अथः एकादशाधिकशततमोऽध्यायः विचारवर्णनं ब्रह्माजी बोले — नन्दीश्वर द्वारपाल द्वारा बताये जाने पर उस सिन्धुदैत्य की अत्यन्त रमणीय सभा में गये, वहाँ सभा में विराजमान उस सिन्धु दैत्य को देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १ ॥ वह सिन्धुदैत्य अनेकों प्रकार के अस्त्र तथा शस्त्र हाथ में लिये हुए महान् वीरों से घिरा हुआ था । वह वारांगनाओं का नृत्य देखने में तल्लीन था । मनुष्य लोग हाथ में पंखा लेकर प्रसन्नतापूर्वक उसे झल रहे थे ॥ २ ॥ उस समय वहाँ सभी प्रकार के बाजे बज रहे थे, जिनके नाद से सभी दिशाएँ निनादित हो रही थीं । उस सभा में उपस्थित कुछ दैत्यों ने उन नन्दीश्वर को देखकर यह समझा कि साक्षात् सूर्य आये हुए हैं ॥ ३ ॥ उन विशाल शरीर वाले तथा महान् वीर को देखकर कुछ दैत्य भय से काँप उठे। कुछ अन्य दैत्य उन्हें डराने के लिये बलपूर्वक भयंकर गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥ अपने पराक्रम के कारण निडर बने हुए नन्दीश्वर महान् धैर्यशाली होने से बिलकुल भी भयभीत नहीं हुए। उस दैत्य सिन्धु के द्वारा हाथ से संकेत किये गये एक उत्तम आसन पर नन्दी विराजमान हुए ॥ ५ ॥ उन नन्दी को देखकर सभी दैत्य उसी प्रकार निष्क्रिय हो गये, जैसे कि चित्र में अंकित पुत्तल आदि का दृश्य निष्क्रिय होता है। दैत्य सिन्धु का संकेत पाकर दूसरे बृहस्पति समान नन्दीश्वर कहने लगे — ॥ ६ ॥ मैंने इससे पूर्व में अनेकों सभाएँ देखी हैं, किंतु उनमें इस प्रकार के मूढ़जन मैंने कहीं नहीं देखे हैं । आप सभी लोग अत्यन्त बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं और श्री से परम सुशोभित हैं ॥ ७ ॥ आप सभी देखने में कामदेव के समान सुन्दर हैं, किंतु बुद्धि से वैसे ही प्रतीत होते हैं, जैसे वृक होते हैं । क्योंकि सभा में जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये — यही सनातन नीति है। मैंने ये सब बातें इस सभा में नहीं देखी हैं, इसलिये मेरे मन में बड़ा आश्चर्य है ॥ ८-९ ॥ ऐसी सभा के सभी सभासद् व्यर्थ हैं, सभी मन्त्रिगण व्यर्थ हैं और सभी उपस्थित नागरिकजन व्यर्थ हैं । यह न केवल राजा का धर्म है, अपितु राजसभा में उपस्थित सम्भ्रान्तजनों का भी कर्तव्य है ॥ १० ॥ ब्रह्माजी बोले — नन्दीश्वर के इस प्रकार के वचनों को सुनकर दैत्यराज सिन्धु उनसे बोला — हे गुणों के आकर स्वरूप! आपकी बुद्धि तो पद्मयोनि ब्रह्मा के समान प्रतीत होती है। हे वृषेश्वर! आप किसके द्वारा प्रेषित हैं, पंचानन कहाँ से आये हैं और आपके आगमन का क्या प्रयोजन है? आप तेज में अग्निसदृश हैं और पराक्रम में शिव के समान प्रतीत होते हैं ॥ ११-१२ ॥ नन्दी बोले — आप मुझे सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली गोमाता सुरभि का पुत्र समझें। मेरा नाम नन्दी है। मैं माता पार्वती के स्वामी भगवान् शिव का वाहन हूँ और ब्रह्माण्ड को भेद सकने की सामर्थ्य रखता हूँ। भगवान् शिव के भवन में देव मयूरेश ने अवतार ग्रहण किया है, वे पृथ्वी के भार का हरण करने वाले और दुष्टों का संहार करने वाले हैं। वे बाल्यावस्था से ही दैत्यों का वध करने वाले हैं ॥ १३-१४ ॥ उन मयूरेश के पराक्रम का वर्णन करने में शेषनाग तथा कमलयोनि ब्रह्मा भी असमर्थ रहते हैं । समुद्र- मन्थन के द्वारा जिस प्रकार से रत्नों का समूह बाहर निकला, उसी प्रकार आज आप नीति का मन्थन करके कार्यसिद्धि पर विचार करें । देव मयूरेश द्वारा आपके लिये प्रेषित अत्यन्त प्रबल आज्ञा का आप श्रवण करें ॥ १५-१६ ॥ जो कोई भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करता है, उसका निश्चित ही विनाश हो जाता है; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत् की रचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका विनाश भी कर देते हैं ॥ १७ ॥ आपने बलपूर्वक अपने कारागार में ‘देवताओं को बन्दी बनाकर रखा है और उनके पदों को स्वयं ग्रहण कर रखा है, इससे बड़े सौभाग्य की बात और क्या हो सकती है। इस समय आप देवताओं से वैर त्यागने का विचार कर सकते हैं, अतः आप मेरे स्वामी की आज्ञा मानकर सभी देवताओं को शीघ्र ही मुक्त कर दें ॥ १८-१९ ॥ त्रिपुरासुर ने भगवान् शिव के साथ वैर किया था तो वह क्षणभर में ही मारा गया। भगवान् विष्णु ने स्तम्भ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु को मार डाला ॥ २० ॥ तारकासुर ने देवताओं पर विजय प्राप्त की और उन सभी देवताओं के पद पर प्रतिष्ठित हो गया, किंतु कार्तिकेय ने बलपूर्वक युद्ध में क्षणभर में ही उसे मार डाला। अतः आप देवताओं को मुझे समर्पित करके सुखपूर्वक चिरकाल तक अपने स्थान पर बने रहें ॥ २११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — नन्दीश्वर के इस प्रकार के वचनों को सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा। आँखें लालकर वह आँखों से अग्नि उगलता हुआ-सा बोल पड़ा ॥ २२१/२ ॥ सिन्धु बोला — हे वृषनन्दन! मैंने तुम्हारी बहुत- सी चालाकी देख ली है, क्योंकि तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समय के अनुकूल बात न करने वाले का वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो ॥ २३-२४ ॥ तुम-जैसे बालक के कहने से तथा तुम्हारे स्वामी के कथनानुसार मैं देवताओं को कैसे मुक्त कर सकता हूँ, जबतक कि वह भी जीत नहीं लिया जाता ॥ २५ ॥ वन में विचरण करने वाले तथा तृण का भक्षण करने वाले तुम्हारे कथन का क्या प्रमाण ? तुम्हारा वह शिव कहाँ है और कहाँ उसका पुत्र है, तुम व्यर्थ ही मुझे भय दिखा रहे हो ॥ २६ ॥ यदि तुम दूत बनकर नहीं आये होते तो तुझ बैल को मैं आज ही हल में जोत देता । हे वृष! क्रोध के कारण यदि मेरी भृकुटियाँ टेढ़ी हो जायँगी तो तीनों लोक नष्ट हो जायँगे, फिर उन दोनों – शिव तथा मयूरेश की क्या गणना है ! रुष्ट हुआ सियार भला सिंह अथवा हाथी का क्या बिगाड़ लेगा ? तुम उसकी कामना कर रहे हो, जो सम्भव ही नहीं है, अतः खिन्न होकर ही यहाँ से जा सकोगे ॥ २७-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले — दैत्य सिन्धु के इस प्रकार के वचनरूपी बाणों से आविद्ध नन्दीश्वर क्रोध करते हुए बोले — ॥ २८१/२ ॥ नन्दी बोले — अरे अधम दैत्य ! आज मैं तुम्हारी बुद्धि विपरीत ही देख रहा हूँ। तुम सन्निपात ज्वर से व्याकुल हुए मरणासन्न व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही बकवास कर रहे हो, ‘पहले साम नीति का प्रयोग करना’ यह कह करके मेरे स्वामी ने मुझे भेजा है ॥ २९-३० ॥ किंतु तुम्हारे सामने सामनीति की बातें उसी प्रकार व्यर्थ हो गयी हैं, जैसे दुष्ट को दिया हुआ उपदेश व्यर्थ हो जाता है। यदि तुमने भगवान् शिव और मयूरेश की निन्दा की, तो समझ लो कि आज से ही तुम्हारी आयु के क्षीण होते जाने से तुम युद्ध में विजय नहीं प्राप्त कर सकोगे। अरे मूर्ख दैत्य! मैं तुम्हें अभी मार डालता, किंतु मेरे स्वामी की इस प्रकार की आज्ञा नहीं है। स्वामी को दूत का वध नहीं करना चाहिये और दूत को भी स्वामी का वध नहीं करना चाहिये ॥ ३१-३२१/२ ॥ इस प्रकार कहकर नन्दीश्वर अपनी निःश्वास वायु के द्वारा उन दैत्यों को गिराते हुए क्रुद्ध होकर बिना उस सिन्धुदैत्य से पूछे ही हर्षित होते हुए वहाँ से निकल पड़े और वे शीघ्र ही मयूरेश के समीप आ गये ॥ ३३-३४ ॥ देव मयूरेश्वर ने दूर से ही नन्दी को देख लिया और वे कहने लगे, नन्दी आ गया है । तदनन्तर नन्दी ने आकर उन मयूरेश को प्रणाम किया और आदि से लेकर अन्त तक समाचार उन्हें बतलाया ॥ ३५ ॥ नन्दी बोले — मैंने बहुत प्रकार से उस दैत्य को समझाया, किंतु उसने मेरी बात स्वीकार नहीं की, उसने बहुत प्रकार से मेरी भर्त्सना की और मैंने भी उसे धिक्कारा; किंतु जिस प्रकार से उलटे घड़े में जल की बूँद नहीं अटकती, उसी प्रकार उस दैत्य के लिये सब कुछ समझाना व्यर्थ हो गया ॥ ३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से नन्दीश्वर की बातें सुनकर और उनके वापस चले जाने पर उस दैत्य के मर्दन की लालसा से मयूरेश अत्यन्त प्रसन्न हो उठे । तब उन्होंने प्रमथ आदि गणों को युद्ध के लिये आज्ञा प्रदान की [ और कहा —] सिन्धुदैत्य के बन्धन से देवताओं को मुक्त करने के लिये इस समय तुम सब उसके नगर में युद्ध करने के लिये अत्यन्त उत्सुक होकर भयंकर शब्दों द्वारा गर्जना करो ॥ ३७–३९ ॥ सेनासहित उस सिन्धुदैत्य को मारकर सभी देवताओं को मुक्त करने के लिये और अपने आश्रम में जाने के लिये त्वरा दिखाने वाले मुनियों को भी [ पौरोहित्य – सम्बन्धी दायित्व से] मुक्त करने के लिये तुम लोग युद्ध के लिये जाओ ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘विचारवर्णन’ नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १११ ॥ Content is available only for registered users. 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